महात्मा गांधी की जीवनी

Mahatma Gandhi Biography


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मोहनदास करमचंद गांधी Mohandas Karamchand Gandhi (महात्मा गांधी Mahatma Gandhi) का जन्म २ अक्टूबर, १८६९ को पोरबंदर (गुजरात) में हुआ था। उनके पिता का नाम करमचंद गांधी और माता का नाम पुतलीबाई था। करमचंद गांधी बहुत कम पढ़े-लिखे थे। उनकी शिक्षा पांचवीं कक्षा तक हुई थी। पुतलीबाई करमचंद गांधी की चौथी पत्नी थीं।


संक्षिप्त विवरण(Summary)[छुपाएँ]
महात्मा गांधी जीवन परिचय
पूरा नाममोहनदास करमचंद गांधी
जन्म तारीख२ अक्टूबर, १८६९
जन्म स्थानपोरबंदर (गुजरात)
धर्म हिन्दू
पिता का नामकरमचंद गांधी
माता का नामपुतलीबाई
पत्नि का नामकस्तूर बाई / कस्तूरबा गांधी
भाई / बहन कुल ३ भाई व बहन,
दो भाई
और एक बहन
संतान४ पुत्र हरीलाल गांधी, रामदास गांधी,
देवदास गांधी और मनीलाल गांधी
पिता का कार्यराजनीतिक व्यक्ति, पोरबंदर,
राजकोट और वांकानेर के दीवान
माता का कार्यगृहणी
शिक्षाप्रारम्भिक शिक्षा(पोरबंदर),
मेट्रिक(यूनिवर्सिटी ऑफ़ बॉम्बे),
बैंरिस्ट्री (इंग्लेंड)
कार्यस्वतन्त्रता संग्राम सेनानी,
नेटाल इंडियन कांग्रेस के प्रमुख,
सत्याग्रह आंदोलन, स्वदेशी आंदोलन
भारत छोड़ो आंदोलन, नमक
आंदोलन, असहयोग आंदोलन
आमतौर पर लिए जाने वाला नामबापू, गांधीजी,
महात्मा गांधी
मृत्यु तारीख३० जनवरी, १९४८
मृत्यु स्थानबिरला भवन, नई दिल्ली
उम्र७९ वर्ष
मृत्यु की वजहहत्या, नाथूराम गोडसे के द्वारा
पिस्तौल चलाकर
भाषाहिन्दी, अँग्रेजी

जब उनके पिता दीवान होकर राजकोट आए, उस समय बालक मोहन की उम्र लगभग सात साल की थी। वह बचपन से ही जरा झंपू स्वभाव के थे। वह अन्य लड़कों की संगति से कतराते थे। पर थे वह बड़े मेहनती और आत्मसम्मानी। यह बात नहीं कि गांधी जी बचपन ही से दूध के धुले हुए थे। बुरी संगति में पड़कर उन्होंने भी कुछ भूलें कीं, पर एक बार अपनी गलती समझ जाने पर उन्हें अपनी करनी पर बड़ा पछतावा होता था, और वह उनसे दूर रहने का दृढ़ प्रण कर लेते थे। यही उनके चरित्र की खूबी थी।

एक बार मोहन की नजर अपने पिता जी की एक पुस्तक 'श्रवण पितृ भक्ति” नाटक पर पड़ी। वह उन्हें इतनी अच्छी लगी कि इस पुस्तक को उन्होंने कई बार पढ़ा। इस पुस्तक का बालक गांधी के मन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने मन में श्रवण के समान ही पितृभक्त पुत्र बनने का प्रण किया।

अनुक्रम (Index)[छुपाएँ]

महात्मा गांधी की जीवनी

महात्मा गांधी का जन्म

संक्षिप्त विवरण(Summary)

महात्मा गांधी और श्रवण पितृ भक्ति

गांधीजी पर सत्य हरिश्चंद्र नाटक का प्रभाव

गांधी जी का विवाह व पारिवारिक विवरण

गांधी जी की बुरी संगत और पश्चाताप

मैट्रिक पास और बेरिस्ट्री की पढ़ाई

दक्षिण अफ्रीका मे दादा अब्दुल्ला से संबंध

कुली बैरिस्टर और पगड़ी उतारना

गांधीजी और स्टेशन मे अपमान की घटना

गांधीजी का गोरे कन्डक्टर द्वारा अपमान

गांधीजी का दक्षिण अफ्रीका मे सत्याग्रह

साबरमती आश्रम की स्थापना

स्वदेशी आंदोलन

भारत छोड़ो आंदोलन

गांधीजी की हत्या

FAQ`s

इसी प्रकार एक बार नगर में एक नाटक मंडली आई। वह “सत्य हरिश्चंद्र” नाटक खेलती थी । इस नाटक के दृश्यों का भी उनके मन पर बड़ा प्रभाव पड़ा आर उन्हौंने राजा हरिश्चंद्र की तरह सब कष्टो को सहनकर भी सत्य पर मर मिटने और अडिंग रहने का निश्चय किया। इस तरह बचपन ही से गांधी जी के ऐसे सुंदर संस्कार धीरे-धीरे बनते गए।

१८८३ मे बारह-तेरह वर्ष की आयु में गांधी जी का विवाह कस्तूर बाई से हुआ जिसे हम कस्तूरबा गांधी के नाम से जानते है और उनके चार पुत्र थे - हरीलाल गांधी, रामदास गांधी, देवदास गांधी और मनीलाल गांधी | गांधी जी के दो भाई और एक बहन थी। गांधी जी तीनों भाइयों में सबसे छोटे थे। उनके मंझले भाई का एक दोस्त था उसमें कई बुरी आदतें थीं। उसने गांधी जी को कई दलीले देकर मांस खाने का लाभ समझाया। पर मांस खाकर गांधी जी को बड़ा ही पश्चाताप हुआ। अंत में गांधी जी ने इस मित्र से साफ-साफ कह दिया कि मां-बाप को झूठ बोलकर मांसाहार करना उचित नहीं।

जब गांधी जी बारह तेरह वर्ष के थे, उस समय एक रिश्तेदार की संगति में उन्हें भी सिगरेट पीने और धुंआ उड़ाने का शौक हुआ। पर बाद में उन्हें अपनी गलती पर बड़ा पश्चाताप हुआ। बचपन में एक बार गांधी जी ने चोरी से अपने भाई के कड़े का सोना बेच दिया यह चोरी गांधी जी और उनके मंजले भाई ने पच्चीस रु० का कर्ज चुकाने के लिए की थी। कर्ज चुक गया पर गांधीजी इस चोरी के पश्चाताप से जलने लगे। उन्होंने सब कुछ अपने पिता के आगे कबूलने का निश्चय किया। इसलिए उन्होंने सब बातें एक पत्र में लिखीं । अपना कसूर मानकर माफी मांगी और पिता से प्रार्थना की कि इसके लिए पिता जी अपने को कष्ट न दें। गांधी जी ने यह प्रतिज्ञा भी की कि ऐसा काम फिर कभी नहीं करूंगा। उनके पिता बड़े कठोर स्वभाव के थे, किंतु अपने पुत्र के पत्र को पाकर उनकी आंखों में आंसू भर आए। वह उनकी सच्चाई पर बहुत खुश हुए और उन्होंने उनको क्षमा कर दिया।

गांधी जी के पिता बड़े सत्संग प्रेमी थे। ऐसी चर्चाओं के समय गांधी जी प्राय: अपने पिता के साथ रहते थे। इस तरह बचपन ही में उनके मन में यह बात जड़ पकड़ गई कि सब धर्मों का मूल सच्चाई की पूजा है।

गांधीजी के पिता को भगंदर की बीमारी थी। इस बीमारी में गांधीजी ने अपने पिता की बड़ी सेवा की।

मैट्रिक पास करके ४ सितंबर, १८८८ को गांधी जी बम्बई से विलायत जाने के लिए जहाज पर सवार हुए। जहाज पर गांधी जी के साथ एक त्र्यंबकराय मजूमदार को छोड़कर और सब यात्री अंग्रेज थे। मजूमदार महोदय जूनागढ़ के एक वकील थे और बैंरिस्ट्री पास करने के लिए विलायत जा रहे थे। उन्होंने तो अन्य लोगों से झट हेल-मेल बढ़ा लिया, पर गांधी जी को अंग्रेजी बोलने का अभ्यास नहीं था, इसलिए वह मिलने जुलने से कतराते थे।

गांधी जी को विलायत के रहन-सहन या समाज के शिष्टाचार का तनिक भी अनुभव नहीं था। कुछ दिन बाद डाक्टर प्राणजीवन मेहता ने अपने एक मित्र के यहां गांधी जी के रहने का प्रबंध करवा दिया।

इस मित्र ने गांधी जी को अपने एक परिवार के सदस्य की तरह अपने यहां रखा, अंग्रेजी रीति-रिवाज की शिक्षा दी और अंग्रेजी में बातचीत करने की आदत डलवाई। गांधी जी को वहां सब सुख तो था, पर भोजन की समस्या बड़ी विकट थी। सुबह जौ के दलिए से अपना पेट भर लेते थे उचली हुई साग-भाजी उन्हें अच्छी नहीं लगती थी, इसलिए दोपहर और शाम को अक्सर वह भूखे रह जाते थे। सब लोगों ने मांस खाने के लिए गांधी जी को बहुत समझाया, पर उन्होंने मांस खाना मंजूर नहीं किया।

गांधी जी ने मांस तो नहीं खाया, पर अंग्रेजों को तरह सभ्य बनने की सनक उन पर सवार रही। उन्होंने सूट सिलवाया। अपने भाई से घड़ी की असली सोने की चेन मंगवाई। टाई बांधनी सीखी। वह रोज बालों की पट्टीया काढ़ते और मांग निकालने में दस मिनट खराब करते। परंतु इतनी टीप-टाप ही काफी नहीं थी। सभ्य कहलाने के लिए नाच जानना और फ्रेंच भाषा सीखना भी जरूरी था। इसके अलावा यूरोप का भ्रमण किए बिना विलायत आना अधूरा ही रह जाता। इस प्रकार काफी रुपया खर्च करने के बाद गांधी जी ने जब महापुरुषों की पुस्तकें पढ़ीं, तब उन्हें सभ्यता की इन बनावटी बातों के थोथेपन का अनुभव हुआ।

जब गांधी जी को अपने कुटुंब की आर्थिक स्थिति का ख्याल आता तब उन्हें यह सोचकर कष्ट होता कि वह अपनी औकात से अधिक अपने ऊपर खर्च कर रहे हैं। उन्हें ऐसा लगता मानो वह कोई पाप कर रहे हैं। अंत उन्होंने और भी अधिक सादगी से रहने का निश्चय किया।

बैरिस्टर बन कर गांधी जी जुलाई, १८९१ को भारत लौटें उनके भारत लौटने के पहले ही उनकी माता स्वर्ग सिधार चुकी थीं। मित्रों की राय से गांधी जी ने बंबई हाईकोर्ट में वकालत शुरू कर दी। लेकिन संकोची स्वभाव होने के कारण उनकी वकालत चल नहीं सकी। आखिर वह राजकोट वापस आ गए।

दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी के बड़े भाई के मित्र दादा अब्दुल्ला का बहुत बड़ा कारोबार था। उन्होंने अपने एक मुकदमें में पैरवी करने के लिए गांधी जी को दक्षिण अफ्रीका आने का निमंत्रण दिया। गांधी जी तुरंत तैयार हो गए। और मई, १८९३ में, चौबीस वर्ष की अवस्था में, दक्षिण अफ्रीका पहुंचकर उन्होंने देखा कि इस देश में भारतवासियों को बड़े अपमान का जीवन बिताना पड़ता है। सभी भारतीय वहां “कुली” के नाम से पुकारे जाते हैं। गांधी जी को यह बहुत बुरा लगा।

डरबन शहर की अदालत में मुकदमे की पैरवी के लिए गांधीजी गए। हमेशा की तरह वह पगड़ी पहने हुए थे। एक “कुली बैरिस्टर” पगड़ी पहन कर अदालत में आए, गोरा जज यह कैसे सहन करता | उसने कहा--पगडी उतार लो |

गांधी जी को यह बात एकदम अन्यायपूर्ण लगी। उन्होंने पगड़ी नहीं उतारी। अदालत से बाहर चले गए।

इस पगड़ी की बात को लेकर गांधी जी ने वहां के अखबारों में कई लेख छपाए। अखबारों ने भी इस “कुली बैरिस्टर” के मामले में खुब दिलचस्पी ली। किसी ने उनका पक्ष लिया तो किसी ने विरोध किया। लेकिन गांधी जी की पगड़ी उनके सिर पर कायम रही। इस मामले में गांधी जी शीघ्र ही प्रसिद्ध हो गए। अंग्रेजों को मालूम हो गया कि यह बैरिस्टर दूसरे भारतीयों की तरह दब्बू नहीं है। वह अपने देश का या देशवासियों का अपमान नहीं सह सकता और विरोध करने का उसका ढंग भी निराला है। डरबन के अनेक अंग्रेज गांधी जी के मित्र बन गए।

कुछ दिन बाद सेठ अब्दुल्ला ने गांधी जी को अपने एक और मुकदमे में पैरवी करने के लिए प्रिटोरिया नामक शहर भेजा। एक स्टेशन पर उनके डिब्बे में एक अंग्रेज मुसाफिर आया। एक हिंदुस्तानी को पहले दरजे में बैठा देखकर उस गोरे की क्रोध आ गया । सब स्टेशन के अफसरों को बुला लाया। उन्होंने गांधी जी से कहा – “चलो, तुम्हें दूसरे डिब्बे में जाना पड़ेगा।“

गांधी जी बोले – “मेरे पास पहले दरजे का टिकट है और शुरू से इसी डिब्बे में बैठ कर सफर कर रहा हूँ। दूसरे में क्यों जाऊं?”

झगड़ा बढ़ा, पुलिस बुला ली गई। एक सिपाही ने गांधी जी को धक्का मार कर डिब्बे से नीचे गिरा दिया। उनका सामान बाहर फेंक दिया गया। परंतु फिर भी गांधी जी दूसरे डिब्बे में नहीं गए।

उन्हें वहीं छोड़कर गाड़ी चल दी। सारी रात गांधी जी प्रतीक्षालय (वेटिंग रूम) में कांपते और ठिठुरते रहे। सवेरा होते ही उन्होंने रेल्वे के जनरल मैनेजर को तार दिया और शिकायत की। इसके बाद वह एक दूसरी गाड़ी में आगे बढ़े। चार्ल्स टाउन नामक शहर पर लाइन पर आखिरी स्टेशन था। आगे का रास्ता घोड़ागाड़ी से तय करना पड़ता था। गांधी जी के पास घोड़ा गाड़ी के अंदर बैठने का टिकट था। किंतु घोड़ा गाड़ी के लीडर (गोरे कन्डक्टर) ने उन्हें गाड़ी से बाहर कोचवान के पास बैठाया और खुद अंदर जा बैठा। गांधी जी को गुस्सा तो आया, फिर भी चुप रहे। थोड़ी देर बाद इस गोरे की इच्छा बाहर खुली हवा में बैठकर सिगरेट पीने की हुई। वह गांधी जी से बोला – “मुझे अपनी सीट पर बैठने दो। तुम यहां मेरे पैरों के पास बैठो।“

अब तो गांधी जी से नहीं रहा गया। उन्होंने कहा - यह तो सरासर अन्याय है। मेरी जगह तो भीतर थी पर तुमने उस समय मुझे बाहर बैठा दिया। अब तुम मुझे अपने पैरों के पास बैठने को कहते हो, मैं यहां से नहीं उठूंगा।

गोरे को इतनी बात भला कैसे सहन होती | गांधी जी की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि गोरे ने उन्हें मारना शुरू कर दिया। जैसे-तैसे गांधी जी जब प्रिटोरिया पहुंचे तब वहां उनके सामने नई-नई मुसीबतें आईं। उन्हें होटलों में ठहरने की जगह नहीं दी गई । फुटपाथ पर चलते तो गोरे संतरी उन्हें सड़क पर ढकेल देते थे। कभी-कभी लात घूंसे भी सहने पड़ते थे।

किसी तरह मुकदमे का काम खत्म करके गांधी जी डरबन आ गए और भारत लौटने की तैयारी करने लगे। इसी समय उन्हें पता चला कि दक्षिण अफ्रीका की सरकार एक ऐसा कानून बनाना चाहती है जिससे वहां के भारतीयों को चुनाव में वोट का हक न रह जाए।

बस, फिर क्या था? उन्होंने भारत लौटने का अपना कार्यक्रम रद्द कर इस काले कानून के खिलाफ आंदोलन का बिगुल बजा दिया।

अब गांधी जी एक तरह से दक्षिण अफ्रीका में ही बस गए। उन्होंने गोरे और काले के भेद-भाव को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए कमर कस ली। काले कानून के खिलाफ बाकायदा आंदोलन चलाने के लिए १८९४ में एक समिति बनी और उसका नाम “नेटाल इंडियन कांग्रेस” रखा गया।

जब गांधी जी को दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए लगभग तीन वर्ष हो चुके, तब वह बीच महीनों के लिए भारत आए यहां उन्होंने एक पुस्तिका लिखी जिसमें दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के दुखों की कहानी बताई गई थी। गांधी जी सर फीरोजशाह मेहता, लोकमान्य तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले जैसे प्रमुख भारतीय नेताओं से भी मिले। बंबई की एक आम सभा में गांधी जी ने अपना पहला भाषण किया। यहां से पुणे और मद्रास में भाषण करते हुए वह कलकत्ता पहुंचे यहीं उन्हें डरबन से तार मिला कि ब्रिटिश संसद की बैठक होने वाली है, इसलिए जल्दी लौटो। तार पाते ही गांधी जी दुबारा अपने परिवार के साथ दक्षिण अफ्रीका के लिए रवाना हो गए।

गांधी जी ने भारत में दक्षिण अफ्रीका के गोरों के जुल्मों की जो पोल खोली थी, उससे वे लोग उनसे चिढ़ गए थे। जहाज से उतरते ही उन्हें धमकी दी गई कि भला चाहते हो तो लौट जाओ, वरना तुम्हें समुद्र में डुबो दिया जाएगा पर गांधी जी डरे नहीं। अपनी पत्नी और बच्चों को तो पहले ही घोड़ा गाड़ी से शहर भेज दिया और खुद पैदल चल पड़े। कुछ दूर ही पहुंचे थे कि गोरों की एक भीड़ ने उन्हें घेर लिया।

संयोग से डरबन के पुलिस सुपरिटेंडेंट की पत्नी उधर से आ निकली। वह गांधी जी को जानती थी। उसने उन्हें भीड के गुस्से से बचाया। जब उसने मारपीट करने वालों पर मुकदमा चलाने की सलाह दी तो गांधी जी ने कहा – “मैं किसी पर मुकदमा चलाना नहीं चाहता। “ गांधीजी की इस बात से उनका सम्मान बढ गया। उन्हें पीटने वाले भी अपने ऊपर शर्मिंदा हुए और पछताए।

गोरों के मन में अब गांधी जी का डर पूरी तरह बैठ गया था वे भारतीयों को मिटा देने की तैयारी करने लगे। दक्षिण अफ्रीका की सरकार दमन के नए-नए कानून बनाने लगी। गांधी जी ने उनका डट कर विरोध किया।

इस प्रकार दक्षिण अफ्रीका में चार वर्ष फिर बिता कर गांधी जी भारत लौटे। लौटते समय उन्हें बड़ी शानदार विदाई दी गई। लेकिन भारत में वह अभी पुरा एक वर्ष भी नहीं रह पाए थे कि दक्षिण अफ्रीका से फिर बुलावा आ गया। गांधी जी तुरंत रवाना हो गए। वहां पहुंच कर इस बार उन्हें पहले से ही ज्यादा मेहनत करनी पडी। भारतीयों के हित के लिए अब उन्होंने “सत्याग्रह” की लड़ाई छेड़ी। “सत्याग्रह” संग्राम के साथ-साथ गांधी जी के धार्मिक और सामाजिक प्रयोग भी चलते रहे। उन्होंने फिनिक्स नामक स्थान पर १९०४ में एक आश्रम खोल दिया।

दक्षिण अफ्रीका का सत्याग्रह सफलतापूर्वक समाप्त होने पर गांधी जी इंग्लैंड होते हुए १९१५ में भारत लौटे। तब तक उनका नाम भारत में काफी फैल चुका था। बंबई से गांधी जी भारत के दौरे पर निकले। उन्होंने जगह-जगह जाकर देश की हालत खुद अपनी आंखों से देखी।

उन दिनों बिहार के चंपारन जिले में नील बागानों के गोरे जमींदारों ने बड़ा अत्याचार मचा रखा था। ये जरमींदार निलहे साहब के नाम से प्रसिद्ध थे। गांधी जी जब १९१७ में वहां जांच करने गए तो उन्हें सरकारी नोटिस मिला कि चंपारन से निकल जाओ। गांधी जी के इंकार करने पर उन पर मुकदमा चलाया गया।

मुकदमे की सफाई के समय गांधी जी ने अदालत में बेहिचक स्वीकार कर लिया कि उन्होंने जानबुझ कर सरकारी हुक्म मानने से इंकार किया था मजदूरों के ऊपर मिल मालिकों का अत्याचार रोकने और अकाल पीड़ित इलाके में लगान की माफी आदि के लिए भी गांधी जी ने सत्याग्रह किया। सरकार पर उनकी बातों का असर हुआ और सारी शिकायतें सुनी गई।

उन सत्याग्रह आंदोलनों के साथ-साथ गांधी जी का समाज सेवा कार्य भी चल रहा था। हरिजनों को नीच या अछूत न माना जाए, उन्हें समाज में बराबरी के अधिकार दिए जाएं, इसके लिए गांधी जी ने अलग आंदोलन शुरू कर दिया। उन्होंने गुजरात में साबरमती नामक स्थान पर एक आश्रम की स्थापना की। इस आश्रम में हरिजन भी ऊंची जाति कहलाने वालों के साथ बराबरी के अधिकार पर बिना किसी भेदभाव के मिल-जुल कर रहने लगे।

प्रथम महायुद्ध में भारत ने अंग्रेजों की सहायता की। लेकिन युद्ध समाप्त होते ही अंग्रेजों ने भारतीयों को कुचलने के लिए १९१९ में रोलॅट एक्ट नामक एक नया कानून बनाया। इसके विरोध में देश भर में हड़तालें हुईं, जुलूस निकले और बड़ी-बड़ी सभाएं हुईं। इस आंदोलन में हिंदू और मुसलमान साथ थे। सरकार खून की प्यासी हो उठी और पूरी ताकत के साथ उसने आंदोलन का दमन किया। जनता मरने-मारने पर उतारू हो गई। किंतु गांधी जी अपने अहिंसा के सिद्धांत पर दृढ़ रहे और उनकी वजह से ही आंदोलन हिंसात्मक नहीं हो सका।

विदेशी माल का बहिष्कार करने के लिए गांधी जी ने स्वदेशी आंदोलन चलाया। गरीब मजदूर किसानों की उन्नति के लिए खादी का प्रचार किया। चरखा चलाने का उपदेश दिया। खुद भी चरखा कातना शुरू कर दिया। चरखा आजादी की लडाई का निशान बना। इसके कुछ समय बाद ही १९२० में गांधी जी के असहयोग आंदोलन का कार्यक्रम स्वीकार कर लिया गया। देश में इस नए आंदोलन की आंधी आ गई। चारों ओर असहयोग और बायकाट की धूम मच गई। विदेशी कपड़ों की खूब होलियां जलीं। जनता में जागृति की नई लहर फैल गई। सरकार भी तुली बैठी थी। इसी बीच चौरी-चौरा थाने के कुछ सिपाहियों को मार डाला गया। इसका गांधी जी पर विपरीत प्रभाव पड़ा। उन्हें लगा कि आंदोलन गलत रास्ते पर जा रहा है। उन्होंने आंदोलन बंद करते हुए कहा कि उनसे हिमालय जैसी बड़ी भूल हुई है।

सरकार ने १० मार्च, १९२२ को गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया। और अदालत ने उन्हें सजा दी। जिन दिनों गांधी जी जेल में थे, अंग्रेजों ने हिंदू और मुसलमानों में फूट के बीज बोने शुरू कर दिए। जब गांधी जी १९२४ में जेल से छूटे तब जगह-जगह हिंदू-मुस्लिम दंगे हो रहे थे। चारों ओर अशांति फैल रही थी। गांधी जी ने हिंदू मुस्लिम एकता के लिए २१ दिन का लंबा उपवास कर डाला। महात्मा गांधी का उपवास सफल हुआ और दोनों तरफ से एकता के प्रयास होने लगे। कुछ समय में शांति हो गई। लाहौर कांग्रेस में पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पास हुआ। गांधी जी को आंदोलन की बागडोर सौंपी गई। एक वर्ष के भीतर ही सरकार को झुकना पड़ा। गांधी जी जेल से रिहा कर दिए गए। वाइसराय लार्ड इरविन ने गांधी जी के साथ समझौता किया।

१९३१ में इंग्लैंड में गोलमेज सम्मेलन हुआ। कांग्रेस के प्रतिनिधि बन कर गांधी जी उनमें गए। लेकिन गोलमेज सम्मेलन तो एक ढकोसला भर था। उसमें कोई बात तय नहीं हुई। भारत लौटने के बाद गांधी जी ने १९३२ में सत्याग्रह आंदोलन का नारा बुलंद कर दिया। कांग्रेस को गैरकानूनी करार दे दिया गया और गांधीजी तथा दूसरे नेता गिरफ्तार कर लिए गए।

१९३४ में बंबई में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। तब गांधी जी ने कांग्रेस का नया विधान बनाया |

१९३९ मे यूरोप मे दूसरी महायुद्ध छिड़ने पर अंग्रेज सरकार ने भारतीयों की राय के बिना ही इस युद्ध मे शामिल कर लिया। कांग्रेस ने इस बात का घोर विरोध किया|

अगस्त १९४२ में कांग्रेस में गांधी जी के सुझाव पर प्रसिद्ध “भारत छोड़ो“ प्रस्ताव पास किया |इसमे कहा गया कि अंग्रेज तुरंत भारत से चले जाएं, नहीं तो बहुत जबरदस्त आंदोलन छेड़ दिया जाएगा। सरकार तो दमन करने के लिए तैयार ही बैठी थी। ९ अगस्त १९४२ को सबेरे ही गांधी जी और दूसरे सब प्रमुख नेता एकाएक गिरफ्तार कर लिए गए। पर आंदोलन तेजी से चलता रहा।

आखिरकार १५ अगस्त, १९४७ को भारत को स्वतंत्रता मिली। दिल्ली के लालकिले पर अंग्रेजी झंडे की जगह भारतीय तिरंगा फहराया गया। सारे देश में स्वतंत्रता दिवस की आजादी तो मिल गई लेकिन भारत के दो टुकड़े हो गए - भारत व पाकिस्तान। इससे सांप्रदायिकता और भी बढ़ी। फिर भयंकर मारकाट मची, लूटमार हुई। हजारों-लाखों हिंदू पाकिस्तान से भाग कर भारत आए। भारत से भी बहुत से मुसलमान पाकिस्तान चले गए। गांधीजी की आजादी की साध पूरी हुई। किंतु इस खुशी के मौके पर वह दिल्ली में नहीं थे। वाह सप्रद्रायिकता से लोहा लेने के लिए बंगाल में गांव-गांव धूम कर शांति के लिए प्रयत्न कर रहे थे।

जब दिल्ली में दंगे हुए तो गांधीजी बंगाल से तुरंत दिल्ली गए। दंगों को शांत कराने के लिए उन्होंने प्राणों की बाजी लगा दी और उपवास शुरू कर दिया इस अनशन से सभी कांप उठे। हिंदुओं और मुसलमानों के प्रतिनिधियों ने मिल कर शांति का विश्वास दिलाया। तब उन्होंने उपवास तोड़ा। गांधी जी अब नई दिल्ली की हरिजन बस्ती में रहने लगे और फिर ३० जनवरी, १९४८ की काली संध्या आई । गांधी जी प्रार्थनासभा में जा रहे थे, तभी एक सिरफिरे हिंदूराष्ट्रवादी नाथूराम गोडसे ने उन पर पिस्तौल चला दी। शांति के दूत और अहिंसा के पुजारी की छाती पर तीन गोलियां लगीं उन्होंने दोनों हाथ जोड़ लिए और “हे राम” कहते हुए इस संसार से विदा हो गए। मरते समय भी गांधी जी के मुख पर अपने हत्यारे के विरुद्ध केवल क्षमा भाव ही झलक रहा था।


FAQ`s

Questation : महात्मा गांधी का पूरा नाम क्या था?

Answer : महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था |


Questation : महात्मा गांधी का जन्म कब हुआ था ?

Answer : महात्मा गांधी का जन्म २ अक्टूबर, १८६९ को हुआ था |


Questation : महात्मा गांधी का जन्म कहा हुआ था ?

Answer : महात्मा गांधी का जन्म पोरबंदर (गुजरात) मे हुआ था |


Questation : महात्मा गांधी का जन्म कौन से राज्य मे हुआ था ?

Answer : महात्मा गांधी का जन्म पोरबंदर गुजरात राज्य मे हुआ था |


Questation : महात्मा गांधी के पिता का क्या नाम था ?

Answer : महात्मा गांधी के पिता का नाम करमचंद गांधी था | वे राजनीतिक व्यक्ति और पोरबंदर, राजकोट एवं वांकानेर के दीवान थे |


Questation : महात्मा गांधी के माता का क्या नाम था ?

Answer : महात्मा गांधी के माता का नाम पुतलीबाई था |


Questation : महात्मा गांधी की पत्नी का क्या नाम था ?

Answer : महात्मा गांधी की पत्नी का नाम कस्तूरबा गांधी था |


Questation : महात्मा गांधी के बच्चो का क्या नाम था ?

Answer : महात्मा गांधी के ४ बच्चे थे और वे सभी पुत्र थे उनका नाम - हरीलाल गांधी, रामदास गांधी, देवदास गांधी और मनीलाल गांधी था |


Questation : महात्मा गांधी की बेटी का क्या नाम था ?

Answer : महात्मा गांधी के ४ बच्चे थे और वे सभी पुत्र थे, उनकी कोई भी बेटी नही थी |


Questation : महात्मा गांधी की मृत्यु कब हुई ?

Answer : महात्मा गांधी की मृत्यु ३० जनवरी, १९४८ को बिरला भवन, नई दिल्ली मे प्रार्थना सभा मे जाते समय नाथूराम गोडसे के द्वारा गोली मारे जाने के कारण हुई |


Questation : महात्मा गांधी क्यो मारे गए थे ?

Answer : महात्मा गांधी की मृत्यु ३० जनवरी, १९४८ को बिरला भवन, नई दिल्ली मे प्रार्थना सभा मे जाते समय नाथूराम गोडसे के द्वारा गोली मारे जाने के कारण हुई | नाथूराम गोडसे हिंदूराष्ट्रवादी थे और उनका संबंध हिन्दू महासभा से था | हिन्दू महासभा के अनुसार पाकिस्तान को भुगतान करना भारत को कमजोर करना था |



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