अबुल फ़जल | Abul Fazal


अबुल फ़ज़ल, अल्लामी शेख मुबारक का पुत्र था। उसका जन्म आगरा निकट १४ जनवरी, १५५१ को हुआ था और अगस्त १६०२ को जब वह सराय बरकी गाँव से कुछ मील दूर अन्तरी को जा रहा था, तब शाहजादा जहाँगीर के आदेश पर उसे घेरकर कत्ल कर दिया गया |


अबुल फ़जल अरबी था। उसका पितामह शेख मस्त अरेबिया का रहने वाला था। नवीं शताब्दी में उसके पूर्वज कुछ मुस्लिम आक्रमणकारियों के साथ सिन्ध आए थे। वहाँ से अबुल फजल का दादा शेख खिज्र, जो एक घुमक्कड़ फ़कीर था, अजमेर के निकट नागौर में आया । अबुल फ़ज़ल के पिता शेख मुबारक का जन्म यहीं हुआ था । इसके जन्म के थोड़े समय बाद ही शेख खिज्र और परिवार के दूसरे लोग एक दुर्भिक्ष में चल बसे । घूमते-फिरते शेख मुबारक अहमदाबाद पहुँचा जहाँ वह कई वर्ष तक रहा । बाद में वह आगरा के निकट एक सुन्नी फकीर की शरण में रहा, परन्तु बाद में शियामत का अनुयायी हो गया | उसके चरित्रभ्रष्ट होने की सूचना अकबर को दी गई | शिया लोगों के प्रति घृणा के कारण उसने शेख मुबारक को गिरफ्तार करने का हुक्म दिया। शेख को जब विश्वास हो गया कि फ़ैजी अकबर उसे मरवा डालेगा, तब वह अपने दो जवान लड़कों अबुल फैजी और अबुल फ़जल को आगरा में छोड़कर भाग निकला और स्वयं उसने सलीम चिश्ती की शरण ली। अबूल फ़जल छोटा था । १५७४ में बड़े भाई फैजी ने उसका परिचय अकबर से करवाया ।

१५७४ ई० में पहली बार अबुल फ़जल का अकबर से परिचय कराया गया, परन्तु अकबर पर उसका कोई प्रभाव न पड़ा। अबुल  फ़ज़ल ने अपनी किस्मत को कोसा क्योंकि उसे विश्वास था कि एक बार अकबर से भेंट का मौका मिल जाए तो ह अकबर के दिल में जगह बना लेगा। अकबर ने जिस तरह उसे दुत्कारा, उससे अबुल फ़ज़ल को निराशा हुई |  और अकबरनामे में उसने लिखा है कि "किस्मत ने पहली बार मेरा साथ न दिया, जिसके कारण मैं एकदम स्वार्थी और घमण्डी बन गया। विद्वत्ता के घमण्ड के कारण मेरा दिमाग सबसे अलग रहने के विचार से भर उठा। मेरे पिता बार-बार मुझे समझाते जिसके कारण मैं बेवकूफी में पड़ने से बच गया। मैं अपने देश के विद्वान् लोगों से तंग आ गया था ।" इससे प्रकट होता है कि अबुल फ़जल दरबार में ऐशो-आराम और शाही संरक्षण का जीवन व्यतीत करना चाहता था।

जिस समय अबुल फ़ज़ल को दरबार में अकबर के हजूर में पेश किया गया, उस समय अकबर बिहार और बंगाल की विजय के लिए तैयारियाँ कर रहा था। बादशाह के फतेहपुर सीकरी लौटने पर तुरन्त बाद अबुल फ़जल दरबार में हाजिर हुआ, जहाँ अकबर ने उसे सबसे पहले जामिया मस्जिद में देखा ।

खुशामद करने में अबुल फ़जल की चातुरी के बारे में, जिसके कारण उसे बादशाह अकबर का अनुग्रह प्राप्त हुआ | यूरोपीय लेखको के अनुसार “बहुत बार अबुल फ़जल पर चापलूसी करने और यहाँ तक कि अपने आश्रयदाता की प्रसिद्धि पर आँच लाने वाले तथ्यों को जानबूझकर छिपाने का आरोप लगा है ।"

      

दरबारी लोग और शाहजादा सलीम उर्फ जहाँगीर, अबुल फ़जल के विरुद्ध थे। एक बार जहाँगीर अचानक अबुल फ़ज़ल के घर चला गया जहाँ उसे अबुल फ़ज़ल पर दोरंगी चाल चलने का आरोप लगाने का अच्छा मौका मिल गया । मकान में प्रवेश करने पर उसने देखा कि कुछ लोग कुरान की टीकाओं की नकल करने में लगे हुए थे। वह उन्हें बादशाह के पास ले गया और उन प्रतियों को दिखाकर उसने कहा कि देखिए, अबुल फ़जल मुझे जो कुछ सिखाता है वह घर पर उससे बिल्कुल भिन्न व्यवहार करता है ।" इस घटना से शायद अकबर को यह विश्वास हो गया कि उसके दरबारर में, जहाँ कपट-नीति की बहुत अधिक आवश्यकता थी, अबुल फ़जल बिल्कुल सही व्यक्ति रहेगा।

१५२ ई० के अन्त में अकबर ने फ़़जल का दर्जा बढ़ाकर उसे दो हजारी बना दिया। अब उसे दरबार में बड़े अमीरों की श्रेणी में गिना जाने लगा ।

उसके पिता का देहावसान लाहौर में १५६३ को ८० वर्ष की आयु में हुआ। दो वर्ष बाद फ़जल के बड़े भाई फैजी का भी ५० वर्ष की अवस्था में १५६५ को देहावसान हो गया । अकबर के शासन के ४३वें वर्ष में फ़जल को पहली बार सैनिक सेवा पर बाहर भेजा गया। शाहजादा मुराद दक्कन में विद्रोहियों का दमन नहीं कर पा रहा था। इसलिए फज़ल को वहाँ भेजा गया ताकि वह उसे अपने साथ लेकर वापिस आये क्योंकि मुराद की अत्यधिक शराबखोरी के कारण अकबर को बहुत चिन्ता थी। अबुल फ़जल जिस दिन दौलताबाद से कुछ कोस दूर पुरना नदी के किनारे शिविर में पहुँचा, उसी दिन मुराद की मृत्यु हो गई। फ़जल ने अपना अभियान चालू रखा। उसने अहमदनगर के निजामशाही राज्य की चाँद बीबी से, जो अपने आपमें रणचण्डी थी, समझौता किया।

अकबर के शासन के ४७वें वर्ष में अबुल फ़जल को वापस बुलाया गया ताकि उसे शाहजादा सलीम उर्फ जहाँगीर के विरुद्ध भेजा जा सके, जिसने इलाहाबाद में अपने-आपको शासक घोषित कर दिया था। ज जहांगीर ने यह सुना कि अबुल फ़जल उस के विद्रोह को दबाने के लिए दक्षिण में अपने शिविर से चल पड़ा है तो उसने बुन्देला के वीरसिंह देव को कहा कि जब अबुल फ़जल बुन्देला के रछा नरेश के इलाके में से होकर निकले तब वह उसको घेर ले और कत्ल कर दे । जब अबुल फ़ज़ल एक पेड़ के नीचे बैठा आराम कर रहा था तब उसे और उसके साथियों को चारों ओर से घेर लिया गया । फ़जल को बारह घाव लगे और अन्त में उसे भाले से छेद दिया गया । उसका सिर धड़ से अलग करके इलाहाबाद में जहाँगीर के पास भेजा गया। जहाँगीर इतना खुश हुआ कि उसने उसे उठाकर गन्दगी के ढेर में फेंक दिया |

जहाँगीर, अबुल फ़जल से बहुत डरता था । फ़जल जानता था कि उसे अकबर का विश्वास प्राप्त है, इसलिए वह अकबर की उपस्थिति में भी एक अभिमानी बड़े-बुढ़े की तरह जहांगीर को डांट दिया करता था। अबुल फ़जल के दम्भ और उसकी चालाकी को जानते हुए जहाँगीर के मन में उसके प्रति घृणा उत्पन्न हो गई थी। अपने संस्मरणों में उसने लिखा है कि “जब अबुल फ़जल बादशाह के पास होता था तब मैं अपने पिता अकबर के पास जाने का साहस नहीं करता था क्योंकि मुझे डर था कि अबुल फ़ज़ल कोई-न-कोई अपमानजनक बात कहकर अकबर को मुझसे नाराज़ कर देगा।“ इस तरह स्वयं अपने पिता से प्रायः अलग कर दिए जाने के कारण जहाँगीर ने अबुल फ़जल को कल्ल करने की योजना बनाई। अबुल फ़जल में वे सब बुराइयाँ थी जो किसी मुस्लिम दरबार में रहने वाले व्यक्ति में हो सकती हैं। वह अपने पेटूपन के लिए प्रसिद्ध था । कहा जाता है कि पानी को छोड़कर वह प्रतिदिन लगभग २२ सेर खुराक खा जाता था। जब ह मुगल सेना के सेनापति के रूप में दक्कन में गया था तब खाने की मेज पर उसकी विलासिता बहुत बढ़ गई थी । एक बड़े तम्बू के नीचे उसकी खाने की मेज पर सैकड़ों प्रकार के बढ़िया भेजन प्रस्तुत किये जाते थे ।

            

अबुल फ़जल के दो सहपालित भाई थे और दो और भाई थे जो उसके पिता शेख मुबारक की रखैल औरतों से पैदा हुए थे। इतिहासकारो के अनुसार उसकी कम-से-कम चार बहनें भी थीं। अकबर, अबुल फ़जल को कोई महत्त्व नहीं देता था, इसका संकेत फ़ज़ल की 'मृत्यु से भी मिल जाता है। जहाँगीर द्वारा अबुल फ़जल का कत्ल कर दिये जाने पर उसने अपने बेटे को एक शब्द भी बुरा-भला नहीं कहा क्योंकि उसके दरबार में बहुत से चापलूस हमेशा उसकी कृपा-दृष्टि पाने के लिए तैयार रहते थे और इसलिए इनमें से एक की कमी हो जाने से उसको कोई फर्क नहीं पड़ता था।

अबुल फ़ज़ल की मृत्यु ५३ वर्ष की अवस्था में हुई। उसी ने अकबर को पहली बार यह विचार दिया था कि वह अपनी प्रजा का आध्यात्मिक और लौकिक दोनों प्रकार का नेतृत्व सँभाले । १५७४ में कुरान की टीका की सहायता से वह अकबर को यह बात समझाने में सफल हो गया। एक बार यह कार्य प्रारम्भ हो गया तो उसने उसकी प्रगति बनाये रखी । दरबार में उसे शाही अनुग्रह इतना अधिक मिला कि ईसाई पादरी उसका उल्लेख "बादशाह का जोनाथन" कहकर करते हैं । फिर इस बात से कि कुरान के गम्भीर अध्ययन के माध्यम से अबुल फ़ज़ल अकबर के दिल में स्थान पा सका |               

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