सूरज रोटा | Suraj Rota

सूरज रोटा Suraj Rota शीतल सप्तमी क पछ जो रविवार आवे बी दिन सूरज भगवान की पूजा करणू । सूरजजी का ऊजुवणा में सूरज भगवान की पूजा करणु। आठ सवागण लुगायां न जीमाणू । एक साखीदार न जिमाणू सबन जीमा कर शक्ति सारू नेक का रुपया देणू । ऊजुवणा की रसोई में गेहूँ का आटा का ८ रोट बनाणूं ब्यांक क कंगूरा बनाणू और घी शक्कर रख कर पूजा करणू तथा लुगाया न पुरसणु ।

सूरज रोटा की कहानी | Suraj Rota Ki Kahani (सूरज रोटा कथा | Suraj Rota Katha)

एक डोकरी ही आपक सूरज रोटा बणाया आप गई बार बेटी न केहकर गई थारा म्हारा दो रोटा बणालीज । सूरज भगवान साधु के भेष धर कर आया और आवाज लगायी घर की देवी भिक्षान्न देही |

बा बोली महाराज म्हारी माँ को रोटो हुयो ह म्हारो हाल हुयों कोनी । ओरूं आवाज लगाई बेटी मनमं विचार करयो आयो साधु भूखो जाई माँ का रोटा मंसू आधो साधू न दे दियो । बारसू माँ आई धी (बेटी) रोटो द पण सागे रोटो द । माँ बार बार पुकारण लागी । बेटी सुण सुणर बेजार होर पीपल क झाड पर जार बेठगी ।

गांव को राजा शिकार खेल बान गयो हो पाछो आंवतो बी पीपल का झाड के नीच आकर बेठयो | भूखो प्यासो हो । बेटी ऊपर सुं थोडो रोटा को टुकडो ओर पाणी राजा न दियो राजा आपका नोकरां न कहयो ऊपर कोई मिनख ह । ऊपर जाकर देख नौकर झाड पर चढ़गा देख तो बठ एक सावकार की बेटी बेठी ह । राजा बोल्यो तु कुण है । भूत ह पलित ह मिनखह । बा कहयो म सावकार की बेटी हूँ । राजा बोल्यो म्ह थारासु ब्याह करूं । बा बोली म्हार घरदार परिवार की कोनी । पर फेर भी राजा बीसूं ब्याव करर साथ लेग्यो ।

पाछो चेत को महिनो आयो । सूरज रोटो खोलण लागी माथो न्हार बार झरोखा मं केस सुखावण न ऊबी नीच स माँ निकली । बेटी न पिछाण कर कहयो धी रोटो द पण सागे रोटो द । बेटी जाण्यो म्ह राजा की राणी हूँ देश की धिराणी हूँ लोग कांई बोली । नोकरां न हुक्म दियो डोकरी न लाकर एक कोठा म बंद कर दियो। राजा न मालम पडी राणी जी एक डोकरी न ताला म बंद करी ह ।

राजा बोल्या राणीजी चाबी दयो । राणीजी सं चाबी लेकर राजा तालो खोलकर देख तो सामन सोना की दीवाल खडी ह । राजा बोल्या राणीजी ओ कांई ह । राणी उत्तर दियो दूबला पीर की भेंट ह । राजा के मन म आई इशो सासरो तो म्हान देख बान जाणो ह | राणीजी सूरज भगवान न प्रार्थना करी हे भगवान राज हठ पूरो करो । सूरज भगवान चार प्रहर को पीरवासो दियो । राजा राणी कंवर नौकर चाकर हाथी घोडा साज सामान सगलो साथ लियो । झिका झाड क नीच सुं राणी न लाया हा बी झाड कन पूग्या आग कांई देख ह एक सुन्दर नगरी बसी है कोई केव भूआ आई कोई केव बेन आई लुगाया केव बाईजी आया । नगरी को नाम सुरज नगरी हो । खुब पावणा चार करी आदर मान करयो । सवा प्रहर होनं लाग्यो राणी जी राजाजी न कहायो आपां पाछा चालां । राजाजी उत्तर दियो इशो सासरो महिनो भी से तो धापां कोनी छोडकर क्यान चालां। राणी जाण्यो राजाजी चाले कोनी कंवर न चूंटया भरवा लागी । कंवर रोवा लाग्यो । राजा न कहा अठ कोई देवता को दोष होग्यो पाछो पलटणो ही ठीक ह । राजा जल्दी जल्दी म एक घोडा को ताजणो ओर आपकी पगरख्या भूलगा ।

नोकर आकर बोल्या झाड क कन कीं कोनी। घोडा को ताजणों और पगरख्यां मिली झकी लेर आया । राजजी राणी न पूछया ओ काई ह । राणी उत्तर दियो महाराज थे मन झाडक नीच सूं लाया आपका हठ के कारण म्हन सूरज भगवान सवा प्रहर को पीरवासो दियो |

हे सूरज भगवान बीन पीरवासो दियो जिशो सगला न दीजो ।


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