कल्हण | Kalhana

कल्हण – Kalhana

११ वीं शताब्दी के
अंतिम दिनों में (१०८९-११०१) कश्मीर में हर्ष नाम का एक राजा राज्य करता था। राजा
हर्ष ने गद्दी पर बैठने के थोड़े ही दिनों बाद प्रजा पर अत्याचार करना शुरू कर
दिया। कश्मीर की प्रजा हर्ष के अत्याचारों से दुखी हो गई उसने विद्रोह किया। यह
विद्रोह
वर्ष तक चलता रहा। अंत में एक षड्यंत्र में राजा हर्ष मारा गया।

उसके दरबार में चंपक नाम का एक ब्राह्मण मंत्री था, जो बड़ा स्वामी
भक्त था। उसी मंत्री चंपक के पुत्र का नाम कल्हण था। राजा की मृत्यु के समय कल्हण
छोटे थे। इसीलिए लोगों का अनुमान है कि उनका जन्म
११००  के लगभग हुआ
होगा। राजा की हत्या होने के साथ ही है चंपक का जीवन भी बदल गया
और वह राज कार्य से अलग हो गए

कल्हण के पिता की तरह उनके चाचा, कनक की भी राज
दरबार में अच्छी पहुंच थी। कनक अच्छी संगीतज्ञ थे। महाराज की उन पर बड़ी कृपा थी।
उन्हें राज्य की ओर से प्रायः पुरस्कार मिला करते थे। राज दरबार के ऐश्वर्य में
पले हुए कल्हण को प्राचीन काल का बहुत बड़ा इतिहासकार माना जाता है।

भारत के प्राचीन कवियों की एक परंपरा यह थी की वे अपने बारे
में कुछ लिखना उचित नहीं समझते थे। वे ऐतिहासिक घटनाओं को भी कल्पना के रंग में
रंग कर उपस्थित करते थे
,  जिससे
असली इतिहास पर पर्दा पड़ जाता था। कल्हण मैं हमें यह दोनों ही बातें बहुत कम
मात्रा में मिलती हैं। उनकी पुस्तक से हमें उस समय की इतिहास तथा स्वयं कल्हण के बारे
में बहुत कुछ पता चलता है। कल्हण ने काव्य के रूप में कश्मीर का इतिहास लिख कर एक
बहुत बड़ा काम किया
था

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संस्कृत शब्द तरंग का अर्थ होता है
-लहर। “राजतरंगिणी” में कल्हण ने आठ तरंगों में कश्मीर के राज परिवारों के
उतार-चढ़ाव का वर्णन किया है। वह धन दौलत को तुच्छ समझते थे। उनके लिए कवि होना
अधिक सम्मान की बात थी। उनका कहना था कि जो लोग आराम से हाथी पर बैठकर सैर करते
हैं
,  जिनके पास धन और
वैभव है जिनके बड़े-बड़े महलों में हजारों सुंदर स्त्रियां रहती हैं वह जब मर जाते
हैं तो दुनिया उनको भूल जाती हैं। परंतु कवि सदैव जीवित रहता है। वह संसार का पथ
प्रदर्शक है।

इन्हीं गुणों के कारण स्वयं कल्हण और उनका लिखा हुआ कश्मीर
का इतिहास
राजतरंगिणी” आज भी लोकप्रिय हैं।

कल्हण के पिता शिव के भक्त थे और हर साल शिवयात्रा करने जाते थे। बालक कल्हण भी उनके साथ
जाते थे। पिता के धार्मिक विचारों की छाप उन पर भी पड़ी थी। फिर भी कल्हण बौद्ध
धर्म का बड़ा सम्मान करते थे। धर्म में दी जाने वाली बली और आहुतियां मैं उन्हें
विश्वास नहीं था। वह अहिंसा के पुजारी थे।

कल्हण ने कठिन परिश्रम करके अपनी पुस्तक “राजतरंगिणी   वर्ष में ही पूरी कर
डाली। पर उस पुस्तक को लिखने से पहले कल्हण को काफी अध्ययन करना पड़ा। इसके अलावा
उन्होंने आज के इतिहासकारों की तरह प्राचीन अभिलेखों का भी अध्ययन करके ऐतिहासिक
सामग्री एकत्र की और उसका अपने इतिहास में उपयोग किया।

            

ब्राह्मण परिवार में जन्म होने से कल्हण उस युग के
ब्राह्मणों की कमियों और बुराइयों से भी भली भांति परिचित थे। वह जानते थे कि
ब्राह्मण अब पहले जैसी मेहनत से न तो पढ़ते हैं और न ही पढ़ाते हैं। वे अधिक घमंडी
हो गए हैं और राज कार्यों में बिना बात के टांग अड़ाते हैं। इसीलिए कल्हण उन्हें
बहुत सम्मान की दृष्टि से नहीं देखते थे।

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जवाहरलाल नेहरू ने राजतरंगिणी के बारे में ठीक ही लिखा है
कि यह पुस्तक इतिहास भी है और कविता भी। यह पुस्तक ८०० साल पहले लिखी गई थी। इसमें
करीब हजार वर्षों की कहानी है और पहले भाग के मुकाबले इसका दूसरा भाग अच्छा लिखा
है। इसमें राजमहलो के षड्यंत्र हत्याएं धोखाधड़ी लड़ाई अत्याचारों आदि का वर्णन विस्तार
के साथ किया गया है। जैसा कि नाम से जाहिर है यह राजाओं की कहानी है आम जनता की
नहीं। इसमें उस समय की राजनीतिक सामाजिक और आर्थिक स्थिति का सच्चा और बड़ा सुंदर
वर्णन है। इससे पता चलता है कि उस समय स्त्रियां सभाओं की सदस्य होती थी और वीर
सिपाहियों के समान लड़ाई के मैदान में लड़ा करती थी।

कल्हण राज दरबार की बहुत सी भीतरी बातें जानते थे। उनके
पिता ने हर्ष की मृत्यु के बाद राज दरबार से अपना संबंध तोड़ लिया था। उनके चाचा
कनक भी काशी में जाकर बस गए थे। कल्हण को सरकारी नौकरी सहज ही मिल सकती थी। वह
चाहते तो उन्हें बड़ी आसानी से मंत्री का पद भी मिल सकता था परंतु उन्हें दरबारी
नौकरी के प्रति कभी आकर्षण ही नहीं था। वह तो साहित्य के प्रेमी थे और अपना सारा
समय पढ़ने लिखने में व्यतीत करते थे।

कल्हण का जन्म अमीर घराने में हुआ था। उन्होंने अपने जीवन
में कभी बुरे दिन नहीं देखे थे। वह अभावों से अपरिचित थे
|

कल्हण ने राजा हर्ष की मृत्यु का वर्णन बड़ी विस्तार से
किया है। जिस समय हर्ष की हत्या की गई थी
, उस समय मुक्त
नाम का एक स्वामी भक्त सेवक उनके साथ था। अपने स्वामी की मृत्यु के बाद वह किसी
तरह शत्रु के चंगुल से बच निकला। उसी ने राजा की हत्या का सारा हाल कल्हण को बताया
था।

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कल्हण ने अपने चाचा कनक के बारे में लिखा है कि वह काशी में
रहते थे और उनका जन्म स्थान परिहासपुर था। ऐसा प्रतीत होता है की कल्हण के पिता
परिहास
पुर में रहते थे और वही
शायद कल्हण का भी जन्म हुआ होगा।

रामायण में हम पढ़ते हैं किस स्वर्ग प्रस्थान करने से पूर्व
राम ने अपने पुत्रों और भतीजो को बुलाकर राज्य का बंटवारा कर दिया था। इस बंटवारे
में उन्होंने अपने दोनों पुत्रों लव और कुश को कश्मीर में लवपुरी और कुशपूरी के
राज्य दिए थे। कल्हण ने कश्मीर के राजाओं के वर्णन में इन दोनों राजाओं का भी
उल्लेख किया है ।

कल्हण की व्यक्तिगत जीवन की बातें बहुत कम मालूम है। उसके
बारे में अब काफी खोज
जारी है |
                 

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