मीराबाई - Meerabai   

मीरा बाई हिंदी की प्रसिध्द भक्त कवयित्री हुई है। वह राजस्थान की रहने वाली थी । मीरा के जीवन के संबंध में बहुत कम बाते मालूम है। उनके जन्म आदि के बारे में भी कुछ निश्चय पूर्वक कहना कठीन है। लेकिन ऐसा विश्वास किया जाता है कि १६वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में वह अवश्य जीवित थीं ।

राजस्थान के जोधपुर शहर का नाम आपने सुना होगा। इसे राव जोधा जी ने बसाया था । मीरा इन्हीं राव जोधा जी के वंश में पैदा हुई थी । राव जोधा जी राठौर वंश के थे । उनके पुत्र राव दूदा ने मेड़ता में राज्य स्थापित किया था । राव दूदा के पुत्र राव रत्नसिंह को मेड़ता राज्य की ओर से निर्वाह के लिए बारह गांव मिले थे । उन्हीं में से कुड़की नाम के गांव में राव रत्नसिंह के घर मीरा बाई ने जन्म लिया। मीरा बाई की माता का नाम कुसुम कुवर था । वह टांकनी की राजपूतानी थी ।

मान्यता है कि मीरा बचपन से ही, जब वह गुड़िया का ब्याह रचाने का खेल खेला करती थी। गोपाल जी की मूर्ति के पास बैठना पसंद करने लगी थी ।

मीरा की बाल्यावस्था में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया । अनुमान है कि अपने पिता की मृत्यु के समय मीरा कि आयु तीन वर्ष कि थी और माता की मृत्यु के समय दस वर्ष की। मां के निधन के कारण मीरा अपने दादा राव दूदा के पास आकर मेड़ता मे रहने लगी । मेड़ता मारवाड़ में था । वही उनका लालन-पालन और शिक्षा-दीक्षा हुई। राव दूदा परम वैष्णो भक्त थे । वह साधु-संतो को बड़ा आदर करते थे । धीरे-धीरे मीरा पर भी कृष्ण के प्रेम का रंग चढ़ने लगा ।

पर थोड़े ही दिनों में राव दूदा भी इस संसार से चल बसे । राव दूदा की मृत्यु के पश्चात उनके ज्येष्ठ पुत्र वीरमदेव जी राज्य सिंहासन पर बैठे । मीरा अब सयानी हो चुकी थी । वीरम देव को उनके लिए सुयोग्य वर ढूंढने की चिंता हुई । उन दिनों चित्तौड़ के सीसोदिया वंश की कीर्ति चारों ओर फैल रही थी । सिसोदिया वंश के सूर्य राणा सांगा बड़े प्रतापी थे । उनकी वीरता की कहानी चरो ओर फैली हुई थी । वीरम देव ने मीरा बाई का विवाह इन्हीं राणा सांगा के सबसे बड़े राजकुमार भोजराज के साथ कर दिया। इस प्रकार मीरा मारवाड़ की बेटी होकर मेवाड़ में ही ब्याह गई थी।

राणा सांगा का वंश वीरता और भक्ति दोनों के लिए विख्यात था । मीरा के ताऊ वीरमदेव ने सोचा कि यह घर मीरा के लिए अतिउत्तम रहेगा । पर मीरा के भाग्य में सुख नहीं था । कहते है कि मीरा को अपने पति राणा भोजराज का प्रेम और सम्मान पुरी तरह प्राप्त था । पर यह सुख मीरा अधिक दिन न भोग सकी । अल्प आयु में ही राणा भोजराज का स्वर्गवास हो गया । उधर बाबर से हार जाने के कारण मीरा के ससुर राणा सांगा को इतना आघात पहुंचा कि उनका भी देहांत हो गया ।

मीरा के हृदय में कृष्ण की भक्ति का अंकुर पहले ही फूट चुका था। इन घटनाओं ने उनके दुखी मन को झकझोर कर रख दिया । बिरह वेदना गीतों में बह निकली ।

राणा सांगा के बाद भोजराज के छोटे भाई रत्नसिंह मेवाड़ के राजा हुए, पर वह भी अधिक दिन जीवित नहीं रहे । इसलिए रत्नसिंह के सौतेले भाई विक्रमादित्य और विक्रमजीत राजा हुए। जैसे-जैसे इधर मेवाड़ की राजनीति और विशेषकर चित्तौड़ के राजघराने में परिवर्तन होने लगे, वैसे-वैसे मीरा का मन संसार कि ओर से हटकर अपने प्रभु के चरणों में लीन होने लगा । साधु समागम, हरि-कथा और कृष्ण-कीर्तन के आध्यात्मिक प्रवाह में मीरा सब कुछ भूल गई।

धीरे-धीरे महल में और महल के बाहर भी कानाफूसी होने लगी । लोग मीरा के बारे में तरह-तरह कि बाते कहने लगे । परंतु मीरा ने गोपाल से जो प्रेम संबंध स्थापित किया था, उसे वह किसी भी मूल्य पर तोड़ने को तैयार नहीं थी । वह इस सीमा से आगे जा चुकी थी, कि अब उन्हें लोक-लाज की चिंता नहीं रह गई थी ।

परंतु लोक-लाज की चिंता मीरा के देवर राणा विक्रमादित्य को तो थी । राजघराने की विधवा बहू, इस पर युवती और वह भी अनन्य सुंदरी, साधु-संतो के साथ उठे बैठे और कीर्तन करे, यह उन्हें ज़रा भी सहन न था । उन्होंने मीरा को हर तरह से समझाने की कोशिश की। मीरा के पास अनेक स्त्रीयों को भेजा । स्वयं अपनी बहन ऊदाबाई को भी समीप रखा । पर फल कुछ भी ना हुआ । मीरा पर कृष्ण प्रेम का जो नशा चढ़ा हुआ था, वह चढ़ा ही रहा, उतरा नहीं ।

क्रोध में आकर राणा ने मीरबाई को चरणामृत के रूप में विष और पिटारी में काला नाग भेजा । किंतु मीरा के राखनहार तो स्वयं भगवान कृष्ण थे, उनका बाल भी बांका न हुआ । इस डराने धमकाने कष्ट देने का मीरा पर उल्टा ही असर हुआ । कृष्ण के प्रेम का रंग दिनोदिन गाढ़ा हो चला । अपने उपर होने वाले अत्याचारों के प्रति मीरा सजग थी |

कृष्ण प्रेम में मीरा कि आत्मा इतनी ऊंची उठ चुकी थी, कि उन्हें सांसारिक सत्ता की सीमा का बोध हो गया था । वह जानती थी कि अगर राजा रूठ जाएगा, तो अपनी नगरी अपने पास रखेगा, अधिक से अधिक अपने राज्य से बाहर निकाल देगा । परंतु भगवान के रूठ जाने पर तो कहीं ठिकाना ही नहीं रहेगा । इसीलिए मीरा ने राणा की आज्ञा को ठुकराया और गोविंद के गुणगान में चित्त लगाया –

मैं तो गोविंद के गुण गाना | राजा रूठे नगरी राखे ||

हरि रूठे कहा जाना ? डिबिया में काला नाग जो भेजा, शालिग्राम कर जाना ||

राणा विक्रमादित्य और मीरा के रास्ते अलग-अलग थे । राणा लोक लाज और कुल की मर्यादा पर अटके थे, मीरा सांसारिक बातों के खोखलेपन से उपर उठ चुकी थीं। इसीलिए अब मीरा को अपना मार्ग चुनना था । उन्हें तय करना था कि वह राणा की यातनाएं सहे या राजमहल से संबंध तोड़कर स्वतंत्र हो जाए ।

जिस समय मीरा बाई इस उलझन में थी, उसी समय मीरा के कष्ट सुनकर उनके ताऊ बीरमदेव ने मीरा को चित्तौड़ छोड़ देने को कहा | चित्तौड़ छोड़ देने के बाद चित्तौड़ पर बड़ी विपत्तियां आयी। गुजरात के सुल्तान बादशाह ने चित्तौड़ छिन लिया । अंत में विक्रमादित्य भी मारे गए ।

उधर मेड़ता पर भी विप्पतियो के बादल छा गए। जोधपुर के राव मालदेव ने वीरमदेव से मेड़ता छिन लिया । ऐसी स्थिति में मीरा ने तीर्थयात्रा करने की ठानी । बस वह मेड़ता से निकाल पड़ी ।

मीरा कृष्ण को ढूंढती हुई, ब्रज कि ओर चली और वृंदावन जा पहुंची । लेकिन वृन्दावन मे ठहरे रहना भी मीरा के लिए कठिन था | वह तो उन सभी जगहो के दर्शन करना चाहती थी, जिन जगहो मे कृष्ण मे अपना जीवन बिताया था | इसलिए मीरा वृन्दावन से द्वारका को चल पड़ी | इस बीच चित्तौड़ और मेड़ता मे फिर से रौनक लौट आया | वहा से मीरा को वापस बुलाने के लिए लोग भेजे गए | मीरा पहले तो इंकार करती रही लेकिन बाद मे जाने को राजी हो गई | किन्तु द्वारका से विदा लेने के लिए जब वह रणछोड जी के मंदिर मे पूजा करने गई, की पूजा मे इतनी लीन हो गई की कहते है मूर्ति मे उन्हे अपने मे समेट लिया | इस प्रकार मीरा की जीवन लीला गुजरात मे समाप्त हुई |

मीरा ने अपने पदो मे रैदास को भी अपना गुरू माना है | साथ ही यह भी प्रसिद्ध है की उन्होने जीव गोस्वामी से दीक्षा ली थी | इस प्रकार एक तरफ उनका संबंध सगुनमार्गी भक्तो से सिद्ध होता है और दूसरी तरफ निर्गुणमार्गी भक्तो से भी |  

अन्य संत कवियो की तरफ मीरा ने भी भारत को अमर साहित्य दिया | मीरा की भाषा सरल और सीधे हृदय को छूने वाली है | मीरा का जीवन मारवाड़, मेवाड़, ब्रज और गुजरात मे बीता था इसलिए उनके भाषा पर इन चारो जगहो का प्रभाव है |  

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