हकीम अजमल खान की जीवनी

Hakim Ajmal Khan Biography


हकीम अजमल खान को दिल्ली का राजा भी कहा जाता था। ऐसा कहा जाना ठीक भी है। क्योंकि १९१८ में स्वतंत्रता प्राप्त करने का जो आंदोलन चला, वह १९४७ में स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद ही खत्म हुआ।हकीम साहब एक यूनानी चिकित्सक होने के साथ साथ भारतीय मुस्लिम राष्ट्रवादी नेता और स्वतंत्रता सेनानी थे | सन १९१८ से १९२७ तक हकीम साहब इन आंदोलनों के एक प्रमुख नेता रहे। हर काम में आगे, हर स्थिति और हर मौके पर वह आगे ही रहे। हिंदुस्तान की आजादी के लिए उस समय कुछ भी किया जाता तो उसमें हकीम साहब का होना जरूरी ही होता। बिना उनके उस समय कोई भी काम न हो सकता था। क्योंकि १८६८ मे हकीम साहब का जन्म ही ऐसे परिवार में हुआ था, जो कि बहुत पुराना, प्रभावशाली और देशभक्त हकीम घराना था।


संक्षिप्त विवरण(Summary)[छुपाएँ]
हकीम अजमल खान जीवन परिचय
पूरा नामहकीम मुहम्मद अजमल खान
जन्म तारीख११ फरवरी १८६८
जन्म स्थानदिल्ली
धर्म मुस्लिम
दादा का नामहकीम शरीफ खान
पिता का कार्यहकीम(चिकित्सक)
कार्यहकीम(चिकित्सक),
राजनीतिज्ञ,
भारतीय राष्ट्रीय
कांग्रेस के अध्यक्ष
मृत्यु तारीख२९ दिसंबर, १९२७
मृत्यु स्थानदिल्ली
मृत्यु की वजहदिल के दर्द
उम्र५९ वर्ष
भाषाहिन्दी, अँग्रेजी, उर्दू

हकीम साहब का पूरा नाम हकीम मुहम्मद अजमल खान था। हकीमी इनका पुश्तैनी काम था। मुगल शासन काल में हकीम जी के पिता, और पितामह हकीम शरीफ खान आदि ही मुगल बादशाहों के पारिवारिक चिकित्सक थे। इसलिए हकीम साहब की नसों में दौड़ते खून में ही हकीमी मिली हुई थी। अजमल खां साहब अपने समय में चोटी के हकीम माने जाते थे इसलिए उन्हे “मसीहा-ए-हिन्द” और “बेताज बादशाह” भी कहा जाता था । उन्हें ही नहीं, बल्कि उनके परिवार के सभी लोगों को अपने इस पुश्तैनी पेशे पर गर्व था। हकीम अजमल खां साहब के बड़े भाई हकीम अब्दुल मजीद खां भी अपने वक्त के बड़े अच्छे चिकित्सक माने जाते थे ।

अनुक्रम (Index)[छुपाएँ]

हकीम अजमल खान की जीवनी

हकीम अजमल खान "दिल्ली का राजा"

“मसीहा-ए-हिन्द” और “बेताज बादशाह”

हकीम साहब का दवाखाना

हकीम साहब और नवाब मोहम्मद अली खां के साहबजादे

हकीम अजमल खान का राजनीतिक जीवन

महात्मा गांधी और हकीम साहब

शरीफ मंजिल

आल इंडिया गोरक्षा कांफ्रेंस के अध्यक्ष

हकीम अजमल खान की मृत्यु

हकीम साहब और खादी प्रेम

संक्षिप्त विवरण(Summary)

हकीम साहब का दवाखाना सुबह चला करता था, उनके पुश्तैनी मकान के दीवान-खाने में ही। हकीम साहब एक चौकी पर बैठ कर मरीजों को देखा करते थे और पास ही बैठे मुंशी को दवा का पर्चा लिखा देते थे और रोगी वह पर्चा लेकर बाहर से दवा खरीद लेता। रोगी से बातचीत हकीम साहब बड़े धीमे स्वर में करते थे, ताकि मरीज को कोई कष्ट भी न और न ही उसके रोग की बात आस-पास सैकड़ों की तादाद में बैठे मरीज सुन सकें। हकीम साहब लगभग दो घंटे में दो सौ से ऊपर मरीजों को देख लेते थे मरीजों के लिए वैसे उनके पास हमेशा वक्त रहता था कई बार तो ऐसा हुआ कि हकीम साहब किसी खास मीटिंग में बैठे हैं और कोई मरीज उनके दरवाजे पर आकार उन्हें सलाम करता है, तो हकीम साहब ने अपना काम तक छोड़ कर पहले उसकी मदद की। हकीम साहब मरीज को शहर के बाहर जाकर देखने का १००० रूपये दैनिक का लेते थे, लेकिन यदि मरीज उनके पास दिल्ली मे आ जाए तो उसका ईलाज मुफ्त मे हो जाता था, चाहे वो कितना भी रईस क्यो न हो |

हकीम साहब की प्रसिद्धि सिर्फ दिल्ली में ही हो, ऐसी बात नहीं। सारे भारत में उनका नाम था। बड़े-बड़े राजा-महाराजा अपने इलाज के लिए हकीम साहब को ही याद करते थे। उस समय जितना विश्वास हकीम साहब पर लोगों का था, उतना अंग्रेजी डाक्टरों पर भी नहीं था। इसका एक कारण यह भी था कि हकीम साहब सभी मरीजों के साथ एक-सा व्यवहार करते थे उनकी दृष्टि में गरीब-अमीर छोटे-बड़े का कोई भेद-भाव नहीं था। कई बार तो गरीबों के लिए वह बड़े रईसों के बुरे तक बने।

एक बार की बात है कि हकीम साहब के एक मित्र नवाब मोहम्मद अली खां का पुत्र बीमार हुआ। नवाब साहब और हकीम साहब दो-तीन दिन न मिले तो हकीम साहब को चिंता हुई और उन्होंने फौरन आदमी भेज कर नवाब साहब की खैरियत पुछवाई । जैसे ही हकीम साहब को पता चला कि नवाब साहब का पुत्र बहुत बीमार है, वह उसी वक्त जैसे थे वैसे ही चल दिए। हकीम साहब ने नवाब साहब से उनके पुत्र के बारे में बातचीत की जिससे उन्हें पता चला कि दिल्ली के सभी चिकित्सक इस ओर से निराश हो चुके हैं। इन बड़े-बड़े डाक्टरों, हकीमों और वैद्यों में विख्यात डाक्टर अंसारी भी थे। किस्मत से उसी वक्त डाक्टर अंसारी भी वहां आ पहुंचे हकीम साहब ने डाक्टर असारी से सलाह की, तो डाक्टर साहब ने निराशा जताई। किंतु हकीम साहब ने अपने मित्र नवाब साहब से कहा – “नवाब साहब, मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि साहबजादे चंगे हो जाएंगे” |

हकीम साहब नुस्खे लिख दिए और घर चले आए। घर आते ही देखा कि ग्वालियरमहाराजा का संदेशवाहक उन्हीं के इंतजार में बैठा है। हकीम साहब को दस हजार रुपये पेशगी नजर करके उस संदेशवाहक ने महाराजा ग्वालियर का निमंत्रण दिया क्योकि ग्वालियर की महारानी कुछ बीमार थी। हकीम साहब ने महारानी की बीमारी का हाल पूछ कर रूपये वापस करते हुए अपनी विवशता बताई और कहा – “महाराजा साहब को मेरा सलाम अर्ज करके कहना कि मैं जरूर हाजिर होता, पर इस वक्त एक गरीब के बच्चे का इलाज मेरे हाथ में है और इस बच्चे की जान खतरे में हैं। यदि मैं दिल्ली से चला गया तो खुदा न करे, कुछ भी हो सकता है। महाराज साहब को मेरी तरफ से अर्ज करिएगा |कि महाराजा साहब बड़े-बड़े डाक्टर देश विदेश से मिल जाएंगे, पर इस गरीब को कोई दूसरा नसीब न हो सकेगा। इसलिए हालत पर गौर कर मुझे इस बार माफी दें।”

इस घटना से उनके हदय में गरीबों के लिए दया की गहरी भावना का पता चलता है | वैसे सभी के लिए उनके दिल में दया थी, सहानुभूति थी । उनकी सहानुभूति भरी आवाज सुन कर ही और उनका आश्वासन पाकर ही मरीज का आधा रोग दूर हो जाता था अपने कोमल व्यवहार के लिए तो हकीम साहब देश भर में प्रसिद्ध थे, उन्होंने अपने जीवन में किसी से भी कोई कड़ा शब्द तक न कहा था। किसी से चाहे कितना ही बढ़ा अपराध क्यों न हो जाता, वह कभी भी भौ पर बल न आने देते थे और तो और अपने नौकरों तक को वह सदा आप कह कर बुलाते । बड़े-से-बड़े अपराध पर उनका दंड होता था, धीरे से मुस्करा कर कह देना- बड़े बेवकूफ हो तुम। ये शब्द भी कहते हुए उन्हें बड़ा संकोच होता था किसी गलती के लिए उन्होंने किसी को कुछ ज्यादा कहा हो, ऐसा कहीं भी सुनने में नहीं आया।

हकीम अजमल खान का राजनीतिक जीवन १९१८ के बाद से ही शुरू होता है दिसंबर १९१८ में दिल्ली के पीपल पार्क में हुए कांग्रेस अधिवेशन से ही हकीम साहब ने राष्ट्रीय जीवन में प्रवेश किया। उन दिनों बड़ी-बड़ी सभाएं आदि पीपल पार्क में ही हुआ करती थीं। जहां आजकल चांदनी चौक के शुरू में लाजपत राय मार्केट है, उसी मैदान को पीपल पार्क कहते थे। इस अधिवेशन के लिए बनी स्वागत समिति के अध्यक्ष पद के लिए बहुत गरमा-गरमी चल रही थी, क्योंकि कई बड़े और प्रतिष्ठित लोग इस पद के उम्मीदवार थे। पर जब हकीम साहब का नाम सामने आया तो सारी गड़बड़ी दूर हो गई और हकीम साहब को ही अध्यक्ष चुन लिया गया। यह उनकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा प्रमाण था। अध्यक्ष पद से दिया गया हकीम साहब का भाषण बड़ा प्रभावशाली था। हकीम साहब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पांचवे मुस्लिम अध्यक्ष थे |

महात्मा गांधी और हकीम साहब का परिचय १९१९ में रालेट बिल के विरुद्ध गांधी जी द्वारा किए गए सत्याग्रह के समय गहरा हुआ। हकीम साहब के शब्दों में जादू था। गांधी जी भी हकीम साहब से बड़े प्रभावित हुए और फिर वर्षों तक उन्होंने हकीम साहब को सांप्रदायिक मामलों में अपना सलाहकार माना।

हकीम साहब का बल्लीमारान का पुराना सा रईसी ढंग का मकान “शरीफ मंजिल” जो आज भी उसी शान से सिर उठाए खड़ी है, सिर्फ उनका निवास स्थान, दवाखाना और यूनानी चिकित्सा के पढ़ाई का स्थान ही न था, बल्कि वह बड़ी राजनीतिक मीटिंगों का भी स्थान था। बड़ी-बड़ी राजनीतिक समस्याए जो बाहर किसी भी प्रकार सुलझने में न आतीं, हकीम साहब के घर आकर आसानी से सुलझ जातीं। हकीम साहब के मकान के बीचो-बीच एक बड़ा-सा आंगन था। इसी आंगन में लकड़ी के तख्ता का बड़ा सा मंच तैयार किया जाता था मंच पर अन्य नेताओं के साथ हकीम साहब बैठ कर योजनाएं बनाया करते थे।

आँगन के एक तरफ एक छोटा सा कमरा था, कोई नौ-दस फुट चौड़ा और बारह-चौदह फुट लंबा। इस कमरे में बाहर से प्रकाश कम आता था। इसलिए इसमें दिन में भी बिजली का प्रकाश रखा जाता था। कीमती गलीचों, मसनदों से यह कमरा सजा था। हकीम साहब को अपने एक-दो दोस्तों से जब कोई गुप्त सलाह करनी होती थी, तो इसी कमरे उन्हें खाने पर या चाय पर बुलाया जाता था।

१९१८ के आखिरी दिनों में जब हकीम साहब ने राजनीति में प्रवेश किया, तो फिर उससे जीवन भर निकल ही नहीं पाए। जो बड़ी हड़ताल ३० मार्च,१९१९ को हुई थी, उसकी सारी योजना स्वयं हकीम साहब की तैयार की हुई थी। तीस मार्च के शहीदों के लिए स्मारक बनाने के निश्चय में भी हकीम साहब ही सब से आगे थे। हकीम साहब का काम राष्ट्रीय आंदोलन के साथ ही बढ़ता गया।

१९१९ में “शहीद-हॉल” में हुई आल इंडिया गोरक्षा कांफ्रेंस की स्वागत समिति के अध्यक्ष भी हकीम साहब ही बनाए गए | इस अधिवेशन के सभापति पंजाब केसरी लाला लाजपत राय थे इस अधिवेशन में एक तरफ से तो अंग्रेजों से गौहत्या बंद करने की अपील की गई थी, दूसरी और भारत के राष्ट्रीय मुसलमानों से भी अनुरोध किया गया था कि वे हिंदुओं की भावनाओं की कद्र करें।

१९२४ में हुए आपसी दंगों से महात्मा गांधी को बड़ा धक्का लगा और उन्होंने संप्रदायों की एकता के लिए २१ दिन का उपवास रखा। दिल्ली इन दंगों का एक बड़ा केंद्र था। इसलिए महात्मा गांधी ने उपवास दिल्ली में ही रखा। आपसी मेल कराने के लिए दिल्ली में एक सम्मेलन बुलाया गया। सम्मेलन के बुलाने वालों में हकीम साहब का नाम भी रखा गया। सम्मेलन सफल हुआ और महात्मा जी ने उपवास तोड़ दिया। हकीम साहब ने मुसलमानों की तरफ से गांधी जी को आपसी भेद-भाव मिटा देने का विश्वास दिलाया था।

हकीम साहब का राजनीतिक जीवन ९ वर्ष का रहा। २९ दिसंबर, १९२७ में वह दिल के दर्द के कारण स्वर्ग सिधार गए। जितना कार्य हकीम साहब ने इन नौ वर्षों में किया उसे देख कर यह अंदाजा लगाना कठिन हो जाता था कि यह सब उन्होने इस थोड़े से समय में ही किया।

एक बार किसी महाराजा ने हकीम साहब को बुलवाया। महाराजा साहब की पत्नि बीमार थी। हकीम साहब देखने गए। सारा महल सिल्क और विदेशी रेशमी वस्त्रों से सजा था। यह बात हकीम साहब के दिल में चुभने लगी। महारानी की नब्ज देखते हुए हकीम साहब ने मुस्कुराकर महाराजा से कहा – “अब तो जमाना बदल रहा है, कुछ तो खादी आप लोग भी इस्तेमाल में लाएं। आप तो देश के खैर ख्वाह हैं।“

महाराजा के कुछ उत्तर देने से पहले ही महारानी साहिबा ने कहा – “हकीम साहब, खादी पहनने में एतराज तो कोई नहीं, पर क्या करें खादी बड़ी मोटी होने की वजह से बदन पर चुभती है।“ यह सुनते ही हकीम साहब के दिल को बड़ा धक्का लगा । वह नब्ज छोड़ कर उठ खड़े हुए और बोले – “अब उसी दिन मैं आपके दीवानखाने पर हाजिर होऊंगा, जिस दिन आपका सारा घर खादी से सजा होगा और महारानी जी भी खादी के लिबास में होंगी।“ हकीम साहब के हृदय में खादी के प्रति इस प्रेम को देखकर महाराजा साहब शर्म से झुक गए। तुरंत उन्होंने सारे महल में खादी इस्तेमाल करने की आज्ञा दे दी।

हकीम साहब का सामाजिक और सार्वजनिक जीवन केवल राजनीति या हकीमी तक ही सीमित न था। वह साहित्य के बड़े प्रेमी थे। उर्दू साहित्य का केंद्र तो उन दिनों उनका बल्लीमारान का घर ही था। मौको पर वहां मुशायरे हुआ करते थे, जिनमें दिल्ली और बाहर के छोटे-बड़े सभी शायर हिस्सा लेते थे। खुद हकीम साहब भी मौज में आकर कभी-कभी शेर कहा करते थे।

हकीम साहब का बनाया हुआ हिंदुस्तानी दवाखाना और तिबिया कालेज (जिसे ठीक से चलाने के लिए ही हकीम साहब ने दवाखाने को खोला था) आज हकीम साहब की सबसे बड़ी यादगारों में हैं। दवाखाने की फायदे की सारी रकम कालेज को दे दी जाती थी | तिबिया कॉलेज संसार में आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सा पद्धति का अपनी तरह का एक ही कॉलेज है। इसी कॉलेज के नए भवन की नींव रखते हुए लार्ड हार्डिग ने हकीम साहब को भरी सभा में विश्वास दिलाया था कि भवन पूरा हो जाने पर वह कॉलेज को एक मुश्त छः लाख रुपये की सहायता दिलवाएंगे। किंतु १९२१ में भवन के पूरे होने पर हकीम साहब कांग्रेस के प्रमुख नेता बन चुके थे। उन्होंने पैसों की तनिक भी परवाह नहीं की। लोगों ने इसके लिए हकीम साहब को बहुत कुछ कहा, किंतु हकीम साहब के लिए देश से बढ़कर दूसरा कुछ भी न था। हकीम साहब देश के उन रत्नों में से एक थे, जिन्हें भारत का बच्चा-बच्चा याद रखेगा।


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