नानक देव – Nanak Dev

सिख धर्म को चलाने वाले गुरु नानकदेव का जन्म १४६९ लाहौर शहर के लगभग ३५  मील दक्षिण पश्चिम में राई गोई तलवंडी (ननकाना साहब) नामक ग्राम में एक खत्री परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम मेहता कालू था और माता का नाम त्रीपत था। मेहता कालू गांव के पटवारी थे।

कहते है, नानकदेव बचपन से ही ईश्वर में बड़ी श्रद्धा रखते थे। अपने मित्रों से कहा करते थे अगर तुम कोई नया खेल खेलना चाहते हो तो जो मैं करता हूं वही करो। तुम मेरी तरह बैठ जाओ और मेरे साथ साथ मन ही मन "सत्य कर्तार "कहते चलो।

जब नानक देव ७ वर्ष के हुए तब उनके पिता उन्हें गोपाल पंडित के पास विद्याभ्यास के लिए ले गए। गोपाल पंडित ने नानक देव को बड़े स्नेह से अपने पास बैठा कर उनसे पढ़ने के लिए कहा। नानक देव ने अध्यापक से पूछा - गुरुजी, आप मुझे क्या पढ़ाएंगे ?

अध्यापक बोल - मैं तुम्हें दुकानदारी का सारा हिसाब और गणित तथा दूसरी पुस्तके पढ़ाऊंगा।

यह सुनते ही नानकदेव ने उत्तर दिया - मैं ऐसी पढ़ाई नहीं पढूंगा। यह पढ़ाई तो इस नश्वर संसार में ही रह जाएगी। मैं तो ऐसी पढ़ाई पढ़ूंगा जो अंत समय में भी मेरे काम आए।

यह सुनकर गुरुजी आश्चर्यचकित होकर नानकदेव की तरफ देखते रह गए।

जब उनके पिता ने देखा कि हिंदी और गणित पढ़ने में पुत्र की रुचि नहीं है, तो कुछ सोच कर वह उन्हें पहले बृजलाल पंडित के पास संस्कृत पढ़ाने और फिर मौलवी कुतुबुद्दीन के पास फारसी पढ़ाने के लिए ले गए। लेकिन यह दोनों शिक्षक भी बालक नानक के ज्ञान को देखकर आश्चर्य में पड़ गए। नानक ने संस्कृत और फारसी पढ़ना भी स्वीकार नहीं किया। नानक देव के पिता को विश्वास हो गया कि उन्हें पढ़ाना-लिखाना बेकार है। इसीलिए उन्होंने अब नानकदेव को भैसे चराने के लिए भेजना शुरू किया। वह भैंसो को लेकर जंगल में चले जाते हैं और ईश्वर को ध्यान करने बैठ जाते हैं।

एक दिन जब ध्यान में लीन थे, तब उनकी भैंसे एक जाट के खेत में घुस गई और खेत का एक हिस्सा उजाड़ दिया। जाट ने गांव के बड़े मुखिया के पास शिकायत की। मुखिया ने नानक देव को बुलाकर पूछा - भैंसो से इसका खेत खराब क्यों करवा दिया।

नानक देव ने तुरंत ही उत्तर दिया - उजाड़ने और रखने वाला तो स्वयं ईश्वर ही हैं। उसमें उजाड़ा है तो वह बना भी देगा। हम और आप इसमें कुछ भी नहीं कर सकते।

कहते हैं जवाब बच्चे के मुंह से सुनकर मुखिया को फिर यह नहीं सूझा कि आगे क्या कहें।

नानक देव की एक बड़ी बहन नानीकी जी थी। उनका विवाह हो चुका था। वह नानकदेव को बहुत प्यार करती थी। जब उन्होंने देखा कि पिता नानक देव से नाराज रहते हैं तो अपने पति से आग्रह करके उन्हें अपने घर सुल्तानपुर ले आई। यहां आकर नानक देव ने दौलत खा लोदी के मोदीखाने का काम संभाल लिया और वहां बैठ कर सामान बेचने लगे।

जब नानक देव १८ वर्ष के हुए तब उनका विवाह मूलचंद्र जी की सुपुत्री सुलक्षणा देवी से कर दिया गया। सुलक्षणा देवी से श्रीचंद्र और लक्ष्मीदास नामक दो पुत्र हुए।

नानक देव अब तक किसी तरह मोदीखाने का काम चला रहे थे। लेकिन बहुत से लोगों को बिना पैसे लिए ही सौदा तौल देते थे। उनका कहना था अगर किसी के पास पैसे नहीं है तो क्या इसीलिए उसे जरूरत को सामान नहीं दिया जाए ?  गरीबों को नानक देव की कृपा से मुफ्त में ही सामान मिलने लगा ।

एक बार उनके साथ एक विचित्र घटना घटी। वह एक व्यक्ति को आटा तौल रहे थे। एक सेर दो सेर तीन सेर इस तरह १२ सेर तक तो गिनती ठीक आईं लेकिन तेरह आते ही आपने तेरह-तेरह कहना शुरू कर दिया। भला इस दुनिया में मेरा क्या है सभी कुछ तेरा (ईश्वर का) है। यह कहकर उन्होंने सारा आटा दे डाला। इसका नतीजा यह हुआ कि उसी दिन उन्हें मोदीखाने से अलग कर दिया गया।

नानकदेव ने जीवन भर लोगों के बीच वैर-भाव और राग द्वेष को मिटाने का भरसक प्रयत्न किया। वह कहा करते थे कि ना कोई हिंदू है ना मुसलमान। सभी उस परमपिता परमेश्वर के बंदे हैं। उनका कहना था कि दुनिया में कोई बुरा नहीं है। दूसरे की खराबी देखना छोड़ कर हमें पहले अपने दोष देखने चाहिए और उन्हें दूर करने  का प्रयत्न करना चाहिए, तभी हमारा जीवन सफल हो सकता है। दूसरों की सेवा करना ही गुरु नानक का आदर्श था।

नानक जी अपने समय के महान समाज सुधारक थे। उन्होंने छुआछूत अंधविश्वास तथा पाखंडों का जोरदार खंडन किया और परोपकार मानव प्रेम और सहयोग का महत्व समझाया। उन्होंने लोगों को मेल मिलाप से रहने का उपदेश दिया। हिंदू मुस्लिम एकता के वह भारी समर्थक थे। उन्होंने कहा कि सभी का ईश्वर एक ही है। जगह-जगह घूम-घूम कर उन्होंने लोगों को मानव प्रेम का पाठ पढ़ाया और शांति का प्रचार किया। सुख और शांति के उपदेशों को लोगों तक पहुंचाने के लिए ही गुरु नानक ने देश विदेश की यात्रा शुरू की।

सबसे पहले वह मनाबाद जाकर लालो नामक एक बढ़ई के घर ठहरे और वहां से दिल्ली, गया, काशी,  हरिद्वार और जगन्नाथ पुरी तक गए। इसके बाद वह दक्षिण भारत की ओर गए और वहां सेतुबंध रामेश्वरम,  अर्बुदगिरी तथा लंका आदि स्थानों में जाकर उन्होंने अपने धर्म का प्रचार किया। दक्षिण से लौटने के बाद उन्होंने गढ़वाल , हेमकुट,  टिहरी,  सरमोर,  गोरखपुर, सिक्किम,  भूटान और तिब्बत आदि की यात्रा की और वहां अपने उपदेशों का प्रचार किया। चौकी और अंतिम यात्रा में वह बलूचिस्तान होते हुए मक्का तक गए। इस यात्रा में उन्होंने ईरान, कंधार,  काबुल और बगदाद आदि में “सत्यनाम”  के उपदेश दिए। उन्होंने बताया कि संसार के सारे कार्य उसी एक परमपिता की मर्जी से होते हैं इसीलिए लड़ाई झगड़े और छोटे-बड़ों का भेद मिटाकर सच्चे हृदय से ईश्वर का स्मरण करना चाहिए। जो व्यक्ति दया, धर्म, नम्रता, प्यार और सत्य में लगा रहता है, वही इस जीवन में सुख पाता है।

नानकदेव के उपदेशों का सभी धर्मों के लोगों पर ऐसा गहरा प्रभाव पड़ता था, कि बहुत से लोग तुरंत ही उनके शिष्य हो जाते थे और उन पर गहरी श्रद्धा रखने लगते थे।

गुरु नानक का उपदेश देने का ढंग भी बड़ा निराला था। जब वह अरब में थे, तब एक बार वह मक्के की तरफ पैर कर सो गए। इस पर वहां के मौलाना-काजी लोग बिगड़े और बोले अल्लाह के घर की तरफ पैर कर मत सोओ।

गुरु नानक ने उत्तर दिया- काजी जी जिधर अल्लाह का घर ना हो उधर ही मेरे पांव कर दो।

सब लोग चकित होकर उनकी और देखते रह गए। गुरु नानक के पांव किस तरफ करें, यह उनकी समझ में नहीं आया, क्योंकि मूल्य और काजी जानते थे कि परमात्मा का निवास तो हर जगह है।

गुरु नानक का उपदेश देने का यही ढंग था। उन्होंने कितनी सीधी-सादी भाषा में और कितनी सरल ढंग से उन लोगों को अपनी बात समझा दी। इसीलिए उनके उपदेशों का लोगों पर बड़ा प्रभाव पड़ता था और वे उनके सामने नतमस्तक हो जाते थे।

नानक देव की महानता की एक और घटना इस प्रकार है - एक बार नानक देव के पिता ने उनको गुजरांवाला जिले के चुहड़काना नामक गांव में जाकर वहां से नमक, हल्दी आदि चीजें खरीद लाने को कहा। रास्ते में नानक देव को कुछ नंगे फकीर मिले। उन्होंने सारी रकम उन पर खर्च कर डाली और पूछने पर बताया कि मैंने तो “सच्चा सौदा” किया है |

गुरु नानक ने हिंदू-मुसलमान, बौद्ध-जैन आदि सभी धर्मों के पवित्र तीर्थों की यात्रा की थी। सभी जगह उन्होंने “सत्य कर्ता” यानी ईश्वर को स्मरण रखने का उपदेश दिया और सभी धर्मों को मानने वालों को समान रूप से प्रभावित किया। इसीलिए हिंदू हो या मुसलमान, जैन हो या बौद्ध सभी उनका आदर करते थे और बहुत से लोग तो उनकी शिष्य बन गए थे।

नानकदेव के दो प्रमुख शिष्य थे बाला और मरदाना, जो हमेशा उनके साथ रहते थे उनके बारे में कितनी ही किवदंतीया प्रसिद्ध हैं। एक बार नानक देव पंजाब में घूमते हुए हसन अब्दाल नामक एक ही स्थान पर पहुंचे। वहां बाबा ली कंधारी नाम का एक दंभी फकीर रहता था। संयोग से उस इलाके में पानी का एक ही स्त्रोत था जो उसके कब्जे में था। इस फकीर ने मरदानों के बार-बार प्रार्थना करने पर भी नानक देव के लिए पानी देने से इनकार कर दिया तब नानक देव ने जमीन फोड़ कर अपने लिए स्त्रोत बनाया और इस फकीर का स्त्रोत सूख गया। उसने क्रोध में आकर ऊपर से पहाड़ का एक टुकड़ा लुढ़का दिया जिसे नानक देव ने अपने पंजे से रोक लिया। पत्थर पर उनका पंजा बन गया। अब उसी स्थान पर एक विशाल गुरुद्वारा बना दिया गया। यह गुरुद्वारा पंजा साहब के नाम से प्रसिद्ध हैं।

२५ वर्षों तक भ्रमण करने के बाद गुरु नानक करतारपुर में आकर बस गए और वही अपना उपदेश देने लगे।

वही १५३८ ई। में अश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को गुरु नानकदेव की आत्मा इस नश्वर शरीर को त्याग कर परलोक सिधार गए।

मृत्यु के समय उनके बहुत से शिष्य उनके पास इकट्ठे हो गए थे। अब हिंदू और मुसलमान शिष्यों में नानक देव के शव के लिए झगड़ा होने लगा। हिंदू कहने लगे कि वह हमारे गुरु थे, इसीलिए उनकी संस्कार क्रिया हम करेंगे। दूसरी और मुसलमान कहते थे कि वह हमारे पीर थे। हम उनको कब्र में दफनाएंगे।

जिस जाति भेद को मिटाने के लिए गुरु नानक जीवन भर प्रयन्त करते रहे वहा ऐसा विवाद हो यह कोई शोभा की बात नहीं थी। लेकिन कहते हैं कि जब उनके शिष्यों ने उनकी चादर उठाकर देखी तो वहां उनका शरीर था ही नहीं। कुछ फूल पड़े थे। दोनों दलों ने आधे आधे फूल ले लिए और अपने अपने ढंग से उनका संस्कार किया। यही कहानी कबीर के बारे में भी कहीं जाती हैं।

गुरु नानक चले गए लेकिन उनके उपदेश आज भी हमारे मन में समाए हुए हैं। वह सही मायने में त्यागी पुरुष और महात्मा थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि संसार में सब कुछ झूठा है और कोई चीज स्थाई नहीं है। इसीलिए वह जोर देकर कहते थे कि मानव-जन्म लेकर जो मनुष्य परोपकार नहीं करता उनका जन्म व्यर्थ हैं। 

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