ठक्कर बापा | Thakkar Bapa

ठक्कर बापा की जीवनी

Thakkar Bapa Biography

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ठक्कर बापा Thakkar Bapa एक विरल लोकसेवक थे । वह विनम्र स्वभाव के थे। प्रशंसा की उन्हें भय नहीं। उनका जीवन कार्य ही उनका एक मात्र संतोष और विश्राम है। वृद्धावस्था उनके उत्साह को मंद नहीं कर सकी। वह स्वयं एक संस्था थे । एक बार जब उन्हें लिखा गया कि वह थोड़ा आराम लें तो तुरंत उनका जवाब आया – “जब इतना सारा काम करने को पड़ा है अपने जीवन कार्य तब में आराम कैसे कर सकता हूं? मेरा काम ही मेरा आराम है। “ अपने जीवन कार्य में वह जिस तरह अपनी शक्ति लगा रहे थे, उसे देख कर तो उनके आस-पास रहने वाले युवक भी लज्जित हो जाते थे।

उनके जीवन का बहुत बड़ा भाग दूसरों की, विशेषकर हरिजनों, दलितों तथा पिछड़ी जातियों की सेवा में बीता था।

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संक्षिप्त विवरण(Summary)[छुपाएँ]
ठक्कर बापा जीवन परिचय
पूरा नाम अमृतलाल ठक्कर
जन्म तारीख २९ नवंबर, १८६९
जन्म स्थान भावनगर,काठियावाड़ (गुजरात)
धर्म हिन्दू
पिता का नाम विट्ठलदास लालजी ठक्कर
माता का नाम मुलीबाई
पत्नि २ पत्निया, पहली की मृत्यु
के बाद दूसरे से शादी किए
भाई / बहन ६ भाई व बहन, एक बड़े और
चार छोटे
पिता का कार्य साधारण व्यापारी
माता का कार्य गृहणी
शिक्षा प्रारम्भिक शिक्षा( भावनगर)
मेट्रिक(१८८६),
सिविल इंजीनियर(पुणे)
कार्य समाज सेवक,
रेल्वे मे ओवरसियरी कार्य (शोलपुर),
असिस्टेंट इंजीनियर भावनगर-गोंडल-
जूनागढ़-पोरबंदर (बी.जी.जे.पी.) रेलवे,
मुख्य इंजीनियर (बढ़वाण राज्य)
रेलवे विभाग (युगांडा, अफ्रीका)
लाइट रेलवे निरीक्षक म्यूनिसिपैलिटी(बंबई),
अछूत सेवा, भारत
सेवक समाज मे कार्य,
हरिजन ऋणमुक्ति सहकारी
समितियों के स्थापना,
अकाल पीड़ित सेवा,
भील सेवा मण्डल की स्थापना,
हरिजन सेवक संघ मे कार्य
आमतौर पर लिए जाने वाला नाम ठक्कर बाप्पा, ठक्कर बापा
मृत्यु तारीख २० जनवरी, १९५१
उम्र ८२ वर्ष
मृत्यु की वजह सामान्य मृत्यु

ठक्कर बापा का जन्म २९ नवंबर, १८६९ को भावनगर, काठियावाड़ में हुआ था। उनका नाम अमृतलाल ठक्कर था। “ठक्कर बापा” नाम तो तब पड़ा जब कि वह अपनी सेवा के कारण सारे देशवासियों के बापा यानी पिता बन गए थे । उनका परिवार बहुत बड़ा था। वह छः भाई थे। भाइयों में एक बड़े और चार छोटे थे। उनके माता मुलीबाई और पिता विट्ठलदास लालजी ठक्कर मामूली हैसियत के आदमी और साधारण व्यापारी थे। नौकरी या अपने धंधे में उनकी कभी इतनी आमदनी नहीं हुई कि घर का खर्च अच्छी तरह चला सकें। बच्चों की पढाई का खर्च बढने पर तो उन्हें घर के गहने तक बेच देने पड़े और कर्ज लेकर काम चलाना पड़ा।

पैसे की इतनी तंगी होने पर भी समाज में उनका बड़ा मान था। वह घोघारी लोहाणा जाति के थे, जिसके भावनगर में कई घर थे। कट्टर वैष्णव होते हुए भी विट्ठलदास ने अपनी जाति के सुधार के लिए बहुत काम किए। इतना ही नहीं उन्होंने अपनी बिरादरी के बच्चों के पढ़ाई के लिए व्यवस्था कराई, गरीब छात्रों की शिक्षा के लिए सहायता कोष स्थापित किया, लोहाणा छात्रावास का निर्माण कराया। उनके जीवन के आखिरी साल तो इस छात्रावास से उन्नति में ही बीते । इन सब सेवा-कार्यों का नतीजा यह हुआ कि वह अपनी जाति के मुखिया बन गए और नगरवासी उनका बड़ा आदर करने लगे।

अनुक्रम (Index)[छुपाएँ]

ठक्कर बापा की जीवनी

संक्षिप्त विवरण(Summary)

ठक्कर बापा का जन्म

ठक्कर बापा का अछूतों के लिए सद्भावना

ठक्कर बापा की शिक्षा

ठक्कर बापा का विवाह व पारिवारिक विवरण

ठक्कर बापा के कार्य

ठक्कर बापा और भारत सेवक समाज की दीक्षा

ठक्कर बापा और साबरमती जेल

भील सेवा मण्डल के स्थापना

ठक्कर बापा की मृत्यु

FAQ`s

पिता की उदारता और सेवावृत्ति का ठक्कर बापा पर बचपन से ही गहरा असर पड़ा। उनके मोहल्ले में ज्यादातर गरीब लोग रहते थे अपने माता-पिता को उनकी मदद करते देख कर ठक्कर बापा को लगता था कि वह भी उनके लिए जो कुछ कर सकते हैं, करें | सादगी किफायतशारी, शारीरिक श्रम, विनम्रता आदि गुण भी उन्हें अपने पिता से विरासत में मिले।

अछूतों के लिए ठक्कर बापा में छोटी उम्र से ही बड़ी सद्भावना पैदा हो गई। यह देखते थे कि सबेरे उनके मोहल्ले में झाड़ लगाने वाला भंगी अछूत माना जाता है और रोटी मांगने वाला “ढेड़ों का मुखिया” वहां जाकर बैठता है जहां मोहल्ले के बच्चे निवृत्त होने के लिए बैठाए जाते हैं। ठक्कर बापा को बड़ा बुरा लगता था कि किसी भी आदमी के साथ इस तरह का बर्ताव हो। एक दिन उन्होंने अपनी मां से कहा – “ढेड़ों के इस बेचारे मुखिया को कितनी गंदी जगह बैठना पड़ता है। उसे अगर हम अपने पत्थर के चबूतरे पर बैठा लें तो कैसा रहे ? इससे पत्थर अपवित्र तो नहीं हो जाएगा?”

मां बड़ी भली थीं, बड़ी भोली थीं, बड़ी उदार थीं, लेकिन पुराने संस्कारों की थीं उन्होंने कहा-“ऐसा कैसे हो सकता है? वह हमारे चबूतरे पर कैसे बैठ सकता है ? “

“इसमें बुराई क्या है, मां?”

मां क्या जवाब देती, टालते हुए बोली – “तुम इस बात को नहीं समझ सकते। ये लोग अछूत हैं। इनकी जगह दूसरी ही है।“

उन्हे किसी तरह भी जानबूझ कर नहीं छुआ जा सकता। भूल से ही छू जाए तो नहाना पड़ता है और कभी नहाना न हो सके तो छींटे तो लेने ही पड़ते हैं। यह बात उनके मन पर ऐसे डाली गई थी कि कुछ न पूछिए। हरिजनों के लिए बचपन में सहानुभूति का जो बीज उनके दिल में पड़ा, वह आगे चलकर हरिजन सेवा के विशाल वृक्ष के रूप में विकसित हुआ।

चार-पांच बरस की उम्र में बालक अमृतलाल को पढ़ने बैठाया गया, लेकिन उनका मन पढ़ने में नहीं लगता था। खेल का उन्हें बड़ा शौक था अकेले घुमना उन्हें और भी अच्छा लगता था। लेकिन आगे चलकर पढाई रास आया तो ऐसा कि जब १८८६ में मैट्रिक की परीक्षा पास की तो न केवल प्रथम श्रेणी मिली, बल्कि विश्वविद्यालय की “सर जसवंतसिंह जी छात्रवृत्ति” भी प्राप्त हुई।

आर्थिक कठिनाई के कारण ठक्कर बापा के बड़े भाई को अपनी इंटर की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर स्कूल में मास्टरी करनी पड़ी थी, लेकिन पिता ने ठक्कर बापा को आगे पढ़ाने का निश्चय किया और उन्हें पुणे के इंजीनियरिंग कालेज में भर्ती करा दिया। बड़ी कठिनाई से ठक्कर बापा ने तीन बरस की अपनी पढ़ाई पूरी की।

ठक्कर बापा का विवाह ग्यारह-बारह वर्ष की आयु में ही हो गया था । इंजीनियरी की पढ़ाई पूरी करके जब उनकी नौकरी लग गई तब उनका विवाहित जीवन आरंभ हुआ। कुछ समय बाद उनके एक लड़का हुआ, लेकिन दुर्भाग्य से वह पांच-छः साल का होकर चल बसा। उसके बाद उनके और कोई संतान नहीं हुई। उनकी पत्नी शुरू से ही बड़ी कमजोर थीं सन १९०७ में उनका देहांत हो गया। पिता के आग्रह पर ठक्कर बापा ने दूसरी शादी की, लेकिन उनकी वह पत्नी भी एक या दो साल से अधिक जीवित न रही।

इंजीनियरी की परीक्षा पास करने के बाद उन्हें शोलापुर जिले में बारसी लाइट रेलवे लाइन में ७५ रुपये मासिक की ओवरसियरी का काम मिल गया । वहां चार-छः महीने रहने के बाद भावनगर-गोंडल-जूनागढ़-पोरबंदर (बी.जी.जे.पी.) रेलवे में असिस्टेंट इंजीनियर के रूप में उनकी नियुक्ति हुई। इस रेलवे का केंद्र भावनगर में ही था। इसलिए वह घरवालों के साथ रहने लगे। रेल की पटरियां बिछाते समय बहुत से किसानों के खेत बीच में आ जाते थे और कट जाते थे। ये किसान इंजीनियर आदि को रिश्वत देकर अपने खेतों को बचाने का प्रयत्न करते थे।

ठक्कर बापा के सामने भी रुपयों की थैलियां आईं, लेकिन उनकी फूटी कौड़ी तक लेने से उन्होंने साफ इंकार कर दिया । ऊपर के अधिकारी भी रिश्वत खाते थे। जब उन्हें ठक्कर बापा की ईमानदारी की बात मालूम हुई तो उन्होंने उनके विरुद्ध पड्यंत्र रचना आरंभ किया। आखिरकार ठक्कर बापा को नौकरी छोड़ देनी पड़ी।

अब बढ़वाण राज्य ने उन्हें मुख्य इंजीनियर के रूप में अपने यहां रख लिया। इस स्थान पर उन्होंने इतनी मेहनत और सच्चाई से काम किया कि चारों ओर उनकी धाक जम गई । ढाई-तीन वर्ष में राज्य की इमारतें पूरी हो जाने के बाद ठक्कर बापा पोरबंदर राज्य में मुख्य इंजीनियर के पद पर नियुक्त हो गए। पोरबंदर में उन्होंने पांच बरस तक काम किया। इसके बाद भाग्य उन्हें अफ्रीका में युगांडा ले गया, जहां एक रेलवे लाइन डाली जा रही थी। वहां वह तीन बरस रहे और फिर स्वदेश लौट आए। अफ्रीका में रहकर उन्होंने न केवल एक नया देश देखा, बल्कि नए लोगों से उनका परिचय हुआ और प्रकृति के साथ बड़ा घनिष्ठ संबंध जुड़ा।

अफ्रीका से लौटने के बाद उन्हें सांगली राज्य में नौकरी मिली। वहां वह प्रो० कर्व के संपर्क में आए। विधवाओं के प्रति ठक्करबापा के हृदय में पहले से ही बड़ी हमदर्दी थी प्रो०कर्वे के संपर्क में उसमें और भी वृद्धि हुई। १९०४ में उनकी गोपाल कृष्ण गोखले से पहली बार भेंट हुई।

सांगली के बाद ठक्कर बापा को बंबई में नौकरी मिली। वहां की म्यूनिसिपैलिटी ने उन्हें कुर्ला में कचरे की लाइट रेलवे के निरीक्षक का काम सौंपा। इस गाड़ी में बंबई के अलग- अलग मोहल्लों का कूड़ा-करकट भर कर बाहर चेंबूर के पास खुली जगह में गड्ढों में डाला जाता था। ठक्कर बापा का काम यह देखना था कि शहर का सारा कचरा गाड़ी में भर जाए और बाहर जाकर भंगी उसे ठीक से साफ कर डालें। यह काम बड़ा ही मुश्किल था। सड़े हुए कचरे, कीचड़, पत्ते, घास, जूठन, पेशाब आदि से इतनी दुर्गन्ध आती थी कि जरा सी देर खड़े होने में सिर फटने लगता था। सफाई के काम को ढेड़, चमार, भंगी जैसी छोटी जाति के लोग करते थे। इन लोगों की बस्तिया शहर से दूर बड़ी गंदी जगह में थीं ठक्कर बापा इन्हें जीता-जागता नरक कहते थे। गंदे काम से भी अधिक दुख की बात यह थी कि अछूत लोगों को नौकरी पाने के लिए ऊपर के अफसरों को रिश्वत देनी पड़ती थी। रिश्वत के रुपये वे पठानों या व्यापारियों से भारी ब्याज पर लेते थे और सारी जिंदगी कर्ज के बोझ से दबे रहते थे।

ठक्कर बापा को यह सब देखकर बड़ी चोट पहुंची और अछूतों के लिए उनका हृदय करुणा से भर उठा। उसी समय वह हरिजनों के महान सेवक विट्ठलराम जी शिंदे के संपर्क में आए और उनसे अछूतों की सेवा करने की प्रेरणा प्राप्त की।

ठक्कर बापा के काम की अधिकारियों पर इतनी अच्छी छाप पड़ी थी कि कुछ समय बाद उनकी नियुक्ति अधिक वेतन पर रोड विभाग में कर दी गई। लेकिन ठक्कर बापा का मन अब नौकरी से ही ऊबने लगा था। वह जो कुछ कमाते थे, उसका आधा हिस्सा सार्वजनिक संस्थाओं को दान में दे देते थे, पर इससे संतोष नहीं होता था उनकी इच्छा थी कि वह परिवार की सारी जिम्मेदारियों से छुट्टी पाकर पूरा समय दीन-दुखियों की सेवा में लगावें। लेकिन उनके पिता ने उन्हें नौकरी छोड़ने से रोका। उनका स्वर्गवास होने पर वह अपने मन चाहे रास्ते पर चल पड़े। तेईस बरस तक उन्होंने नौकरी की। उसके बाद पैंतालीस बरस की उम्र में उन्होंने सेवा का व्रत लिया तो उसे अपने जीवन के अंतिम क्षण तक पूरी निष्ठा और लगन के साथ निभाया ।

ठक्कर बापा ने ६ फरवरी, १९१४ को भारत सेवक समाज (सेर्वेंट ऑफ इंडिया सोसाइटी) के संस्थापक गोपाल कृष्ण गोखले के सामने सेवा की दीक्षा ली। बाद में ३७ वर्षों में ठक्कर बापा ने अनेक रूपों में सेवा किया । हरिजनों की ऋणमुक्ति के लिए सहकारी समितियों की स्थापना की, रिश्वतखोरी को मिटाने का प्रयत्न किया और उत्तर प्रदेश, कच्छ, पंचमहल आदि के अकालों में अकाल पीड़ितों सेवा की। पहले महायुद्ध के समाप्त होने के बाद उन्होंने जमशेदपुर जाकर टाटा कंपनी के के कारखाने के मजदूरों को राहत पहुंचाई।

१९२० में जब गांधी जी के नेतृत्व में असहयोग का प्रस्ताव पास हुआ और धारा सभाये, अदालतों और स्कूल-कालेजों के बहिष्कार के साथ विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार और स्वदेश के प्रचार का आंदोलन चला तो ठक्कर बापा काठियावाड़ में खादी के काम में जुट गए। उसी वर्ष उड़ीसा के पुरी जिले में बड़े जोर का अकाल पड़ा। उस समय ठक्कर बापा ने वहां पर लोगों की इतनी सेवा की कि गांधी जी उससे बहुत प्रभावित हुए यहां तक कि जब भारत सेवक समाज के अध्यक्ष श्रीनिवास शास्त्री ने अफ्रीका के भारतीयों की मदद करने के लिए ठक्कर बापा को ब्रिटिश गियाना भेजने का विचार किया, तो गांधी जी ने उनके कार्य की प्रशंसा की।

ठक्कर बापा की रुचि राजनीति में नहीं थी, लेकिन जब उनकी सेवाओं का क्षेत्र व्यापक बना तो देशी राज्यों की त्रस्त प्रजा को जगाने के लिए उन्होंने अनेक प्रजा परिषदों में ऊंचा पद स्वीकार किया।

सन १९३० में जब देश भर में सविनय कानून भंग की लड़ाई शुरू हुई तो ठक्कर बापा के जीवन ने नया मोड़ लिया। वह मोहम्मदाबाद के शराबखाने पर पहरा देने वाले स्वयंसेवकों की सेवा के लिए गए थे, लेकिन वहां के थानेदार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन पर मुकदमा चला। नीचे की अदालत ने उन्हें छः माह की सजा दी, पर अपील होने पर ऊपर की अदालत ने उन्हें निर्दोष मान कर छोड़ दिया। मुकदमें के दौरान सवा महीने वह साबरमती जेल में रहे।

१९२२ मे उन्होने “भील सेवा मण्डल” की स्थापना की और १९२२ से १९३२ तक के दस वर्ष ठक्कर बापा ने मुख्य रूप से भीलों की सेवा में गुजारे। इन वर्षों में उन्होंने भील जाति के अज्ञान, दरिद्रता, बेकारी, गरीबी और अंधविश्वासों को दूर करने के लिए बहुत प्रयत्न किया। सन १९३१ में जब गांधीजी ने अछूतोद्धार का काम उठाया और उसके लिए अखिल भारतीय अस्पृश्यता निवारण संघ की स्थापना हुई, तो ठक्कर बापा से उसका मंत्रीपद स्वीकार करने के लिए कहा गया। उस अवसर पर गांधी जी ने उन्हें लिखा – “भील सेवा मंडल का काम उपयोगी तो है ही, परंतु देश और हिंदू जाति के इतिहास की इस घड़ी में हरिजन सेवा अधिक आवश्यक है। इसकी जड़ से सारे राष्ट्र की आत्मशुद्धि करके उसे ऊंचा उठाने की आध्यात्मिक भावना विद्यमान है। ऐसा करने के लिए उच्च नैतिक बल वाले मनुष्यों की इस कार्य में पहली आवश्यकता है। हिंदू जाति ने सदियों तक अस्पृश्यता जारी रख कर जो पाप किया है, उसका प्रायश्चित करना है। इस मामले में आप जैसे व्यक्ति ही पहल कर सकते हैं।“

ठक्करबापा राजी हो गए। गांधी जी ने अछतों के लिए जब “हरिजन” शब्द अपनाया तब इस संघ का नाम बदल कर “हरिजन सेवक संघ” कर दिया गया। सन १९३३ में गांधी जी ने अस्पृश्यता निवारण के लिए २१ दिन का उपवास किया और बाद में नौ महीने तक सारे देश का दौरा किया तो ठक्कर बापा छाया की तरह उनके साथ रहे। वह सारे देश में घूमे और उन्होंने न केवल हरिजन कोष के लिए रुपये इकट्ठे किए, बल्कि हरिजनों के लिए जगह-जगह मंदिर, कुएं, धर्मशालाएं आदि भी खुलवाए। इस यात्रा में उन्हें देश की अवस्था को अच्छी तरह देखने का मौका मिला। बहुत से स्थानों पर उनका जबरदस्त विरोध हुआ, कई जगह उन पर सावर्णों ने प्रहार तक किए, लेकिन उससे ठक्कर बापा का उत्साह बढ़ा ही, कम नहीं हुआ।

सन १९३७ में कांग्रेस के पद-ग्रहण करने के बाद जब कुछ प्रांतों में कांग्रेसी सरकारें बनी तो उससे हरिजनों की सेवा का कार्य और अधिक आगे बढ़ा। ठक्कर बापा की साधना फिर भी अखंड गति से चलती रही।

सन १९४६-४७ में देश में सांप्रदायिक दंगे हुए, उन्होंने ठक्कर बापा के दिल को चूर-चूर कर दिया। फिर भी ७७ वर्ष की अवस्था में वह गांधी जी के पास नोआखाली गए और प्रेम का संदेश लेकर घर-घर घूमे।

ठक्करबापा मानवता के पुजारी थे। उनके लिए यह असह्य था कि आदमी-आदमी के बीच ऊंच-नीच, छोटे-बड़े, छूत-अछूत की बनावटी दीवारें रहें। भेदभाव की इन दीवारों को वह तोड़ देना चाहते थे। वह जानते थे कि जब तक राष्ट्र का कोई भी अंग दुर्बल रहेगा, तब तक देश पूरी तरह से ऊपर नहीं उठ सकता। यही कारण है कि उन्होंने अपने जीवन के ३७ वर्ष हरिजनों, आदिम जातियों तथा दलित वर्गों आदि की सेवा में लगाए। भारत का कोई भी कोना ऐसा नहीं बचा, जहां पहुंच कर ठक्कर बापा ने सेवा का कोई न कोई कार्य न किया हो।

कुछ समय तक वह संसद के सदस्य भी रहे, लेकिन इस पद का उपयोग भी उन्होंने हरिजनों के पक्ष को मजबूत करने के लिए ही किया।

ठक्कर बापा २० जनवरी, १९५१ को ८२ वर्ष की अवस्था में इस संसार से विदा हो गए, पर डा०राजेंद्र प्रसाद के शब्दों में “जब-जब नि:स्वार्थ सेवकों की याद आएगी ठक्कर बापा की मूर्ति आंखों के सामने आकर खड़ी हो जाएगी।“


FAQ`s

Questation : ठक्कर बापा का पूरा नाम क्या था?

Answer : ठक्कर बापा का पूरा नाम अमृतलाल ठक्कर था |

Questation : ठक्कर बापा का जन्म कब हुआ था ?

Answer : ठक्कर बापा का जन्म २९ नवंबर, १८६९ को हुआ था |

Questation : ठक्कर बापा का जन्म कहा हुआ था ?

Answer : ठक्कर बापा का जन्म भावनगर, काठियावाड़ (गुजरात) मे हुआ था |

Questation : ठक्कर बापा का जन्म कौन से राज्य मे हुआ था ?

Answer : ठक्कर बापा का जन्म भावनगर गुजरात राज्य मे हुआ था |

Questation : ठक्कर बापा के पिता का क्या नाम था ?

Answer : ठक्कर बापा के पिता का नाम विट्ठलदास लालजी ठक्कर था | वे मामूली हैसियत के आदमी और साधारण व्यापारी थे |

Questation : ठक्कर बापा के माता का क्या नाम था ?

Answer : ठक्कर बापा के माता का नाम मुलीबाई था |

Questation : ठक्कर बापा के कितने बच्चे थे ?

Answer : ठक्कर बापा का एक लड़का हुआ, लेकिन दुर्भाग्य से वह पांच-छः साल का होकर चल बसा। उसके बाद उनके और कोई संतान नहीं हुई

Questation : ठक्कर बापा की मृत्यु कब हुई ?

Answer : ठक्कर बापा की मृत्यु २० जनवरी, १९५१ हुई |

Questation : हरिजन सेवक संघ क्या है और हरिजन शब्द के उत्पत्ति कहा से हुई ?

Answer : गांधी जी ने अछतों के लिए जब “हरिजन” शब्द अपनाया तब इस संघ का नाम बदल कर “हरिजन सेवक संघ” कर दिया गया। सन १९३३ में गांधी जी ने अस्पृश्यता निवारण के लिए २१ दिन का उपवास किया और बाद में नौ महीने तक सारे देश का दौरा किया तो ठक्कर बापा छाया की तरह उनके साथ रहे। वह सारे देश में घूमे और उन्होंने न केवल हरिजन कोष के लिए रुपये इकट्ठे किए, बल्कि हरिजनों के लिए जगह-जगह मंदिर, कुएं, धर्मशालाएं आदि भी खुलवाए। इस यात्रा में उन्हें देश की अवस्था को अच्छी तरह देखने का मौका मिला। बहुत से स्थानों पर उनका जबरदस्त विरोध हुआ, कई जगह उन पर सावर्णों ने प्रहार तक किए

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