सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय | Sayajirao Gaekwad 3


सन् १८७५ के मई महीने की २२ तारीख को सुबह तड़के-तड़के नासिक जिले के पुलिस वालों के एक दल ने अचानक क्वलाणा गांव को घेर लिया और डुग्गी पिटवा दी कि हर घर के मर्द लोग एक जगह इकट्ठे हो जाएं। जब सब लोग कुछ डरे-डरे इकट्ठे हो गए तो उनसे पूछा गया कि क्या कोई गायकवाड़ खानदान के मराठे हैं? इसके बाद एकमात्र गायकवाड़ परिवार को अलग करके और सब को अपने-अपने घर चले जाने दिया गया और फिर उस साधारण किसान परिवार के काशीराव और उनके तीन पुत्रों को नासिक शहर चले जाने का आदेश दिया गया। नासिक के अंग्रेज पुलिस कप्तान और जिलाधीश ने उस परिवार के पुराने इतिहास की जांच-पड़ताल की और फिर उन चारों बाप-बेटों को बड़ौदा ले गए, जहां दो-चार और गायकवाड़ मराठे युवक मौजूद थे। कई अंग्रेज़ अधिकारी इन सब की जांच-पड़ताल कर रहे थे। अंत में क्वलाणा के तीनों लड़कों में से बीच के बारह वर्षीय गोपालराव को, जिसका जन्म ११ मार्च १८६३ को हुआ था, सबसे अलग करके बताया गया कि बड़ौदा राज्य के महाराज मल्हाराव गद्दी से हटा दिगा गया है उसके स्थान पर गोपालराय को महाराजा बनाया जाएगा। २७ मई को गोपालराय को मल्हाराव की विधवा महरानी जमना बाई ने गोद ले लिया, जिसके बाद उन्हें राजगद्दी पर बैठाया गया |

इस प्रकार एक अत्यंत साधारण किसान परिवार का बालक गोपालराव बड़ौदा राज्य का राजा सयाजीराव गायकवाड़ (तृतीय) हो गया। इसी नाम के दो और गायकवाड़ महाराजा पहले हो चुके थे। अंग्रेज़ी राज्य कायम होते समय तो देश भर में छोटे-बड़े न जाने कितने राजा थे, लेकिन १८५७ में हुई आजादी की लड़ाई के बाद बस वही राजे-महाराजे रह सके जिन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया था, उनके पिट्ठू थे और जिन्हें अपने राज्य की जनता के सुख-दुख की कोई चिंता न थी।


लेकिन सयाजी राव तृतीय ने जिस दिन से अनुभव किया कि वह महाराजा हैं, उसी दिन से तय कर लिया कि वह उन सभी कर्तव्यों को सच्चे हृदय से निभाएंगे, जो किसी भी राजा के लिए आवश्यक होते हैं। वह एक क्षण के लिए भी यह नहीं भूल पाते थे कि वह स्वयं मामूली किसान परिवार के शासक है और राज्य का अर्थ इन्हीं किसानों का जनसमूह है। उन्होंने अपनी डायरी और अनेक मित्रों को व्यक्तिगत पत्रों में लिखा था कि मुझे अक्सर यह राजमहल काटने लगता है क्योंकि मुझे चौबीस घंटे याद रखना पड़ता है कि मैं मामूली आदमी नहीं, महाराजा हूं। सयाजी राव गायकवाड़ महाराजा बनकर लोकप्रिय राजा बनना चाहते थे। यही कारण था कि १८८१ में ज्योंही वह बालिंग घोषित किए गए और शासन की पूरी बागडोर उनके हाथों में आई, त्योंही उन्होंने तय किया कि वह राजमहल से बाहर आकर अपने राज्य के गांव-गांव का दौरा करेंगे। लोगों के घर जाते समय वह अपने साथ सिर्फ दो-चार अधिकारी-कर्मचारी ही ले जाते थे, क्योंकि बड़ा दल ले जाने से साधारण लोग खुलकर अपनी बात नहीं कह पाते थे।

धीरे-धीरे सयाजी राव गायकवाड़ की देख-रेख में बड़ौदा राज्य का भारत के राज्यों में एक विशिष्ट स्थान बन गया था । राजगद्दी पर बैठने से पहले उनकी कोई शिक्षा नहीं हुई थी। इसलिए पढ़ाई की शुरूआत-मराठी, गुजराती, उर्दू और अंग्रेज़ी इन चार भाषाओं में एक साथ हुई। वह दिन में दस-दस, बारह-बारह घंटे पढ़ते थे और पढ़ने से कहीं अधिक सोचते थे । सोचते यह थे कि बिना किसी योग्यता के राजा तो बन गया, अब दुनिया के सामने यह कैसे सिद्ध करूं कि मैं वास्तव में इसके योग्य हूं।

सबसे पहले उन्होंने यह निश्चय किया कि मैं अंग्रेजों के इशारे पर चलने वाली उनके हाथों की कठपुतली नहीं बनूंगा। दूसरे, अपने राज्य के विकास के लिए उन्होंने विश्व के अन्य उन्नत देशों का आदर्श सामने रखा। तीसरे,आम लोगों की उन्नति को उन्होंने राज्य की उन्नति का आधार माना। सयाजी राव गायकवाड़ अपनी सीमाओं और कमजोरियों को जानते थे, इसलिए उन्होंने अंग्रेजों से खुली लड़ाई तो मोल नहीं ली, पर उन्हें अपने कामों में बेजा दखल भी नहीं देने दिया। सयाजी राव को विदेश घूमने और हर देश से कुछ-न-कुछ सीख कर वैसा ही अपने यहां करने का बहुत शौक था। अपनी तंदुरुस्ती और इलाज के लिए भी उन्हें अनेक बार विदेशों की यात्रा करनी पड़ी। ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि देशी राज्यों के राजा बिना वाइसराय की मंजूरी के विदेश न जाएं, लेकिन उन्होंने कभी इजाजत मांगना जरूरी नहीं समझा।

इस शताब्दी के आरंभ में जब देश के स्वाधीनता आंदोलन ने जोर पकड़ा और क्रांतिकारियों की हलचलों से अंग्रेज़ी सरकार परेशान होने लगी तो सरकार ने “इंपीरियल सर्विस” (शाही सेना) बनाई, जिसमें सभी देशी राजा-महाराजा लोग शामिल हुए थे, लेकिन बड़ौदा नरेश ने इसमें शामिल होने से इंकार कर दिया। इस पर वाइसराय लार्ड कर्जन बहुत नाराज हुए। उनके पूरे शासन काल में जितने भी अंग्रेज़ रेजीडेंट रखे गए, सभी से उनकी खटपट हुई, क्योंकि वह किसी को अपने राज्य के कामो में दखल नही देने देते थे। अंग्रेज़ सरकार से मंजूरी लिए बिना ही उन्होंने पूरे बड़ौदा राज्य में रेलों का जाल बिछा दिया, ताकि राज्य का हर इलाका एक-दूसरे से जुड़ा रहे। अपने राज्य की सेना के बारे में भी उन्होंने ब्रिटिश सरकार के कायदे-कानूनों की कोई परवाह न की। महाराजा ने इस बात का हमेशा विरोध किया कि ब्रिटिश सरकार यह तय करे कि राज्य की सेना कितनी बड़ी हो और उसे किस-किस प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित किया जाए। उन्होंने सरकार की राय के बिना भारतीय सेना में अवकाश प्राप्त सैनिकों को अपने यहां नौकरी दी।

एकाध बार तो उन्होंने विदेशों से भी सैनिक अधिकारियों को आमंत्रित किया कि वह बड़ौदा आकर सेना को ट्रेनिंग दें। उन्होंने अपने राज्य में ऐसे न जाने कितने लोगों को आश्रय दिया, जो भारत में अंग्रेज़ी हुकूमत के विरोधी थे, राष्ट्रीय कार्यकर्ता थे क्रांतिकारी थे। ऐसे लोगों में अरविंद घोष, महाराष्ट्र के राष्ट्रीय स्कूलों के आंदोलन के नेता के.जी. देशपांडे, संत निहाल सिंह, वीर सावरकर के घनिष्ठ मित्र शंकर पी. बाघ आदि थे।

विदेशों में भी उन्होंने अनेक ब्रिटिश-विरोधी क्रांतिकारी नेताओं से दोस्ती की, जिनमें श्रीमती कामा, श्यामजी कृष्ण वर्मा, वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, जफर अली खां आदि के नाम प्रमुख है। अन्य देशी राज्यों से भिन्न बड़ौदा राज्य ने अपने यहां विस्फोटक पदार्थों और समाचार पत्रों आदि के विरुद्ध नये कानून बनाने या पुरानों को कड़ा करने से भी इंकार कर दिया। महाराजा ने राजद्रोह संबंधी भाषणों पर भी कड़े प्रतिबंध नहीं लगाए। वह ब्रिटिश सम्राट के प्रति स्वामिभक्ति स्वीकार करने के लिए तैयार थे, लेकिन भारत में ब्रिटिश सरकार के प्रतिं नहीं। वह स्वयं को स्वतंत्र राजा मानते थे न कि भारत सरकार के अधीन।

इन तमाम बातों ने अंग्रेज़ सरकार को उनके बहुत खिलाफ कर दिया था। एक बार भारत की ब्रिटिश सरकार ने लंदन में भारत मंत्री को लिखा था, कि बड़ौदा ब्रिटिश विरोधी आंदोलन का गढ़ बन गया है और इसे कुचलने के लिए यहां के महाराजा को कुचलना होगा। महाराजा सयाजी राव गायकवाड़ को अपने देश और भारतीय संस्कृति पर अभिमान था, पर वह दूसरे देशों की अच्छाइयों के भी प्रशंसक थे | वह अपनी संस्कृति को रक्षा के साथ-साथ दूसरों से भी अच्छी बातें सीखना चाहते थे। वह आदर्शवादी भी थे और यथार्थवादी भी। वह पूर्वी तथा पश्चिमी संस्कृतियों के समन्वय के पक्ष में थे, इसीलिए उन्होंने शासन सुधारों में शिक्षा पर सबसे अधिक जोर दिया। उन्होंने देश में निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा सबसे पहले शुरू की थी। लड़कियों की शिक्षा का तो श्रीगणेश ही उन्होंने किया था। उनका कहना था कि जनता को आरंभिक शिक्षा दो, आगे वह स्वयं ही और मांगेगी और एक बार जब यह मांग होने लगेगी तो उसे सही दिशा में ले जाना आसान होगा। प्रारंभिक शिक्षा के बाद की शिक्षा में वह खेती, व्यापार और उद्योग-धंधों की शिक्षा पर अधिक जोर देते थे। इन सबकी शिक्षा छात्रों को अपनी मातृभाषा में ही दी जानी चाहिए और आगे चलकर छात्रों को विदेश अवश्य भेजना चाहिए ताकि वे सीख सकें कि अपने यहां किस प्रकार नए-नए उद्योग धंधे खोले और चलाए जाएं।

इस प्रकार की बहुमुखी शिक्षा के प्रयोग के लिए ही उन्होंने १८९० में “कला भवन” की स्थापना की थी | जिसमें साहित्य, कला आदि के अलावा इंजीनियरिंग, छपाई, कपड़े बनाने आदि का काम भी सिखाया जाता है। यह अपने ढंग की अनोखी संस्था थी। बडौदा के निकट उन्होंने रेलों का एक बहुत बड़ा कारखाना भी खोला जिसमें चीफ इंजीनियर के अलावा सभी भारतीय कर्मचारी काम करते थे और जहां कुछ चीजों को छोड़कर रेलों की सारी चीजें बनती थीं। बिंजली की सप्लाई भी इससे काफी दूर-दूर के इलाको तक की जाती थी।

युनान की प्रथा भी उन्होंने देश में सबसे पहले शुरू की। वह चाहते थे कि जनता शासन स्वयं शासन करे, इसीलिए सबसे नीचे पंचायतें, उनके ऊपर जिला परिषदें और उनके ऊपर धारा सभा की स्थापना की गई। इन सभी नें जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की संख्या धीरे-धीरे बराबर बढती गई। न्याय विभाग के और प्रशासन विभाग के कर्मचारी एक ही न होकर अलग अलग व्यक्ति हों, यह व्यवस्था भी सबसे पहले उन्होंने ही की थी। मार्मिक मामलों में वह पूरी तरह से समन्वयतादी थे अंध-विश्वास और रूढिवादी कर्मकांडों से उनका कड़ा विरोध था। उन्होंने सभी मर्मों के लिए लाखों रुपया दिया। अछूतों के उत्थान के लिए उन्होंने अथक कोशिशें की, ऐसे भोज किए जिनमें राव एक साथ बैठ कर खाए और वह स्वयं भी उनमें भाग लेते थे। जात-पात के वह घोर विरोधी थे। अछूतों को सब स्कूलों में पढ़ने की और विवाह को उन्होंने प्रोत्साहन दिया। साथ ही कानून बनाया कि १६ वर्ष की उम्र से कम के लड़के और १२ वर्ष से कम की लड़की की शादी नहीं हो सकती। अपने शिक्षा प्रेम के कारण ही महाराजा सयाजी राव गायकवाड़ १९२४ में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति चुने गए। स्त्रियो को पर्दे में रखने के भी वह विरुद्ध थे। यही नहीं, स्त्रियो के उत्थान के लिए उन्होंने “सयाजी विहार” नामक क्लब को महिलाओं के लिए भी खोल दिया था। उस समय स्त्रियो का क्लब में जाना कोई सोच नहीं सकता था। साहित्य से उन्हें अनुराग था। उनको १९३२ में कोल्हापुर में हुए महाराष्ट्र साहित्य सम्मेलन का अध्यक्ष बनाया गया। अगले वर्ष उन्होने बड़ौदा में प्राच्य विद्या परिषद के सातवें अधिवेशन का उदघाटन किया। १९३४ में उन्होंने दिल्ली में अखिल भारतीय सम्मेलन की अध्यक्षता की थी।

भारत में ही नहीं अन्य देशों में भी ऐसा कोई बिरला ही महाराजा होगा जो अत्यंत अशिक्षित किसान परिवार में पैदा होकर इतना अधिक प्रतिभाशाली और योग्य सिद्ध हो और इतने अधिक समय तक शासन करे। अक्तूबर १९३८ में अपनी अंतिम यूरोपीय यात्रा से लौटते समय वह जहाज पर बीमार पड़े तो फिर सम्हल नही सके और ६ फरवरी १९३९ को उनका देहावसान हो गया।

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