रास बिहारी बोस | Rash Behari Bose

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रास बिहारी बोस | Rash Behari Bose

देश और विदेश में ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्व क्रांति का पथ जिन लोगों ने अपनाया था और जिन्होंने सोए हुए भारतीय राष्ट्रवाद को जगाया था, उनमें रास बिहारी बोस (Rash Behari Bose ) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

रास बिहारी बोस का जन्म


रास बिहारी बोस (Rash Behari Bose) का जन्म २५ मई १८८६ को उनके मामा के घर हुगली जिले में भद्रेश्वर के समीप पलाति विघतीर नामक ग्राम में हुआ था। रास बिहारी बोस की प्रारंभिक शिक्षा चंद्रनगर में हुई, जहां उनके पिताजी की नौकरी शिमला के गवर्नमेंट प्रेस में लग गई और वह वहां चले गए।

बचपन में रास बिहारी बोस मनमाने ढंग से काम करने वाले और उद्दंड स्वभाव के थे। जब वह चंद्रनगर के डुप्ले कालेज में दूसरी कक्षा के छात्र थे, तब वह अपने शिक्षक से लड़ बैठे और उन्हें स्कूल छोड़कर कलकत्ता के मार्टन स्कूल में नाम लिखाना पड़ा। उन्हें कुश्ती-लठैती का शौक था, और पढ़ने-लिखने में मन नही लगता था। वह अंग्रेजी पलटन में भरती होने के लिए दो बार गए, लेकिन बंगाली होने के कारण भरती नहीं किए गए। इससे उनकों अँग्रेजी शासन के प्रति बड़ा क्रोध आया।

जब उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी तो मां उन्हें शिमला ले गई। उन्हें गवरनमेंट प्रेस में कापीहोल्डर की जगह मिल गई। लेकिन उनके व्यवहार से अधिकारी नाराज थे और इस्तीफा देने की नौबत आ गई। वह दो बार पहले घर छोड़कर भाग चुके थे। तीसरी बार भागकर कसौली पहुंचे और वहां पाश्चियर इंस्टीट्यूट में नौकरी कर ली।

१९०६ में देहरादून में जंगल अनुसंधान संस्थान के रसायन विभाग में क्लर्क बन गए। देहरादून में उनका संपर्क बहुत-से क्रांतिकारियों से हुआ, जिन्होंने पंजाब में आंदोलन का पुन: संगठन किया, क्योंकि लाला हरदयाल १९०८ में यूरोप जा चुके थे और उनकी कमान संभालने वाले जितेंद्र मोहन चटर्जी भी १९१० में यूरोप चले गए थे, रास बिहारी बोस ने पंजाब के क्रांतिकारियों का नेतृत्व बखूबी संभाला। बंगाल के क्रांतिकारियों से भी उनका संबंध घनिष्ठ होने लगा। बंगाल विभाजन से युवकों का खून अभी खौल रहा था।

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रास बिहारी बोस द्वारा बम फैके जाना


दिसंबर १९११ में दिल्ली दरबार की तैयारी जोरों पर थी। यह तय हुआ कि विभाजन के विरोध में वाइसराय लार्ड हार्डिंग पर बम फेका जाए। बसंतकुमार विश्वास को रास बिहारी बोस ने इस काम के लिए तैयार किया और २३ दिसंबर १९१२ को जब लार्ड हार्डिंग एक बड़े जुलूस में हाथी पर सवार होकर चांदनी चौक से गुजर रहे थे, उन पर बम फेंका गया। वह मरे तो नहीं, मगर गोरे शासक दहल उठे। सी.आई.डी. दौड़ पड़ी, पुलिस में तहलका मच गया। फिर भी रास बिहारी बोस लाख कोशिश करने पर भी गोरों की पकड़ में नहीं आए।

तीन चार अन्य लोगों को फांसी पर लटका दिया गया। रास बिहारी की गिरफ्तारी के लिए पुरस्कार की घोषणा की गई। उत्तर भारत में बगावत की हवा गरम होने लगी। सन् १९१३ में रास बिहारी बोस ने अंग्रेजी में “लिबर्टी” नामक एक पर्चा छाप कर बंटवाया, जिसमें यह घोषणा की गई थी कि “इंकलाब आज के समय का तकाजा है। भाइयों, उठ खड़े होओ। दिल्ली जैसे बम कांडों से अत्याचारियों के दिल तो दहल सकते हैं और उससे हमारे लक्ष्य सिद्धि में मदद भी मिल सकती है, मगर उनसे हमारे लक्ष्य प्राप्त न होंगे। हमारी आजादी की मंजिल सशस्त्र क्रांति के रास्ते ही हासिल हो सकती है। उठो, तैयार हो जाओ ।“ इससे स्पष्ट है कि रास बिहारी बोस के मन में आरंभ से ही छिटपुट रूप से चंद गोरे अफसरों को मार देने भर की बात न थी, बल्कि वह भली-भाँति जानते थे कि सशस्त्र क्रांति से ही अंग्रेजी हुकुमत का तख्ता उल्टा जा सकता है।

अब रास बिहारी बोस छिपे-छिपे क्रांतिकारियों का नेतृत्व करने लगे। पुलिस वाले उनके पीछे पड़े थे। लेकिन लाख कोशिश करने पर भी पुलिस उन्हें पकड़ नहीं पाई। १९१४ मे विदेशों से गदर पार्टी से लोग पंजाब आ चुके थे, जिंनका उद्देश्य भारत में सशस्त्र क्रांतिं करना था। उनके नेतृत्व के लिए रास बिहारी बोस ने पिंगले को भेजा और बाद में खुद भी अमृतसर गए। साथ ही देश के दुसरे हिस्सों में क्रांतिकारी तैयार किए गए, ताकि वे नियत समय पर क्रांति को सफल बनाने में सहयोग दे सकें। सेना में भी विद्रोह के बीज बोए गए। परंतु भेद खुल गया और कई क्रांतिकारी पकड़कर फांसी पर लटका दिए गए।

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रास बिहारी बोस एक फर्जी नाम का पासपोर्ट बनवाकर १९१५ में जापान चले गए। लेकिन वहां भी अंग्रेज सरकार के जासूस मौजूद थे। ब्रिटिश सरकार ने जापान की सरकार से कहा कि वह रास बिहारी बोस को पकड़कर उसे सौंप दे। कुछ उदार जापानियों की सहायता के कारण वह सात वर्ष तक उधर छिपते रहे। उन्होंने १७ बार मकान बदला और जापान सरकार उन्हें पकड़ नहीं सकी। अंत में उन्होंने एक जापानी लड़की से विवाह करके जापान की नागरिकता प्राप्त की। रास बिहारी बोस को जापान में अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करने का मौका मिला। यों तो श्री बोस के पास किसी विश्वविद्यालय की डिग्री न थी, फिर भी उनकी प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उत्तर भारत की समस्त भाषाओं के अच्छे ज्ञाता होने के साथ-साथ वह जापानी अच्छी तरह बोलते और लिखते थे। उनका संपर्क जापान के बड़े-बड़े लोगों से बढ़ता गया। वह भारत के क्रांतिकारियों के लिए हथियार आदि भेजने की व्यवस्था में लगे रहे। शंघाई से दो जहाजों में उन्होंने अस्त-शस्त्र आदि भेजे, लेकिन विश्वासघातियों के कारण सामान समुद्र में ही पकड़ लिया गया।

इंडियन इंडीपेडेंट्स लीग की स्थापना


रास बिहारी बोस ने ही सबसे पहले यह नारा बुलंद किया था कि “एशिया एशियावासियों का है। “ १९२४ में टोक्यो में उन्होंने इंडियन इंडीपेडेंट्स लीग की स्थापना की। स्वतंत्रता आंदोलन को शक्तिशाली बनाने के लिए रास बिहारी बोस ने २१ जून १९४२ को बैकाक में सम्मेलन बुलाया।

रास बिहारी बोस को विश्वास था कि सुसंगठित सशस्त्र क्रांति से ही देश को आजाद किया जा सकता है। उनका यह भी विश्वास था कि इस क्रांति को सफल बनाने में ब्रिटिश-विरोधी विदेशी राज्यों की सहायता आवश्यक है। १९३७ में जब जापान ने चीन पर हमला किया और जवाहरलाल ने इसकी निंदा की, तो रवीद्रनाथ ठाकुर के पास एक तार भेजकर रास बिहारी बोस ने अपना दुख प्रकट किया था और कहा था कि कांग्रेस के नेताओं को अपनी विदेश नीति सुधारनी चाहिए। जापान हमारा मित्र है। अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने में यह हमारी मदद करेगा। और हुआ भी यही। जापान सरकार को इस बात का विश्वास दिलाने में रास बिहारी बोस सफल रहे कि उसके ब्रिटिश विरोधी अभियान में सभी भारतवासी जापान का साथ देंगे। जापानी मान गए और श्री बोस को जापान सरकार की ओर से तरह-तरह की सुविधाएं मिलने लगीं।

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दिसंबर १९४१ में रास बिहारी बोस ने जापान में आजाद हिंद फौज की स्थापना की और कैप्टेन मोहन सिंह को उसका प्रधान नियुक्त किया। इस फौज का उद्देश्य भारत की भूमि से अंग्रेजों को मार भगाना था। इस फौज में लोगों को भरती कर सैनिक प्रशिक्षण दिया जाने लगा। किंतु बाद में मोहन सिंह और श्री बोस में मतभेद हो गया। कहा जाता है कि इस फौज के उद्देश्य से मोहन सिंह पूरी तरह सहमत नहीं थे। ४ जुलाई १९४३ को रास बिहारी बोस ने आजाद हिंद फौज की बागडोर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के हाथ सौंप दी, क्योंकि वह स्वयं अब बूढ़े हो चले थे। उन्होंने इंडियन इंडीपेंडेंट्स लीग के सभापति पद से इस्तीफा देकर सुभाष चंद्र बोस को इस पद पर नियुक्त किया और सिंगापुर की एक विराट सभा में इसकी घोषणा की।

रास बिहारी बोस अब अस्थायी आजाद हिंद सरकार के सर्वोच्च परामर्शदाता थे। नेताजी ने कहा था कि रास बिहारी बोस पूर्व एशिया में भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम के जन्मदाता थे।

रास बिहारी बोस की मृत्यु


रास बिहारी बोस का देहांत २१ जनवरी १९४५ को जापान की ही भूमि पर हुआ, जिसके वह नागरिक बन चुके थे।

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