पंडित रविशंकर शुक्ल की जीवनी | Ravishankar Shukla

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पंडित रविशंकर शुक्ल की जीवनी | Ravishankar Shukla

क्या आप जानते हैं, कि पहले भारत का सबसे बड़ा राज्य कौन सा था? इसका नाम है मध्य प्रदेश । पर १ नवंबर १९५६ से पहले मध्य प्रदेश का यह रूप नहीं था। तब इसमें वर्तमान मध्य प्रदेश के १७ जिले और महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र शामिल था । पुराने मध्य प्रदेश के विकास और उन्नति में पं.रविशंकर शुक्ल का योगदान भुलाया नहीं जा सकता।

१९३८-३९ में और अप्रैल १९४६ से मृत्युपर्यंत, दिसंबर १९५६ तक, वह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। राज्य के जनजीवन पर उनके बीसियों वर्षों के कार्यों की इतनी छाप पड़ी है कि उनका नाम और मध्य प्रदेश आपस में पर्यायवाची बन गए हैं। जब कभी, जहां कहीं मध्य प्रदेश की चर्चा आएगी, शुक्लजी के उल्लेख के बिना अधूरी रहेगी।

पं. रविशंकर शुक्ल का जन्म


पं. रविशंकर शुक्ल का जन्म २ अगस्त १८७७ को सागर में एक साधारण परिवार में हुआ था। वहीं उन्होंने प्राथमिक शिक्षा पाई। हाईस्कूल की परीक्षा रायपुर से पास की और इंटर की जबलपुर से। बी.ए. की कुछ पढ़ाई उन्होंने हिस्लाप कालेज नागपुर में शुरू की | पर बी.ए. की परीक्षा कलकत्ता से पास की। बाद में जबलपुर से एल.एल.बी. किया और रायपुर में वकालत की।

नागपुर में पढ़ते समय ही वह सार्वजनिक जीवन में कुद पड़े थे, पढ़ाई के दिनों में शुक्लजी क्रिकेट के मंजे हुए खिलाड़ी थे। वह बाएं हाथ से बल्लेबाजी करते थे और गेंद इतनी तेज फेंकते थे, कि हर दूसरी गेंद पर एक खिलाड़ी आउट हो जाता था |

उनका यह शौक उस समय भी जारी रहा जब वह कानून पास कर रायपुर में वकालत करने लगे।

पं. रविशंकर शुक्ल का जीवन


वह अपने स्वास्थ्य का भी पुरा ध्यान रखते थे और नियमित रूप से व्यायाम करते थे। उनके शरीर का डील-डौल तथा आकार असामान्य रूप से विशाल, खाना खाने की शक्ति अपार तथा उस पर बड़ी-बड़ी मूछें उन्हें एक पहलवान का स्वरूप प्रदान करती थीं | शरीर के डील-डौल का यह हाल कि जब उन्होंने कोट-पेंट को तिलांजलि देकर कुर्ता-धोती पहनने का संकल्प किया तो समस्या यह हुई कि उनके नाप की धोती नहीं मिली। काम चलाने के लिए दो धोतियों को सील कर मिलाया गया।

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पं. रविशंकर शुक्ल के कार्य


पढ़ाई के बाद और राजनीतिक क्षेत्र में कूदने तक पंडित रविशंकर शुक्ल कई सरकारी नौकरियों पर रहे। परंतु उन्हें लगा कि वह सरकारी नौकरियों के उपयुक्त नहीं हैं। इसलिए नौकरियों में उनका मन कभी नहीं लगा।

सरकारी नौकरियों के प्रति अरुचि उत्पन्न होने का एक विशेष कारण था, जब शुक्लजी एक बड़े अंग्रेज अधिकारी के साथ काम करने लगे, तो खाली समय में वह उस अधिकारी की गुप्त फाइलें देखते रहते थे। उनमें किसी कर्मचारी के बारे में अच्छी रिपोर्ट लिखी रहती थी और किसी कर्मचारी के बारे में बहुत बुरी। उन्होंने देखा कि ये सब रिपोर्ट बिना किसी आधार के लिखी जाती हैं।

एक बार शुक्लजी को, जो अकाल राहत अधिकारी बन गए थे, यह देखकर भारी ग्लानि हुई कि अकाल पीड़ितों को राहत बांटने में अधिकारी तथा व्यापारी घोटाला करते हैं। शुक्लजी बाद में जब तक इस पद पर बने रहे, अधिकारी होने के नाते मिलने वाला अपना सारा सामान स्वयं अकाल पीड़ित बच्चों में बांट देते थे। बच्चों के लिए उनके मन में बड़ा प्रेम था। वह उन्हें स्वस्थ और हंसमुख देखना चाहते थे।

इसके बाद उन्हें नायब तहसीलदारी तथा मुंसिफी के प्रस्ताव भी मिले, लेकिन शुक्लजी ने उन्हें साफ ठुकरा दिया। अल्बत्ता कुछ समय के लिए मर्दुमशुमारी (जनगणना) विभाग में गणक का काम और गजेटियर बनाने का काम अवश्य किया।

वह एक देशी रियासत खैरागढ़ के एक स्कूल में हेडमास्टर भी रहे। एक दिन एक समारोह में कुछ अच्छे विद्यार्थियों को पुरस्कार देने की बात आई, तो शुक्लजी ने एक सूची तैयार की। रियासत के दीवान मौलवी मुहम्मद हुसैन ने इस सूची में अपनी मर्ज़ी से कुछ परिवर्तन कर दिए।

शुक्लजी को यह बुरा तो लगा किंतु वह चुप रहे। उसके कुछ ही दिनों बाद खैरागढ़ में प्लेग फैल गई। लोग नगर छोड़कर भागने लगे, रियासत के इसी दीवान का पुत्र भी प्लेग की चपेट में आ गया। उस समय शुक्लजी अकेले ही थे, लेकिन उन्होंने दिन-रात उस लड़के की सेवा-सुश्रूषा की। काम करने का शौक एक गुण है, और वह भी तब जब स्वयं अपने हाथ से किया जाए। शुक्लजी में यह गुण असीमित था।

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पं. रविशंकर शुक्ल की वकालत


सन् १९०८ से उन्होंने वकालत शुरू कर दी। शुक्लजी के जीवन पर चार बड़े नेताओं का विशेष प्रभाव पड़ा। ये चार नेता थे – श्री बालगंगाधर तिलक, छत्रपति शिवाजी, पंडित मदनमोहन मालवीय और महात्मा गांधी।

तिलक का यह वाक्य कि “ब्रिटिश हुकूमत ताम्रपट्ट के ऊपर पट्टा लिखाकर नहीं आई है”, शुक्लजी के जीवन में परिवर्तन लाने वाला सिद्ध हुआ और जब ब्रिटिश साम्राज्य के अधिकारियों ने तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया, तो शुक्लजी के राजनीतिक विचार चरम सीमा पर पहुंच गए। इसके बाद देश गांधी की आंधी में बह गया । भला शुक्लजी जैसा स्वाभिमानी युवक उससे कैसे अछूता रहता | वह भी सत्याग्रह आंदोलन में कूद पड़े।

पं. रविशंकर शुक्ल की जेल यात्रा


१९२३, १९३०, १९३२, १९४० और १९४२ में वह जेल गए। सत्याग्रह आंदोलनों में भाग लेने के कारण उनका नाम ही वकीलों की सूची से काट दिया गया पर बाद में १९३५ में फिर लिख लिया गया।

सन् १९२६ से १९३६ तक वह रायपुर की जिला परिषद के अध्यक्ष रहे। इस अवधि में उन्होंने शिक्षा पर बहुत ध्यान दिया | जिले के बहुत से स्कूलों की संचालन व्यवस्था का उन्हें अवसर मिला। उस समय तक शुक्लजी पूरी तरह राष्ट्रीय रंग में रंग चुके थे इसलिए उस पद पर रहते हुए उन्होंने दो महत्वपूर्ण कार्य किए।

एक, स्कूली अध्यापकों में राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार करने के लिए उनके सम्मेलन आयोजित करने शुरू किए। दूसरे, उन्होंने जगह-जगह जाकर बच्चों को लाठी तथा लेजियम सरीखे शारीरिक व्यायाम का प्रशिक्षण देना शुरू कराया।

इन दोनों ही कामों से अंग्रेज अधिकारी बड़े नाराज हुए तथा इन कार्यवाहियों को तुरंत बंद करने के आदेश जारी कर दिए। किंतु शुक्लजी झुकने वाले नहीं थे, वह समझते थे कि केवल किताबी शिक्षा से बच्चों का बहुमुखी विकास नहीं हो सकता | उसके लिए कुछ और भी सीखना जरूरी है।

सन् १९३३ में वह स्वराज पार्टी के टिकट पर लैजिस्लेटिव कौंसिल के सदस्य चुने गए जब १९३७ में विभिन्न प्रांतों में प्रथम कांग्रेसी सरकारें बनीं, तो मध्य प्रदेश के पहले मंत्रिमंडल में पंडित रविशंकर शुक्ल भी लिए गए और उन्हें शिक्षा तथा कृषि विभाग सौंपे गए।

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पं. रविशंकर शुक्ल की विद्यामंदिर योजना


शिक्षामंत्री के नाते शुक्लजी ने पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों से लाभोपयोगी काम कराने की एक राष्ट्रीय योजना तैयार की | जो “विद्यामंदिर योजना” के नाम से प्रसिद्ध हुई। योजना का मूल उद्देश्य शिक्षा को स्वावलंबी बनाना था। इसके अंतर्गत पढ़ाई के अतिरिक्त छात्र-छात्राओं को कुछ काम भी करने पड़ते थे, जिसका उन्हें आर्थिक लाभ होता था। महात्मा गांधी की बुनियादी तालीम योजना से यह काफी मिलती-जुलती थी, इसलिए गांधीजी का आशीर्वाद भी उसे तुरंत ही मिल गया।

अगस्त १९३८ में वह प्रांत के मुख्यमंत्री चुने गए और नवंबर १९३९ तक इस पर रहे। नवंबर १९३९ में सभी प्रांतों की कांग्रेसी सरकारों ने इस्तीफा दे दिया। शुक्लजी ने भी इस्तीफा दे दिया। १९४० में उन्होंने व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लिया। अगस्त १९४२ में अन्य बड़े नेताओ के साथ वह भी पकड़ लिए गए। १५ जून १९४५ को वह रिहा हुए।

पं. रविशंकर शुक्ल का मुख्यमंत्री बनाना


१९४६ में वह पुनः मध्यप्रदेश विधान सभा के लिए चुने गए और अप्रैल १९४६ में प्रांत के मुख्यमंत्री बने ।

१९५१ में वह पुनः राज्य के मुख्यमंत्री चुने गए।

पंडित रविशंकर शुक्ल की मृत्यु


१ नवंबर १९५६ को जब नए मध्य प्रदेश का निर्माण हुआ, तो वह उसके भी मुख्यमंत्री बने। दुर्भाग्यवश दो महीने बाद ही ३१ दिसंबर १९५६ को ८० वर्ष की दीर्घ आयु में नई दिल्ली में उनका स्वर्गवास हो गया।

हिंदी समर्थकों में पंडित रविशंकर शुक्ल का नाम सदा अग्रणी रहेगा | मुख्यमंत्री के नाते और इसके साथ ही देश की संविधान सभा की सदस्यता के दौरान उन्होंने बराबर यही कोशिश की कि देश में हिंदी को सर्वोच्च स्थान मिले और इसका देशव्यापी प्रचार तथा प्रसार हो ताकि अंग्रेजी की दासता से मुक्त हुआ जा सके। वह “मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन” के संस्थापकों में से थे।

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