गणपति उपासना | गणपति मंत्र | गणपति यंत्र

Ganpati Upasna, mantra, Yantra


देवता कई प्रकार के होते हैं, और प्रत्येक देवता का एक आधार होता है। जिसका साक्षात्कार करने के लिए न्यास ध्यान रहित मंत्र जप की आवश्यकता होती है। प्रत्येक देवता के अलग-अलग मंत्र व यंत्र होते हैं। देवता की उपासना पद्धति मनोवैज्ञानिक होती है, इसके लिए गुरू से उपदेश लेना आवश्यक होता है। गणपत्य संप्रदाय एवं उसकी उपासना पद्धति भी इसका अपवाद नहीं है।

गणपति उपासना भारत में अति प्राचीन मानी जाती है। वैदिक धर्म के अतिरिक्त जैन, बौद्ध आदि धर्मों में भी इसका महत्वपूर्ण स्थान है जिनमें समष्टि बोध होता है उसे गण कहते हैंउसका पति गणपति कहलाता है। भारत में विशेषकर महाराष्ट्र प्रांत में गणपति की पूजा-अर्चना बड़े विधि-विधान के साथ की जाती है। यहां गणपति की शोभायात्रा के दौरान विभिन्न धर्मों के लोगों का उमड़ा जनसैलाब देखकर सहज ही इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि गणपति बप्पा आम जनता के प्रति कितने लोकप्रिय हैं।

बीज मंत्र | गणपति बीज मंत्र


बीज मंत्रों के जीव रूप या वीर्यरूप होते हैं। अतः निर्जीव मंत्र बीजहीन होने के कारण साधना का फल नहीं देते। मंत्रो का जप बीज मंत्र सहित ही करना चाहिए | “भूःभवःस्वः” ये तीनों त्रिपदा गायत्री के बीज मंत्र हैं “ऐं” सरस्वती का, “ही” शिव का, “दें” दुर्गा का, “क्ली” काली का, “श्री” लक्ष्मी का, एवं “गं” गणपति का बीज मंत्र है। मंत्र देवता को प्रसन्न करने वाले होते हैं एवं प्राणबाध नमोऽन्त मंत्र शांति, भोग और सुख देने वाले होते हैं। अतः प्रायः बीज मंत्रों के साथ अनुस्वाररूप बिंदु लगाकर उनके प्रारंभ में प्रणब तथा अंत में “नमः” लगाकर उनका जप किया जाता है। इस नियम के अनुसार श्री गणपति के बीज मंत्र का जप के प्रायोजन के लिए रूप होगा - “ॐ गं नमः"

मंत्र की संकेतार्थ प्रणाली के अनुसार श्रीगणपति के बीज मंत्र के रहस्यार्थ विचार करें। “गम” के तीन खंड हैं- ग+अ+अनुसार(बिन्दु) सनत्कुमार संहिता में शिवरात्रि और इंद्ररात में वर्णित प्रत्येक वर्ण द्वारा संकेतिक देवता तथा तत्व के अनुसार गकार का देवता अग्नि है। अकार प्रकाश का परमशिव का बोधक है तथा बिंदु देवता की प्रति एवं अवस्यातीत (तुरीय) पर ब्रहा का संकेतक है। “नमः” पद जीवनिष्ठ अहंकार का निषेध करके देवता के प्रति पूर्ण शरणापक्ष होने का भाव व्यक्त करता है अतः “ॐ गं नमः” का तात्पर्य हुआ "मैं ज्वनिहित अहंकार ममतादिका एवं अविधामूलक प्रकृति का त्यागकर ओंकार वाच्य, अग्री रूप गणपति के गरणागत होता हूं। वे मेरी उपासना से प्रसन्न होकर कृपा पूर्वक शुद्ध प्रकाश रूप पर ब्रह्म का साक्षात्कार करावें।“

श्री हरिद्रा गणेश मंत्र | श्री हरिद्रा गणेश यंत्र


मंत्रों के पदों तथा अक्षरों के निवेश के लिए यंत्र रचना की जाती है। अतः यंत्र के बिना पूजन करने पर देवता शीघ्र प्रसन्न नहीं होते, इसलिए समस्त मंत्रों का यंत्र में ही पूजन प्रशस्त बताया गया है।

मंत्र महोदधि में यंत्र लेखन के लिए इष्टदेव से स्वप्नादेश लेने की बात बताई गयी है। किसी शुभ दिन साधक इष्टदेव की आराधना करके तीन दिनों तक केवल हविष्य के भोजन पर रहकर जप परायण हो, रात में भूमि पर शयन करे। शयन के पूर्व वह अपने देवता से पूछे कि भगवन! मैं अमुक यंत्र लिखना चाहता हूं। यह मेरे लिए कैसा रहेगा ? इस प्रकार प्रश्न करके प्रतिदिन इष्ट देव की पूजा करते रहें, तीसरे दिन की रात्रि में साधक को स्वप्नादेश प्राप्त हो सकता है कि वह यंत्र सिद्ध है, साध्य है, सुसिद्ध है अथवा शत्रु भूत है | शत्रुभूत यंत्र का लेखन न करें। पूछने के बाद यदि कोई स्वप्नादेश न प्राप्त हो तो भी उस यंत्र को न लिखे। दूसरे ही किसी यंत्र को लिखें।

यंत्र लेखक को स्नान करके, शुद्ध वस्त्र पहनकर पुष्प और चंदन से भूषित हो, विहित द्रव्यों द्वारा, विहित स्थान पर एकांत में बैठकर यंत्र लिखना चाहिए। सकाम साधक यंत्र की कर्णिका या मध्य भाग में निहित बीज मंत्र के ऊपर अपना षष्ठ यंत्र नाम लिखें। बीज मंत्र के नीचे द्वितीयान्तसाध्य का नाम लिखें। बीज मंत्र के दोनों पार्श्वभागों में “कुरू कुरू” लिखे। यंत्र के मध्य भाग के नीचे “हसौः” यह बीज लिखे। यह बीज मंत्र यंत्र का जीव है। फिर उसके ईशान आदि चार कोणों में “हं सः सो हं” इन चार वर्ण को क्रमश: लिखे। ये यंत्र के प्राण माने गये हैं। “इ ई” - ये दो स्वर नेत्र हैं और “उ ऊ” ये दो स्वर कान हैं। श्रोत और नेत्र को यंत्र के पार्श्व भागों में लिखे। तदनंतर पूर्वादि दस दिशाओं में दिकपालों के बीज लिखने चाहिए यथा लं रं मं क्ष, बं यं सं आं ही। तत्पश्चात् गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षरों को आठ दिशाओं में बांटकर प्रत्येक दिशा में तीन-तीन अक्षर लिखें।

गायत्री यंत्र


गायत्री यंत्र इस प्रकार है- “यंत्र राजाय विद्रनहे, वरप्रदाय, धीमहि । तन्नो यंत्रः प्रचोदयात” इस गायत्री के स्मरण मात्र से संपूर्ण अभीष्ट पदार्थों की सिद्धि होती है।

श्री हरिद्रा गणेश यंत्र


श्री हरिद्रागणेश यंत्र के द्वारा हरिद्रागणपति के पूजन एवं उनके मंत्र का अनुष्ठान करने से संपूर्ण कामनाओं की पूर्ति होती है। इस यंत्र से सारे विध्नों का निवारण होकर मंगल की सृष्टि होती है। श्री हरिद्रागणेश मंत्र बत्तीस अक्षरों का है – “ॐ हुं गं ग्लौं हरिद्रागणपतये वर वरद सर्वजनदृदयं स्तम्भय स्वाहा।“ इसी मंत्र का यह यंत्र है । अभीष्ट सिद्धि के लिए इसका अनुष्ठान करनेवाले साधक को पूजन आरंभ करने से पूर्व स्तनानादि से निवृत होकर पवित्र स्थान में शुद्ध आसन बिछाकर पूर्वाभिमुख होकर बैठ जाना चाहिए। शरीर की वाह्य आंतरिक शुद्धि करते हुए अनुष्ठान करने का संकल्प करना चाहिए, फिर भगवान गणेश तथा भगवती गौरी आदि का पूजन तथा कलश स्थापना विधिपूर्वक करना चाहिए जिससे यह अनुष्ठान आराम से संपन्न हो सके।

प्रत्येक साधक को हरिद्रागणेश यंत्र व मंत्र सिद्ध करने के लिए किसी योग्य विद्वान से परामर्श कर लेना चाहिए। पाठक बिना परामर्श से कोई भी यंत्र व मंत्र सिद्ध न करें। अच्छा यह रहे कि साधक गणेश जी के मंत्र या यंत्र को सिद्ध करने के लिए दीपावली का ही दिन चुने । इस दिन भगवान गणपति व माता लक्ष्मी हर घर में विराजमान रहती हैं। श्री हरिद्रागणेश यंत्र सिद्ध होने के पश्चात् साधक को धन, बल व बुद्धि की कमी नहीं रहती। वह तीनों लोकों में सर्वशक्तिमान हो जाता है। बशर्ते वह इसका दुरुपयोग न करें।

अमंगल कार्यों हेतु मंत्र व यंत्र का प्रयोग करने से साधक की शक्ति स्वतः समाप्त हो जाती है। श्री हरिद्रागणपति सम्बंधी मंत्र व यंत्र की सिद्धि के लिए विशेष पूजा-विधि होती है जो विनियोग से लेकर आयुध पूजनकर समाप्त होती है। यह विधि किसी योग्य साधक व विद्वान द्वारा प्राप्त की जा सकती है।

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