समुद्रगुप्त - Samudragupt

अशोक के बाद मौर्य साम्राज्य छोटे –छोटे राज्यो मे बट गया | उत्तर-पश्चिम की ओर से विदेशियो के आक्रमण होने लगे | सिकंदर से साथ आने वाली कुछ यूनानी बैकट्रीया मे बस गए थे | सब से पहले यही यूनानी अथवा यवन भारत आए | इनका सबसे बड़ा राजा मीनान्दर या मिलिंद हुआ जिसने बौद्ध धर्म अपना लिया था | यूनानियों के बाद शक आए और फिर कुषाण | कुषाण वंश का सबसे बड़ा सम्राट कनिष्क हुआ और वह भी बौद्ध हो गया | वह बड़ा तेजस्वी था | उसका साम्राज्य पेशावर से पटना तक फैला हुआ था |

कनिष्क के बाद तीसरी पीढ़ी मे कुषाण साम्राज्य का संगठन छिन्न-भिन्न हो गया | भारत पर फिर से बाहरी हमले होने लगे | कनिष्क के कमजोर उत्तराधिकारी उस गड़बड़ी को सम्हाल न सके | नतीजा यह हुआ की उत्तर भारत की राजनीतिक एकता नष्ट हो गई और छोटे छोटे कई राज्य वहा कायम हो गए | ये राज्य आपस मे लड़ते रहते थे |

ऐसी परिस्थितियो मे भारत मे गुप्त वंश का उदय लगभग चौथी शताब्दी के आरंभ मे हुआ | श्रीगुप्त या गुप्त इस वंश के प्रथम शासक थे | इस वंश का तीसरा शासक चन्द्रगुप्त प्रथम बडा शक्तिशाली हुआ | उसने अपने राज्य की सुव्यवस्था की ओर विशेष ध्यान दिया | और कुछ वर्ष बाद ही यह दिखाई देने लगा की वह दिन दूर नही जब सारे भारत मे गुप्त साम्राज्य का डंका बजने लगेगा |

एक गुप्त अभिलेख से यह पता चलता है की समुद्रगुप्त के अनेक भाई थे जिसमे वह सबसे बड़े थे | उनके पिता ने उनके गुणो से प्रसन्न होकर उसे युवराज बनाया और अपने बाद राजा मनोनीत किया | चन्द्रगुप्त प्रथम की मृत्यु लगभग ३४० ई॰ मे हुई और उसके बाद समुद्रगुप्त सिहासन पर बैठे |

भारत के इतिहास मे समुद्रगुप्त का नाम हम आदर के साथ लेते है | समुद्रगुप्त ने सिहासन पर बैठते ही इस बात को समझ लिया की जब तक सब राजा एक होकर बाहरी शत्रुओ का मुक़ाबला नही करेंगे, तब तक देश की रक्षा और उन्नति होना असंभव है |

कुछ विद्धवनों का कहना है की चन्द्रगुप्त प्रथम के बाद उसके एक अन्य पुत्र “काच” ने भी राज किया | इसका कारण यह है की समुद्रगुप्त के सिक्को से मिलते जुलते कुछ ऐसे सोने के सिक्के भी मिले है जिन पर “काच” खुदा मिलता है | स्मिथ ने कहा है की यह “काच” नामक व्यक्ति समुद्रगुप्त का संभवत: भाई था | परंतु इस मत को स्वीकार करना कठिन है | इन सिक्को के पीठ पर “सर्वराजोच्छेता“ खुदा हुआ है | यह समुद्रगुप्त की उपाधि है | यह भी संभव है की समुद्रगुप्त का पहला नाम “काच” रहा हो और बाद मे अपने कुल के नाम के अनुरूप “समुद्रगुप्त” रख लिया हो |

समुद्रगुप्त का महान कार्य था उनकी दिग्विजय | इससे प्रयाग और मगध के बीच के गंगा तटवर्ती प्रांतो और अयोध्या के इलाके का छोटा सा राज्य फैलकर साम्राज्य हो गया | सिहासन पर बैठने के संभावत: कुछ ही दिनो के बाद उसने दिग्विजय की यात्रा की | उनकी विजयों की तालिका प्रयाग के किले मे खड़े अशोक के स्तम्भ पर खुदी है, जिसे प्रयाग का “प्रशस्ति लेख” कहते है | सब से पहले समुद्रगुप्त ने आर्यावर्त के नौ राज्यो के विरूद्ध युद्ध किया | इन सब राजाओ को जड़ से उखाड कर समुद्र गुप्त ने उनके राज्य अपने शासन मे लिया |

इसके बाद समुद्रगुप्त दक्षिण की ओर बढ़ा परंतु दक्षिणापथ के राजाओ के विरूद्ध यह अभ्यान संभव न था, जब तक की मूल और दक्षिणापथ के राज्यो के बीच के राज्य जीत न लिए जाए | ये बीच के राज्य मध्य भारत के वनो से भरे प्रदेश मे थे | इन राज्यो को भी समुद्रगुप्त ने परास्त करके अपने अधीन कर लिया |

दक्षिणापथ के राज्य समुद्रगुप्त के मूल से दूर थे | इसलिए उनके समुद्रगुप्त को अधिक भय नही था | समुद्रगुप्त ने उनकी श्री तो हर ली, लेकिन भूभाग पर कब्जा नही किया | पहले उन्हे परास्त करके समुद्रगुप्त ने बंदी कर लिया | फिर उनके राज्य उनको लौटा दिए | इन राजाओ की संख्या १२ थी | इनमे कांची के विष्णुगोप जैसे प्रसिद्ध राजा थे | कहते है की सुदुर दक्षिण मे चेर या केरल तक जाकर समुद्रगुप्त महाराष्ट्र खान देश के रास्ते अपना झण्डा फहरा कर लौटे |

समुद्रगुप्त की विजयो से आतंकित होकर सीमा के राज्यो ने समुद्रगुप्त को सब प्रकार का कर प्रदान करना स्वीकार कर लिया | समुद्रगुप्त की सेना मे उपस्थित होकर उसे सब प्रकार से संतुष्ट करना उनका इष्ट हो गया | ये राज्य पूर्वबंग, आसाम, नेपाल और हिमाचल के पर्वतीय प्रदेश थे |

इन सीमांत राज्यो की ही भांति कुछ गणराजय भी थे जिन्होने समुद्रगुप्त की शक्ति और विक्रम के सामने झुक जाना ही उचित समझा | ये राज्य एक प्रकार के पंचायती राज्य थे जिनमे प्राचीन काल की स्वतंत्र जातियो का निवास था | इनकी शक्ति और समरिकता प्रसिद्ध थी | पंजाब, राजपूताना और मध्यप्रांत इनके मुख्य स्थान थे |  इनमे मुख्य थे मालव, यौधेय तथा आभीर |

इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे राज्य भी थे जो संभवत: भारतीय भगौलिक सीमा के भी बाहर थे | समुद्रगुप्त की दिग्विजय से उन्होने भी उनके साथ मित्रता कर ली | अन्य राजाओ की भांति उन्होने भी घुटने टेक दिए और कर आदि देकर समुद्रगुप्त को वह संतुष्ट करने लगे |

समुद्रगुप्त ने भारत विजय के बाद अश्वमेघ यज्ञ किया | प्राचीन काल मे जब कोई राजा दिग्विजय करता था, तब इस विजय की घोषणा करने के लिए वह अश्वमेघ यज्ञ किया करता था | विजयी राजा एक घोडा छोडता था | वह घोडा हर राज्य मे जाता था | इसके पीछे पीछे एक भारी सेना भी जाती थी | यदि कोई घोड़े को पकड़ लेता तो अश्वमेघ यज्ञ करने वाला राजा उससे युद्ध करके उसे हराता था | समुद्रगुप्त से पहले, बहुत समय से यह यज्ञ करने वाला राजा कोई नही हुआ था | इस अवसर पर समुद्रगुप्त ने सोने के ऐसे सिक्के जारी किए थे, जिनके एक तरफ अश्वमेघ के घोड़े की तस्वीर और दूसरी तरफ समुद्रगुप्त के रानी की तस्वीर और “अश्वमेघ पराक्रम” लिखा हुआ था |

रणनीति मे कुशल होने के साथ साथ समुद्रगुप्त को शास्त्र, साहित्य, कला, संगीत आदि का बड़ा अच्छा जानकार थे | शास्त्रविदो और गुणीजनों का वह आदर करते थे और उनकी संगति करते थे | अनेक काव्य रचना करके कविराज की उपाधि भी उन्हे प्राप्त थी | समुन्द्रगुप्त संगीत प्रेमी भी थे और वीणा बजाने मे वह निपूर्ण थे और यह बात उनके समय के प्रचलिए सिक्को से भी स्पष्ट होती है | इन सिक्को पर वीणा बजाते हुए समुद्रगुप्त की आकृति बनी हुई थी |   

इसके अतिरिक्त समुद्रगुप्त विद्धवानो का भी बड़ा आदर करते थे | उनके दरबार मे कवि, कलाकार और संगीतज्ञ हमेशा आदर पाते थे और समुद्रगुप्त उन्हे प्रोत्साहन भी देते थे |

समुद्रगुप्त के शासन काल मे प्रजा को अपनी इक्छानुसार धर्म मानने की पूरी स्वतंत्रता थी | बसुबंधु नामक एक बौद्ध को समुद्रगुप्त ने अपना मंत्री बनाया था | श्रीलंका के बौद्ध शासक को भी उन्होने बोधगया मे एक विहार बनाने की अनुमति दी थी |

इतिहास मे गुप्तवंश के कार्यकाल को स्वर्णयुग कहा गया है | इसका कारण यह है की इस काल मे उत्तरी भारत एकता के सूत्र मे बंधा | शासन प्रबंध बड़ी कुशलता से किया गया | न्याय-व्यवस्था बड़ी उत्तम थी | लोग नियमो का पालन करते थे | गुप्त शासको ने जनता की भलाई के लिए कई काम किए |

समुद्रगुप्त ने भारत मे एकता स्थापित करके देश की समृद्धि की नीव रखी | बचपन से ही उनकी प्रतिभा प्रगट होने लगी थी | जब वह राजकुमार थे तभी उन्होने अपनी वीरता और नीतिकुशलता से सभी को मुग्ध कर दिया था |

समुद्रगुप्त ने ४० या ५० वर्ष तक राज किया | वह एक महान और अत्यंत योग्य शासक थे | समुद्रगुप्त का व्यक्तित्व बड़ा प्रभावशाली था और उसमे कई असाधारण गुण थे | समुद्रगुप्त अपने युग के न केवल सबसे बडे योद्धा थे, बल्कि वह एक ऊंचे दर्जे के राजनीतिज्ञ भी थे | इसके साथ ही साथ वह संस्कृत के जानकार और परम विद्धवांन व्यक्ति भी थे | इतिहासकार स्मिथ ने उनकी दिग्विजय के कारण उन्हे “भारतीय नेपोलियन” की संज्ञा दी थी |

Post a Comment

और नया पुराने