शिवाजी | Shivaji

शिवाजी का नाम भारत का बच्चा-बच्चा जानता है। घर-घर में माताएं अपने बालकों को उनकी वीरता की कहानियां सुनाया करती है उन्हीं जैसी वीरों को जन्म देने के कारण भारत माता वीर जननी कहलाती हैं शिवाजी आदर्श मातृ भक्त सपूत, कुशल शासक, अद्वितीय वीर और राज्य निर्माता थे। इसी कारण संसार के महापुरुषों में उनकी गणना की जाती हैं

भारतवर्ष के दक्षिणी पश्चिमी भाग में स्थित महाराष्ट्र प्रदेश में शिवाजी का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम शहाजी भोसले और माता का नाम जीजाबाई था। इन दोनों की विवाह की कहानी बड़ी मनोरंजक है। जीजाबाई के पिता लखुजी जाधवराव अहमदनगर राज्य के सेनापति और एक बड़े जागीरदार थे। शाहजी के पिता मालोजी उन्हीं की सेना में एक घुड़सवार थे। शहाजी बड़े सुंदर बालक थे और जाधवराव उनसे बहुत प्रेम करते थे।

एक बार होली के दिन सेनापति के घर नाचने-गाने का उत्सव हो रहा था । वर्ष के बालक शहाजी और ३ वर्ष की बालिका जीजाबाई भी अबीर लिए होली खेल रहे थे। जाधवराव ने हंसकर कहा – “भगवान ने लड़की को कैसा सुंदर बनाए हैं । शहाजी भी रूप रंग में इसी के समान हैं। ईश्वर योग्य को योग्य के साथ मिलाएं।“

मालोजी ने हंसी की बात को गंभीर बना दिया। वह कहने लगे कि इन दोनों बच्चों की सगाई हो गई। जीजाबाई की माता गिरिजाबाई बड़ी बहादुर और बुद्धिमती स्त्री थी। यह बात सुनकर उन्होंने पति से कहा – “क्या इसी दरिद्री, आवारा, साधारण घुड़सवार के लड़के के साथ मेरी लड़की का संबंध होगा ? विवाह तो बराबर वालों में होता है। आपने कैसा मूर्खों सा काम किया है ।“

जाधवराव ने 2 दिन बाद मालोजी को नौकरी से अलग कर दिया।

मालोजी फिर अपने गांव आकर खेती करने लगे। एक दिन रात को खेती रखाते हुए उन्होंने एक बड़े सांप को अपनी बिल से निकलकर थोड़ी देर बाद फिर उसी में जाते हुए देखा। प्रचुर धन पाने की आशा में मालोजी ने उस स्थान को खोदा। वह उन्हें अशरफिया से भरी हुई कढांइया  मिली। फिर क्या था थोड़े ही दिनों में मालोजी भी निजामशाही सुल्तान के यहां सेनापति हो गए। इस प्रकार जाधवराव के बराबर वाले हो जाने पर बड़ी हंसी खुशी के साथ शहाजी और जीजा बाई का विवाह हो गया।

शिवाजी का जन्म १९ फरवरी १६३० को हुआ। जबकि कुछ इतिहासकर उनका जन्म १६३० मानते है | इस समय उनकी माता जुन्नर नगर के समीप शिवनेरी के पहाड़ी किले में रहती थी। उन्होंने कुछ दिन पूर्व संतान की मंगल कामना के भाव से किले की देवी शिवा भवानी की मनौती मानी थी। इसी कारण उन्होंने पुत्र का नाम शिवा रखा। शाहजी उस समय लड़ाई झगड़ों और अपनी हालत के हेर-फेर में ऐसे फंसे रहते थे कि वह घर मे रहही नही पाते थे। उन्होंने बहुत धन कमाया और बड़ी-बड़ी जागीरे प्राप्त की। इसी समय उन्होंने तुकाबाई मोहिते से अपना दूसरा विवाह किया और उसी को साथ लेकर वह नई जागीर में रहने लगे। जीजाबाई को इससे बहुत दुख हुआ और वह शिवाजी को लेकर पुणे के पास एक छोटी सी जागीर में रहने के लिए आ गई। इस प्रकार जन्म से लेकर १० वर्ष की आयु तक शिवाजी ने अपने पिता को बहुत कम देखा और इसके बाद तो शहाजी बिल्कुल अलग ही हो गए।

शहाजी ने अपने एक विश्वसनीय कर्मचारी दादाजी कोंडदेव को इस जागीर का प्रबंधक नियुक्त कर दिया और स्वयं पत्नी और पुत्र की ओर से बिल्कुल उदासीन हो गए। दादाजी ने इन दोनों के रहने के लिए पुणे में "लाल महल" नामक एक बड़ा मकान बनवाया। जीजाबाई का जीवन अब नीरस और सन्यासिनी के समान सादा हो गया। उनका मन धर्म की ओर बहुत झुक गया, जिसका बालक शिवाजी पर बहुत प्रभाव पड़ा। माता पुत्र को रामायण और महाभारत की अनेक कथाएं सुनाया करती थी और उनका उत्साह बढ़ाया करती थी। यद्यपि शिवाजी लिख पढ़ ना सके फिर भी भारतीय आदर्श और संस्कृति को वह भली प्रकार समझते थे। जहां कहीं कथा होती यह शास्त्रों का उपदेश होता, शिवाजी बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ वह अवश्य पहुंच जाते थे। इस प्रकार उन्हें भारत के प्राचीन ज्ञान, धर्म और कथाओं के सच्चे उद्देश्य की पूरी जानकारी हो गई और आगे चलकर उन्होंने अपनी राजनीति और धर्म नीति, रण-कला और शासन पद्धति का मूलाधार इसी ज्ञान को बनाया।

शिवाजी ने बचपन से ही अपना काम स्वयं करना सीखा। इससे उनकी बुद्धि कार्यकुशलता और सहनशीलता आश्चर्यजनक विकास हुआ। इसी कारण उनके हृदय में स्वाधीनता का दृढ़ भाव भी उदित हुआ। उनके चरित्र निर्माण में सबसे बड़ा हाथ उनकी माता का था। दादाजी कोंडदेव ने उनको एक अत्यंत बलशाली वीर सामरिक कला में निपुण नवयुवक नेता बनाया और समर्थ गुरु रामदास ने उनको एक कुशल राजनीतिज्ञ, धर्मानुकूल शासक और राष्ट्र निर्माता के रूप में परिणत किया।

पुणे जिले के पश्चिमी भाग में एक बड़ा भूभाग हैं जो उस समय मावल” प्रदेश कहलाता था। यहां कोली नाम की एक असभ्य जाती रहती थी, जो लूटमार और डाका डालकर अपनी गुजर-बसर करती थी। दादाजी कोंडदेव ने इन लोगों को सभ्य बनाया, खेती करने को तैयार किया और उनके जीवन स्तर को ऊंचा उठाया। यही लोग शिवाजी के सैनिक बने और बड़े-से-बड़े सैनिक पदों पर पहुंचे। दादाजी एक कुशल जागीर प्रबंधक, संगठनकर्ता और धार्मिक व्यक्ति थे। शिवाजी उनका पिता के समान आदर करते थे। दादाजी भी शिवाजी को पुत्र के समान ही समझते थे। उन्होंने स्वयं शिवाजी को घुड़सवारी तथा तीर और तलवार चलाने की शिक्षा दी थी। छोटी आयु में ही दादाजी ने उन्हें इतना दक्ष बना दिया था की इन विद्याओं में अच्छे नामवर लोग भी शिवाजी का मुकाबला ना कर पाते थे।

शिवाजी स्वतंत्रता प्रेमी थे। अपने पिता की तरह वह किसी सुल्तान के जागीरदार नहीं रहना चाहते थे। उनका ध्येय था अपना एक स्वाधीन राज्य स्थापित करना, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों ना हो। इसी उद्देश्य से उन्होंने विश्वसनीय मावले वीरों की एक सेना बना ली थी। उन्होंने अपने कुछ साथियों को लेकर कोंकण पहाड़ी प्रदेश का दौरा किया। वहां के भिन्न-भिन्न दुर्गों के गुप्त मार्गों का पता लगाया, उनके रक्षकों की ठीक संख्या और साधनों को ज्ञान प्राप्त किया और उनमें कई एक को हस्तगत करने की एक योजना भी बनाई।

बीजापुर राज्य की अवस्था १६४६ में डावाडोल हो गई। शिवाजी ने इस सुयोग से पूरा लाभ उठाया। अपने मावले सरदारों की सहायता से तोरणा नामक किले के रक्षक को भुलावा देकर उन्होंने इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया। वहां के शाही खजाने में दो लाख होण ( लगभग आठ लाख रुपए) जमा थे, वह भी उनके हाथ लगे। तोरणा के दक्षिण पूर्व में, वहां से प्रायः ५ मील दूर, पहाड़ की दूसरी चोटी पर उन्होंने एक नया किला बनवाया। इसका नाम उन्होंने राजगढ़ रखा। इसके नीचे चहारदीवारी से घेरकर उन्होंने तीन जगह ग्राम भी बसाए।

दादा जी का देहांत मार्च १६४७ को हो गया । मरते समय दादाजी ने शिवाजी से कहा – “भवानी ईशानी ने जो महान आदर्श तुम्हें  दिखाया है, उसी पर चले चलो। तुम्हारा मनोरथ सफल होगा।“

दादाजी के इन शब्दों से शिवाजी का उत्साह दुगुना हो गया। एक ही वर्ष के भीतर उन्होंने किलेदार को मिलाकर बीजापुर सुल्तान के कोंण्ढ़ाना के किले पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने बीजापुर राज्य की बहुत सी जमीन दबाकर अपने राज्य का क्षेत्र काफी बड़ा लिया। कोंण्ढ़ाना के किले के नाम बदलकर उन्होंने  सिंहगढ़ रख दिया।

किंतु अब शिवाजी एक बड़ी मुसीबत में पड़ गए। बीजापुर के सुल्तान ने उनके पिता शहाजी को कैद कर लिया और उनकी सारी सेना और जायदाद जब्त कर ली। पिता की प्राण रक्षा के लिए उन्होंने बैंगलोर,कोंण्ढ़ाना और कन्दपी के तीन किले समर्पण करके बीजापुर सुल्तान से संधि करनी पड़ी। फिर १६५० से १६५५ तक शिवाजी ने कोई आक्रमण नहीं किया। शांति के साथ अपने राज्य का संगठन करने और अपनी सैनिक शक्ति बढ़ाने में लगे रहे। किंतु इसी समय उन्होंने पुरंदर के किले को अपने अधिकार में कर लिया और उसके मालिकों को, जो तीन भाई थे गुजारे के लिए एक गांव और एक भाई पीलाजी को अपनी सेना में उच्च पद दिया।

शिवाजी के राज्य विस्तार में अब एक बड़ी रुकावट सामने आई। यह रोड़ा जावली का राजा चंद्र राव था, जो शिवाजी के अनेक प्रयत्न करने पर भी किसी प्रकार उनके साथ सहयोग करने पर राज़ी नहीं हुआ। अतः विवश होकर शिवाजी ने इस कंटक को अपने मार्ग से हटाया।

फल स्वरूप एक काफी बड़ा प्रदेश और प्रचुर धन राशि उनके हाथ लगी। उनके राज्य की नींव दृढ़ हो गई। जावली से मील दूर उन्होंने प्रतापगढ़ नामक एक नया किला बनवाया। वहां उन्होंने भवानी का मंदिर बनवाया। यही भवानी उनकी इष्ट देवी थी।

दिल्ली के सिहासन के लिए १६५८ में मुगल शहजादो में घोर युद्ध छिड़ गया। शिवाजी ने इस अवसर से यथेष्ट लाभ उठाया। पश्चिमी घाट पारकर उत्तर कोंकण में घुसे और उन्होंने बीजापुर राज्य के कल्याण और भिवंडी नामक दो शहर छीन लिए। इसी के साथ उन्हें बहुत साधन भी मिला। इसके बाद उन्होंने कोलाबा जिले के कुछ भाग पर अधिकार कर लिया और बहुत से किले बनवाए। पुर्तगाली लोगों के कई ग्राम लूटकर शिवाजी की सेना ने आसिरी के किले में स्थाई अड्डा बनाया। शिवाजी ने कल्याण की खाड़ी में जहाज भी बनवाएं और इस प्रकार अपनी जल सेना की नींव डाली।

शिवाजी का सारा जीवन है वीरता के अद्भुत घटनाओं से भरा पड़ा है। उनमें से कई घटनाएं अत्यंत लोक प्रसिद्ध और मनोरंजक भी हैं। अफजल खां का वध उन्हीं में से एक हैं। औरंगजेब के दक्षिण से चले जाने से बीजापुर राज्य को कुछ शांति मिली। अपने खोए हुए इलाकों को फिर पाने के विचार से शहाजी को हुक्म हुआ कि शिवाजी को हाजिर करो। शहाजी ने उत्तर दिया -  “शिवा हमारा त्यागा हुआ पुत्र हैं। आप लोग उसे पकड़कर सजा दे सकते हैं, हमारा कोई संकोच ना कीजिए।“

बीजापुर के सुल्तान ने दरबार में कहा – “जो इस लड़ाई में सेनापति होना चाहता हो वही यह बीड़ा उठाएं।“

अफजल खान जो एक माना हुआ सेनापति था, उठा और बोला – “मैं घोड़े पर बैठे-बैठे शिवाजी को हराकर बांध लाऊंगा।“

उस समय के अंग्रेज कोठी वाले की चिट्ठी में यह बात स्पष्ट लिखी हुई है कि बीजापुर की राजमाता ने अफजल खां से कहा था – “दोस्ती के बहाने शिवाजी को धोखा देकर कैद कर लाओ।“

अफजल खान के आने का समाचार सुनकर शिवाजी और उनके साथी बड़ी चिंता में पड़ गए। दंतकथा है कि अंत में भवानी ने शिवाजी को सपने में दर्शन देकर कहा – “बच्चा तू डर मत, मैं तेरी रक्षा करूंगी ।तेरी ही जय होगी।“

माता जीजाबाई ने भी कहा – “तेरी ही जय होगी।“

तत्पश्चात शीघ्र ही अफजल खां ने शिवाजी के पास एक ब्राह्मण दूत भेजा और यह विश्वास दिलाया कि बीजापुर के सुल्तान उनके साथ किसी प्रकार का विश्वासघात नहीं करना चाहते। किंतु उस दूत ने अंत में यह स्वीकार कर लिया कि अफजल खान का इरादा अच्छा नहीं है।

अंत में शिवाजी और अफजल खान की भेंट का प्रस्ताव दोनों ओर से स्वीकार कर लिया गया। अफजल खान पालकी में बैठकर आया। उनकी कमर में तलवार लटक रही थी। शिवाजी देखने में शस्त्र हीन थे। किंतु वह बाएं हाथ में शेर पंजा पहने हुए थे। कुर्ते के नीचे लोहे की जाली पहने हुए थे और पगड़ी के नीचे फौलाद की टोपी पहने हुए थे। दोनों के  साथ चार-चार अंगरक्षक भी थे। लेकिन दोनों की भेंट एकांत में हुईं। जब दोनों आमने-सामने गले मिलने लगे तो पतले और नाटे होने के कारण शिवाजी अफजल खान के कंधे तक ही आए। मोटे ताजी और लंबे सेनापति ने शिवाजी का गला धर दबाया। साथ ही उनकी कोख में तलवार से वार किया। किंतु लोहे की जाली के कारण शिवाजी बच गए। उन्होंने शीघ्रता से अफजल खान के पेट में बघनखा घुसेड़कर उसका पेट फाड़ डाला और अंतड़िया बाहर खींच ली। फिर वह बाहर निकल आए और अपने साथियों में जा मिले।

कुछ ही क्षण बाद नीचे गांव के पास झाड़ियों में छिपी हुई मराठा फौज ने बीजापुर की सेना पर हमला बोल दिया। तीन घंटे तक लड़ाई हुई जिसमें बीजापुर के लगभग तीन हजार योद्धा मारे गए। इस लड़ाई से शिवाजी को बहुत लाभ हुआ। अफजल-खा कि सब तोपे, गोला-बारूद, तंबू,  पैसठ हाथी, चार हजार घोड़े, बारह सौ ऊंट, कपड़े की दो हजार गांठे, नगद रुपया और गहने शिवाजी को प्राप्त हुए।

इसके बाद शिवाजी ने बढ़कर कोल्हापुर जिले पर दावा किया। पन्हाला किले पर अधिकार किया और फिर रुस्तम-ए-जमा की मातहती में बीजापुर की एक और सेना को परास्त किया।

शिवाजी ने संत तुकाराम के मुंह से गुरु रामदास की बढ़ाई सुनी। उनके हृदय में भी उनसे दीक्षा लेने का विचार हुआ। गुरु रामदास उस समय दो-तीन दिन से अधिक कहीं नहीं ठहरते थे, इसीलिए शिवाजी को उनके दर्शन करने में बड़ी देर लगी। अंत में एक दिन शिवाजी ने यह प्रतिज्ञा की की महात्मा रामदास जी के दर्शन करने से पहले अन्न-जल ग्रहण नहीं करूंगा। शीघ्र ही उन्हें जंगल में एक गूलर के पेड़ के नीचे बैठे हुए गुरुदेव के दर्शन हुए। रामदास जी ने शिवाजी को “श्री राम जय राम जय जय राम” मंत्र की दीक्षा दी। जब शिवाजी ने सब कुछ त्याग कर उनकी सेवा में रहने की आज्ञा चाही तो गुरु राम दास जी ने उनसे कहा – “क्या इसीलिए तुम हमारे पास आए हो ? तुम हो कर्मवीर क्षत्रिय, तुम्हारा काम है देश और प्रजा को विपदा से बचाना तथा गौ और ब्राह्मणों की सेवा करना। यही श्री रामचंद्र की आज्ञा हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिया था उसको याद करो, योद्धा के कर्तव्य मार्ग से चलो,कर्म योग का साधन करो।“

शिवाजी परम गुरु भक्त थे। गुरु की आज्ञा के बिना कोई नया काम नहीं करते थे। उन्हें राज पाठ का बिल्कुल मन नहीं था। वह सच्चे कर्म योगी बन गए थे। एक बार अपने सारे राज्य का दान पत्र लिखवा उस पर अपनी मुहर लगा कर उन्होंने गुरुदेव की झोली में डाल दिया और गुरु जी के साथ भिक्षा मांगने चल पड़े। इस पर गुरुदेव ने मुस्कुरा कर कहा – “अच्छी बात है, राज्य हमने ले लिया तुम हमारे प्रतिनिधि के रूप में राजकाज करो।“

तभी से शिवाजी ने अपने झंडे का रंग गेरुआ कर दिया। इस बात की घोषणा थी कि राज्य गुरु रामदास का है और शिवाजी स्वयं उनके सेवक मात्र हैं।

शिवाजी का चरित्र बड़ा दृढ़ और उज्जवल था। वह सब धर्मों का आदर करते थे। उन्होंने मुसलमानों की किसी मस्जिद को हानि नहीं पहुंचाई। जब कभी लड़ाई में मुस्लिम धर्मग्रंथ कुरान की कोई प्रति उन्हीं मिलती थी तो वह उसे आदर के साथ रखते थे और किसी मुसलमान को दान कर दिया करते थे। उनके यहां मुसलमान नौकर भी थे। साथ ही साथ शिवाजी संयमी भी थे। उनका धर्म सच्चा मानव धर्म था। जब मराठों ने कल्याण को जीत लिया और उसके सुल्तान को कैद कर लिया तो आबाजी सोन देव सेनानायक ने परम रूपवती शहजादी को शिवाजी के लिए उपहार के रूप में भेंट करने का इरादा किया। शिवाजी ने यह बात सुनकर दरबार में शहजादी को हाथ जोड़कर कहा – “बहन यदि मेरी माता भी ऐसी सुंदर होती तो मैं भी सुंदर होता।“

इसके बाद उस शहजादी को बहुत से गहने कपड़े उपहार में दे कर उन्होंने उसके पिता के पास भिजवा दिया।

शिवाजी की बढ़ती हुई शक्ति देखकर मुगल सम्राट औरंगजेब ने उनके दमन के लिए अपने मामा शाइस्ता खां को दक्षिण का सूबेदार नियुक्त किया और महाराजा जसवंत सिंह को उनकी मदद के लिए भेज दिया। शिवाजी मुगल सेना का मुकाबला नहीं कर सकते थे इसीलिए उन्होंने एक ऐसी चाल चली जिसका मुगलों को स्वप्न में भी ध्यान नहीं हो सकता था।

शाइस्ता खां ने पुणे में आकर शिवाजी के लाल महल को अपना निवास स्थान बनाया। किसी मराठे को बिना लिखित आज्ञा के शहर में प्रवेश करने की इजाजत नहीं थी। शिवाजी के लोगों ने कुछ सहस्त्र सिपाहियों के साथ बारात निकलने की आज्ञा प्राप्त की। रमजान का महीना था और अंधेरे पाख की काली रात। एक पहर रात बीत जाने पर शिवाजी और उनके साथियों ने नगर में प्रवेश किया। लाल-महल के पास पहुंचकर कुछ लोग अंधेरे में वही छुप गए बारात आगे बढ़ गई।

अंधेरे में इन लोगों ने एक दीवार की ईटे निकालकर मकान में प्रवेश किया। अंदर जाकर वे इधर-उधर फैल गए और युद्ध करने लगे। शायस्ता खां का पुत्र पिता की रक्षा करते हुए मारा गया। शायस्ता खान बड़ी मुश्किल से जान बचाकर भाग निकला किंतु उसके एक हाथ का अंगूठा कट गया।

शाइस्ता खां ने बादशाह से अपनी सेना के निकम्मेपन की शिकायत और महाराजा जसवंत सिंह के विश्वासघात की बात लिखें। सम्राट ने दोनों को अयोग्य समझ कर दिल्ली बुला लिया और शहजादे मुअज्जम को दक्षिण का सूबेदार नियुक्त कर दिया।

मुगल सम्राट ने महाराजा जयसिंह को शिवाजी के दमन के लिए भेजा। शिवाजी किसी हिंदू से लड़ना नहीं चाहते थे इसीलिए वह पुणे के समीप महाराजा के शिविर में उनसे मिलने गए। महाराजा जयसिंह के समझाने पर शिवाजी सम्राट से भेंट करने के लिए राजी हो गए और राज्य का ठीक प्रबंध करने के बाद उन्होंने आगरे की यात्रा की।

आगरा में बादशाह ने उनका उचित आदर सत्कार नहीं किया और उन्हें एक मकान में कैद कर दिया। यहां भी शिवाजी अपनी चतुराई से निकल भागे। पहले उन्होंने बीमारी का बहाना किया और फिर अच्छे होने की खुशी में जगह-जगह टोकरो में मिठाई भेजना शुरू कर दिया। एक दिन वह स्वयं अपने पुत्र संभाजी के साथ एक बड़े टोकरे में बैठकर शहर के बाहर आ गए और बड़ी होशियारी से वेश बदल कर रायगढ़ पहुंच गए।

शिवाजी ने अनेक लड़ाइयां लड़ी। उनमें सिंहगढ़ की लड़ाई बहुत प्रसिद्ध है। सिंहगढ़ किले का नाम उस समय कोंडाणा था। यह मुगल बादशाहों की राजपूत सेना की रक्षा में था। शिवाजी ने उसको जीतने के लिए अपने मावले सेनापति तानाजी मालसरे को भेजा। तानाजी चुने हुए तीन सौ सैनिकों के साथ अंधेरी रात मे रस्सी की सीढ़ी लगाकर पहाड़ पर चढ़ गए और बाहर के पहरेदारो को मारकर गुप्त मार्ग से किले के अंदर घुसे। इनके सामने जैसे ही राजपूत आए उन्होंने हर हर महादेव कह कर उन पर वार कर दिया। राजपूत सरदार उदय भान ने तानाजी को द्वंद युद्ध के लिए ललकारा। दोनों ही एक दूसरे की तलवार से मारे गए। विजय मराठों के हाथ रही। शिवाजी ने वहां पहुंच कर कहा किला मिल गया परंतु सिंह खो गया।

कान्हा जी की स्मृति में उन्होंने इस किले का नाम सिंहगढ़ रख दिया। शिवाजी जून १६७४ को हिंदू रीति के अनुसार गद्दी पर बैठे। उन्होंने छत्र धारण किया और हाथी पर सवार होकर अपने दल-बल के साथ रायगढ़ के रास्ते से जुलूस निकाला। आगे दो हाथियों के ऊपर दो झंडे थे जिनमें एक भगवा झंडा था जो श्री गुरु रामदास के गेरुए वस्त्र का टुकड़ा था।

लगभग वर्ष पश्चात अप्रैल १६८० को शिवाजी का स्वर्गवास हो गया। सारा महाराष्ट्र वज्रहत हो गया। शिवाजी हमारे भारत के एक अमर सपूत हैं ।

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