सी शंकरन नायर | C. Sankaran Nair

शंकरन नायर का जन्म मलाबार के चेत्तर परिवार में १८५७ में हुआ। यह वर्ष भारतीय इतिहास में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है क्योकि इसी र्ष भारतीयों ने सर्वप्रथम स्वतंत्रता प्राप्ति का प्रत्यक्ष कदम उठाया था। एक सम्पन्न कुल में उत्पन्न होने के कारण उनका बचपन बहुत ही सुखमय व्यतीत हुआ। उनके पिता तहसीलदार थे और दादा कलेक्टर के कार्यालय में काम करते थे।

 

नौ वर्ष की आयु में वह अंगाडीपुरम में स्थित एक छोटे से स्कूल में भर्ती हुए । इसके कुछ वर्ष पश्चात् माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए कण्णूर गए। वहां अंग्रेज अध्यापकों के निदेशन में रहने के कारण उन पर अंग्रजों का प्रभाव पड़ने लगा। हाई स्कूल की शिक्षा पाने के लिए वह कालीकट गए। उन्होंने यह परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की उच्च शिक्षा पाने के लिए वह मद्रास गए तथा मइलापुर के प्रेसीडेंसी महाविद्यालय में प्रविष्ट हुए। इतिहास, अर्थशास्त्र और अंग्रेजी में उनकी विशेष रूचि थी | अंग्रेजी और इतिहास में प्रथम आने के फलस्वरूप उन्हें पुरस्कार भी प्रदान किए गए | साथ ही अति विख्यात एलि्पलरन एल्फ़िन्स्टन पारितोषिक भी उन्होंने प्राप्त किया। मद्रास में भी उनके प्राध्यापक अंग्रेज ही थे, इस कारण उन पर अंग्रेजों का अत्यधिक प्रभाव पड़ा।


उनके समय के अधिकांश व्यक्ति वकील बनने के इच्छुक थे और उनके सामने ही कई बड़े-बड़े वकील बन चुके थे। साधारणतः युवक अपनी शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात वही पेशा अपनाना चाहता है, जिसमें उसने अपने से बड़ों को सफलतापूर्वक कार्य करता देखा है। इसीलिए बी०ए० की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद शंकरन नायर की रुचि राजकीय कर्मचारी बनने की अपेक्षा वकालत करने की ओर अधिक रही। उनके वकालत करने का दूसरा कारण यह था कि वह एक ऐसे क्षेत्र में कार्य करना चाहते थे जिसमें वह अपने विचार प्रकट कर सकें और उनकी दृष्टि में वकालत ही एक ऐसा पेशा था जिसमें बिना किसी बाधा के वह अपने विचार प्रकट कर सकते थे।

 

इसी विचार से शंकरन नायर वकालत पढने लगे और बी०एल० की परीक्षा में प्रथम आए। इस परीक्षा के पास करने के बाद उस समय के एक बड़े अंग्रेज बैरिस्टर शेपर्ड के अधीन अनुभव प्राप्त करने के लिए इन्होंने एक वर्ष तक कार्य किया। फिर वह मद्रास हाईकोर्ट के वकील बन गए। अब उन्हें राजकीय कर्मचारी बनने की तीव्र इच्छा हुई। शंकरन नायर की स्वाभिमानी प्रवृत्ति उनके हृदय में उछलने लगी तथा उन्होंने इस पद से त्यागपत्र दे दिया।

 

भारत में उस समय अंग्रेज़ों का राज्य था और जिस पद पर देखो अंग्रेज ही नियुक्त थे। विशेषकर ऊंचे पदों पर अंग्रेजों की ही नियुक्ति होती थी। अतः शंकरन नायर वकील बन गए। उनकी वकालत खूब चमकी। इसका प्रमुख कारण यह था कि वह अपनी मातृभूमि मलावार के निवासियों के रीति-रिवाज और भूमि संबंधी कानूनों से भली भांति परिचित थे। इसलिए मलावार के मुवक्किल उन्हें मिलने लगे और वह बड़े-बड़े वकीलों से टक्कर लेने लगे।

 

१९०७ में वह एडवोकेट जनरल नियुक्त हुए। मद्रास में इस पद पर नियुक्त वह प्रथम भारतीय थे। इसके एक वर्ष बाद ही ह मद्रास हाईकोर्ट के न्यायाधीश बने। इससे पूर्व भी वह तीन बार स्थानापन्न न्यायाधीश रह चुके थे। वह स्वतंत्र, योग्य और निष्पक्ष न्यायाधीश सिद्ध हुए। मद्राके ही नहीं, सारे भारत के उत्कृष्ट न्यायाधीशों में शंकरन नायर भी एक थे।

        

शंकरन नायर की प्रतिभा सर्वतोपुखी थी वह सफल पत्रकार भी था। उन्होंने “मद्रास रिव्यु आरंभ किया। परंतु इस पत्रिका से उनका संबंध अधिक समय तक न रहा। कुछ समय पश्चात् उन्होंने इस ओर ध्यान देना पूर्ण रूप से छोड़ दिया। आगे चल कर पत्रिका बंद हो गई। मद्रास ला जरनल” से भी शंकरन नायर का सीधा संबंध था। अंग्रेजो पत्रिकाओ मे भी वह अपने लेख भेजते थे। मद्रास के दैनिक पत्रों में प्राय: उनके लेख निकलते थे । शंकर नायर कड़े आलोचक थे और कई बार अंग्रेजों के विरुद्ध भी लिख देते थे, जिसके परिणामस्वरूप एक तूफान-सा उठ खड़ा होता था तथा उस असंतोष को दूर होने मे बहुत समय लग जाता था। कई बार वह देश के नेताओं की आलोचना करने से नहीं करने चूकते थे। उनकी पुस्तक “गांधी और अराजकता” इस बात का प्रमाण है की इस पुस्तक के छपने पर भारत और इंग्लैंड दोनों देशों में तूफान उठ खड़ा हुआ। भारत में तूफान उठने का कारण यह था कि उन्होंने गांधीजी को नीति की कड़ी आलोचना की जबकि अधिकांश जनता गांधीजी के पक्ष में थी तथा शंकरन नायर असहयोग आंदोलन के पक्ष में नहीं थे।

 

इंग्लैंड में असंतोष का कारण यह था कि एक अंग्रेज पंजा के लेफटीटनेंट गवर्नर माइकेल ओडायर द्वारा जलियांबाला बाग में किए गए हत्याकांड को शंकरन नायर सहन न कर सके और उसकी उन्होंने कड़ी आलोचना की । उस अंग्रेज ने इसे अपनी मानहानि समझा तथा उनके विरुद्ध मुकदमा दायर किया। इसके फलस्वरूप उन्हें तीन लाख रुपये मानहानि के लिए तथा अतिरिक्त खर्च के लिए देना पड़ा। उन्होंने इतना धन तुरंत ही प्रसन्नतापूर्व दे दिया क्योंकि उनका विचार था कि उन्होंने वास्तव में उचित कार्य किया है। इसलिए इस पर उन्हें कोई पश्चाताप न हुआ।

 

इन पत्रिकाओं के झंझट में पड़ कर भी उन्होंने अन्य क्षेत्रों में अपनी योग्यता और कठोर परिश्रम का परिय दिया। सार्वजनिक जीवन में उन्होंने बहुत परिश्रम कि। कांग्रेस के तेरहवें वार्षिक अधिवेशन का, जो अमरावती में था, शंकरन नार को अध्यक्ष चुना गया। उन्होंने अपने भाषण में भारतीयों के प्रति अंग्रेजों के बुरे व्यवहार को निडरतापूर्वक आलोचना की।

 

१८१५ में शंकरन नायर वाइसराय की शासन परिपद् के शिक्षा सदस्य बने। उन्होंने अपने कार्यालय में अपना कर्तव्य भली-भाति निभाया। परन्तु जब भी उन्हें ऐसा प्रतीत होता की अपुक कार्य अधिकांश भारतीयों की इच्छा के विरुद्ध हैं तो उसे करना वह उचित नहीं समझते थे। यहां तक कि इसके लिए उस पद को त्यागने में भी किसी प्रकार का संकोच नहीं करते थे। जलियांवाला बाग को घटना के बाद सरकार से मतभेद होने के कारण उन्होंने पद से त्यागपत्र दे दिया। परंत शीघ्र ही सरकार को उनकी सहायता की आवश्यकता पड़ी और उनकी कौसिल आफ स्टेट का सदस्य बनाया गया।

            

१९२१ में सभी राजनीतिक दलों का एक सम्मेलन हुआ। शंकरन नायर उसके अध्यक्ष चुने गए। १९२८ में वह साइमन कमीशन के साथ सहयोग देने के लिए नियुक्त समिति के अध्यक्ष बनाए गए। यद्यपि उन्होंने साइमन कमीशन को सहयोग दिया तथापि कमीशन की सभी सिफ़ारिशों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय शासन विधान बनाने में एक भी अंग्रेज का हाथ नहीं होना चाहिए। अंग्रेजों और भारतीयों के सामाजिक वातावरण में बहुत अंतर है। अंग्रेज न तो भारत के रीति-रिवाज से परिचित हैं और न ही भारत की अनेक जातियों, उनकी समस्याओं और उनके सामाजिक बंधनों से । वे भारतीयों की आकांक्षाओं को नहीं जान सकते। इसलिए उनका बनाया हुआ शासन विधान भारतीयों के लिए हितकारी सिद्ध नहीं हो सकता।

 

अंग्रेजी राज के कर्मचारी होने पर भी उन्होंने देश के हित को ही ध्यान में रखा। उन्होंने अधिक वेतन पाने के लिए बड़े ओदहे नहीं संभाले । उनके कर्म के पीछे नि:स्वार्थ देश-प्रेम था।

 

शंकरन नायर स्त्री शिक्षा को बहुत ही आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि शिक्षा का माध्यम भी भारतीय भाषा ही होनी चाहिए। उन्हें संस्कृत पर बहुत गर्व था। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति को समझने के लिए संस्कृत भाषा का ज्ञान बहुत ही आवश्यक है। उनका विचार था कि भारत की पाठशालाओं में संस्कृत को अनिवार्य विषय बनाना देश के लिए हितकर होगा।

 

शंकरन नायर भारतीयों के स्वभाव से भली-भांति परिचित थे। सलिए उन्होंने भारतीयो को प्रेरित किया कि वे स्वतंत्र होने का प्रयत्न करें। शंकरन नायर का स्वभाव ही ऐसा था कि वह कभी आलसी बन बैठे नहीं रह सकते थे। वह सामाजिक और राजनीतिक कार्य करने के साथ ही अध्ययन भी करते थे,  फिर सायंकाल के समय सेर करने समुद्र के किनारे तक जाते थे। इस कारण उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा था।

२४ अप्रैल १९३४ को उनका देहांत हो गया |             

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