बसव - Basava

बसवेश्वर या बसव आराध्य संप्रदाय के अनुयायी मादिराज नाम के एक विद्वान ब्राह्मण के पुत्र थे। उनकी माता का नाम मादलाम्बे था। उनका जन्म मैसूर राज्य के बीजापुर जिले के बागेवाड़ी नामक ग्राम में लगभग ११३४-११९ के मध्य हुआ था। उनके मामा बलदेव, कल्याण के राजा बिज्जलराय (११५७-११६७ ई.) के मंत्री थे । बसव अपने ग्राम बागेवाडी से अपने मामा के पास पहुच गए और उन्हीं की अध्यक्षता में उन्होंने राजकार्य सीखा। जब बलदेव की मृत्यु हुई तब बसव की राजकार्य में दक्षता से प्रभावित होकर बिज्जलराय ने उन्हें अपना मंत्री बनाया।

बसव अत्यंत धार्मिक प्रकृति के व्यक्ति थे। जो समय राजकार्य से बचता, उसे साधु सेवा में व्यतीत करते थे | राजकोष उनके अधिकार में था। उसका बहुत-सा धन शैव साधुओ में खर्च होता। इससे कोष में कोई विशेष कमी ना आई, किंतु बसव के शत्रुओं ने राजा के कान भरने शुरू कर दिए। धीरे-धीरे राजा का मन पलट गया। जो उसको मित्र था, वही शत्रु प्रतीत होने लगा। उसने बसव को पकड़ने का प्रयत्न किया, किंतु बसव कल्याण से निकल गए। राजा ने बसको पकड़ने के लिए कुछ आदमी भेजें। बसव ने उन्हें आसानी से हरा दिया। तब राजा स्वयं एक बड़ी सेना लेकर उसके विरुद्ध चले। किंतु बसव की नीति निपुणता से प्रजा प्रायः उसकी ओर हो चुकी थी। बिज्जल युद्ध में पराजित हुआ। कुछ दिन बाद वह बसव को मना कर कल्याण वापस ले आया। बसव फिर शिव भक्तों की सेवा करने लगे और हर तरह से उन्होंने वीर शैव संप्रदाय की जड़ मजबूत की।

इतिहास की कुछ विद्वान बसव को वीर शैव संप्रदाय का संस्थापक मानते हैं, किंतु वीर शैव धर्म की परंपरा वीर शैव धर्म को अत्यंत प्राचीन मानती हैं। बसव केवल उसके प्रबल समर्थक थे। वीर शैव सिद्धांत का प्रतिपादन बसव के जन्म से पूर्व संभवत हो चुका था, किंतु उसे किसी अच्छे समर्थक की आवश्यकता थी। कर्नाटक प्रदेश के आसपास जैनो का काफी प्रभाव था। वैष्णवो की संख्या भी ठीक थी । शैव भी थे किंतु उनमें अनेक सभी देवी देवताओं को मान्यता देने वाले थे। ऐसे शैव कम थे जिन्हें एकांत शिव भक्ति में विश्वास हो।

एकांत शिव भक्ति में विश्वास करने वाले शैवो यानि बसव के मत वाले वीर शैव के सिद्धांत और आचार दूसरों से कुछ भिन्न थे।

वीर शिव संप्रदाय में उपनयन का स्थान दीक्षा ने ग्रहण किया है। उनका मंत्र ओम नमः शिवाय” हैं, और यज्ञोपवित के स्थान पर वे लिंग को धारण करते हैं। इसी आचार के कारण वे वीर शैव लिंगायत के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। स्त्री और पुरूष दोनों को दीक्षा लेने और लिंग धारण करने का अधिकार है।

वीर शैव मत के अनेक दार्शनिक विचार और आचार शायद बसव की समय से पूर्व भी थे । बसव ने वीर शैव धर्म को मजबूत और अधिक व्यापक बनाने के लिए एक राजनीतिज्ञ की दृष्टि से इसमें कुछ परिवर्तन किए |

कितने सिद्धांत और आचार बसव की कृति हैं यह बताना कठिन है। किंतु अनेक विद्वानों का अनुमान है कि बसव ने अनेक रूपों से लिंगायत धर्म को ब्राह्मण धर्म से भिन्न बनाने का प्रयत्न किया। संभव है कि स्त्रियों को अनेक अधिकार बसव की कृपा से मिले हो। ब्राम्हण, जैन आदि संप्रदायों के लोगों ने अनेक रूकावट पैदा किए थे, उन्हें अपवित्र माना था। लिंगायत संप्रदाय में स्त्रियों को वही अधिकार हैं जो पुरुषों को और वे उतनी ही शुद्ध हैं। शूद्र वैश्य आदि सब जातियों के लिए अब मुक्ति का मार्ग खुला था और हर एक को शिव मंत्र से दीक्षा लेकर मुक्ति पाने का अधिकार था। जात-पात के भेद से युक्त ब्राह्मण धर्म, जैन धर्म का सामना ना कर सका किंतु वीर शैव धर्म के मुकाबले जैन संप्रदाय को पीछे हटना पड़ा। वीर शैव ना मांस खाते हैं और ना मदिरा पीते हैं। इसीलिए जैनों के लिए वीर शैव धर्म मार्ग का पालन कठिन ना था। परंपरा से यह भी प्रसिद्ध है कि बसव ने जैनो के विरुद्ध बल का प्रयोग भी किया। एक अंग्रेज विद्वान का मत है की बसव ने मठों द्वारा समाज संगठन की पद्धति जैनों से ली थी| शाक्त संप्रदाय का संगठन अनेक शक्तिपीठ कर रहे थे। अद्वैत मत के प्रतिष्ठाता आदि श्री शंकराचार्य ने भारत के चारों कोने में मठ स्थापित किए थे। बसव के सामने शंकराचार्य का आदर्श पर्याप्त था। बसव ने एक नवीन समाज के ही संगठन नहीं किया, उन्होंने इस बात का भी ध्यान रखा की वीर शैव मत में सब ऐसे साधन उपस्थित हो जो आवश्यकता को पूरा कर सकें।

बसव दृढ़ प्रतिज्ञा और कर्मठ कार्यकर्ता थे। उन्होंने अपने समय की आवश्यकताओं को समझा और उन्हें पूर्ण करने की उपाय किए। उनके विचारों को क्रांतिकारी भी कहा जा सकता है। जात-पात में बंधी हिंदू जाति को इससे छुड़ाने की बसव ने कोशिश की। उसे उपदेश भी दिया कि ईश्वर एक है और कोई मूर्तस्वरूप नहीं है। स्त्रियों को उन्होंने समाज में अधिकार दिए और स्वयं जन्म से ब्राह्मण होते हुए भी उन्होंने ब्राह्मणों के विशेष अधिकार पर चोट की। लिंगायत संप्रदाय की वर्तमान स्थिति इस बात की प्रत्यक्ष साक्षी हैं की बसव ने अपने समाज निर्माण के कार्य के लिए ठोस नींव तैयार की थी। बहुत संभव है कि बसव से कुछ भूले भी हुई हो। संभव है कि उन्होंने कुछ ऐसे कार्य भी किए हो जिन्हें हम सर्वथा उचित न कह सके। किंतु उनके रचनात्मक कार्य का महत्व बहुत अधिक हैं और उसी के आधार पर बसव का भारत के महान धार्मिक नेताओं में स्थान हैं।

बसव की वचन सारे कर्नाटक में बहुत प्रसिद्ध और लोकप्रिय हैं। सभी जातियों और धर्मों के लोग उनकी वचनों को आदर की दृष्टि से देखते हैं। अपने आदर्शों और सिद्धांतों के प्रचार के लिए बसव ने बड़ी सरल कन्नड़ भाषा का प्रयोग किया। धीरे-धीरे बसव के वचन इतने लोकप्रिय हुए कि कन्नड़ भाषा के साहित्य में उनका एक विशिष्ट स्थान हो गया। यद्यपि बसव ने अपना जीवन आध्यात्मिक उन्नति में लगाया तथापि सामाजिक तथा आर्थिक विषयों के संबंध में उन्होंने जो विचार व्यक्त किए थे वह भी बहुत हद तक क्रांतिकारी थे। उन्होंने जातिभेद को मिटाया ईश्वर की दृष्टि में सबको समान ठहराया और स्त्रियों को समाज में उचित स्थान दिलाया।

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