कस्तूरी रंगा अय्यंगार | एस. कस्तूरी रंगा अयंगार | S. Kasturi Ranga Iyengar


स्वराज की लड़ाई के दिनों में और उसके भी पहले से भारतीय समाचार ने जनता में जागृति उत्पन्न करने में बड़ा महत्वपूर्ण योग दिया था। भारतीय पत्रकारिता में कस्तूरी रंगा अय्यंगार तथा उनके विश्वविख्यात अंग्रेज़ी दैनिक “हिंदू” का गौरवपूर्ण स्थान है, किंतु कस्तूरी रंगा अय्यंगार केवल एक बड़े पत्रकार ही नहीं, एक सच्चे देशभक्त, पक्के कांग्रेसी नेता और उत्साही जन-सेवक भी थे | देश की उन्नति और आजादी के लिए जो अनमोल सेवाएं उन्होंने की, वे स्मरणीय रहेंगी।



कस्तूरी रंगा अय्यंगार का जन्म


तंजावुर जिले में कावेरी के तट पर बसे हुए इन्नमबूर नामक एक छोटे से गांव में १५ दिसंबर १८५९ को उनका जन्म हुआ। उनका परिवार तंजावुर जिले में विशेष सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। उनके पिता शेष अय्यंगार ने पहले कुछ दिनों तक तंजावुर की कलेक्टरी कचहरी में नौकरी की थी और बाद में वह कपिस्थलम तथा शियाली जैसी मालदार रियासतों के मैनेजर नियुक्त किए गए थे। कस्तूरी रंगा अय्यंगार अपने पिता के तीसरे और सबसे छोटे पुत्र थे। उनके दोनों बड़े भाई भी अच्छे-अव्छे पदों पर नियुक्त हुए थे। एक भाई श्रीनिवास राघव अय्यंगार मद्रास सरकार में एक ऊंचे पद पर रह चुकने के बाद बड़ौदा रियासत के दीवान बने और दूसरे सौदराज अय्यंगार डिएटी कलेक्टर।


कस्तूरी रंगा अय्यंगार की शिक्षा


कस्तूरी रंगा अय्यंगार ने प्रारंभिक शिक्षा कुंभकोणम में प्राप्त की। उसके बाद वह मद्रास गए, जहां प्रेसीडेंसी कॉलेज से उन्होंने बी ए. की परीक्षा पास की | सरकारी नौकरी की शान का भूत कुछ दिनों तक कस्तूरी रंगा अय्यंगार के सिर पर भी सवार रहा और वह सब रजिस्ट्रार के पद पर नियुक्त हुए, किंतु देश सेवा की भावना शीघ्र ही उनके हृदय में इतनी बलवती हो उठी कि उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कानून की परीक्षा पास की और भायष्म अय्यंगार के पास वकालत का काम सीखने लगे। इसके बाद उन्होंने मद्रास से कोयंबतूर जाकर वकालत शुरू की और शीघ्र ही वहां के एक नामी वकील माने जाने लगे।

वह वहां के लोकल बोर्ड तथा म्युनिसिपल कमेटी के सदस्य भी चुने गए और इस प्रकार सार्वजनिक सेवा के क्षेत्र में आए। फिर वकालत का काम बड़े पैमाने पर करने के विचार से वह मद्रास चले आए, लेकिन स्थानीय राजनीति में उलझ जाने के कारण मद्रास हाईकोर्ट में उन्हें वकालत का अधिक अवसर न मिला।


हिन्दू पत्र का सम्पादन


उस समय वहां का मुख्य दैनिक समाचार “हिंदू” आर्थिक कठिनाइयों में फंसा हुआ था। वह १९०० के लगभग “हिंदू” के कानूनी सलाहकार बने। शीघ्र ही कस्तूरी रंगा अय्यंगार ने असाधारण साहस और पुरुषार्थ का परिचय दिया और १९०५ में उसे खरीद लिया। उन्होंने उसके भूतपूर्व अध्यक्ष वीर राघवाचार्य को मैनेजर बनाया और भूतपूर्व संपादक करुणाकर मैनन को अपना सहकारी नियुक्त किया, परंतु कुछ ही काल पश्चात् करुणाकर मैनन ने एक नया दैनिक पत्र “इंडियन पैट्रियट” (भारतीय देशभक्त) निकाला और वीर राघवाचार्य को बीमारी के कारण कार्यभार से अलग होना पड़ा।

फलतः कस्तूरी रंगा अय्यंगार को सहसा अनेक कठिनाइयों और उलझनों का सामना करना पड़ गया। इस समय उनके अभिन्न मित्र शंकरन नायर ने उन्हें सलाह दी कि सफलता प्राप्त करने के उद्देश्य से समस्त कारोबार को एकमात्र अपने अधिकार में रखो। अतएव उन्होंने पूरी लगन से काम करना शुरू किया और पहले वर्ष उन्हें कुल १५० रुपये का लाभ हुआ, किंतु साथ ही उन्हें उज्जवल भविष्य का पूरा-पूरा विश्वास भी होने लगा, क्योंकि जनता में उनका प्रभाव बढ़ता जा रहा था | करुणाकर मैनन द्वारा नया दैनिक पत्र निकालने के बावजूद “हिंदू” की पाठक संख्या तेजी से बढ़ती जा रही थी।


कस्तूरी रंगा अय्यंगार के कार्य


कस्तूरी रंगा अय्यंगार ने राष्ट्रीय महासभा के कामों में भाग लिया वह आरंभ से ही कांग्रेसी थे। १९०७-०८ में कांग्रेस में नरम दल और गरम दल में बड़ी खींचातानी हुई। श्री अय्यंगार ने उस समय कांग्रेस के स्वदेशी और बहिष्कार कार्यक्रम और उद्देश्यों में परिवर्तन करने के प्रस्तावों का घोर विरोध किया। उस समय देश में यातायात के साधनों की बड़ी कमी थी। मद्रास से कलकत्ता जाने के लिए समुद्र मार्ग से यात्रा करनी पड़ती थी। फिर भी, कलकत्ता में होने वाली कंग्रेस की सभी बैठकों में कस्तूरी रंगा अय्यंगार नियमपूर्वक जाया करते थे | आरंभ से ही वह लोकमान्य तिलक की नीतियों का समर्थन और नरम दल की नीतियों का विरोध करते थे।

इसी समय मद्रास प्रांत में लार्ड ऐम्टहिल के स्थान पर आर्थर लाले गवर्नर नियुक्त हुए। उन्होने लार्ड ऐम्टहिल की न्याययुक्त शासन नीति त्याग कर दमन की नीति अपनाई और बगावत के अपराध में अनेक देशभक्तों को जेल में ठूस दिया | कस्तूरी रंगा अय्यंगार के पत्र “हिंदू” ने साहस के साथ इस नीति की कड़ी आलोचना की और जनता का पूरा साथ दिया। इन राजनीतिक मुसीबतों के बीच मद्रास पर एक और आर्थिक संकट भी आ टूटा। यह एक बड़े अंग्रेज़ व्यवसायी और बैंकर सर जार्ज आरबैधनाट का “दिवाला कांड” था। कर्तरी रंगा अव्यंगार ने इस मामले की खोज की और सच्चा विवरण “हिंदू” में प्रकाशित किया। फलतः सर जार्ज अपराधी ठहराए गए और अदालत से उन्हे सजा हुई। इसका एक शुभ परिणाम यह भी हुआ कि भारतीय बैंक-उद्योग की नींव पड़ी और मद्रास में “इंडियन बैंक” स्थापित हो गया।

मद्रास के नए गवर्नर सरकारी सहायता तथा प्रोत्साहन के द्वारा व्यवसाय का विकास तो करना चाहते थे, किंतु स्वदेशी की नीव भावना और आर्थिक असहयोग के कट्टर शत्रु थे। उनकी इस नीति तथा अनेक अन्यायपूर्ण कथनों का “हिंदू” में विरोध किया गया। इस तरह धीरे-धीरे “हिंदू” जनता का प्रिय एवं विश्वस्त पत्र बन गया। उन्हीं दिनों, जब स्वदेशी “स्टीम नेवीगेशन कंपनी” के नाम से एक जहाज चलाने वाली भारतीय संस्था स्थापित हुई और उसके कारण विदेशी ब्रिटिश कंपनियां कठिनाई अनुभव करने लगी, तब अधिकारी वर्ग ने विदेशी व्यवसाय की अनुचित सहायता की। फलतः तूतीकोरिन में घोर राजनीतिक संकट उपस्थित हो गया। बलवे हुए और उन्हें कुचलने के लिए सरकारी अफसरों ने अंधाधुध पकड़ करने के साथ-साथ गोली चलवाई। इससे जनता भयभीत हो उठी। इस समय भी “हिन्दू” पत्र ने सरकारी नीति की निंदा की तथा अत्याचारी अफसरों को दोषी बताया। “हिन्दू” के इस साहसपूर्ण कार्य का लोगों पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा। सरकार ने क्रोध में आकर पत्र के विरुद्ध मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी | किंतु किसी कारणवश ऐसा नहीं हुआ।

कस्तूरी रंगा अय्यंगार को विवश होकर अक्सर मद्रास सरकार का विरोध करना पड़ता था। मिंटो-मारले योजना में भारत के लोगों को कुछ अधिकार देने की योजना थी। इस उद्देश्य को पूरा न होने देने की भावना से जब प्रांतीय सरकार ने षडयंत्र आरंभ किए, तब उनको लोगों के सामने प्रकट करना कस्तूरी रंगा अय्यंगार ने अपना कर्तव्य समझा। कई जिलों में सहसा मालगुजारी बढ़ा देना, विद्यार्थियों को आतंकित करना, भारतीय आई सी.एस.अफसरों के साथ अन्याय बरतना आदि ऐसी ही कुचालें थी। उन्हें चुपचाप सहन कर सकना एक सच्चे देशभक्त के लिए नितांत असंभव था। अतः उन्होंने खुल कर सार्वजनिक हितों के लिए मद्रास की अँग्रेजी सरकार से संघर्ष किया। “हिंदू” की आर्थिक व्यवस्था भी १९१० तक काफी संतोषजनक हो गई।


कस्तूरी रंगा अय्यंगार और उनके पुत्र ने सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्रों में भी देश की बड़ी सेवा की। उस समय थियोसोफिकल सोसायटी के कार्यों में कुछ ऐसी रंगत दिखाई पड़ने लगी जिसके कारण हिंदुओं में एक हलचल-सी मच गई। इस समय डा. नैयर और डा. नंजुंदा राव के आग्रह पर “हिंदू” ने इसका विरोध किया और सोसायटी तथा उसके भक्तों की ओर से उस पर दो दीवानी तथा दो फौजदारी मुकदमे चलाए गए। अंत में फौजदारी के दोनों मुकदमों में “हिंदू” की जीत हुई और श्रीमती एनी बेसेंट तथा कस्तूरी रंगा अय्यंगार में समझौता हो जाने के कारण शेष दोनों मुकदमे वापस ले लिए गए।

श्रीमती बेसेंट के राजनीतिक क्षेत्र में आने और होमरूल (स्वराज्य) आंदोलन द्वारा देश की सेवा करने का वास्तविक कारण यही मुकदमेबाजी थी। कस्तूरी रंगा अय्यंगार के उग्र स्वभाव का एक उदाहरण १९११ के दिल्ली दरबार में सम्मिलित न होने का उनका निर्णय था। उनका कहना था कि जब तक यूरोपीय पत्रों और भारतीय पत्रों के बीच भेदभाव समाप्त नही कर दिया जाता, जब तक मैं इस दरबार में भाग नहीं ले सकता। इसी प्रकार सार्वजनिक सेवाओं के संबंध में इस्लिंगटन कमीशन के सामने कस्तूरी रंगा अय्यंगार ने जो जबानी और लिखित बयान दिए, वे उनकी विद्वत्ता, ऊंची सूझ-बूझ और निर्भीक देशभक्ति के उदाहरण है।

१९१४ में महायुद्ध छिड़ जाने के कारण सारे भारतीय समाचार-पत्रों को एक भयंकर स्थिति का सामना करना पड़ा। फिर भी “हिंदू” ने जिस योग्यता के साथ अपने कर्तव्य का पालन किया, उसकी जनता और सरकार, दोनों ने सराहना की। सरकार ने युद्धकालीन आवश्यकता, बगावत तथा असंतोष के दमन के नाम पर स्वतंत्रता के आंदोलन और राष्ट्रीय प्रयत्नों को दबाने के जिन हथकंडों का उपयोग किया, उनका “हिंदू” ने डट कर मुकाबला किया। जब श्रीमती बेसेंट को नजरबंद कर लिया गया, तब कस्तूरी रंगा अय्यंगार मैदान में आए और राजनीतिक आंदोलन में सक्रिय भाग लेने लगे। इन सबके परिणामस्वरूप १९१७ में ब्रिटिश सरकार ने भारत में धीरे-धीरे प्रतिनिधि शासन कायम करने की घोषणा की, जिसका कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन ने स्वागत किया। इस घोषणा के अनुसार भारत के शासन में भारतीयों को अधिक हिंस्सा देने के बारे में जांच करने के लिए भारत-मंत्री मांटेगू और वाइसराय लार्ड चेम्सफोर्ड की कमेटी बनी। फलतः प्रधानमंत्री और वाइसराय जब मद्रास आए तब उन्होंने कस्तूरी रंगा अय्यंगार और “स्वदेशमित्रम्” के संपादक रंगास्वामी अय्यंगार को अपने विचार व्यक्त करने के लिए बुलाया।

१९१८ महायुद्ध के दौरान बिट्रिश सरकार ने इंग्लैंड तथा रणक्षेत्रो का दौरा करने के लिए भारतीय समाचार-पत्रों के एक प्रतिनिधि मंडल को आमंत्रित किया। कस्तूरी रंगा अय्यंगार इस मंडल के नेता थे। उस समय उनका स्वास्थ्य बड़ा खराब था, फिर भी उन्होंने निमंत्रण स्वीकार कर लिया और दौरे पर चले गए, लेकिन १९१९ की जनवरी में जब वह भारत लौटे, तो उन्होंने देखा कि ब्रिटिश अधिकारी बजाय भारतीय जनता को अधिकार देने के उसका दमन कर रहे हैं। रोलट एक्ट, सत्याग्रह आंदोलन तथा जलियांवाला बाग का हत्याकांड उसी समय के परिचायक हैं।

कस्तूरी रंगा अय्यंगार जिस बात को सही समझते थे, उसका दृढ़ता से समर्थन करते थे और जिसे गलत समझते थे उसका उतना ही तीव्र विरोध करते थे। १९२० के असहयोग आंदोलन के समय उन्होंने बच्चों को स्कूलों से हटाने और वकीलों के वकालत छोड़ देने की गांधीजी की नीति का विरोध किया था, लेकिन १९२० की नागपुर कांग्रेस में जो नया निश्चय किया गया, कस्तूरी रंगा अय्यंगार ने उसका समर्थन किया। इतना ही नही, प्रिंस ऑफ वेल्स के मद्रास आगमन पर उनके विरुद्ध हड़ताल में भी उन्होंने सक्रिय भाग लिया।


कस्तूरी रंगा अय्यंगार की मृत्यु


गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद जब कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के देशव्यापी संगठन के लिए एक समिति नियुक्त की, तब कस्तूरी रंगा अय्यंगार को भी उसका सदस्य मनोनीत किया गया। उस समय कस्तूरी रंगा अय्यंगार एक फोड़े के आपरेशन के कारण बहुत निर्बल थे | फिर भी उस हालत में, उन्होंने देश का दौरा किया और रिपोर्ट पूरी हो जाने पर उस पर हस्ताक्षर किए। यही उनकी अंतिम देश-सेवा थी। लंबे दौरे के कारण शीघ्र ही वह खाट पर पड़ गए और १२ दिसंबर १९२३ को चेन्नई मे इस संसार से विदा हो गए।

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