संत तुकाराम  | Sant Tukaram


सत्रहवी शताब्दी में महाराष्ट्र ने बड़ी उन्नति की। इस संबंध में तीन नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है - शिवाजी महाराज, समर्थ गुरु रामदास, और तुकाराम ।

संत तुकाराम भी कबीरदास, सूरदास, तुलसीदास और मीरा की भांति ही प्रसिद्ध भक्त कवि थे । वह १६०८ में देहू गांव में पैदा हुए थे । कहते है कि मां-बाप के बहुत मनौती और साधना करने के बाद उनका जन्म हुआ था ।

मां-बाप ने बड़े प्यार से तुकाराम का पालन पोषण किया । जब वह कुछ बड़े हुए तो संगी-साथियों के साथ खेल में मस्त रहने लगे । बाद में इन खेलों को प्रतीक बनाकर तुकाराम ने अभंग (भक्ति गान) रचे । तुकाराम का सबसे प्रिय खेल “टीपारी” था । इस खेल में १३ या १७ खिलाड़ी रहते हैं । जो दो पक्ष में बंट जाते है। बचा हुआ एक लड़का बीच में खड़ा रहकर गाता है। दूसरे पक्ष के लड़के गीत की ताल पर अपने हाथ में टिपरियो( छोटे-छोटे लकड़ी के डंडों) से ताल देते हुए उस बीच के लड़के के बाई ओर से चक्कर लगाते हैं। उसके दोनों ओर प्रतिपक्ष के लड़के रहते हैं। जो कोई ताल देने में चुकता है उसे बीच में खड़ा होना पड़ता है और बीच का लड़का उसका स्थान ले लेता है। इस खेल का कौशल टीपरियो के एक नाद में ताल बन जाने और ताल के साथ पैर उठाने में है।  कहना नहीं होगा कि इस खेल ने तुकाराम के कवित्व को काफी निखारा ।


तुकाराम का बचपन तो खेल-कूद में बीत गया । इनके पिता लड़कों को लिखना-पढ़ना, हिसाब-किताब सिखाया करते थे । तुकाराम की बुद्धि इधर भी कम न थी । वह बड़ी सावधानी से काम की सब बातें समझते और जल्द ही दुकान तथा साहूकारी का जमा खर्च लिखने लगे। यह देखकर एक आदमी इनके पिता बोल्होबा से बोले कि आपका यह लड़का तो बड़ा होशियार है, कुल का नाम उजागर करेगा ।

पिता का तुकाराम पर अधिक मोह था । वह दुकान और व्यापार के काम में भी बड़े बेटे सावजी कि अपेक्षा इन पर अधिक भरोसा करते थे । जब वह चौदह पंद्रह साल के हुए तो उनका ब्याह कर दिया गया । पर थोड़े ही दिनों में पता चला कि बहू को दमे की बीमारी है । पुणे का एक साहूकार उन्हें अपनी पुत्री देने को तैयार भी हो गया और पिता ने सोलह साल की उम्र में उनका दूसरा ब्याह भी कर दिया । पहली पत्नी का नाम सुखमाई और दूसरी का नाम जिजाई रखा गया ।

इनके दो साल सुख से बीते । पिता की मृत्यु १६२५ में हो गई । अब गृहस्थी का सारा बोझ तुकाराम के कंधो पर आ पड़ा । उन्होंने बड़े धीरज से सब काम संभाला और अपने छोटे भाई कांहोबा का ब्याह खूब धूमधाम से किया । सच पूछा जाए तो उन्होंने इस ब्याह पर आवश्यकता से अधिक खर्च कर दिया । जिससे सिर पर काफी कर्ज हो गया ।

दूसरे ही साल मां को साथ लेकर तीर्थ यात्रा को चल दिए । इस लंबी यात्रा पर एक तो खर्च बहुत हुआ और दूसरे जब लौटकर आए तो दुकानदारी चौपट हो चुकी थी । गांव में किसी दूसरे आदमी ने अपनी दुकान जमा ली थी ।

            

इसके बाद ही देश में ऐसा भयंकर अकाल पड़ा कि तुकाराम के अभावो की सीमा ना रही । दिवाला निकल जाने से साख बिगड़ चुकी थी । अब तो कोई उन्हें अपने दरवाजे पर खड़ा भी नहीं होने देता था । इसी अकाल में उनकी पहली पत्नी, बड़ा पुत्र और मां वह चल बसी ।

उनकी दूसरी पत्नी जिजाई एक धनी घर की लड़की थी । उसे अपने पिता के घर के सुख याद आते और ससुराल के कष्टों को सोचकर वह बहुत कुढ़ती । चिढ़कर वह तुकाराम को कठोर बाते कहती । वह चाहती यह थी कि तुकाराम को कुछ समझ आए लेकिन पत्नी के कड़वे बोल सुनकर उनका जी और बहकता । वह तीखी बाते सुन बड़े दुखी होते और विट्ठल-विट्ठल कहते हुए मंदिर में चले जाते । पत्नी के तानों से दुखी होकर तुकाराम एक दो बार कुछ करने का निश्चय भी किया ।

उन्होंने दुकान का काम छोटे भाई कन्होबा के सुपुर्द किया और खुद एक व्यापारी का गल्ला दूसरे गांव में पहुंचाने का काम ले लिया । बोरिया बैलों पर लादी गई और तुकाराम उन्हें हाकते हुए घर से निकले । चलते चलते श्री विट्ठल का कीर्तन शुरू किया और उसी में उनकी लौ लग गई । मंजिल पर पहुंचकर देखा तो एक बैल खाली था। उनकी बोरिया या तो रास्ते में चोरों ने उड़ा ली या बैल ने खुद ही कहीं गिरा दी थी। पहुंचाने का भाड़ा मिलने के बजाय उल्टे बोरियो के दाम ही देने पड़े । बाहर लोग उनकी मूर्खता और विट्ठल भजन की हसी उड़ाते और घर में जीजाई उन्हें परेशान करती । उन्होंने निश्चय किया की अब ऐसे लापरवाही फिर कभी नहीं करूंगा । पर अब उन्हें भाड़े का काम मिलना कठिन था ।

आखिर इधर-उधर से थोड़ा पैसा जमा कर उन्होंने मिर्चे खरीदी और उन्हें दूसरे गांव में बेचने ले गए । वहां एक चतुर व्यापारी ने पहले तो इन्हे भाव और तौल में ठगा, फिर जो दाम देने थे वे नकद न देकर सोने के रूप में दिए । उसने समझाया की नकद पैसे के बजाय सोने का कड़ा ले जाने में कम खतरा है। घर जाकर पता चला कि कड़े का उपरी भाग तो सोने का है और अन्दर पीतल भरा है । यह सब जानकर जीजाई उन पर खूब बिगड़ी, पर अब क्या हो सकता था ?

इसके बाद जीजाई अपने पिता से दो सौ रुपए लाई । उन रूपयो का नमक खरीदा और तुकाराम को कर्नाटक की ओर बेचने भेजा । इस बार उन्होंने बड़ी सावधानी से काम किया । दो सौ का नमक ढाई सौ में बेचा । बड़ी खुशी और आनंद से विट्ठल का भजन करते करते लौटे । मार्ग में एक गरीब ब्राह्मण मिला । उसने उन्हें अपनी करुण कहानी सुनाई । उसकी गरीबी देख कर तुकाराम का मन पसीज गया और पास में जों धन था उसका अधिकांश भाग उसे दे दिया । घर आए तो फिर कोरे के कोरे। जिजाई ने सब हाल सुनकर माथा पीट लिया ।

इस बार तुकाराम दुखी होकर घर से निकले और इंद्रायणी नदी के उत्तर में आठ मिल दूर माननाथ पहाड़ पर जा बैठे । वहां एकांत में सोचने लगे कि मैं इस कुटुंब की सेवा चाकरी करते-करते सांसारिक दुखो से खूब तप चुका हूं । सब धन का लाभ सोचते है, मुझ पर कोई भी दया नहीं करता । मैं तो अब इस दुनियादारी से बहुत घबरा गया हूं । इसीलिए “हे पांडुरंग ! अब तुम्हीं मेरी मां हो, अब तो तुम्हारी ही शरण आया हूं ।“

कहते है कि वह पंद्रह दिन तक वही बैठे रहे । जिजाई घबराई । उसने उनके छोटे भाई कान्होबा को उन्हें ढूंढने भेजा । वह उन्हें समझा बुझाकर घर ले आया । अब वह घर में ही रहने लगे, पर घर का कुछ काम नहीं करते थे । सुबह उठते ही श्री विट्ठल की पूजा होती, फिर कहीं एकांत में जाकर ज्ञानेश्वरी या भागवत का पाठ करते और रात को जहां कही हरिकिर्तन होता,  वहां जाकर हरिगुण और भक्तों का प्रवचन सुनते।

                    

अब जिजाई भी उनसे कुछ न कहती थी । पर उसने उन्हें घर के काम में लगाए रखने के लिए लोगो से कर्ज वसूल करने का काम सौंप दिया । यह काम तुकाराम करने तो लगे लेकिन शीघ्र ही इससे ऊब गए । उन्होंने देखा कि देनदार लोग उन्हें आता देख मुंह छिपाते हैं अथवा झूठ बोलते है। यह देख तुकाराम के मन में विचार उठने लगा - यह काम बहुत बुरा है । ईश्वर की जगह धन का चिंतन तो मुझे करना ही पड़ता हैं, पर साथ ही मैं लोगों को झूठ बोलने की ओर प्रवृत्त करता हूं। मैंने भी यह शरीर ईश्वर से उधार ही लिया है, जब तक मैं भगवान के प्रति अपना कर्ज न चुका दू, मुझे दूसरो से तकाज़ा करने का क्या अधिकार है।

यह विचार कर उन्होंने कर्ज के आधे कागज भाई को दिए और अपने हिस्से के कागज़ नदी में डुबो दिए ।

अब तुकाराम गृहस्थी के सारे जंजालों से छूट गए । इसके बाद उन्होंने पैसे को कभी हाथ नहीं लगाया । उनका सारा समय श्री विट्ठल के भजन करने में बीतने लगा । गांव में पूर्वजों का एक पुराना विट्ठल मंदिर पड़ा था, उसकी उन्होंने अपने हाथ से मरम्मत की। पहले वह दूसरों के यहां कीर्तन सुनने जाते थे पर अब उन्होंने अपने मंदिर में ही खुद कीर्तन करना शुरू कर दिया । उनके किर्तन में बड़ा रस था । वह खुद भक्तिपूर्वक अभंग रचकर भक्तों को सनाते थे । इससे इनकी कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई, जिसे सुनकर रामेश्वर भट्ट नाम के एक महापंडित कन्नड़ ब्राम्हण ने उन पर यह आरोप लगाया कि तुकाराम अपने कीर्तन में नाम महात्म्य का वर्णन कर भोले-भाले लोगो को अनादि काल से चले आ रहे वैदिक धर्म से विमुख करता है,  ईश्वर दर्शन की झूठ बोलकर गरीबों को फासता है। उसने गांव के अफसर से कहकर तुकाराम को देहू से निकाल जाने का हुक्म भिजवा दिया ।

यह हुक्म सुनकर तुकाराम बहुत दुखी हुए और दौड़े-दौड़े रामेश्वर भट्ट के पास गए और उनसे अपना अपराध पूछा । पंडित जी  महाराज बोले – “तुम्हारे अभांगो में श्रुतियो का अर्थ आता है। तुम शूद्र जाति में पैदा हुए हो। तुम्हे श्रूतियो के अर्थ लगाने का अधिकार नहीं । तुम ऐसा करके सुनने वाले को और अपने आप को पाप का भागी बनाते हो । इसीलिए आज से अभंग रचना बंद कर दो ।“

तुकाराम बोले – “मैं विट्ठल की आज्ञा में कविता करता हूं। आप ब्राम्हण है, देवो के भी पूज्य है । आपकी आज्ञा मुझे मान्य है। मैं आज से  अभंग नहीं रचुंगा । पर रचे हुए अभंगो का क्या करू ?

जवाब मिला – “यदि रचे हुए अभंग नदी में डुबो दो और भविष्य में नए अभंग न रचो तो मैं हुक्म वापस करने की शिफारिश करू ?

तुकाराम ने घर लौटते ही अभंग का बस्ता उठाया और उसे तुरन्त नदी में डुबो दिया । लोगों ने देखा तो कहा यह तुमने बुरा किया । कर्ज़ के कागज डुबोकर स्वार्थ को डुबोया और अब अभंग फेककर परमार्थ भी डुबो दिया, यानि अपने लोक और परलोक दोनों बिगाड़ लिए ।

 दोनों ठौर से गए पांडे | न हलुवा मिला न मांडे ||

तुकाराम ने विचार किया तो उन्हें यह बात ठीक मालूम हुई । जीवन में न स्वार्थ रहा न परमार्थ रहा, फिर जीने से क्या लाभ ? बस वह वहीं नदी किनारे एक शिला पर बैठ गए और उन्होंने अनशन कर प्राण देने का निश्चय किया ।

तेरह दिन तक भगवान के ध्यान में यों ही बैठे रहकर पानी तक नहीं पिया। कहते है कि तेरहवें दिन भगवान ने उन्हें दर्शन दिए और लोगो ने देखा उनका बस्ता नदी पर तैर रहा है। तुरंत भक्तजन नदी में कूदकर उसे निकाल लाए और उनके पास आकर बोले – “महाराज ! उठिए आपकी भक्ति से प्रसन्न हो परमात्मा ने आपके अभंग पानी में डूबने से बचाए है । उठिए देखिए !” कागज सूखे थे । तुकाराम आनंद से गदगद हो गए । इसके बाद फिर कीर्तन और अभंग रचना शुरू हो गई । रामेश्वर भट्ट ने यह घटना सुनी तो वह खुद तुकाराम के भक्त बन गए |

तुकाराम देहु के अलावा अन्य गांव में भी खूब धूमधाम से कीर्तन करते थे । एक गांव का पटेल उनका बड़ा भक्त था । एक बार वह अपने बीमार बच्चे को घर में छोड़कर उनका कीर्तन सुनने गया । पीछे बच्चे की सांस बंद हो गई । मां क्रोध में भरी बच्ची को उसी हालत में उठा कीर्तन में ले आईं । कहते है कि तुकाराम ने गाते-गाते ही श्री विट्ठल नाम का घोष किया । सब सभा ताली बजाती विट्ठल-विट्ठल कहती भजन करने लगी । बच्चे की भी सांस लौट आईं । उसने आंखे खोल दी और वह भी अपने नन्हे-नन्हे हाथों से तालियां बजाने लगा।

तुकाराम के विषय में ऐसी बहुत सी बातें प्रसिद्ध है। उनकी कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई थी। लोग आते थे और उनके अभंग लिख कर ले जाते थे। यह सारे महाराष्ट्र में अब भी बड़े प्रेम से गाए जाते हैं।

इस सिद्ध अवस्था में ४२ वर्ष की उम्र में चैत बदी दूज को तुकाराम का देहांत हो गया । तुकाराम के कारण देहूगांव महाराष्ट्र का तीर्थ स्थान समझा जाता है और वहां चैत बदी दूज से ५  दिन तक हजारों लोग हर साल उनकी निधन तिथि मनाने के लिए इकट्ठे होते हैं। देहू गांव में तुकाराम का मंदिर बना हुआ है। तुकाराम ने मराठी के अलावा कुछ कविताएं हिंदी में भी रची है। उनकी हिंदी कविता पर मराठी और गुजराती की छाप साफ नजर आती हैं।

संत तुकाराम की जीवन की विशेषता यह थी की वह मान व प्रेम और भक्ति के कारण अपने शत्रु और मित्र दोनों के समान रूप से प्रेम और पूजनीय बन गए थे। लोभ, क्रोध, मोह इन सबसे परे वह सच्चे अर्थ में संसार त्यागी संत थे ।                         

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