वासुदेव बलवंत फड़के का जीवन परिचय | Vasudev Balwant Phadke Biography


“भूख से जो लोग मर रहे हैं, उनको मैं कैसे बचा सकता हूं, इस विषय पर अनेक वर्षों से मैं सोचता रहा हूँ। जिस भूमि का मैं पुत्र हूं, उसी की ये सब संतान है। ये लोग अन्नाभाव में भूखे मरते रहें और हम कुत्तों के समान पेट भरते रहें, यह मुझ से देखा नही गया। अतः ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध मैने सशस्त्र विद्रोह की घोषणा की।“


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वासुदेव बलवंत फड़के का जीवनी

वासुदेव बलवंत फड़के का जन्म

वासुदेव बलवंत फड़के की शिक्षा

वासुदेव बलवंत फड़के और कुश्ती के दांव-पेच

वासुदेव बलवंत फड़के का पारिवारिक जीवन व संतान

वासुदेव बलवंत फड़के व महाराष्ट्र में भयंकर अकाल

वासुदेव बलवंत फड़के की माँ की मृत्यु

वासुदेव बलवंत फड़के का सशस्त्र विद्रोह

वासुदेव बलवंत फड़के की गिरफ्तारी व कालापानी की सजा

वासुदेव बलवंत फड़के की मृत्यु


फांसी की रस्सी को झूलते देखकर भी जिस निर्भय, निडर व साहसी भारतीय युवक ने अंग्रेजी अदालत को अपने सिंह-गर्जन से गुंजा दिया, उस तेजस्वी क्रांतिकारी का नाम वासुदेव बलवंत फड़के था। मिलिट्री फाइनांस डिपार्टमेंट पूना की ६० रु. मासिक की नौकरी छोड़कर और युवा पत्नी और छोटी बालिका का प्रेम भुलाकर उन्होंने भूखों को रोटी देने और बेरोजगारों को रोजगार दिलाने के लिए ब्रिटिश शासन के अंत करने का बीड़ा उठाया।

वासुदेव बलवंत फड़के भारत के सबसे पहले क्रांतिकारी थे, जिन्होंने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह का संगठन किया और सशस्त्र सेना का निर्माण किया। गांव-गांव घुमकर राजनीतिक आंदोलन करने वाले सर्वप्रथम व्यक्ति होने का श्रेय भी वासुदेव फड़के को प्राप्त है।


वासुदेव बलवंत फड़के का जन्म


वासुदेव फड़के का जन्म ४ नवंबर, १८४५ को महाराष्ट्र राज्य के कोलाबा जिले के शिरढोणे में हुआ था। उनके पिता का नाम बलवंत था। मां सरस्वती बाई कल्याण के एक संपन्न और धनी घराने की कन्या थी। वासुदेव फड़के का बचपन वहीं पर बीता था।

बालक वासुदेव सुंदर और हृष्ट-पुष्ट शरीर का था। उसका भाल उसके तेजस्वी होने की सूचना देता था। बच्चे और गांव वाले प्यार में उसको “महाराजा” कहते थे। वासुदेव तीव्र बुद्धि के थे तथा हठी और जिद्दी भी। वासुदेव को वन-पर्वतों और घाटियों में घूमने का बड़ा शौक था। उसका अधिकांश समय घर से बाहर ही बीतता था। मां वासुदेव की प्रतीक्षा में घंटों बैठी रहती। वासुदेव अंधकार होने पर आता तो झट लिपट जाता। पिता बालक की स्वतंत्र प्रकृति को संशय और भय से देखते थे।


वासुदेव बलवंत फड़के की शिक्षा


कल्याण के स्कूल की पढ़ाई समाप्त कर वह बंबई पढ़ने गए, पर शीघ्र ही पूना में वासुदेव ने इंग्लिश हाई स्कूल में अपना नाम लिखाया। इससे दो साल पहले १८५७ में बंबई विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी। १८५७ में ही विफल क्रांति हुई थी जिसके समाचारों को उसने बड़े ध्यान से सुना था। सामरिक चालों और व्यूह-रचना की बातों में वह बड़ा रस लेता था। लड़ाई में मिली जय-पराजय के कारणों की मीमांसा भी वह ध्यान से सुनता था। इस सबके कारण उसके जीवन का ध्येय भारत में पुनः क्रांति करना हो गया था। इस कारण उसने प्रवेशिका (एंट्रैस) परीक्षा देना अनावश्यक समझा। वासुदेव की आयु इस समय १५ वर्ष की थी।

उनका विवाह सोमण घराने की कन्या सई बाई से हो गया। वासुदेव बलवंत फड़के “ग्रेट इंडियन पेनिनसुला” रेलवे के एक दफ्तर में क्लर्क हो गए। मासिक वेतन बीस रुपया था जो उन दिनों बहुत अधिक माना जाता था। फड़के के विभाग का हेडक्लर्क बात-बात में कहता था कि बाहर तुम लोगों को कोई पांच रुपये की नौकरी भी न देगा। स्वाभिमानी फड़के को यह बात चुभ गई। उन्होंने ग्रांट मेडिकल कॉलेज में तीस रुपये मासिक पर क्लर्की की जगह पा ली। नई जगह पर जाने से पहले फड़के ने हेड क्लर्क से कहा – “तुम भारतीय होकर भारतीय से घृणा करते हो और उनको अयोग्य बताते हो। देखो, मुझे तीस रुपये की नौकरी मिल गई है।“ कुछ समय बाद उनको मिलिट्री फाइनांस डिपार्टमेंट, पूना में क्लर्की की नौकरी मिल गई और तीन-चार साल के अंदर वेतन भी बढ़कर ६० रुपये हो गया। पूना में फड़के सपल्नीक रहने लगे।


वासुदेव बलवंत फड़के और कुश्ती के दांव-पेच


पुना में उन दिनों अखाड़े लगते थे। वासुदेव फड़के प्रातः-सायं अखाड़ों में जाते। कुश्ती के दांव-पेच सीखते। वह प्रतिदिन ३०० दंड-बैठक निकालते। अखाड़ेबाजी में फड़के के एक साथी ज्योति वा फुले थे, जो महाराष्ट्र के एक प्रसिद्ध समाज-सुधारक नेता हुए। वासुदेव फड़के श्री दत्त के उपासक थे जिन पर उन्होंने “दत्त लहरी” लिखी थी। फड़के ने युवकों को संगठित किया। उनकी व्यायामशाला जंगल में बने एक मंदिर के आंगन में लगती थी। वहां शस्त्राभ्यास भी कराया जाता था | यहां सीखने आने वालों में तिलक भी थे।


वासुदेव बलवंत फड़के का पारिवारिक जीवन व संतान


सई बाई से फड़के को एक पुत्र हुआ था पर वह दस दिन ही जीया। फिर मधु नामक बालिका हुई। जब वह चार साल की थी, तब सई बाई का देहांत हो गया। बच्ची की देखभाल के लिए वासुदेव फड़के को गोपिका बाई से दूसरा विवाह करना पड़ा। विवाह के समय गोपिका बाई की आयु नौ वर्ष की थी। जब गोपिका बाई १५ वर्ष की हुई, तब पति ने उनको उसके मामा के पास भेज दिया पति-पत्नी की यह आखिरी भेंट थी। वासुदेव फड़के की क्रांतिकारी कार्रवाइयां बढ़ीं और वह पकड़े गए। ब्रिटिश सरकार ने गोपिका बाई को पति से मिलने की आज्ञा नहीं दी। सत्तावन साल के वैधव्य का शेष जीवन उन्होंने पति की स्मृति में ही बिताया। गोपिका बाई एक आदर्श भारतीय सती नारी थी।

पूना की सार्वजनिक सभा में जिसकी स्थापना १८७० में हुई थी, न्यायमूर्ति रानडे ने तीन व्याख्यान दिए। ये भारत की आर्थिक अवस्था और गरीबी, राष्ट्रीय व्यापार नीति और खर्चीले ब्रिटिश शासन के बारे में थे। रानडे ने कहा था कि अंग्रेजों को ऊंची और अधिक वेतन की जगहें दी जाती है। भारतीयों की योग्यता का अंग्रेज़ी शासन आदर नहीं करता। महाराष्ट्र के पहले १४ जिले थे, अब २१ किए जा रहे हैं, जिससे सात अंग्रेजों को दो-दो हजार रुपये की नौकरी दी जाए। रानडे स्वयं अभी राजनीति में उतरे नहीं थे। वह तो वासुदेव फड़के की मृत्यु के उपरांत ही उसमें आए थे, लेकिन उनके भाषणों ने वासुदेव फड़के के हृदय में हलचल मचा दी। वासुदेव फड़के शनि-रवि की छुट्टी में गांवों में चले जाते। गांवों में भी व्याख्यान देते। सोमवार को दफ्तर में काम पर आ जाते और पूना में भी चौक-चौक सभाओं का आयोजन करते और व्याख्यान देते। स्वयं ही थाली बजाकर लोगों को अपने व्याख्यान की सूचना देते। उन्होंने स्वदेशी का व्रत लिया और दफ्तर का सारा काम भी देसी कलम से करना शुरू कर दिया, क्योंकि होल्डर का निब विदेशी होता था |


वासुदेव बलवंत फड़के व महाराष्ट्र में भयंकर अकाल


वर्ष १८७६ में महाराष्ट्र भर में भयंकर अकाल पड़ा। सरकार ने निवारणार्थ जो काम खोले उनमें लोगों से कड़ी मेहनत ली जाती थी और मजदूरी डेढ़ आना दी जाती थी। यह सुनकर फड़के का हृदय विदीर्ण हो गया। उन्होंने दफ्तर से छुट्टी ली और अकाल पीड़ितों की सहायता के लिए पैदल ही निकल पड़े। उज्जैन से लेकर बीजापुर तक वासुदेव फड़के ने गरीबी और भूख के प्रत्यक्ष दर्शन किए। उन्होंने ब्रिटिश शासन को जल्द से जल्द समाप्त करने का दृढ़ संकल्प कर लिया। फड़के को स्नेहमयी मां के बीमार होने का समाचार मिला। उन्होंने दफ्तर से छुट्टी मांगी। उनकी अर्जी फाइलों में दबी पड़ी रही। दुबारा अर्जी दी, पर नामंजूर हो गई।


वासुदेव बलवंत फड़के की माँ की मृत्यु


फड़के रुकने वाले न थे, परंतु जब वह पहुंचे तब उनको समाचार मिला कि पुत्र की बाट जोहते मां ने निराश हो प्राण छोड़ दिए। अपनी मां से न मिल सकने के लिए फड़के ने ब्रिटिश सरकार को जिम्मेदार पाया। इस घटना ने उनकी विद्रोहाग्नि को और भड़काया। फड़के को यह देखकर बड़ी निराशा हुई कि उनके क्रांति कार्य में सम्मिलित होने के लिए कोई नहीं आता। उन्होंने एक लंबा दौरा किया। देशी नरेशों और रियासतों के शासकों से भी वह मिले। उन्होंने केवल सहानुभूति दिखाई, किसी प्रकार की सहायता नहीं दी। धनी वर्ग ने भी सहायता नहीं दी।

उन्होंने शिवाजी का मार्ग अपनाया और आदिवासियों की सेना संगठित की। धन संग्रह और शस्त्र-संग्रह के लिए लूटपाट का रास्ता अपनाया। सैनिकों का दस रुपये मासिक वेतन तय हुआ |


वासुदेव बलवंत फड़के का सशस्त्र विद्रोह


फरवरी १८७९ में फड़के ने सशस्त्र विद्रोह की घोषणा कर दी। उनकी सेना ने सबसे पहले धमारी गांव पर छापा मारा। यहां लूट में तीन हजार रुपये मिले। लुटपाट में स्त्रियों को छेड़ने और सताने की कड़ी मनाही थी। स्त्रियो के गहने भी नहीं लिए जाते थे। फडके ने कहा कि – “मैं माताओं और बहनों को गरीब बनाने नहीं आया हूँ।“ गांव के बनियों और साहूकारों की बहियों, पोथियों की होली जला दी जाती। गांववाले इससे बहुत खुश होते थे कि उनका कर्जा जल रहा है। विदेशी कपड़ों की होली १९२० से पहले नहीं हुई, पर फडके ने १८७९ में ही हिसाब की पोथियों की होली गांव-गांव में की थी।

धमारी गांव पर छापा पड़ने के साथ महाराष्ट्र भर में गांवों में लूट-पाट प्रारंभ हो गई। इसका कारण सरकार पहले अकाल को समझती रही, परंतु शीघ्र ही उसने जान लिया कि यह लूट-पाट राजनीतिक कारणों से हो रही है। इसका एक प्रभावशाली नेता है। उसको पकड़ने और विद्रोह को कुचलने के लिए मेजर डेनियल की नियुक्ति की गई। फड़के को गिरफ्तार कराने वाले को ४००० रुपये इनाम देने की घोषणा की गई। इसके जवाब में फड़के ने पूना के कलेक्टर, सेशन जज और बंबई के गवर्नर को गिरफ्तार करने वाले को ५००० रुपये इनाम देने की घोषणा की। शहरों में इस आशय के पोस्टर चिपके। पत्रों में यह विज्ञापन छपने के लिए भेजा गया। यह घोषणा स्वतंत्र भारत के सेनापति वासुदेव बलवंत फड़के के नाम से दी गई थी।

पुलिस और फौज फड़के की टोह में थी। इसी बीच पूना में भयंकर आग लगी। शनिवार बाड़ा भस्म हो गया। यहां सरकारी स्कूल लगता था। आग ठंडी नहीं हुई थी कि बुधवार बाड़ा भी जला दिया गया। यह फड़के के आदमियों का काम बताया गया, बुधवार बाड़ा में सरकारी दफ्तर और कचहरियां लगती थीं। मई १८७८ में बंबई से कुछ मील दूर पल्सपे गांव पर छापा मारा गया। यहां बड़ौदा के गायकवाड़ के भूतपूर्व दीवान का पुत्र रहता था। सरकार ने दीवान को बड़ी जागीर दी थी क्योंकि १८५७ में उसने अंग्रेजों की सहायता की थी। महाराज को पदच्युत कराने में भी उसने अंग्रेजों की मदद की थी। घर में विवाह की तैयारी हो रही थी। अतः इस गांव से फड़के के दाएं हाथ सरदार दौलत राव नाईक को ५०००० रुपये का बहुमूल्य माल लूट में मिला। इससे अग्रेज़ घबरा गए। एक समाचार पत्र ने लिखा – “बंबई में गवर्नर राज्य है या वासुदेव फड़के का।"

एक पहाड़ी पर मेजर डेनियल और सरदार दौलत राव नाईक के बीच लड़ाई हुई। नाईक मारा गया। उसकी मृत्यु से आदिवासी सैनिकों का सेनापति नहीं रहा। वासुदेव को ज्वर आ रहा था वह पहाड़ से गिर कर मरते-मरते बचे। उन्होंने श्री दत्त के एक मंदिर में आश्रय लिया। यहां उन्होंने रुहेलों और पठानों की घुड़सवार सेना संगठित करने की योजना तैयार की। घुडसवार सैनिकों को २५ रुपये मासिक वेतन देना तय हुआ था। रुहेलों के सरदार ने घोड़े खरीदने के लिए ३००० रुपये मांगे थे। दो हजार रुपये भेजे जा चुके थे। शेष का इंतजाम करने के लिए फड़के निजाम राज्य में गए, परंतु पुलिस उनका पीछा कर रही थी। वासुदेव लगातार तीन दिन से चल रहे थे। उनको ज्वर भी आ रहा | रात में आराम करने के लिए वह एक मंदिर में जाकर ठहरे। डेनियल ने मंदिर को घेर लिया।


वासुदेव बलवंत फड़के की गिरफ्तारी व कालापानी की सजा


वासुदेव फड़के २० जुलाई, १८७९ को गिरफ्तार कर लिए गए। अक्तूबर १८७९ में फड़के पर राजद्रोह के अभियोग में मुकदमा चलाया गया। पूना के नागरिक फड़के के दर्शनों को आतुर थे। पुलिस और घुड़सवारों का विशेष प्रबंध था, फिर भी अदालत में तिल भर पैर रखने की जगह नही थी। आजन्म कालापानी की सजा सुन कर जनता स्तब्ध रह गई। वासुदेव फड़के को जिस दिन पूना से ले जाया गया, उस दिन स्टेशन पर अपार भीड़ थी। साहस और वीरता का आदर करने वाले अंग्रेज़ और गोरी महिलाएं भी बड़ी संख्या में स्टेशन पर जमा थी।


वासुदेव बलवंत फड़के की मृत्यु


जनवरी १८८० में वासुदेव बलवंत फड़के अदन पहुंचे। वह अदन जेल से भागने में सफल हुए, पर अदन के रास्ते जानते नहीं थे। दस घंटे की दौड़-धुप के बाद उनको पकड़ लिया गया। जेल वालों ने उनका स्वागत किया “महाराजा आ गए, सरकार आ गई” उनको बहुत मोटी बेड़ियां डाल दी गई। उन्होंने आमरण अनशन कर दिया। उनकी अवस्था दिनों-दिन गिरने लगी, जिससे चिंतित होकर उनके लिए विशेष हल्की बेड़ियां बनवाई गई। इसके बाद फड़के को क्षय रोग हो गया। इस रोग से उन्होंने १७ फरवरी १८८३ को अदन की ब्रिटिश जेल में प्राण त्याग दिए।

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