समस्त मनोकामनाओ के लिए : पी

Ficus Religiosa


जन सामान्य में पीपल के संबंध में अनेक भ्रांतिया और अंध-विश्वास व्याप्त हैं। आम धारणा है कि पीपल के वृक्ष पर ब्रम्ह राक्षस एवं भूत-प्रेतों का वास होता है ।

दाह-संस्कार के बाद जो अस्थियां चुनी जाती हैं, उन्हें एक लाल कपड़े में बांधकर एक छोटी-सी मटकी मे रख पीपल के वृक्ष पर टांगने की प्रथा भी है। यह इसलिए कि विसर्जन के लिए चुनी गयी ये अस्थियों को घर नहीं ले जायी जा सकती, अतः उन्हें पीपल के वृक्ष पर टांग दिया जाता है | इस कारण भी पीपल के विषय में अंघ-विश्वास बढ़ा है । कर्मकांड में विश्वास रखनेवाले लोगों की मान्यता है कि पीपल के वृक्ष पर ब्रम्हा का निवास होता है । श्री कृष्ण ने भी गीता में अर्जुन से कहा था कि “हे पार्थ, वृक्षों में पीपल मैं हूं।

पीपल अक्षय वृक्ष

पीपल को क्षीण न होने वाला अक्षय वृक्ष माना गया है | जड़ से ऊपर तक का तना नारायण कहा जाता है और ब्रम्हा, विष्णु, महेश ही इसकी शाखाओ के रूप मे स्थिर है | पीपल के पत्ते संसार के प्राणियों के समान है | प्रत्येक वर्ष नए पत्ते निकलते है, पतझड़ होता है, मिट जाते है, फिर नए पत्ते निकलते है | यही जन्म मरण का चक्र है |

पीपल के वृक्ष के नीचे गौतम को इस तथ्य का बोध हुआ था और वे बुद्ध कहलाये थे । फरीदाबाद के ज्योतिषाचार्य पं. श्याम सुंदर वत्स ने अपने श्री बजरंग नवग्रह अनुसंधान एवं जीवन प्रदायण केंद्र में पीपल के विषय में शोध भी किया है । उनका कहना है कि मात्र पीपल की पूजा करने से समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति हो सकती है।

प.श्याम सुंदर वत्स का विश्वास है कि पितृ-प्रकोप अर्थात पितरों की नाराजगी के कारण भी कोई व्यक्ति जीवन में विकास नहीं कर पाता है तो पितरों को प्रसन्न करने का एकमात्र सरल, सहज उपाय है, पीपल की पूजा । श्री वत्स ने इस पूजा की विधि भी बतलायी है। उनका कहना है कि समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति तथा पितरों को प्रसन्न करने के लिए इस विधि से पीपल की पूजा की जाए, तो तत्काल फल मिलता है | उनकी विधि इस प्रकार है – रविवार की रात्रि को भोजन के बाद पीपल की दातौन से दांत साफ करें, फिर स्नान कर पूजन सामग्री लेकर पीपल के वृक्ष के नीचे जाएं । जल लेकर संकल्प करें कि “मैं इस जन्म एवं पूरे जन्म के पापों के नाश के लिए यह पूजन कर रहा हूँ ।“ फिर यह संकल्पित जल जड़ में छोड़ दें। गणेश-पूजन कर पीपल वृक्ष को गंगाजल तथा पंचामृत से स्नान करायें और तने में कच्चा सूत लपेटकर, जनेऊ अर्पण करें । पुष्पादि अर्पण कर आरती करें और नमस्कार कर वृक्ष की १०८ बार परिक्रमा करें । प्रत्येक परिक्रमा पर वृक्ष को मिष्ठा अथवा ताशा अर्पित कर एक फल और एक दीप जलायें। अर्थात १०८ ताशे और १०८ दीपक जलायें ।   

पं. वत्स का कहना है कि सोमवती अमावस्या पर इस तरह पीपल पूजन से तत्काल फल मिलता है | वैसे यह प्रयोग किसी भी अमावस्या मे किया जा सकता है |

पं. वत्स का कहना है कि वैसे तो पीपल में अनेक गुण हैं । जैसे पीपल की दातौन करने से और रस चूसने से मलेरिया या अन्य प्रकार के ज्वर उतर जाते हैं । खांसी या दमा में भी यह लाभदायक है । पीपल के सूखे पत्तों को कूटकर, कपड़-छान कर एक रत्ती चूर्ण शहद में लेने से तत्काल लाभ होता है । पीपल के कोमल पत्तों का रस गरम कर कान में डालने से कान का दर्द, कान का बहना ठीक हो जाता है । कोमल पत्तों का रस शहद में मिलाकर अंजन करने से आंख की लाली, फूला आदि में आराम मिलता है | नेत्र ज्योति बढ़ती है ।

सबसे अधिक ऑक्सीजन पीपल से

पीपल की एक और विशेषता है । तुलसी के अतिरिक्त यही वृक्ष दिन-रात ऑक्सीजन प्रवाहित करता है। वह अशुद्ध वायु अर्थात वातावरण की कार्बन-डाए-आक्साइईड को ग्रहण करता है और दिन-रात शुद्ध वायु छोड़ता है। शायद यही कारण है कि हिंदू धर्म में पीपल की लकड़ी काटना, जलाना, पाप समझा जाता है। पीपल की रक्षा के लिए ही संभवतः उसमें ब्रम्हा आदि देवताओं के निवास की कल्पना की गयी और कालांतर में उसमें ब्रम्ह राक्षस का निवास भी कल्पित कर लिया गया, ताकि लोग भयभीत हो और वृक्ष को हानि न पहुंचायें ।

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