अमीर खुसरो - Amir Khusro

आज से लगभग ६०० वर्ष से भी पहले भारत में अमीर खुसरो नाम के प्रसिद्ध कवि हुए थे । उन्होंने बोल चाल की भाषा में बहुत से गीत और पहेलियां लिखे हैं, जिनके कारण ६०० वर्षों से अधिक समय बीत जाने पर भी अमीर खुसरो की लोकप्रियता में कमी नहीं हुई है | अपनी रचनाओं के रूप में वह आज भी हमारे बीच में जीवित है । अमीर खुसरो ने हिंदी में भी बहुत कुछ लिखा। उन्होंने जैसी हिंदी का प्रयोग किया, वह आजकल की हिंदी के बहुत मिलता जुलता है। इस तरह उन्हें आधुनिक हिंदी का पहला कवि कहा जा सकता है।

खुसरो का जन्म १२५५ ई. में एटा जिले के पटियाली नामक ग्राम में हुआ था । इनके पिता जीविका कि खोज में बलख- हजारा से यहां आकर बसे थे। तीन भाइयों में खुसरो सबसे छोटे थे । वह ९ वर्ष के भी नहीं हो पाए थे कि उनके पिता का ८५ वर्ष की आयु में स्वर्गवास हो गया । पिता की मृत्यु के बाद इनके नाना नवाब इमाद-उल- मुल्क ने उन्हें पाला ।

जब खुसरो १२ वर्ष के हुए, तब उनके लिए जीविका की खोज की जाने लगी । उस समय तक खुसरो के परिवार के लोग तलवार चलाने और सेना में भर्ती होकर लड़ने जाने का एकमात्र पेशा जानते थे। परंतु खुसरो ने सेना में भर्ती होकर तलवार उठाने के बजाय कलम पकड़ना ज्यादा अच्छा समझा। शुरू से ही उनका मन कविता करने में ज्यादा लगता था । स्वभाव से वह शांतिप्रिय थे । उन्होंने अपना सारा ध्यान लिखने और पढ़ने में लगाया ।

अपनी एक पुस्तक की भूमिका में वह लिखते हैं, मैं १२ वर्ष की अवस्था में ही कविता लिखने लगा । परंतु मुझे कोई गुरु नहीं मिला । मैं पुराने और नये कवियों की कविताएं पढ़ता और उन्हीं के सहारे स्वयं लिखने की चेष्टा करता ।

उन दिनों कवि राज दरबारो में जाते और राजाओं को कविता सुनाकर धन पाने की चेष्टा करते थे। खुसरो ने भी यही धंधा शुरू किया । दूसरे कवियों के मुक़ाबले में खुसरो को दरबारो में बड़ी जल्दी सफलता मिली । उन्हें यश और धन भी अधिक मिला, क्यूकी वह अरबी, फारसी और तुर्की सभी भाषाओं में कविता कर सकते थे। दिल्ली के मुसलमान सुल्तान तुर्की या अरबी भाषा को आसानी से समझ सकते थे ।

शुरूआत मे, जब दिल्ली के दरबार में इन की पहुंच नहीं हुई थी, खुसरो को कुछ कठिनाई का सामना करना पड़ा। वह छोटे छोटे नवाबो और सरदारों की सेवा में भटकते रहे। दिल्ली के सुल्तान गयासुद्दीन बलबन के बड़े बेटे शहज़ाद मुहम्मद को उन्होंने अपनी शायरी से बहुत खुश कर दिया । वह उन्हें इतना अधिक चाहता था, कि वह अपने पास से उन्हें हटने न देता था,  जब १२८४ ई. में पंजाब में मुगलों का आक्रमण होने पर जब वह लड़ने गया तब खुसरो को भी अपने साथ ले गया । इस लड़ाई में शहज़ाद मारा गया और मुगल लोग खुसरो को पकड़ कर बलख ले गए। खुसरो के पिता और दादा बलख के ही रहने वाले थे । दो वर्ष बाद वह बलख से लौटे । भारतवर्ष पहुंचने पर उन्होंने गयासुद्दीन बलबन को उसके पुत्र की मृत्यु के संबंध में लिखी हुई अपनी कविता सुनाई । उनकी कविता में इतनी करुणा थी कि बलबन उसे सुनकर दुख से व्याकुल हो उठा और उसकी तबीयत एकाएक बहुत खराब हो गई । तीन दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गई |

अब खुसरो को नए आश्रय दाता की आवश्यकता पड़ी। दो साल तक वह अवध के सूबेदार के यहां रहे । उसके बाद वह दिल्ली लौट आए और बादशाह कैकोबाद के दरबारी के पद पर उनकी नियुक्ति हो गई।

सन् १९२० ई.में जब जलालउद्दीन ख़िलजी दिल्ली के तख्त पर बैठा तब खुसरो उनकी सेवा में हाजिर हुए । उसने खुसरो का नाम पहले से सुन रखा था । उनकी शायरी से सुल्तान जलालउद्दीन बहुत प्रसन्न हुआ और उन्हें “अमीर” की पदवी दी । उसने उन्हें अपने दरबार में रख लिया और प्रतिमास एक लंबा वेतन देना आरंभ कर दिया ।

सन् १२९६ ई.में सुल्तान जलालउद्दीन को मारकर उसका भतीजा अलाउद्दीन ख़िलजी दिल्ली के तख्त पर बैठा । अलाउद्दीन भी अमीर खुसरो से खुश था। उसने इस बात का पूरा इंतजाम कर दिया कि खुसरो को पहले की तरह ही सारी सुविधाएं मिलती रहे । अलाउद्दीन ने खुसरो को "खुसरवे शोअरा" (कवि सम्राट) की उपाधि दी और साथ ही जलालउद्दीन से उन्हें जो वेतन मिलता था, उसे जारी रखा। १३१६ ई.में कुतुबुद्दीन मुबारक शाह सुल्तान हुआ । कुतुबुद्दीन भी शायरी का शौकीन था । वह खुसरो कि एक कविता पर इतना प्रसन्न हुआ कि उन्हें एक हाथी के वजन के बराबर सोना दे डाला ।

ख़िलजी वंश का अंत होने पर जब गयासुद्दीन तुगलक गद्दी पर बैठा,  तब खुसरो ने उसके नाम पर "तुगलकनामा" नाम की एक पुस्तक लिखी । यह खुसरो कि अंतिम पुस्तक कहीं जाती है।

सब मिलकर खुसरो ने ९९ पुस्तकें लिखी । प्रायः सभी पुस्तके फारसी अथवा अरबी में थी । हिंदी और उर्दू में इनमें से कुछ के अनुवाद मिलते है। मसनवी शीरी फरहाद,  मसनवी लैला मजनू और खालीकबारी नामक भी उनकी पुस्तके प्रसिद्ध है

खुसरो अपने समय में फारसी के सबसे बड़े कवि माने जाते थे । परंतु हिंदी मे उनकी कविताए प्रसिद्ध है । कोई कोई छंद वह ऐसा लिखते थे जैसे कि उसमें एक पंक्ति फारसी की होती थी, तो दूसरी हिंदी की।

खुसरो ने अपनी आंखो से गुलाम वंश का अंत, ख़िलजी वंश का उदय और अस्त तथा तुगलक वंश का आरंभ देखा था । उनके जीवन काल में दिल्ली के तख्त पर आठ सुल्तान बैठे  और उनमें पांच सुलतानों के दरबारो में उन्हें आदर के स्थान पर बैठने का सौभाग्य मिला।

खुसरो को जो मान आज मिल रहा है। उसका कारण उसके फारसी भाषा में लिखे ग्रंथ भी है। फारसी में उनके पांच कविता संग्रह और पांच खंडकाव्य भी है। भारत में अब तक फारसी के जो कवि हुए हैं, उनमें यह श्रेष्ठ माने जाते हैं। उन फुटकर छंदों के कारण लोग उन्हें हमेशा याद करेंगे जो उन्होंने हिंदी में लिखे थे । खुसरो तब भी बोलचाल की हिंदी में ही कविता करते थे।

जिस समय हमारे देश में भारतीय और मुसलमान देशों की सभ्यताओं का मिलाप हो रहा था, उस समय अमीर खुसरो ने एक बहुत बड़ा काम किया। उसने संगीत और साहित्य के क्षेत्र में दोनों सभ्यताओं के मिलाप को बहुत ज्यादा आगे बढ़ाया। भारत को खुसरो की यह बहुत बड़ी देन है |

खुसरो धार्मिक विचारों के आदमी थे। वह अपने पीर निजामुद्दीन औलिया की शान में जो कुछ कहते थे, उसका बहुत असर होता था। इसीलिए कव्वाली बहुत लोकप्रिय हुई और आज भी लोकप्रिय बनी हुई हैं। उनके कुछ गीत भी बड़े प्रसिद्ध हुए।

खुसरो अपने धर्मगुरु निजामुद्दीन औलिया को बहुत अधिक मानते थे। १३२४ ई॰ में औलिया की मृत्यु हो गई। खुसरो उस समय दिल्ली से बाहर थे। यह समाचार पाकर वह फौरन दिल्ली आए।

इसके बाद तो खुसरो घर छोड़कर अपने धर्म गुरु की समाधि के पास जा बैठे हैं और अपना सब धन लुटा डाला। उसी वर्ष उनकी भी मृत्यु हो गई। अपने गुरु की कब्र के पास ही वह दफनाए गए। आज भी उनकी कब्र पर मेला लगता है।

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