विनायक जी की कहानी (मारवाड़ी मे)

Vinayak Ji Ki Kahani (In Marwari)

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एक गणेशजी हा न्हा धोकर राजा का डावा गोखा म भार बैठ जवता। राजा की सवारी निकलती जणा पूछतो थे अठ ही अठ बेठो हो थांक भी की काम ह की नहीं ।

गणेशजी बोल्या राजा अखाण्या परवाण म्हे सारां । ब्याव काज मे सारां । खाली भंडार म्हे भरा। राजा बोल्या म्हाका भी कारज सारो । तो कहयो-राजा परीक्षा ले ल्यो । राजा फूटा ढ़ोल बेठाया बांका मुंडा की गीतेरण्या बेठा दी। राख को कूं कं रख दियो। सुल्योड़ी सुपारी रख दी। बींद बीदणी जड दिया। ताला लगा दिया। कुंज्या आप कन मंगा ली। पहरेदार दरवाजा पर बेठा दिया ।

आधी रात हुई विनायकजी छडी लेकर निकल्या । बींद बीनणी परणजी नया। हथलेवा जड़ग्या । ढोल चोखा होयग्या गीतेरण्या चोखी होगी। रोली मोली होगी। सुपारी चोखी होगी ।

न्हा धोकर राजा का दरबार म दिनुगे आर बेठगा।

राजा को सवारी निकलती। राजा पूछा थे रोज अठ ही भठ बेठो थांक की काम ह की नहीं। विनायकजी बोल्या । काल का ढक्या अबार जार देखो ।

राजा जार देख तो बींद बीदणी परणी ज गया हथलेवा राच गया | मंत्र उच्चार होरया ह। गीतेरण्यां गीत गाव, ढोलण्या ढोल बजाव । बाजा बाज रया ह । पहरेदारान नीद आायगी। जडयोडा ताला खुलगा।

राजा खुला केसा उगाण पगा जार विनायकजी क पगां पडयो ब्याका कारज सारया जिसा म्हाका सबका कारज सारीजो।

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