सूर्य देव जी की कथा

Surya Dev Ji Ki Katha


सूरजजी की कहानी, सूरज की कहानी, सूरज की कहानी, सूर्य भगवान की व्रत कथा

एक ब्राम्हण हों दिन ऊगतो ओर आपकी लुगाई न केवतो कि भुख लागी। लुगाई केवती न्हावूं धोवू पूजा-पाठ करु पछ रसोई बनावू थोने तो उठताई भुख लागथे नेम ले लेवो । धणी बोल्यो म्हारासूं भुख निकल कोनी म्हे काई नेम लेवं? लुगाई बोली सूरजजी न देखर रोटी खाया करो धणी बोल्यो म्ह उठूं जणा ताई सूरज जी उग जाव |

ओ नेम चोखो है और बो नेम लेर सूरजजी न देखर रोटी खाबा लागग्यो । घणा दिन होयग्या सूरज भगवान बोल्यां ईन आपान तुष्ठ मान होणू ह एक दिन बरसात घणी आयी सूरज भगवान दिख्या कोनी लुगाई न बोल्यो म्हन भूख लागी ह सूरज भगवान दिख्या कोनी अब क्यान करु लुगाई बोली डुंगर पर जार (जंगल म) देखर आवो । वो डुंगर पर गयों । चार चोर चोरी करर आया है । धन की पांती कर हा । डुंगर पर ब्राम्हण न सूरज भगवान दीखग्या ओर वो बोलो दोंसग्यों रे दीसग्यो चोर जाण्यो म्हाकोधन दीसग्यो आग बाम्हण भागे लार चोर भाग्या जाव चोर बोल्यो ठेर ? पण वो जोर सूं भागण लागग्यो घर गयो लुगाई बोली कांई बात ह ब्राम्हण बोल्यो म्हारे लार चोर लाग्या । ब्राम्हणी बोली थे जीमो म्हे बात करु ब्राम्हाणी चोरां न पूछ्यो कांई बात ह ? चोर बोल्या म्हे चार चोर हां चोरी करर लाया धन की पांती कर हा। थारा धणी न दीसग्या रावला म जार के देई तो म्हासुं भी जाई थारसु भी जाई । दो घणा तू ले ले, दो घडा म्हे ले लेवा ।लुगाई हुशार ही बा बोली दो कोनी लेवा तीन लेवा नई तो रावले म ज्ञार के देवां चोर तीन घड़ा दे दिया सुरज भगवान बौन तुष्ठ मान हुया जयान सबन देईजी ।

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