कृष्ण देव राय - RAJA KRISHNA DEV RAI

कृष्ण देव राय दक्षिण भारत में विजयनगर साम्राज्य के एक महान सम्राट थे । अशोक और चंद्रगुप्त की तरह उन्होंने भी अपने राज्य की उन्नति और प्रजा की सुख सुविधा की ओर विशेष ध्यान दिया। इसीलिए उनका शासनकाल साम्राज्य का स्वर्ण युग कहलाता है।

उनके राजतिलक के समय विजयनगर साम्राज्य लगभग छिन्न-भिन्न हो चुका था। किंतु इस सम्राट ने १० वर्षो के अंदर ही विजयनगर का प्रभुत्व सारे दक्षिण भारत में स्थापित कर लिया था।

कृष्णदेव राय का सबसे पहला काम जिहाद के बहाने हर वर्ष लूटपाट करने के लिए आने वाले यवनो को हराना और अपने साम्राज्य की सीमाओं को बढ़ाना था।

बीजापुर की आंतरिक झगड़ों से लाभ उठाकर कृष्णदेव राय ने रायचूर के बाद गुलबर्गा और फिर बीदर पर अधिकार जमा लिया। इसके बाद उन्होंने उदयगिरि को जीता। इस युद्ध में उड़ीसा की रानी तथा राजपरिवार के कुछ अन्य सदस्य कैद कर लिए गए थे। लेकिन कृष्णदेव राय ने किसी का अपमान नहीं किया। उन्होंने कैद कर लि  गजपति के राजकुमार वीरभद्र को एक प्रांत का राज्यपाल बना कर अपने कुशल राजनीतिज्ञ होने का प्रमाण दिया। जब उनकी सेनाए कलिंग की राजधानी कटक तक पहुंच गई, तब वहां के राजा ने सम्राट कृष्णदेव से संधि करके अपनी बेटी का विवाह उनके साथ कर दिया। कृष्ण देव राय ने भी उसका जीता हुआ भू-भाग उन्हे लौटा दिया।

अकबर की तरह कृष्णदेव राय भी सब धर्मों का सम्मान करते थे, क्योंकि उन्होंने इसे एक अच्छी और सफल नीति समझा। उन्होंने जैन धर्म को बढ़ावा भी दिया।

दक्षिण भारत में पुर्तगालियों के आने के साथ-साथ ईसाई धर्म भी भारत में फैला। सम्राट ईसाई पादरियों को सम्मान पूर्वक दरबार में बुलाया करते थे और उनकी धर्म-वार्ताएं सुनते थे। उन्होंने पादरियों को अपने धर्म का प्रचार करने और गिरजाघर बनाने की भी इजाजत दे रखी थी। कृष्णदेव राय ने मुसलमानों को अपनी सेना भी काफी संख्या में भर्ती कर रखा था। उनके राज्य काल में हिंदुओं ने मुसलमानों के लिए मस्जिद भी बनवाई थी। कृष्णदेव स्वयं तो वैष्णव थे, फिर भी उन्होंने शिव मंदिरों को आर्थिक सहायता दी।

वह मानव स्वभाव के बड़े पारखी थे । वह विदेशी राजदूतों से बड़ा अच्छा व्यवहार करते थे। उनका पूर्ण विश्वास था कि शत्रु राजा को भी मित्र बनाने का सबसे अच्छा ढंग यह है कि उसके राजदूत का पूरा सम्मान किया जाए। उन्होंने इसी नीति को अपनाते हुए बरार, बीदर व गोलकुंडा के सुल्तानों के दुतो को भी बहुत से उपहार भेंट किए,  हालांकि इन सुल्तानों ने कृष्णदेव को अपने दूतो द्वारा धमकी भरे पत्र भेजे थे।

कृष्णदेव राय के दरबार की बड़ी शान थी, जिसकी विदेशी दूतो तथा यात्रियों ने भी बड़ी प्रशंसा की हैं। उन दिनों अधिकांश दक्षिण भारत कृष्णदेव राय के अधीन था। उन्होंने साम्राज्य के प्रांतों में राज्यपाल नियुक्त कर रखे थे। उन्होंने शत्रु से भी दया का बर्ताव किया और जीते हुए शहरों के नागरिकों पर कभी जुल्म नहीं किए। उनकी महान सैनिक शक्ति, उनके शानदार व्यक्तित्व और उनकी विनम्रता तथा जनता के हित की भावना ने उन्हें लोकप्रिय बना दिया था।

माना जाता है कि कृष्णदेवराय की १२ पत्नियां थी, जिनमें तीन मुख्य थी। उन सभी के पुत्र राजकुमार समझे जाते थे।  

कृष्णदेव राय का राज्य काल दक्षिण भारत के साहित्य के इतिहास का स्वर्ण युग कहा जा सकता है। उनका दरबार संस्कृत, तेलुगू, तमिल और कन्नड़ के विद्वानों से भरा रहता था। वह स्वयं अच्छे लेखक थे और लेखकों का सम्मान करते थे। तेलुगु से उनका विशेष प्रेम था। तेलुगु में “आमुक्तमाल्यदा” नामक अपनी सर्वोत्तम कृति रचने से पहले उन्होंने लगभग एक दर्जन पुस्तके संस्कृत में लिखी थी।

उनके दरबार में साम्राज्य के ८ महान कवि रहते थे, जिन्हें अष्टदिग्गज कहा जाता था ।सम्राट इन कवियों का विशेष आदर करते थे। तेलुगु में लिखी उनकी आमुक्तमाल्यदा नामक काव्य कृति तेलुगु भाषा की पांच महान काव्य पुस्तकों में गिनी जाती हैं। इसके अतिरिक्त इस महान सम्राट के राज्य काल में न केवल औषधी शास्त्र पर ग्रंथ लिखा गया, बल्कि खाना पकाने की कला तक पर पुस्तके रची गई।

कृष्णदेव राय की शासनकाल में भवन निर्माण कला, मूर्ति व चित्रकला की भी बहुत उन्नति हुई। उनके महल के द्वार पर उनके व उनके पिता के चित्र बने हुए थे। इस महल में नृत्य की अनेक मुद्राओं को दीवारों पर चित्र किया गया था, क्योंकि नृत्य कला में भी सम्राट की बहुत रूचि थी। इसके अतिरिक्त दीवारों पर विभिन्न पक्षियों के चित्र भी बने थे।

महान निर्माता की नाते कृष्णदेव राय की तुलना मुगल सम्राटों से की जा सकती हैं। उन्होंने अपनी राजधानी की सुंदरता को बहुत बढ़ाया। उन्होंने मंदिर और महल बनवाएं। पुर्तगाली इंजीनियरों की सहायता से उन्होंने विजय नगर के पास के क्षेत्रों की बंजर भूमि मे सिंचाई का प्रबंध करवाया । उन्होंने अपनी मां नगल देवी के नाम पर नगलपुर नाम पर एक शहर बनवाया।

४० वर्ष की आयु में कृष्णदेव राय ने अपने ६ साल के बच्चे को राजा बनाया और स्वयं मंत्री का काम करने लगे। इस समय वह बूढ़े तो नहीं हुए थे पर यह कहा जाता है की किसी ऐसे रोग से ग्रस्त रहे हो, जिससे उन्हें मृत्यु का भय हो। कहते कि बच्चे को राज सिंहासन का अधिकारी बना देख कृष्णदेव राय की मंत्री सालूवा तिम्मा को अपनी आकांक्षाएं मिट्टी में मिलती नजर आ और उसने इस बच्चे को विष दिलवाने के प्रयत्न किए। इस समय कृष्ण देव राय की शारीरिक स्थिति खराब थी फिर भी उन्होने खुले दरबार में सलुवा तिम्मा पर आरोप लगाकर उसे जेल में डाल दिया।

जब तक कृष्णदेव राय जिंदा रहे, तब तक किसी बाहरी राजा की विजयनगर पर आक्रमण करने की हिम्मत नही हुई   लेकिन कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद शत्रुओ ने विजयनगर पर चारो ओर से आक्रमण शुरू कर दिए | उनके पुत्र की भी थोड़े समय के बाद मृत्यु हो गई और विजयनगर साम्राज्य दिन-व-दिन कमजोर होने लगा |  

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