सैयद अहमद खां | Syed Ahmad Khan


सैयद अहमद खां देश के उन बड़े लोगों में से थे, जिन्होंने शिक्षा का प्रसार किया और समाज-सुधार का काम आगे बढ़ाया। उनका जन्म दिल्ली में १७ अक्तूबर, १८१७ को एक धार्मिक और प्रभावशाली परिवार में हुआ था। सैयद अहमद खां के पिता मीर मुक्तकी हज़रत मोहम्मद के वंश के थे। मीर मुत्तकी के पूर्वज उमय्याओं के अत्याचार से घबराकर पहले ईरान में और फिर वहां से अफगानिस्तान में हेरात चले आए थे। अनुमान है कि बादशाह शाहजहां के समय में यह परिवार हिंदुस्तान चला आया। तब से इस परिवार के लोग मुगल दरबार में बड़े-बड़े ओहदों पर काम करते रहे। किंतु सैयद अहमद खां के पिता अधिक ऊंचे पद तक नहीं उठ सके थे।

जिस समय सैयद अहमद खां का जन्म हुआ, दिल्ली की हालत बहुत-कुछ बदल चुकी थी। अंग्रेजों ने दिल्ली पर १८०३ में अधिकार कर लिया था। अंग्रेजों ने ऐसा प्रबंध किया था कि सारी सत्ता तो अपने हाथों में ले ली थी पर लाल किले के अंदर मुगल बादशाह शाहआलम को अपने राजसी ठाट-बाट से रहने और दरबार लगाने की छूट दे दी थी। शाहआलम को काफी धन भी मिलता था, जिससे वह ऊपरी शान-बान बनाए रखने की कोशिश करता था।

सैयद अहमद खां का बचपन ऐसी दिल्ली में बीता था जहां प्राचीन मुगल शासन का दिखावटी वैभव भी मौजूद था और जहां फैलते हुए अंग्रेजी शासन के पंजे भी जमते जा रहे थे। सैयद अहमद खां को कितनी ही बार अपने पिता की जगह मुगलों के शाही दरबार में हाजिर होना पड़ता था इस तरह वह मुगल दरबार के रीति-रिवाज को अच्छी तरह जान गए थे।

विद्यार्थी के रूप में सैयद अहमद खां कोई ज्यादा होशियार नहीं थे। उन्होंने खुद यह माना है कि दूसरे विद्यार्थियों से मैं किसी मायने में अच्छा नहीं था, पर शारीरिक बल मुझ में जरूर बहुत ज्यादा था। सैयद अहमद खां को तैरना और तीर चलाना आता था ये दोनों बातें उन्होंने अपने पिता से सीखी थी। सैयद अहमद खां ने थोड़ी-बहुत कुरान पढ़ी थी। उन्हें एक मकतब में भी भेजा गया जहां उन्होंने फारसी और अरबी का ज्ञान प्राप्त किया था।

जिन लोगों ने सैयद अहमद खां के आरंभिक जीवन पर गहरा प्रभाव डाला था, उनमें उनकी मां प्रमुख थीं। वह शरीफ खानदान की लड़की थीं। उन्हें फारसी और मुस्लिम संस्कृति की अच्छी जानकारी थी। उन्होंने सैयद अहमद खां को अपनी कड़ी निगरानी में पाला था। अपनी मां के बारे में एक घटना की चर्चा करते हुए सैयद अहमद खा लिखते हैं – “उस समय मेरी उम्र ग्यारह साल रही होगी। मुझे किसी बात पर अपने बुढ़े नौकर पर हंसी आ गई। इत्तफाक से मां ने मेरी बात सुन ली। वह मुझ पर नाराज हुई और उन्होंने मुझे घर से निकाल दिया। तीन दिन मैं रिश्ते की एक चाची के यहां रहा और जब मैंने नौकर से माफी मांग ली तभी मुझे घर में घुसने दिया गया।“

जब सैयद अहमद खां १९ वर्ष के हुए तो उनके पिता की मृत्यु हो गई। इससे उनके ऊपर जिम्मेदारी आ पड़ी। सैयद अहमद खां के परिवार के लोग चाहते थे कि अपने पिता की तरह वह भी शाही दरबार में नौकरी कर लें, पर सैयद अहमद खां कंपनी सरकार की नौकरी करना चाहते थे। सैयद अहमद खा बड़े व्यवहार-कुशल थे। अपनी कुशाग्र बुद्धि से उन्होंने जान लिया था कि मुगल सामाज्य का सितारा डूब चुका है। हाली ने, जिसने सैयद अहमद खां की बड़ी सुंदर जीवनी लिखी है, इस संबंध में कहा है – “सैयद अहमद खां महल की छाया में पले थे और अगर वह विजयी शासकों का शासन नापसंद करते तो यह स्वाभाविक ही होता। लेकिन उनकी सूझ-बूझ बड़ी जबर्दस्त थी। उन्होंने जान लिया था कि मुगल शासन का अंत केवल संयोग से नहीं हुआ, बल्कि उसकी शासन करने की शक्ति ही समाप्त हो गई थी।“

सैयद अहमद खां ने कंपनी सरकार की नौकरी दिल्ली की सदर अदालत में सरिश्तेदार की हैसियत से शुरू की। सरिश्तेदार भारत की अंग्रेजी अदालतों में देशी भाषाओं में मुकदमों की मिसलें रखने वाले कर्मचारी को कहते थे। कुछ साल बाद उन्हें आगरा जिले में फतेहपुर सीकरी का मुंसिफ बनाकर भेज दिया गया। सैयद अहमद खां ईमानदार और मेहनती कर्मचारी थे, फिर भी अंग्रेजी का अधिक ज्ञान न होने के कारण वह सरकारी नौकरी में कभी भी अदालते खफीफा (स्माल काज कोर्ट) की मुंसिफी से आगे नहीं बढ़ सके।

१८५७ के स्वतंत्रता संग्राम ने सारे देश में हलचल मचा दी। यह स्वतंत्रता संग्राम हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों ने मिलकर किया था दोनों ही दिल्ली के बादशाह बहादुरशाह को फिर से हिंदुस्तान का सम्राट बनाना चाहते थे पर वह विद्रोह सफल नहीं हुआ। बहादुरशाह देश से निकाल दिए गए और हिंदुस्तान से मुगल साम्राज्य का नाम-निशान मिट गया।

विद्रोह के दिनों में सैयद अहमद खां बिजनौर में मुंसिफ थे। उस समय तक नौकरी करते हुए उन्हें बीस वर्ष हो चुके थे। उन्होंने पूरी वफादारी के साथ अंग्रेजों की जान और माल की रक्षा की। सैयद अहमद खां अंग्रेजों के अंधभक्त न थे। वह अंग्रेजों की सफलताओं और उपलब्धियों के प्रशंसक थे और अंग्रेजी शिक्षा को जरूरी मानते थे। वह सचमुच ऐसा मानते थे कि स्वतंत्रता संग्राम अंग्रेजों और हिंदुस्तानियों के बीच गलतफहमी के कारण हुआ। बाद में इस बारे में उन्होंने एक किताब भी लिखी थी। सैयद अहमद खां के जीवन पर विद्रोह का कितना गहरा असर पड़ा था इसके बारे में हाली लिखते हैं – “जैसे सूरज की गर्मी से फैले हुए पानी की सतह कुछ ऊंची हो जाती है उसी तरह स्वतंत्रता संग्राम से उनके रक्त का तापमान सामान्य से कहीं ज्यादा बढ़ गया था।“

कुछ इतिहासकार लिखते हैं कि १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटिश सरकार मुसलमानों को अपना वास्तविक शत्रु मानने लगी। कितने ही मुसलमान परिवारों पर घोर अत्याचार किया गया। कितने ही अच्छे और समृद्ध परिवार बिलकुल नष्ट हो गए। उलेमाओं ने ब्रिटिश शासन को दिल से कभी स्वीकार नहीं किया। इस समय तक हिंदू और मुसलमान भारतीय राष्ट्र की एकता के लिए काम कर रहे थे, यद्यपि उनके धार्मिक विचार भिन्न थे पहले तो सैयद अहमद खां भी ऐसा ही सोचते थे। वह हिंदू और मुसलमान को सुंदरी की दो आंखें मानते थे और कहा करते थे कि किसी एक को नुकसान पहुंचने से दूसरे को भी नुकसान होगा। बाद में सैयद अहमद खां के विचार बदल गए, यहां तक कि उन्हें मुसलमानों को कांग्रेस से अलग रखने की नीति का जन्मदाता भी बताया जाता है।

सैयद अहमद खां का १८६६ में अलीगढ़ तबादला हो गया। अलीगढ़ में ही आगे चलकर उनकी सब योजनाएं बनी और पूरी हुई। वहां पहुंचने के चार वर्ष बाद वह अपने दो बेटों के साथ इंग्लैंड गए। वह १८७६ में सरकारी नौकरी से रिटायर हो गए। रिटायर होने के बाद मृत्यु तक के बाईस वर्षों में उन्होंने असाधारण लगन और परिश्रम से काम किया। मुस्लिम समाज की हीन अवस्था देखकर उनका दिल बहुत उदास रहता था। वह कहा करते थे कि मुसलमानों ने इतमीनान की चादर ओढ़ रखी है और वे समझते हैं कि अब उन्हें कुछ करना-धरना नहीं है। इसे वह बहुत बड़ा दोष मानते थे मुसलमान समाज की अवनति को रोकने के लिए सैयद अहमद खां ने अपनी सारी ताकत लगा दी। उनके एक अंग्रेज मित्र ने इस बारे में कहा था – “एक समूचे समाज की अधोगति को दीवार बनकर रोक लेना, तो एक पैगंबर का ही काम था।“

सैयद अहमद खां इस नतीजे पर पहुंच चुके थे कि मुसलमानों की स्थिति सुधारने के लिए उनमें अंग्रेजी भाषा और पाश्चात्य विचारों का प्रचार करना जरूरी है। इस सिलसिले में उन्होंने कई काम किए। उन्होंने एक अनुवाद संस्था कायम की जो साइंटिफिक सोसाइटी आफ अलीगढ़ के नाम से विदित हुई। उन्होंने तहज़ीब-उन-अखलाक नाम से एक मासिक पत्र निकाला। अलीगढ़ में ही उन्होंने मुहम्मडन ऐंग्लो-ओरिएंटल कालेज की स्थापना की, जिसका आगे चलकर मुस्लिम यूनिवर्सिटी के रूप में विकास हुआ।

इसके अतिरिक्त सैयद अहमद खां ने बहुत-सी पुस्तकें लिखीं। उन्होंने अनेक विषयों पर लिखा। उनके राजनीतिक और शिक्षा संबंधी निबंध भी उपलब्ध है।

सैयद अहमद खां को अपने जीवन काल में काफी प्रशंसा और ख्याति मिली। वाइसराय लाई लारेंस ने उन्हें स्वर्ण पदक प्रदान किया। उन्हें सर की उपाधि भी दी गई। सैयद अहमद खां लेजिस्लेटिव कौसिल (व्यवस्थापिका सभा) के सदस्य भी बनाए गए और उन्होंने शिक्षा कमीशन के सदस्य की हैसियत से भी काम किया।

सन् १८९८ में ८१ वर्ष की आयु में सैयद अहमद खां की मृत्यु हो गई | उनके राजनीतिक विचार चाहे जो रहे हों इसमें संदेह नहीं कि वह बड़े कर्मठ, निर्भीक और स्पष्टवादी थे।

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