स्वामी श्रद्धानंद | Swami Shraddhanand


महर्षि दयानंद और उनके अमूल्य ग्रंथ “सत्यार्थप्रकाश” ने जिन महापुरुषों का निर्माण किया, उनमें स्वामी श्रद्धानंद प्रमुख थे।


अनुक्रम (Index)[छुपाएँ]

स्वामी श्रद्धानंद का जीवन परिचय

स्वामी श्रद्धानंद का जन्म

स्वामी श्रद्धानंद का व्यक्तित्व

स्वामी श्रद्धानंद का विवाह

स्वामी श्रद्धानंद का आर्य समाज की ओर झुकाव

स्वामी श्रद्धानंद का वकालत की शिक्षा

सतधर्म प्रचारक का सम्पादन

स्वामी श्रद्धानंद द्वारा स्वामी दयानंद के सपने को पूरा करना

स्वामी श्रद्धानंद द्वारा गुरुकुल की स्थापना

श्रद्धानंद बलिदान भवन

स्वामी श्रद्धानंद के द्वारा कांग्रेस छोड़ना

स्वामी श्रद्धानंद की मृत्यु

FAQ`s


स्वामी श्रद्धानंद का जन्म


स्वामी श्रद्धानंद के बचपन का नाम मुंशीराम था। वह पंजाब के जालंधर जिले में तलवन नाम के गांव में खत्री परिवार में २२ फरवरी १८५७ में पैदा हुए थे। उनके पिता लाला नानकचंद संयुक्त प्रांत में, जिसे अब उत्तर प्रदेश कहते हैं, पुलिस सुपरिटेंडेंट के पद पर थे। नौकरी से पेंशन लेकर उन्होंने तलवन में मकान और मंदिर आदि बनवाए। उन्हें तुलसीदास की रामायण से बड़ा अनुराग था। मुंशीराम की माता भी बड़ी धार्मिक और उदार प्रवृत्ति की थीं। घर में सनातन धर्म माना जाता था और मूर्ति-पूजा होती थी। इस प्रकार मुंशीराम का जन्म एक राजभक्त और सनातनी परिवार में हुआ था, पर अपने जीवन में वह विद्रोही और आर्यसमाज के स्तंभ के रूप में देश के सामने आए। उन्होंने लगभग तीस वर्ष तक समाज की निरंतर सेवा की।


स्वामी श्रद्धानंद का व्यक्तित्व


मुंशीराम का व्यक्तित्व बड़ा भव्य था। उनका रंग गोरा, कद लंबा और काठी मजबूत थी। उनकी चाल-ढाल और वाणी में ओज था। उनकी आंखें चमकदार थीं, जिनमें गहराई और आत्म-विश्वास झलकता था। उनको देखने के बाद उनसे प्रभावित हुए बिना रह सकना कठिन था। दलित और दुखी लोगों से वह बहुत प्रेम करते थे। उनके लिए मुंशीराम का हृदय सहज ही परसीज जाता था, पर जहा उनका हृदय गरीबों के लिए इतना कोमल था वहां अत्याचारियों के लिए उतना ही कठोर भी था | अन्याय का वह डटकर मुकाबला करते थे।


स्वामी श्रद्धानंद का विवाह


लगभग बीस वर्ष की आयु में उनका विवाह शिवादेवी से हो गया, इसके अगले वर्ष उन्होंने इलाहाबाद में कॉलेज में प्रवेश किया। शीघ्र ही पढ़ाई छोड़ कर तेईस वर्ष की आयु में नायब तहसीलदार बन गए। वह अंग्रेज़ी राज का जमाना था, जिसमें भारतीयों को पग-पग पर इस बात का अनुभव होता था कि वे गुलाम है और अंग्रेज़ जाति शासक जाति है। मुंशीराम को भी इसका बड़ा कटु अनुभव हुआ। एक बार वह कमिश्नर से मिलने गए। कमिश्नर महोदय ने उन्हें बड़ी देर तक बाहर बैठा रखा और इसी बीच बाद में आने वाले अंग्रेजों से मुलाकात जारी रखी। स्वाभिमानी मुंशीराम को यह बात बहुत बुरी लगी। वह कमिश्नर से भेंट किए बिना ही चले आए और उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। यह उनका पहला खुला विद्रोह था।

मुंशीराम नौकरी छोड़ कर अपने पिता के पास रहने लगे। तब उनका पूर्ण यौवनकाल था। उनके पास रूप था। नगर में पिता की धाक थी। मुशीराम बुरी संगत में पड़ गए। उन्होंने सिगरेट और शराब पीना शुरू कर दिया और ऐशोआराम में डूब गए। तभी उन पर महर्षि दयानंद का प्रभाव पड़ा। उनके प्रभाव के कारण वह मोह निद्रा से जागे।


स्वामी श्रद्धानंद का आर्य समाज की ओर झुकाव


मुंशीराम के जीवन ने नया मोड़ लिया। धार्मिक पोंगापंथियों से उन्हें पहले ही अरुचि हो चुकी थी। मंदिरों के पूजा-पाठ में उन्हें दिखावे की ही प्रधानता दिखाई दी थी, एक बार जब वह दर्शन करने के लिए मंदिर गए तो उन्हें यह कह कर रोक लिया गया कि जब तक रानी साहिबा, जो उस समय मंदिर में गई हुई थी, बाहर न आ जाएं तब तक कोई अंदर नहीं जा सकता। इस पर मुंशीराम को बड़ा आघात पहुंचा। वह सोचने लगे कि भगवान के मंदिर में ऊंच-नीच का भेदभाव कैसा? फल यह हुआ कि पुराने या सनातन धर्म में उनकी आस्था टूट गई। महर्षि दयानंद के प्रभाव से वह आर्य समाज की ओर खिंचने लगे।


स्वामी श्रद्धानंद का वकालत की शिक्षा


उन्होंने अपने जीवन को सेवाकार्य में लगाने का निश्चय कर लिया। उन्होंने कानून की परीक्षा पास की और जालंधर में वकालत करने लगे। इस समय उनकी आयु लगभग छब्बीस वर्ष की थी। वकालत में उन्हें काफी सफलता मिली और उनकी गणना जिले के प्रतिष्ठित लोगों में होने लगी। मुंशीराम का यह स्वभाव था कि वह जो भी काम करते थे पूरी लगन से करते थे। जिस समय वह मौज-मस्ती के फेर में थे, उन दिनों वह पूरी तरह उसी में डूब गए थे। जब वह वकालत करने लगे तो उन की सारी शक्ति उसी में लगने लगी। इधर पंजाब में आर्य समाज का नया-नया जोर शुरू हुआ था और मुंशीराम का सारा ध्यान अब उसी दिशा में लगने लगा। परिणाम यह हुआ कि धीरे- धीरे, आर्य समाज के संदेश का प्रचार उनका मुख्य काम हो गया और वकालत दूसरा ।



सतधर्म प्रचारक का सम्पादन


मुशीराम ने आर्य समाज के पत्र “सतधर्म प्रचारक” का संपादन किया। इसके अलावा उन्होंने जालंधर में कन्या महाविद्यालय की स्थापना कराई। इन सब कार्यों से मुंशीराम की ख्याति दिनों-दिन फैलने लगी और उनका नाम पंजाब से बाहर भी प्रसिद्ध हो चला। अब मुशीराम का ध्यान स्वामी दयानंद का सबसे बड़ा सपना पूरा करने की ओर गया।


स्वामी श्रद्धानंद द्वारा स्वामी दयानंद के सपने को पूरा करना


स्वामी दयानंद का सबसे बड़ा सपना देश में राष्ट्रीय शिक्षा के पुनरुद्वार के लिए “गुरुकुल” की स्थापना करने का था। वह राष्ट्र का निर्माण नए सिरे से करना चाहते थे। वह बच्चों को राष्ट्र की बुनियाद मानते थे, क्योंकि वही आगे चलकर राष्ट्र के नागरिक बनते हैं। इसलिए वह चाहते थे कि नगरों की विषेली वायु से दूर प्रकृति की गोद में प्राचीन ऋषियों के आश्रमों की तरह गुरुकुल हो, जहां से चरित्रवान नवयुवक निकलें। महर्षि दयानंद यह सपना पूरा नहीं कर पाए थे। उसे पूरा करने का बीड़ा मुंशीराम ने उठाया। इस कार्य के लिए वह घर से निकल पड़े। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि गुरुकुल की स्थापना के लिए तीस हजार रुपये एकत्र करके ही घर लौटूंगा। उनके घर से निकलने के साथ ही उनकी वकालत सदा के लिए छूट गई।


स्वामी श्रद्धानंद द्वारा गुरुकुल की स्थापना


फिर जब गुरुकुल की स्थापना के लिए उन्हें हरिद्वार के पास कांगड़ी नाम का गांव मिल गया तो उन्होंने अपना घर भी छोड़ दिया और वहीं जाकर रहने लगे। १९०२ में तीस ब्रह्मचारी विद्यार्थियों के साथ गुरुकुल का आरंभ हुआ। गुरुकुल में सात-आठ वर्ष की आयु के बालक लिए जाते थे, चौदह वर्ष का पाठ्यक्रम रहता था। दस वर्ष तक स्कूल की पढ़ाई चलती थी, चार वर्ष का महाविद्यालय का पाठ्यक्रम होता था महाविद्यालय की शिक्षा तीन भागों में बांटी गई - वेद महाविद्यालय, कला महाविद्यालय, और आयुर्वेद महाविद्यालय।

गुरुकुल के विद्यार्थी सीधा-सादा जीवन व्यतीत करते थे और ब्रह्मचर्य का पालन करते थे। वह प्रातःकाल और सांयकाल हवन और संध्या में भाग लेते। गुरुकुल में त्याग, कर्तव्य-निर्वाह और आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया जाता और पाश्चात्य विद्याविज्ञान तथा संस्कृति की अच्छी बातें अपना कर भारतीय संस्कृति के विकास की ओर ध्यान दिया जाता।

गांधीजी कहा करते थे कि गुरुकुल भारत को आर्य समाज की सबसे बड़ी देन है। गुरुकुल के अधिष्ठाता के रूप में मुंशीराम जी ने बड़ी स्वस्थ परंपराओं की नींव डाली। गुरुकुल की शिक्षा प्रणाली एकदम राष्ट्रीय और स्वतंत्र थी। अंग्रेजी शासन के शिक्षा विभाग का उस पर कोई नियंत्रण न था।

पंद्रह वर्ष तक मुंशीराम जी गुरुकुल के मुख्याधिष्ठाता रहे। वह हर रोज सवेरे साढ़े तीन बजे उठते, व्यायाम करते, ठंडे जल से स्नान करते और गायत्री-पाठ करते। इसके बाद वह दैनिक कर्म में मस्त हो जाते। जब उन्हें यह विश्वास हो गया कि गुरुकुल की व्यवस्था सुचारु रूप से चलने लगी है तो उन्होंने १९१७ मे संन्यास ले लिया। तभी से वह “स्वामी श्रद्धानंद” कहलाने लगे। उनका यह नाम इतना प्रसिद्ध हुआ कि लोग उनके नाम मुशीराम को भूल गए।

संन्यास लेने के साथ ही स्वामी श्रद्धानंद ने गुरुकुल छोड़ दिया और दिल्ली आकर रहने लगे।


श्रद्धानंद बलिदान भवन


दिल्ली के प्रसिद्ध नया बाजार में, जो अब श्रद्धानंद बाजार के नाम से भी मशहूर है, सेठ रग्घुमल लोहिया के दो मकान थे। इनमें से एक मकान की पहली मंजिल उन्होंने स्वामी जी को आश्रम बनाने के लिए दान कर दी थी। अपने जीवन के बाकी दिन स्वामी श्रद्धानंद ने इसी जगह गुजारे। इसी मकान में उनकी जीवन लीला समाप्त हुई और अब यह “श्रद्धानंद बलिदान भवन” के नाम से प्रसिद्ध है।


स्वामी श्रद्धानंद के द्वारा कांग्रेस छोड़ना


दो वर्ष तक स्वामी श्रद्धानंद दलितोद्धार आंदोलन में लगे रहे। उन दिनों यूरोप में पहला महायुद्ध चल रहा था। ब्रिटेन ने भारत को स्वराज्य देने का वायदा किया था लेकिन महायुद्ध समाप्त होने के बाद स्वराज्य के बजाय अंग्रेजों ने भारतीयों के दमन के लिए रोलट एक्ट बनाया। महात्मा गांधी ने इस एक्ट का विरोध करने के लिए सत्याग्रह छेड़ दिया। स्वामी जी भी सत्याग्रह में कूद पड़े। ३० मार्च १९१९ को लगभग चालीस हजार की भीड़ के सामने उन्होंने गोरखा सैनिकों की संगीनों के आगे अपना सीना अडा दिया। बड़े ऊंचे स्वर में उन्होंने कहा – “लो मार दो।“ और वह वहीं खड़े रहे। उनके गंभीर स्वर को सुनकर गोरखों की संगीने वहीं की वहीं रुक गई।

सत्याग्रह यद्यपि शांतिपूर्वक चलाया गया था किंतु फिर भी कुछ हिंदू और मुसलमान लोग पुलिस और फौज की गोलियों के शिकार हुए। दोनों का लहू बहकर मिल गया और हिंदू-मुसलमान का भेद मानों मिट गया। नतीजा यह हुआ कि पांच दिन बाद मुसलमानों ने स्वामी श्रद्धानंद को जामा मस्जिद की सीढ़ियोँ से व्याख्यान देने को बुलाया। शायद भारत के ही नहीं इस्लाम के इतिहास में इस तरह का यह पहला मौका था। उसी वर्ष स्वामी श्रद्धानंद को अमृतसर में कांग्रेस अधिवेशन की स्वागत समिति का अध्यक्ष बनाया गया।

स्वामी श्रद्धानंद ने १९२३ में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। वह कहते थे कि कांग्रेस, हिंदू सभा, खिलाफत और दूसरी अखिल भारतीय संस्थाओं को चलाने के लिए बड़े-बड़े व्यक्ति मौजूद है, मैं ब्रह्मचर्य और दलित जातियों के उद्धार के लिए काम करूंगा |


स्वामी श्रद्धानंद की मृत्यु


इन्हीं दिनों आगरा जिले में मुसलमानों की शुद्धि का आंदोलन चल रहा था। अधिकतर वे हिंदू थे, जो पहले किसी कारण मुसलमान बन गए थे और अब अपने प्राचीन धर्म में वापस आना चाहते थे | स्वामी श्रद्धानंद हिंदू धर्म का दरवाजा सबके लिए खोल देना चाहते थे, अत: स्वामी श्रद्धानंद शुद्धि के प्रधान चुन लिए गए। स्वामी जी शुद्धि कार्य में पूरी शक्ति से जुट गए। स्वामी जी ने सिंध की एक शिक्षित मुसलमान महिला असगरी बेगम को उसके ही कहने पर हिंदू बना लिया। कट्टर मुसलमान उनके शुद्धि आंदोलन से पहले से ही चिढ़े हुए थे और अब भभक उठे। नतीजा यह हुआ की अब्दुल रशीद नाम के एक अधेड व्यक्ति ने २३ दिसंबर १९२६ के दिन नया बाजार में उनके आश्रम में घुसकर उनकी हत्या कर डाली। स्वामी जी उन दिनों निमोनिया से उठे थे और इलाज अभी जारी था। इस तरह भारत के इस सपूत ने वीर गति पाई।


FAQ`s


Questation : स्वामी श्रद्धानंद जी को किसने गोली मारी?

Answer : स्वामी जी ने सिंध की एक शिक्षित मुसलमान महिला असगरी बेगम को उसके ही कहने पर हिंदू बना लिया। कट्टर मुसलमान उनके शुद्धि आंदोलन से पहले से ही चिढ़े हुए थे और अब भभक उठे। नतीजा यह हुआ की अब्दुल रशीद नाम के एक अधेड व्यक्ति ने २३ दिसंबर १९२६ के दिन नया बाजार में उनके आश्रम में घुसकर उनकी हत्या कर डाली।


Questation : स्वामी श्रद्धानंद के बचपन का नाम क्या था?

Answer : स्वामी श्रद्धानंद के बचपन का नाम मुंशीराम था |


Questation : स्वामी श्रद्धानंद ने कांग्रेस से संबंध क्यो तोड़ा?

Answer : स्वामी श्रद्धानंद ने १९२३ में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। वह कहते थे कि कांग्रेस, हिंदू सभा, खिलाफत और दूसरी अखिल भारतीय संस्थाओं को चलाने के लिए बड़े-बड़े व्यक्ति मौजूद है, मैं ब्रह्मचर्य और दलित जातियों के उद्धार के लिए काम करूंगा |


Questation : स्वामी श्रद्धानंद के पिता का नाम क्या था?

Answer : स्वामी श्रद्धानंद के पिता लाला नानकचंद था, वह संयुक्त प्रांत में, जिसे अब उत्तर प्रदेश कहते हैं, पुलिस सुपरिटेंडेंट के पद पर थे।


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