दादाभाई नौरोजी | Dadabhai Naoroji


दादाभाई नौरोजी, जैसा कि उनका नाम था, समूचे भारत के दादा और सभी दीन-दुखियों के बंधु थे। उन्होंने ९३ वर्ष की लंबी आयु पाई थी और जिस तरह किसी परिवार का बड़ा उस परिवार की देखभाल करता है उसी तरह दादाभाई ने देश की देखभाल का भार अपने ऊपर लिया था ।


दादाभाई नौरोजी का जन्म एक पारसी पुरोहित परिवार में सितम्बर १८२५ को हुआ था। बारह शताब्दी पूर्व जब ईरान पर अरबों का आक्रमण हुआ, तो वहां रहने वाले कई अग्निपूजक पारसी परिवार वहां से भाग कर भारत आ बसे थे। दादाभाई नौरोजी बड़ौदा के पास नवसारी के रहने वाले थे, मुगलों के जमाने में नवसारी सुगंधित फूलों और इत्र के लिए प्रसिद्ध था। दादाभाई के एक पुरखे चांदजी कामदिन बहुत अच्छे इत्र तैयार करते थे। उनकी शोहरत नूरजहां के कानों तक पहुंची थी और उसने चांदजी कामदिन से इत्र तैयार करने का नुस्खा पूछ कर उन्हें एक फरमान द्वारा इज्जत और जागीर दी थी।

 

दादाभाई का वंश दोरड़ी कहलाता था, कहा जाता है की उनके एक पुरखे बहरामजी महरनोशजी एक दावत में देर से पहुंचे और सिकुड़ कर एक कोने में बैठ गए इस पर उनके एक साथी ने कहा कि तुम दोरड़ी (ऐठे हुए रस्से) की तरह क्यों बैठे हो। इस पर वंश का नाम ही दोरड़ी पड़ गया। नवसारी से बीस मील दूर धर्मपुर में दोरड़ी परिवार की जमीन थी, जहां दादाभाई के बाबा और पिता बम्बई आने से पूर्व खेती करते थे। दादाभाई के पिता का नाम नौरोजी पालनजी दोरड़ी और माता का नाम मानकबाई था। वह गरीब परिवार बम्बई में खडक में एक छोटे से मकान में रहता था।

 

जब दादाभाई चार वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया| उनका पालन-पोषण उनकी माता मानकबाई ने किया। बिलकुल अनपढ़ होते हुए भी वह बहुत समझदार स्त्री थीं। बेहद गरीबी की हालत में रहते हुए भी उन्होंने बालक दादाभाई को अच्छी शिक्षा दिलाने की कोशिश की। दादाभाई नौरोजी के चरित्र-निर्माण में उनका बहुत बड़ा हाथ था। दादाभाई अक्सर कहा करते थे कि जीवन में मैं जो कुछ बन सका हूं अपनी मां के कारण ही बन सका हूं। सौभाग्य से उन दिनों शिक्षा बिलकुल मुफ्त थी। उनके जीवन पर इस शिक्षा का ऐसा असर पड़ा की वह वह जीवन भर मुफ्त शिक्षा के सिद्धांत का समर्थन करते रहें। वह कहते थे कि हर बच्चे को, चाहे वह गरीब घर में पैदा हुआ हो या अमीर घर में, अधिक से अधिक शिक्षा पाने की सहूलियत होनी चाहिए।

        

बचपन में दादाभाई बहुत सुंदर थे। कई बार ब्याह-शादियों के मौकों पर उन्हें अंग्रेज जनरल या एडमिरल की पोशाक पहनाया जाता था और लोग उन्हें प्यार से जोंगलूकहा करते थे।

 

दादाभाई आरंभ से ही बड़े होनहार थे। कहा जाता है की दादाभाई ने कभी किसी को गाली नहीं दी। अगर कभी कोई उनको गाली देता था तो वह कहते कि तुम्हारे ये शब्द तुम्हारे ही मुंह में रह जाएंगे।

 

ग्यारह वर्ष की आयु में दादाभाई का विवाह सोराबजी शराफ़ की कन्या गुलबाई से हो गया। लगभग पंद्रह वर्ष की आयु में दादाभाई में यह चेतना आ गई थी कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नही करना चाहिए। एक दिन सड़क पर खड़े होकर उन्होंने संकल्प किया कि मैं कभी ओछी भाषा का इस्तेमाल नहीं करूंगा और जीवन भर उन्होंने अपना यह वचन निभाया ।

 

कालेज जीवन में ही दादाभाई के मन ने यह विचार आया कि मुझे जो कुछ मिला है समाज से मिला है, इसलिए मुझे अपना जीवन समाज सेवा में लगा देना चाहिए। पढ़ाई समाप्त करने के बाद दादाभाई हेड नेटिव असिस्टेंट मास्टर के पद पर नियुक्त किए गए। इसके केवल दो वर्ष बाद उन्हें गणित का प्रोफेसर बनाया गया। प्रोफेसर का पद पाने वाले वह पहले भारतीय थे।

 

गणित के प्रोफ़ेसर के पद पर काम करते हुए ही दादाभाई नौरोजी राजनीति में भाग लेने लगे। २६ अगस्त १८५२ की एल्फिस्टन इंस्टीट्यूशन के एक कमरे में बम्बई में पहली राजनीतिक संस्था की स्थापना की गई। इसका नाम था बम्बई एसोसिएशन”, इस एसोसिएशन ने ब्रिटेन की संसद के लिए एक आवेदन पत्र की रूपरेखा तैयार की। इसमें मांग की गई कि शासन व्यवस्था उदार होनी चाहिए और सिविल सर्विस तथा व्यवस्थापिका सभाओं में भारतीयों को भी स्थान मिलना चाहिए। दादाभाई नौरोजी ने “रास्त गुफ्तार नाम का एक पाक्षिक पत्र भी निकाला। रास्त गुफ्तार का अर्थ है सच कहने वाला

 

कुछ दिन बाद १८५५ में कामा नाम की भारतीय कम्पनी ने इंग्लैंड में अपनी फ़र्म खोली। इंग्लैंड में खोली जाने वाली यह पहली भारतीय फ़र्म थी | इस फ़र्म ने दादाभाई को इंग्लैंड चलने का न्यौता दिया, जब दादाभाई ने इस फर्म के साथ इंग्लैंड जाने का फैसला किया तो उनके प्रिंसिपल ने उनसे कहा “दादा भाई तुम्हारा यह कैसा पतन है। तुम प्रोफेसरी छोड़कर व्यापारी बनना चाहते हो “। लेकिन सच बात यह है कि दादाभाई नौरोजी के इस फैसले के कारण ही उनको देशसेवा का और भारत में राष्ट्रीयता की भावना जगाने का मौका मिल सका।

        

दादाभाई नौरोजी स्वभाव से बड़े न्यायप्रिय और आदर्शवादी थे एक बार उनकी फर्म की मार्फत धागे की रील की सप्लाई होनी थी उन्होंने देखा कि कुछ रीलों में धागा सौ गज की जगह सिर्फ अस्सी गज है | तभी उन्होंने फ़ैसला किया कि यह सौदा नहीं होना चाहिए। मालिकों ने सोचा कि इससे फर्म के कारोबार में घाटा आएगा, दादाभाई अपनी बात पर डटे रहे और उन्होंने फर्म छोड़ दी। फर्म अफीम और शराब का व्यापार भी करती थी। दादाभाई को वह भी पसंद नहीं था। इसलिए दादाभाई भारत लौट आए। इंग्लैंड में रहने से उन्हें इंग्लैंड और भारत की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हालतों की तुलना करते का अवसर मिला और भारत की दुर्दशा देख कर अब वह पहले से भी ज्यादा बेचैन हो उठे।

 

१८५९ में दादाभाई ने दादाभाई नौरोजी एंड कम्पनी के नाम से इग्लैंड में खुद अपनी फर्म की स्थापना की और मुख्य रूप से कपास का व्यापार आरंभ किया। इंग्लैंड में शिक्षा पाने वाले भारतीय विद्यार्थी धीरे-धीरे दादाभाई के प्रभाव में आने लगे और दादाभाई उनका हर तरह से पथ-प्रदर्शन करने लगे | गांधीजी भी विद्यार्थी के रूप में दादाभाई के प्रभाव में आए बिना न रहे। बाद में उन्होंने लिखा कि “दादाभाई हर एक भारतीय विद्यार्थी के लिए पिता तुल्य थे।“

 

दादाभाई नौरोजी ने ब्रिटेन की जनता में भी भारत के प्रति दिलचस्पी पैदा करने की कोशिश की। अंग्रेजों और भारतीयों को एक-दूसरे के नजदीक लाने के उद्देश्य से दादाभाई ने इंग्लैंड में ही प्रसिद्ध बंगाली नेता डब्ल्यू.सी. बनर्जी के सहयोग से लंदन इंडियन सोसायटीकी स्थापना की। दादाभाई लगभग पचीस वर्ष तक इस संस्था के प्रधान रहे। लेकिन दादाभाई को इस छोटी-सी संस्था से संतोष नहीं हुआ इसलिए उन्होंने ईस्ट इंडिया एसोसिएशननाम की एक संस्था भी बनाई | इसकी सभाओं में उन्होंने भारतीयों को स्थान न दिए जाने का सवाल उठाया। शीघ्र ही इस संस्था का शाखाएं बम्बई, कलकत्ता, मद्रास और दूसरे शहरों में भी खोली गई।

 

इसके बाद दादाभाई ने अपनी सारी शक्ति यह साबित करने में लगा दी कि भारत में हर दर्जे की गरीबी है और इसके लिए अंग्रेज़ सरकार ही ज़िम्मेदार है। दादाभाई ने बताया कि प्रत्येक भारतवासी की औसत आय केवल बीस रुपये साल है। ब्रिटेन की सरकार ने छानबीन के बाद पता लगाया कि दादाभाई नौरोजी ने जो बात कही है वह बहुत हद तक सही है। दादाभाई की पुस्तक, पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया पढ़कर कितने ही अंग्रेज भारत से सहानुभूति रखने लगे। उन दिनों ब्रिटेन और युरोप के पश्चिमी देशों का अधिक सभ्य मानने का आंदोलन भी चल रहा था। दादाभाई ने बताया कि भारत में अंग्रेजी राज्य में जो कुछ हो रहा है उससे तो सभ्यता के नाम पर कलंक ही लग रहा है। दादाभाई का मत था कि यूरोपीय जातियां एशियाई जातियों से किसी मायने में भार अपने ऊपर लिया था ।


१८८१ में इंग्लैंड में दादाभाई की फ़र्म बंद हो गई और वह भारत लौट आए। उन दिनों भारत के वाइसराय लार्ड रिपन थे उन्होंने शिक्षा कमीशन बैठाया। दादाभाई ने इस कमीशन को बताया कि भारत जितना गरीब है, वह शिक्षा के क्षेत्र में उससे भी ज्यादा पिछड़ा हुआ है। इस पर लार्ड रिपन ने तय किया कि भारतीयों को स्वायत्त शासन के लिए तैयार किया जाए। दादाभाई ने साथ ही यह भी सुझाव रखा कि स्वदेशी को  अपनाया जाए | अब तक दादाभाई का नाम देश भर में फैल चुका था। उनकी सेवाओं के लिए उन्हें १८८६ में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन का अध्यक्ष बनाया गया।

 

लगभग छह वर्ष बाद दादाभाई नौरोजी ब्रिटेन की लोकसभा (पार्लियामेंट) के सदस्य चुन लिए गए। अंग्रेजी शासन का बोझ भारत की गरीब जनता पर और ज्यादा न पड़े, इस पे उन्होंने बहुत कार्य किया |

 

भारत की जनता ने दादाभाई को १८९३ की लाहौर कांग्रेस का प्रधान चुनकर अपनी कृतज्ञता प्रकट की। उन्हीं दिनों दादाभाई के एकमात्र पुत्र की मृत्यु हुई थी। बम्बई से लाहौर तक उनका भव्य स्वागत हुआ। देशवासियों को हिन्दू, मुस्लिम,ईसाई, पारसी का भेदभाव भूलकर एक होने का संदेश देकर वह वह इंग्लैंड लौट गए। लोकसभा में उनकी बार-बार की दलीलों का नतीजा यह हुआ कि भारत के सैनिक और असैनिक आय और व्यय की जांच के लिए वैलबी कमीशन बैठाया गया।

 

जब तक दादाभाई ब्रिटेन में रहे वह बराबर भारत के पक्ष में प्रचार करते रहे। उनका कहना था कि भारत में अंग्रेज़ी राज्य बहुत कुछ अन्याय पर आधारित है । वह कहते थे कि अंग्रेज़ी राज्य की खराबियां तभी दूर हो सकती हैं जब अंग्रेज़ घरेलू मामलों से भारतीयों को स्वशासन के अधिकार सौंप दे।

 

दिसम्बर १९०६ में दादाभाई भारत आए | इक्यासी वर्ष की आयु में दादाभाई नौरोजी को तीसरी बार कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया इस बार दादाभाई नौरोजी ने भारत के लिए स्वराज्य की मांग की | इससे सारे देश में खुशी की लहर फैल गई ।

 

दो माह बाद दादाभाई अंतिम बार इंग्लैंड गए। लेकिन इस बार वह वहां अधिक समय तक नहीं रह सके। अस्वस्थ रहने के कारण उन्होंने इंग्लैंड सदा के लिए छोड़ दिया।


दादाभाई नौरोजी ब्रिटेन में भारत के सबसे अच्छे राजदूत साबित हुए। जहां भारत की जनता के अधिकारों का संबंध है, वह तिल भर हटने को तैयार नहीं थे, फिर भी उनका लड़ाई का तरीका ऐसा था कि उन्होंने अंग्रेज जाति का हृदय जीत लिया था। भारत की जनता को तो उनमें अटूट श्रद्धा थी। हर रोज कितने ही लोग उन्हें अपनी दुख भरी कहानी लिख कर भेजते थे और उनकी तरफ आशा भरी आंखों से देखते थे। जहां तक बन पड़ता था दादाभाई अपने ही हाथों से ऐसे पत्रों का उत्तर देते थे और जिसकी जितना मदद कर सकते थे करते थे।

 

दादाभाई नौरोजी का देहांत १९१७ में हुआ। वह भारत में राष्ट्रीय भावना के जनक और स्वराज्य की नींव डालने वाले थे।          

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