ईश्वरचंद्र विद्यासागर

Ishwar Chandra Vidhyasagar


इस महापुरुष का जन्म १८२० में बंगाल प्रांत के मेदिनीपुर जिले के वीरसिंह नामक गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम ठाकुरदास बंद्योपाध्याय और माता का नाम भगवती देवी था। एक बार पढ़ लेने पर उन्हें पाठ याद हो जाता था और इसी तरह ग्यारह वर्ष की छोटी आयु में उन्होंने व्याकरण की परीक्षा पास करके साहित्य-श्रेणी में प्रवेश किया। इस श्रेणी में भी वह प्रथम रहे और उन्हें बराबर छात्रवृति मिलती रही। सोलह वर्ष की आयु में अलंकार श्रेणी में भी उत्तीर्ण हो गए इसके पश्चात वेदांत, स्मृति, दर्शन, आदि में भी पुरस्कार सहित उत्तीर्ण होते रहे। वह विभिन्न विषयों की पुस्तकों को कंठस्थ कर लेते थे, इसलिए विद्वानों ने उनका पांडित्य देखकर उन्हें 'विद्यासागर' की उपाधि प्रदान की और वह ईश्वरचंद्र विद्यासागर कहलाने लगे।

ईश्वरचंद्र विद्या के ही सागर नहीं थे, बल्कि दया के भी सागर थे। एक बार बचपन में एक लड़के ने उनसे एक आना मांगा, तो उन्होंने उससे पूछा – “अगर मैं तुझे एक रुपया दे दूं तो तू क्या करेगा ?

उसने उत्तर दिया – “चार आने के तो बेचने को मुरमुरे ले लूंगा, और चार आने के चने तथा आठ आने से हमारा सारा परिवार दो जून खाना खाएगा।“

लड़के के सच्चे उत्तर पर विद्यासागर अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे एक रुपया दे दिया। वह लड़का प्रसन्नतापूर्वक भागता हुआ चला गया।

इसके पश्चात कई वर्ष बीत गए। एक दिन विद्यासागर एक बाजार में से गुजर रहे थे कि अचानक एक व्यक्ति आकर उनके पैरों पर माथा रखकर बोला – “हे अन्नदाता ! आप मेरे घर जरूर पधारें । आप ही की दया से मैं आज इतना बड़ा सेठ बना हूँ। मैं आप को अच्छी तरह पहचानता हूँ। वही छोटा-सा कद, वहीं पहनावा।“

और फिर विद्यासागर के यह कहने पर कि “भाई, मै तो तुम्हें पहचानता नहीं, तुम बताओ तो सही कि कौन हो। मैंने तो किसी को कभी कुछ नहीं दिया। उस व्यक्ति ने बताया कि किस प्रकार उनके एक रुपये की बदौलत वह खोंचे से दुकान और दुकान से इतना बड़ा व्यापार कर सका था। अनुरोध कर वह उन्हें अपने घर ले ही गया।“

ईश्वरचंद्र ने अपनी शिक्षा समाप्त करने के पश्चात अध्यापन कार्य करना आरंभ किया। सबसे पहले उन्होंने फोर्ट विलियम कालेज में ५० रुपये मासिक वेतन पर नौकरी की। उसी कालेज में यूरोप से विद्यार्थी संस्कृत और बांग्ला भाषा की शिक्षा पाने के लिए आया करते थे। उन्हें अंग्रेजी का भी काफी अच्छा ज्ञान था। वह बड़े दयालु और परोपकारी थे। उनके अनुरोध पर लार्ड हार्डिंग ने बंगाल प्रांत में एक सौ के करीब विद्यालय खोले थे। ईश्वरचंद्र में त्याग की भावना कूट-कूटकर भरी थी। जिन दिनों वह ५० रुपये मासिक पर नौकर थे, उन्हीं दिनों उसी कालेज में २०० रुपये का एक पद खाली हुआ और वह उस पद के लिए चुने भी गए, परंतु उन्होंने उस पद को स्वयं न ग्रहण करके अपने एक दुखी मित्र पंडित तारानाथजी को ६० मील पैदल चलकर बुलाया और उसे सुशोभित कराया।

विद्यासागर फोर्ट विलियम कालेज में प्रधान राइटर नियुक्त किए गए, परंतु कुछ दिनों के पश्चात् उन्होंने वहां पर त्यागपत्र देकर संस्कृत कालेज के अध्यक्ष का कार्यभार संभाला। उन्होंने कालेज की उन्नति की एक रिपोर्ट लिखी थी, जिसे देखकर कालेज की कार्यकारिणी सभा ने खुश होकर उनका वेतन १५० रुपये से ५०० रुपये मासिक कर दिया। ईश्वरचंद्र कालेज में अध्यापकों और छात्रों में अनुशासन बड़े समर्थक थे। वह स्वयं समय से पहले पहुंच जाते थे और चाहते थे कि दूसरे भी समय पर आएं। जब वह कालेज के प्रिंसिपल थे तो कुछ प्रोफेसर ऐसे भी थे जिनसे उन्होंने स्वयं शिक्षा पाई थी। एक प्रोफेसर, जिनसे उन्होंने न्याय और तर्कशास्त्र का अध्ययन किया था, प्रायः देर से कालेज आया करते थे। ईश्वरचंद्र उनसे कुछ न कहते और उन्हें नमस्कार कर चुपचाप कक्षा में जाने देते। रोज-रोज की इस मूक डांट ने उस प्रोफेसर को बैचेन कर दिया और एक दिन वह ईश्वरचंद्र के सामने फूट पड़ा – “तुम मुझे कुछ कहते क्यों नहीं? मैं इस शांति को अब और अधिक बर्दाश्त नहीं कर सकता। मैं कल से जरूर समय पर आऊंगा।“

और इसके बाद वह प्रोफेसर फिर कभी देर से नहीं आया।

विद्यार्थियों के प्रति ईश्वरचंद्र उदार होते हुए भी एक कठोर अनुशासक थे। एक बार उन्होंने किसी कम उम्र के प्रोफेसर को नियुक्त किया। जब वह प्रोफेसर कक्षा में पढ़़ाने गया तो लड़़को ने उसका बहुत अपमान किया। ईश्वरचंद्र ने इसकी जांच की और अपराधी लड़कों का नाम पुछा, पर कोई भी लड़का खड़ा न हुआ। इस पर उन्होंने सब लड़कों को कालेज से निकाल दिया। लड़कों ने ईश्वरचंद्र की शिकायत उच्चाधिकारियों से करके उनके निकाले जाने की मांग की। ईश्वरचंद्र एक बार पहले कह चुके थे कि वह अपमान का जीवन बिताने की अपेक्षा तरकारी बेचना अथना परचून की दुकान करना अच्छा समझते थे। लड़कों को यह बात मालुम थी और वह अपने प्रिंसिपल का मजाक उड़ाने लगे।

जब विद्यासागर से इस बात का जवाब मांगा गया तो उन्होंने लिख दिया कि कालेज का अनुशासन बनाए रखने के लिए यह जरूरी है और उसमें अधिकारियों को दखल देने का कोई हक नहीं है। अधिकारियों ने कागज ईश्वरचंद्र को वापस भेज दिए और लड़को की बात अनसुनी कर दी। बाद में लड़कों को अपने प्रोफेसर और ईश्वरचंद्र से माफी मांगनी पड़ी। ईश्वरचंद्र कई जिलों में इंस्पेक्टर भी नियुक्त हुए। उन्हीं के अनुरोध पर बंगाल प्रांत में कई नार्मल स्कूल खोले गए थे जिनकी देखभाल वह स्वयं करते थे। एक दिन किसी बात पर शिक्षा विभाग के डायरेक्टर से उनका विरोध हो गया। उन्होंने देखा कि अब कोई भी कार्य शांति से नहीं होगा तो नौकरी छोड़ दी।

नौकरी छोड़कर उन्होंने साहित्य-सेवा का मार्ग अपना लिया और इसमें इतनी शीघ्रता से उन्नति की कि एक रात में सरल सुबोध संस्कृत व्याकरण की पुस्तक लिख डाली । उन्होंने संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी में ५० से ऊपर पुस्तकें लिखीं। जीवन चरित, बोधोदय, शकुंतला, विधवा-विवाह,वर्णपरिचय, मेघदूत, भ्रांति-विलास, बहूविवाह, इत्यादि इनकी प्रसिद्ध कृतियां है ।

उनकी तीव्र अभिलाषा थी कि देश में कोई अनपढ़ न रहे। उनके प्रयत्नों के फलस्वरूप कलकत्ता में बेथून विद्यालय और मेदिनीपुर, बर्दमान, हुगली और नदिया जिलों में ३० बालिका विद्यालयों की स्थापना हुई। शिक्षा विभाग से इनका विरोध था इसलिए इनके चलाने का भार भी उन्होंने अपने ऊपर ले लिया। बांग्ला पढ़ाने के लिए उन्होंने १०१ विद्यालय स्थापित किए और दिन में नौकरी करने वाले व्यक्तियों के लिए रात्रि में पढ़ने की व्यवस्था की।

विद्यासागर द्वारा स्थापित विद्यालयों में हजारों छात्र निःशुल्क पढ़ते थे। छात्रों की किताबों आदि का मूल्य और शिक्षकों का वेतन भी वह स्वयं ही देते थे । एक बार ईश्वरचंद्र के एक बूढे प्रोफेसर ने पहली स्त्री के मर जाने के बाद एक छोटी उमर की लड़की से विवाह कर लिया। ईश्वरचंद्र इस विवाह के विरुद्ध थे प्रोफेसर साहब जिद कर ईश्वरचंद को अपनी पत्नी से मिलाने घर ले गए, परंतु वह उसको देखकर जोर-जोर से रोने लगे। प्रोफेसर ने उन्हें शांत कर कुछ खाने का अनुरोध किया। ईश्वरचंद्र यह कहकर वहां से उठ गए कि वह उस घर में भोजन तो क्या एक बूंद पानी भी नहीं पिएंगे।

इस घटना के बाद से ईश्वरचंद्र को हिंदू समाज में प्रचलित इन कुरीतियों को दूर करने की लगन  लग गई और उन्होंने विधवा-विवाह को चालू करने के लिए विशेष प्रयत्न किया।

 ईश्वरचंद्र ने जहां देश की शिक्षा की स्थिति को सुधारा वहां कई अन्य सुधार भी किए। उनका  मन देश के सुधारों पर केंद्रित रहता था राजा राममोहन राय की चेष्टा से सती-प्रथा गैर-कानूनी घोषित  कर दी गई थी। साथ ही, ईश्वरचंद्रजी ने विधवाओं की दुर्दशा सुधारने का  दृण संकल्प किया और विधवा-विवाह संबंधी पुस्तकें लिखकर और शास्त्रों के प्रमाण दिखाकर अंधविश्वासियों को समझाने की चेष्टा की। उन्होंने बताया कि विधवा-विवाह शास्त्र-विरुद्ध नहीं। परंतु उनके इस कार्य का प्रभाव लोगो पर कुछ न हुआ और उल्टे लोग उनके शत्रु हो गए। उदाहरण स्थापित करने के लिए उन्होंने अपने इकलौते बेटे का विवाह एक विधवा से किया। सारे बंगाल में समाज-सुधार की लहर दौड़ गई। विद्यासागर के जयकार से नगर गूंज उठा। विचारों में इतने प्रगतिवादी होने के बावजूद विद्यासागर अपने रहन-सहन सीधे-सादे और पूर्ण रूप से भारतीय थे।

जब किसी को कष्ट होता था तो ईश्वरचंद्र हर प्रकार से उसका दुख दूर करने का प्रयत्न करते। किसी की बीमारी अथवा दुख का अगर उन्हें पता चलता था तो वह उसके घर जाकर उसकी तन-मन-धन से सेवा कर उसे आराम पहुंचाने की चेष्टा करते थे।

वह गरीब-अमीर का भेद नहीं करते थे और सब से समान रूप से मिलते थे एक बार वह कलकत्ता के एक बहुत बड़े जमींदार से मिलने जा रहे थे कि एक दुकानदार ने उन्हें बुला लिया। वह एक साधारण दुकानदार था। उसने एक बोरा बैठने के लिए डाल कर ईश्वरचंद्र को बैठा लिया। ईश्वरचंद्र उससे बड़े इत्मीनान से बातें कर रहे थे, तभी शानदार घोड़ों की बग्घी पर बैठा हुआ जमीदार उधर से निकला। जमींदार को ईश्वरचंद्र से मिलने के लिए उतरना तो पड़ा परंतु मन में उसे बड़ा संकोच हो रहा था। दूसरी बार जब ईश्वरचंद्र से उसकी मुलाकात हुई तो वह कहने लगा – “तुम जहां-तहां ऐसे ही क्यों बैठ जाते हो? अपनी इज्जत का क्या तुम्हें कोई ख्याल नहीं है?

विद्यासागर बोले – “आप मुझसे दोस्ती खत्म कर दीजिए, ताकि फिर आपको शिकायत का कोई अवसर न मिले। वह गरीब है, केवल इसलिए मै अपने दुकानदार दोस्त का अपमान नहीं कर सकता।“

ईश्वरचंद्र विद्यासागर के जीवन की एक-एक घटना हमारे लिए आदर्श है। इस महान आत्मा का १८९१ में परलोकवास हुआ। ईश्वरचंद्र आज संसार में नहीं है, परंतु उनका नाम अमर है।

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