सी एफ एंड्रयूज की जीवनी

Charles Freer Andrews Biography

चार्लेस फ्रीर आंड्रूस


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आपको मालूम होगा कि अंग्रेजों ने हमारे देश पर लगभग २०० वर्ष तक राज्य किया। उनकी गुलामी से छूटने के लिए हमने उनसे जम कर टक्कर ली। अंत में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जैसे नेता को पाकर हमने अपने देश को गुलामी की जंजीरों से छुड़ा लिया। अंग्रेज़ १९४७ में इस देश को छोड़ कर चले गए।


संक्षिप्त विवरण(Summary)[छुपाएँ]
सी एफ एंड्रयूज जीवन परिचय
पूरा नामचार्लेस फ्रीर आंड्रूस
जन्म तारीख१२ फरवरी, १८७१
जन्म स्थानन्यूकासल नगर (इंग्लैंड)
धर्म ईसाई
पिता का नामजान एडविन आनोल्ड
माता का नामशालाट एंड्रयूज
भाई / बहन कई भाई-बहन
माता का कार्यगृहणी
शिक्षाप्रारम्भिक शिक्षा(बर्मिघम),
मेट्रिक(कैंब्रिज विश्वविद्यालय),
धार्मिक शिक्षा
कार्यपादरी,
शिक्षक(सेंट स्टीफेंस कालेज),
दीन-दुखीयो की सेवा,हिंदी भवन
की स्थापना मे सहयोग,
महात्मा गांधी के उपवासों
को सफल बनाने मे सहयोग
मृत्यु तारीख५ अप्रैल, १९४०
मृत्यु स्थानकलकत्ता
उम्र६९ वर्ष

लेकिन आपको शायद यह न मालूम होगा कि जो अंग्रेज हम पर राज्य करने आए थे उन्हीं में एक ऐसा महान अंग्रेज भी हो गया है, जिसने भारत को आजाद कराने के लिए और दीन-दुखी भारतीयों की सेवा के लिए अपना पूरा जीवन न्योछावर कर दिया। इस महान अंग्रेज का नाम सी. एफ. एंड्रयूज था। इन्हें हम “भारत भक्त एंड्रयूज़“के नाम से भी जानते हैं।

सी. एफ. एंड्रयूज का जन्म १२ फरवरी, १८७१ में इंग्लैंड के उत्तरी भाग में न्यूकासल नगर में हुआ था। आपके पिता का नाम जान एडविन आनोल्ड था और माता का नाम मेरी शालाट एंड्रयूज । माता-पिता दोनों ही सरल और धार्मिक विचारों के थे उनका परिवार काफी बड़ा था। एंड्रयूज के कई भाई-बहन थे, परिवार की आर्थिक दशा बहुत अच्छी नहीं थी। परंतु माता-पिता का अखंड प्यार सभी को मिलता रहता था इसी से सभी भाई-बहन खूब प्रसन्नता से दिन बिताते थे। विशेष रूप से एंड्रयूज की माता जी का प्रभाव एंड्रयूज पर बहुत गहरा पड़ा।

अनुक्रम (Index)[छुपाएँ]

सी एफ एंड्रयूज की जीवनी

संक्षिप्त विवरण(Summary)

भारत भक्त एंड्रयूज़

सी एफ एंड्रयूज का जन्म

सी एफ एंड्रयूज की शिक्षा

सी एफ एंड्रयूज सेंट स्टीफेंस कालेज के वाइस प्रिंसिपल सुशील कुमार रुद्र की मित्रता

सी एफ एंड्रयूज का स्वतन्त्रता सेनानी का पक्ष लेना

महात्मा गांधी और सी एफ एंड्रयूज

सी एफ एंड्रयूज की मृत्यु

जब एंड्रयूज छः वर्ष के थे तो वह एक बार सख्त बीमार पड़े। परंतु उनकी माता जी ने रात-दिन एक करके उनकी सेवा की और उनको मौत के मुंह से खींच लिया। इस घटना से माता के प्रति उनका प्यार और भी गहरा हो गया। वर्षो बाद जब एड्रयूज को अपनी माता के देहांत का दुखद समाचार मिला था, तो उन्होंने शोकपूर्ण शब्दों में कहा था – “मेरी माता जी का मेरे ऊपर जो प्रभाव पड़ा वह लगातार एक-सा बना रहा। इसालिए खुद मेरे अंदर मातृत्व की भावना जोर पकड़ती रही है। मेरे जीवन की कली मुझे तभी खिलती हुई प्रतीत होती है जब में दूसरों को वैसा प्यार दे सकूं, जैसा मुझे अपनी माता जी से मिलता रहा है।“

एंड्रयूज का परिवार कुछ दिन बाद बर्मिघम में जा बसा। यहीं एंड्रयूज को आरंभिक शिक्षा- दीक्षा हुई। बचपन से ही वह पढ़ने में बहुत तेज थे, हमेशा अपनी कक्षा में प्रथम आते थे। उनकी स्मरण शक्ति भी बहुत तीव्र थी, स्वभाव कोमल और धार्मिक था। किसी का दुख-दर्द देखते ही द्रवित हो जाते थे | पढ़ने के अलावा उन्हें चित्रकारी करने और क्रिकेट खेलने का शौक था। वाद-विवाद में भी बड़े उत्साह से भाग लेते थे इन सब बातों से बढ़ कर बात यह हुई कि उन्हें बचपन से ही भारत के प्रति प्रेम हो गया। बात यह हुई कि उन्हें एक किताब पढ़ने को मिली, जिसमें अंग्रेजों के भारत में आने और राज्य स्थापित करने का वर्णन था। उसे पढ़ते ही वह एक दिन अपनी माता जी से बोले – माँ, कृपया मुझे खाने के साथ थोड़ा चावल रोज दे दिया करो।“

मां ने कहा - क्यों?

क्योंकि बड़े होकर मुझे भारत जाना है। और पिता जी कहते हैं कि एंड्रयूज ने कहा वहां सभी चावल खाते हैं। इसलिए मुझे भी इसका अभ्यास करना चाहिए।

इस घटना से पता चलता है कि एंड्रयूज के हृदय में बचपन से ही भारत आने की धुन समा गई थी।

आरंभिक स्कूलों की पढ़ाई सफलतापूर्वक समाप्त करके एंड्रयूज ने कैंब्रिज विश्वविद्यालय में सफलता के साथ पढ़ाई समाप्त की। साथ ही धार्मिक शिक्षा भी प्राप्त की। वास्तव में उनके जीवन का एक उद्देश्य पादरी बन कर लोगों की सेवा करना था। अंत में उन्हें इस उद्देश्य में सफलता भी मिली। इस अवसर की वह प्रतीक्षा ही कर रहे थे। उन्होंने २८ फरवरी, १९०४ में लंदन से भारत के लिए प्रस्थान किया और २० मार्च, १९०४ को भारत पहुंच गए।

भारत में अपने आगमन को एंड्रयूज ने दूसरा जन्म माना था । उन्हें यहां आते ही ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वह किसी स्वप्नलोक में आ गए हैं। वह दिल्ली में रहते हुए रोज सवेरे यमुना तट पर स्थित कुदेसिया बाग की ओर नियम से घूमने जाते और भारत के फल-फूल, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, धरती-आकाश तथा जन-समुदाय सभी को अचरज और उत्सुकता से देखते रह जाते।

भारत निवास के समय वह सबसे पहले सेंट स्टीफेंस कालेज के वाइस प्रिंसिपल सुशील कुमार रुद्र के निकट परिचय में आए। विशेषतः सुशील रुद्र के तीन मातृहीन बच्चो के प्रति एंड्रयूज के स्नेहशील हृदय में बेहद प्यार उमडने लगा। एंड्रयूज एक प्रकार से रुद्र परिवार के ही सदस्य बन गए। एंड्रयूज ने सुशील रुद्र के संबंध में लिखा है – “सुशील रुद्र से मुझे जो कुछ मिला वह दुनिया भर में और किसी से नहीं मिल सका और वह थी ऐसी मित्रता जिसके कारण भारत मेरे लिए एक अपरिचित देश न होकर बिल्कुल जाना-पहचाना देश बन गया।“

भारत निवास के समय एंड्रयूज ने अंग्रेजों और भारतीयों के बीच जाति-भेद की खाई को प्रत्यक्ष रुप में देखा। गोरे और काले के बीच इस खाई को देख कर उन्हें बड़ा दुख हुआ। वह मानते थे कि इस प्रकार का भेद-भाव ईसाई धर्म के बिल्कुल विरुद्ध है। भारत में रहते हुए आरंभ के वर्षों में एंड्रयूज मौलवी शमशुद्दीन और स्वामी श्रद्धानंद के संपर्क में आए और उनसे उन्हें इस्लाम और आर्य धर्म की खूबियां समझने का अवसर मिला।

स्वामी श्रद्धानंद के साथ वह कई बार गुरुकुल कांगड़ी भी गए और उन्होंने भारतीय पद्धति की पढ़ाई के देखा और बहुत पसंद किया।

सेंट स्टीफेंस कालेज में पढ़ाते हुए उन्होंने दीन-दुखी लोगों को सेवा की ओर ध्यान देना आरंभ कर दिया। जब कभी कोई विद्यार्थी या नौकर बीमार पड़ता तो एंड्रयूज रात-रात भर जागकर उसकी खातिरदारी करते। जब कभी वह किसी को कष्ट में देखते तो तन-मन-धन से उसकी सेवा में जुट जाते।

उसी समय लाहौर के सिविल एंड मिलिट्री गजट में एक ऐसी चिट्ठी प्रकाशित हुई, जिसमें भारत की आजादी के लिए प्रयत्न करने वालों को गलत शिक्षा पाए हुए मुट्ठी भर असंतुष्ट लोग कहा गया था। एंड्रयूज ने इस पत्र का करारा जवाब दिया। इससे सारे देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी जहां कहीं भारतीय रहते थे, उनका ध्यान एंड्रयूज की ओर आकर्षित हो गया। उन्हें ऐसा लगा कि अंग्रेजों की बीच भी उनकी खोज-खबर लेने वाला एक दयालु महापुरुष मौजूद है। एंड्रयूज का परिचय इसी समय से लाला लाजपत राय और रामानंद चटर्जी जैसे नेताओं और पत्रकारों से हुआ। वह कांग्रेस के तत्कालीन सभापति दादा भाई नौरोजी तथा गोपाल कृष्ण गोखले आदि के संपर्क में भी आए। स्वयं ब्रिटिश शासक उन पर संदेह करने लगे और उनकी चिट्ठी-पत्री को गुप्तचर विभाग खोल कर देखने लगा।

मई, १९०७ में लाला लाजपत राय को कैद किया गया और नवंबर में रिहा किया गया। रिहाई पर जब सेंट स्टीफेंस कालेज के विद्यार्थी कालेज भवन में रोशनी करना चाहते थे, तो उन्होंने एंड्रयूज से आज्ञा मांगी। एंड्रयूज ने न केवल आज्ञा ही दी, बल्कि कहा – “ऐसी धूम से दीपक जलाओ कि दिवाली जैसी लगने लगे।“

एंड्रयूज ने भारत का पूरा परिचय पाने के लिए देश भर का भ्रमण किया। जहां भी वह गए, उन्होंने दीन-दुखी जनता से संपर्क स्थापित किया। जब कभी मौका देखा, वह लोगो की सेवा में जुट गए। कभी वह टुंडला में रेलवे कर्मचारियों की हड़ताल के समय मजदुरों की सेवा में लगे हैं, कभी असम में अफीम के आयात के विरुद्ध आंदोलन कर रहे हैं।

परंतु शांति निकेतन में रवींद्रनाथ ठाकुर की स्नेह छाया में रह कर बच्चों की पढ़ाई की देखरेख के कार्य को एंड्रयूज ने सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य माना। कवींद्र रवींद्र से उनका सर्वप्रथम परिचय लंदन में १९२१ में हुआ था। तब से दोनों में जो अभिन्न हृदयता स्थापित हुई वह जीवन पर्यंत बनी रही। वर्षों शांति निकेतन में हिंदी भवन की स्थापना भी बनारसीदास चतुर्वेदी और एंड्रयूज के सम्मिलित प्रयत्नों का फल था।

भारत में ही सेवा कार्य से एंड्रयूज को संतोष न हुआ। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका और फीजी द्वीप की भी यात्रा की और वहां के प्रवासी भारतीयों की दुर्दशा का अध्ययन किया। उन्होंने लगातार अधिकारियों से मिल कर समाचार-पत्रों में लेख लिख कर, स्वयं भारतीयों की बस्तियों में उन्हीं के समान जीवन बिता कर उनकी दशा में सुधार किया। एंड्रयूज के ही अथक प्रयत्न से भारत से फीजी द्वीप में धोखे से मजदूरों का भेजा जाना बंद हो गया | फीजी में ही उन्हें लोगों ने सर्वप्रथम “दीनबंधु” कह कर पुकारना आरंभ किया था ।

एंड्रयूज के प्रति महात्मा गांधी के हृदय में बहुत ही गहरा स्नेह था स्वयं एंड्रयूज ने महात्मा गांधी के उपवासों के अवसर पर मौजूद रह कर या अधिकारियों से बातचीत करके उपवासों को तुड़वाने में या उनके सफलतापूर्वक समाप्त होने में बड़ी सहायता दी। गांधी जी उन्हें प्यार से “मेरे प्रिय चार्ली” कहा करते थे और छोटे भाई के समान मानते थे। एंड्रयूज के निधन पर महात्मा गांधी ने लिखा था – “चार्ली एंड्रयूज बच्चों की तरह सरल, सच्चे और बेहद शर्मीले स्वभाव के थे।“

एंड्रयूज की आर्थिक अवस्था बहुत अच्छी नहीं रहती थी वह प्राय: चिट्ठी का जवाब देने के लिए भी पैसे न जुटा पाते थे। लेकिन उनकी दानशीलता की कथाएं असंख्य हैं। आप उन्हें कोई शाल दीजिए, कुछ ही देर बाद वह ठंड से कंपकंपाते किसी गरीब के पास मिलेगा। कभी एंड्रयूज का कोट गायब है, कभी पर्स खाली है। वह अपने काम में इतने बेसुध हो जाते थे कि एक बार लंदन की सड़कों पर बिना जूता पहने ही भाग निकले और उनके एक मित्र को पीछे-पीछे जूते लेकर दौड़ना पड़ा।

जीवन के अंतिम कुछ वर्ष एंड्रयूज ने लंदन में कुछ धार्मिक ग्रंथों और कुछ भारत संबंधी ग्रंथों को लिखने में बिताए। इन ग्रंथों में जहां उन्होंने अपने हार्दिक विश्वासों को दिखाया, वहीं पूर्व और पश्चिम देशों के बीच पुल बनाने का काम भी किया। वास्तव में भारत और एशिया के विचारों को पश्चिमी देशों तक पहुंचाने और पश्चिमी देशों के सर्वोत्तम विचारों को भारत और एशिया तक पहुंचाने का महान कार्य एंड्रयूज साहब जीवन भर करते रहे।

इस महापुरुष का ५ अप्रैल, १९४० को कलकत्ता मे निधन हो गया ।


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