रमेशचन्द्र दत्त | Rameshchandra Datta


रमेशचन्द्र दत्त योग्य प्रशासक, देशभक्त और उच्च कोटि के साहित्यकार थे । उनकी  गिनती बंगला के विख्यात साहित्यकारों में होती है। १९वीं शताब्दी में कमिश्नर के उच्च पद पर पहुंचने वाले एकमात्र भारतीय वही थे। उनके प्रशासन और साहित्य, दोनों में हमें उनकी देशभक्ति देखने को मिलती है। उनके महत्व को ठीक ढंग से आंकने के लिए हमें यह न भूलना चाहिए कि १८५७ के गदर के बाद जिन कर्मठ महापुरुषों ने अंग्रेजी शास की अभारतीय नीति से उत्पन्न कठिन परिस्थिति में भारत को एक राष्ट्र बनाने का प्रण  लिया और मरते दम तक उसे निभाया, उनमें रमेशचन्द्र दत्त की सदा गिनती होगी।

 

रमेशचन्द्र दत्त का जन्म १३ अगस्त १८८४ को कलकत्ता के एक धनी सुशिक्षित और साहित्य-प्रेमी परिवार में हुआ था। उनके पिता, ईशानचन्द्र दत्त डिप्टी कलेक्टर थे, वह डिप्टी कलेक्टरी के सिलसिले में बंगाल, बिहार और उड़ीसा के अनेक जिलों में घूमते रहते  थे। इस तरह बालक रमेशचन्द्र को कई जिलों की अच्छी जानकारी हो गई | जब रमेशचन्द्र की आयू ११ वर्ष की हुई तभी उनकी माता का देहांत हो गया और दो वर्ष बाद, १८६१में, सरकारी काम के सिलसिले में दौरे पर जाते हुए नदी में नौका के डूबने से, पिता की भी मृत्यु हो गई । पिता के मरने के बाद तीन साल तक चाचा शशिचन्द्र दत्त की देखरेख में ईशानचन्द्र के अनाथ बच्चों का पालन-पोषण हुआ। उनके चाचा की साहित्य में अच्छी रुचि थी

 

जब रमेशचन्द्र चार वर्ष के थे तभी कलकत्ता को एक पाठशाला में भर्ती हुए। इस पाठशाला से निकलने पर एक बंगला स्कूल में उनका नाम लिखाया गया। वहां कुछ समय तक पढ़ने के बाद ह हायर स्कूल में दाखिल हुए। इसी स्कूल से उन्होंने १८६४ में एण्ट्रेंस की परीक्षा पास की और दो साल के लिए बारह रूपये मासिक का छात्रवृत्ति मिलता रहा । दो वर्ष बाद एफ०ए० की परीक्षा में जितने विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए, उनमें रमेशचन्द्र दत्त का दूसरा नम्बर था। उन्हें दो वर्ष तक बत्तीस रुपये मासिक का छात्रवृत्ति मिलता रहा। १८६४ में ह बी0ए० की परीक्षा में उत्तीर्ण हुए।


इसके बाद वह चाचा से पूछे बिना ही विलायत में आई०सी०एस० की परीक्षा में भाग लेने चले गए। १८७० में उन्होंने इस परीक्षा में भी अपनी प्रतिभा का जौहर दिखाया| इस परीक्षा में बैठे तो थे ३२५ विद्यार्थी पर उनमें से केवल ५० ही चुने गए। उन ५० विद्यार्थियों में रमेशचन्द्र दत्त का नम्बर तीसरा था। उनके साथ आई०सी०एस० की परीक्षा देने वाले तीन भारतीय सज्जन थे-सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी, बिहारीलाल गुप्त और श्रीपद बाबाजी ठाकुर। ये तीनों भारतीय विद्यार्थी सरकारी नौकरी के लिए चुने गए। इनके पहले सिर्फ एक भारतीय रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बड़े भाई सत्येन्द्रनाथ ठाकुर इस परीक्षा में उत्तीर्ण होकर भारत की सिविल सर्विस में प्रवेश कर सके थे।

 

इंग्लैंड के विद्यार्थी-काल में रमेशचन्द्र दत्त को ग्लैडस्टन और डिजरैली के भाषण सुनने का अवसर मिला। उनका परिचय उस समय के प्रसिद्ध नेताओं - जान ब्राइट और हनरी  से भी हो गया | इंग्लैंड के जिन प्रसिद्ध साहित्यकारों से उनकी भेंट हुई, उनमें जान स्टुअट मिल और चार्ल्स डिकेन्स के नाम उल्लेखनीय हैं।

 

जनवरी १८६४ में रमेशचन्द्र का विवाह मतगिंनी (मोहिनी) बोस के साथ हुआ। विवाह के बाद लगभग पैंतालीस वर्ष तक उन्होंने आनंदपूर्वक जीवन बिताया। रमेशचन्द्र के छः बच्चे हुए-पांच लड़कियां और एक लड़का।

 

१८७१ में रमेशचन्द्र दत्त असिस्टेंट मजिस्ट्रे के पद पर पहली बार नियुक्त हुए और ११ वर्ष तक इसी पद पर विभिन्न क्षेत्र में काम करते रहे। १८७६ में दक्खिन शहबाजपुर में बाढ़-पीड़ित और रोगग्रस्त परगने का प्रबंध करने के लिए वह भेजे गए। दक्खिन  शहबाज़पुर गंगा नदी के मुहाने पर स्थित एक टापू है। १८७६ में इस टापू में भीषण तूफ़ान और बाढ़ आने के कारण एक ही रात में ४० हज़ार जाने गई। टापू के पूर्वी भाग में २० फुट से भी अधिक जल आ गया था| इस बाढ़ में बहुत-सी पूर्वी सरकारी इमारतें भी नष्ट हो गई। सारा शासन अस्त-व्यस्त हो गया। पुलिस के बहुत-से कर्मचारी भी इस प्राकृतिक कोप के शिकार हुए, शेष जान बचाकर भाग गए। इस तरह अस्त-व्यस्त परगने के शासन के नए सिरे से जमाने का काम रमेशचन्द को सौंपा गया और उन्होंने बड़ी धीरता, गंभीरता तथा उदार न्यायप्रियता से अपना कर्तव्य सम्पादन किया फिर तूफान और बाढ़ की दुर्घटना के बाद इस टापू में हैजा फैला और लगभग २० हजार आदमी इसके शिकार हुए। इस बीमारी को रोकने के लिए भी दत्त जी ने कोई कसर न छोड़ी । वह घर-घर जाते और घरवालों का हाल सुनकर उनका समुचित प्रबंध करते। आखिर कुछ महीनों के बाद इस रोग का प्रकोप शांत हुआ और उनकी बदली किसी दूसरे क्षेत्र में कर दी गई।

        

१८७३ से १८८२ तक वह कई जिलों में जिलाधीश रहे। फिर १८३३ में उनकी नियुक्त स्थानापन्न कमिश्नर के पद पर हुई। इनके बाद १८९५ में वह बंगाल की विधान सभा कें सरकारी मनोनीत सदस्य बनाए गए।

 

कुल मिला कर २६ साल उन्होंने सरकारी नौकरी की। जिस समय उन्होंने आई०सी०एस० में प्रवेश किया उस समय देश के शासन में ऊंचे पदों पर भारतीयों की नियुक्ति नहीं की जाती थी |

 

१८९७ से १९०४ तक रमेशचन्द्र दत्त ने अपनी वाणी और लेखनी से इंगलैंड स्थित अंग्रेज़ो को भारत के मामलों पर सहानुभू्ति पूर्वक विचार करने की आवश्यकता समझाने की कोशिश की। उनके इस आंदोलन से इंग्लैंड वालों को भारतीयों की राजनीतिक पर विचार करने के लिए विवश होना पड़ा। लेकिन इस आंदोलन में दत्त महाशय को निराशा का सामना करना पड़ा | इंग्लैंड में रमेश्चन्द्र के आंदोलन को देखकर कृतज्ञ भारतवासियों ने १८९९ में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया। इस पद से उनका जो सम्भाषण हुआ, उसको सभी दलों में प्रशंसा हुई।

 

१९२४ में भूतपूर्व बड़ौदा रियासत के अधिपति, सय्याजी राव गायकवाड़ के अनुरोध र रमेशचन्द्र दत्त ने राज्य में माल मंत्री के पद पर काम करना स्वाकार किया। इस पद पर वह तीन वर्ष तक रहे। राज्य और जमींदारों के कर भार से गरीब किसानों को मुक्त कराने का काम उन्होंने उठाया था | बड़ौदा राज्य मे उनके प्रमुख सुधार थे - (1) किसानों का कर-भार घटाना (2) दुखदायी करों और  शुल्को को बंद करना (3) न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करना (4) राज्य-परिषद का संगठन (5) प्रारंभिक शिक्षा को नि:शुल्क और अनिवार्य करना (6) ग्रामपंचायतों संगठन और (7) बड़ौदा राज्य में धनिकों द्वारा उद्योग और व्यवसाय की उन्नति करना |

            

१९०७ में डीसेंट्रलाइज़ेशन (विकेन्द्रोकरण) कमीशन की नियुक्ति हुई। उसके एक भारतीय सदस्य रमेशचन्द्र दत्त ही थे दो वर्ष तक इस कमीशन में काम करने के बाद वह भात लौट आए और जून १९०९ में उनकी नियुक्ति बड़ौदा राज्य के दीवान के पद पर हुई।  दीवान होने के छः महीने भी पुरे न हो पाए थे कि भारत के बड़े लाट की अगवानी में काम करने के कारण वह हृदय रोग से पीड़ित हुए और ३० नवम्बर १९०९ की इस संसार को छोड़ कर चल बसे।

 

 

अपने जीवन-काल में उन्होंने कम-से-कम १८ ग्रंथों की रचना की इनमें से अधिकांश वे ग्रंथ हैं, जिनको सरकारी अधिकारी रहते हुए, छुट्टी के दिनों में उन्होंने रचा। इनमें से उल्लेखनीय ग्रंथों के नाम हैं- (1) यूरोप में तीन वर्ष (१८७२) (2) बंगाल के किसान (१८७५) (3) बंगाल का साहित्य (१८८८-९०) और (4) प्राचीन भारत की गाथाएं (१९९४)। ये चारों ग्रंथ अंग्रेजी भाषा में हैं।

 

उन्होंने चार ऐतिहासिक और दो सामाजिक उपन्यास बंगला में लिखे। उनके ऐतिहातिक उपन्यासों के नाम हैं – “बंग-विजेता”, माधवी कंकण”, राजपुत-जीवन-संध्या” और महाराष्ट्र जीवन-प्रभात“ | इन चारों उपन्यासों में मुगल-शासन के सौ वर्षों का इतिहास सन्निहित  है। अतएव “सौ वर्ष”  नाम से एक पुस्तक निकाली गई जिसमें ये चारों उपन्यास एक साथ छापे गए |

 

बंगला में रमेशचन्द्र ने दो सामाजिक उपन्यासों की भी रचना की | १८८५ में “संसार” की और १८९३ में “समाज” की।

 

नौकरी से अलग होने के बाद उन्होंने अंग्रेजी में चार और ग्रंथ रचे - (1) इंग्लैंड और भारत (१८९७) (2) भारत का आर्थिक इतिहास-2खंड (१९०२) (3) महाभारत और रामायण का अंग्रेजी में पद्यबद्ध अनुवाद (१८९८-१८९९) और (4) भारत में दुर्भिक्ष (१९००)          

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