भाई पंचमी | ऋषि पंचमी | Bhai Panchami | Rishi Panchami


भाई पंचमी की पूजा विधि


भादवा सुदी पंचमी न रिषी पंचमी को तीव्हार आव । माहेश्वरी समाज म बीन ही भाई पांचू बोल, ओर बेन भाई क राखी बांध भाई अमर रेणु शान्त सुखी रेणु । बीका कल्याण क लिए राखी बांध । जो बेन रिषी पंचमी को बरत करर भाई क राखी बांधर जीम भाई का आनन्द क वास्ता वीका मंगल क लिए राखी मोली की या लाल पीली केसरियां लेणूं ।

कोई लुगायां रिषी पंचमी को बरत कर जिकी निगोठ बरत करणू बैल को बायोडो कोई चीज खाणूं नहीं । भैंस को दूध या हाथ को लगायोडो फल खाणूं । सप्त रिषियां की पूजा करणूं। १०८ लोठा पाणी सूं या तलाब, नदी का पाणी स्यू न्हाणू । कोरा कपड़ा पेरणूं । कोई न छीवणूं नहीं । पण्डित कनस्यू पूजा कराणू कथा सुनणू । पण्डित को साधन नहीं होवे तो खुद करणो ।


भाई पंचमी की व्रत कथा


एक गांव हो । बठ । ब्राह्मण खेती करतो और आपरो जीवन आनन्द सूं बितातो हो । एक बार ब्राम्हणी बोली म्हारो रिषी पंचमी को उजेवणो करणू है। ब्राह्मणी सब तैयारियां करी। रसोई करी ओर रजस्वला होयगी । बा रजस्वला होयोडी रसोई करणे का दोषस्यू कुत्ती का जणम मं आयगी । ब्राम्हण ग वीन छिणेस्यू बेल का जणम [योनी] म आयो । बे बठ ही रेवता हा । बाको बेटो बहुत धर्मात्मा हो।वो यज्ञ करतो, श्राद्ध करतो, तर्पण करतो ब्राह्मण न भोजन करातो हो।

एक दिन बीका पिताजी को श्राद्ध आयो । वो आपरी लुगाई न बोल्यो कि आज म्हारा पिताजी को श्राद्ध है तू खीर पुडिया की रसोई कर। खीर ऊबल रही ही । ऊपर सूं एक चील सांप न पकड़ कर उड़ती-उड़ती लेर जाव ही । सांप को विष वी खीर म पडग्यो । वा कुत्ती बैठी बैठी देख रही थी । वा विचारा करयो कि या खीर घर का सगला जणा और ब्राह्मण खा लेई तो म्हारा बेटा न ब्राम्हण हत्या को पाप लग जाई, बा झट पट उठी और खीर का भगोना म मुण्डो घाल दियो । ब्राम्हण की लुगाई न रीस आई वा चुल्हा की जलती लकड़ी स्यू कुती की पीठ पर दे मारी ।

बा रसोई न फेंक दिवी । पाछी दूसरी रसोई बणाई ब्राम्हण न भोजन करायी । कुत्ती न वी दिन रोटी कोनी दिवी । कुत्ती आपरा धणी बैल कन गई और रोवण लागी और बोली आज म्हारी बहु म्हने रोटी पाणी दिवी कोनी म्हे भूखी हूं बैल बीको कारण पूछयो बा बोली खीर का भगोना म मुण्डो घाल दियो जिक कारण जलती लकड़ी स्यू मारी और रोटी कोनी दिवी म्हारो तो आज सगलो डील दुःख है । बैल बोल्यो म्हने भी आज म्हारो बेटो घाणी क जोत दियो म्हारो मुण्डो बांध दियो और घणो मारयो । म्हे भी आज भूखो हूं| सगली बातां बेको बेटो रात का सूणयो और उठर बैल न घास न्हाक्यो और कुतिया न रोटो दिवी, पाणी पायो और मन म बहोत दु:खी हुयो। दूज दिन उठकर घणा जंगल म गयो ।

बठ रिषी महात्मा मिलया बो ब्याक पगां पडयो । रिषी पूछया कि तू इत्ती चिन्ता म क्यूं है बेटो बोल्यो म्हारो बाप बैल की योनी और मां कुतिया की योनि म्ह है । ब्याको मोक्ष क्यान हुव जिका को उपाय बताओ । रिषी बोल्या भादवा सुदी पंचमी न रिषी पंचमी को बरत कर और बीको पुण्य थारा मां बाप न दी। बी पुण्य स्यूं थारा मां बाप न मोक्ष मिली। बेटो रिषी पंचमी को बरत कर पुण्य व्यान दियो । स्वर्ग स्यूं थारा विमान आयो मां कुत्ती बन्योडी और बाप बैल बन्योडो मिनखां की योनि म आया और स्वर्ग सिधारया । व्याको संकट मिटयो ज्यान सगलां को मिटाइज्यो ।


भाई पंचमी की कहानी


एक मां बेटा हा रिषी पंचमी आई । बेटो मां न बोल्यो मां म्हे बेनस्यू राखी बंधावण न जावूं । मां बोली बेटा आपां तो गरीब आदमी हां देवण न की कोनी कांई जाव । की देणू तो बेन क जाणू । भाई बोल्यो म्हे रोज लकडी बेचर आऊ बीका पैसा भेला करर म्हे बेन क जाऊं । बी दिन बीन लकड़ी का पैसा खूब मिलया । वो व्या पैसा न लेर बेन क रवाना होयग्यो ।

रस्ता म चोर बीन लुट कोसर पैसा ले लिया और मार दियो। बठिन सु सप्त रिषी निकल्या वे ध्यान लगार देख्या तो मालुम हुयो कि भाई बेन सू राखी बंधवाणे जा रहियो थो चोर लुट कसोटर पैसा ले लिया । सप्त रिषी अमृत को छीटो देर जीवतो करयो भाई उठर रिषियां क पगां पडयो । पाछो आपरे घरा जावा लाग्यो रिषी बोल्या तू पाछो घर क्यू जाव भाई बोल्यो म्हारे कने पैसा कोनी म्हे बेन न कांई देऊ जण रिषी बिन एक छोटो सी लकडी दिवी और बोल्या कि थारी बेन जण राखी बांध तो तू या लकडी थाली म न्हाक दीजै वो बेन क घर गयो बेन सूत कात रही ही सूत को तार टूटगियो बेन भाईस्यू बातां करी कोनी ।

भाई ज ण्यो बेन म्हाराऊ बातां कोनी करी बोली कोनी वो पाछो जावण लाग्यो । बेन सूत को तार जोड़र भाई न बोली म्हे तार टूटग्यो ई वास्त बोली कोनी तू नाराज होर कठ जाव । बेन भाई न पाटा पर बैठाई राखी बांधी, तिलक करी। भाई रिषी दिया जिकी लकड़ी बेन की थाली म न्हाकी जिकी सोना की जंजीर बणगी ।

दिवराण्या जेठाण्या छिप छिन कर देखण लागी सोना की सांकल देखर अचम्बा म पडगी वा भाई की आरती करी आशिर्वाद दिवी । देवराष्यां जेठाण्यांयू पूछण लागी भाई आयो है कांई रसोई करां एक बोली सोना की सांकल दियो है घी म चांवल रांदो । बेन घी म चांवल चढ़ाया दो घण्टा होयग्या चांवल सीज़्या कोनी बेन बिचारी भोली भाली थी बा बोली भाई चांवल घी म सीज्या कोनी भाई बोल्यो बेन घी म चांवल सीज कांई दूध मंगायो खीर पुडियां बनाई सगला जणा जीम्या दू ज दिन दिनुगां ऊठर आटो पीसर भाई क वास्त लाडू बणाया अन्धारा के मायने घट्टी म सांप पीसीजग्यो वीन मालुम कोनी पडयो वा लाडू बणार भाई क बांध दिया । भाई रवाना हीइग्यो ।

दिनुगां टाबर उठया बोल्या मामाजी क साथ लाडू बांध्या ब्याहनका म्हाने दे ।बा लाडू को टुकड़ो तोडयो आग देखतो सांप का छोटा छोटा टुकड़ा निकल्या । बा बेन भाई क लार दौड़ी । दूर जाणे के बाद भाई दिख्यो बा भाई न हेला मारण लागी भाई बोल्यो म्हे थारा घरांसू की लायो तो कोनी तू म्हारे लारे क्यूं आ रई हैं । बा रास्ता म ही बैठण लागी बा बोली बीयमतो पथवारी माता को वासो हैं म्हे क्यान बैठू वा फेर भागण लागी भगवान बोल्या इत्ती गडबड म भी या कि तो ध्यान राख्यो है पथवारी माता बीका भाई का रास्ता म बोर को झाड ऊबो कर दियो घणा बोर लग्योडा देखर भाई बोर तोडबा लागग्यो जित्त म बेन भाई क पास पूगगी भाई बोल्यो तू म्हारे लारे क्यू भागकर आई बेन बोली नहीं रे भाई म्हे तो थारो जींवण बचावण तांई आयी हूं म्हे थने लाडू दिया जिम सांप पिसिजग्यो । बेन भाई कनवूं लाडू लेर झाड क नीचे खाडो खोदर गाड़ दिया बा भाई न पाछो आपक घर लेयगी तीजे दिन भाई न लाडू बणार सीख दिवी दूजे दिन भाई न रवाना नहीं करणू और पीसणू नहीं या तो से दिन या तीजे दिन भाई न रवाना करणू। रिषी देवता बींका भाई की रक्षा करया ज्यान सबकी रक्षा करीज्यो ।

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