विष्णु शास्त्री चिपलूणकर | Vishnushastri Chiplunkar


“अँग्रेजी राज से हमारी सबसे बड़ी हानि कौन सी हुई, ऐसा अगर कोई पूछे तो उसका उत्तर है, हमारी स्वाधीनता का नाश। पराधीनता से स्वाधीनता कितनी अच्छी होती है यह किसी को भी बताने की आवश्यकता नहीं है। गगन और वन में मनचाहा विचरण करने वाले पक्षी और सोने के पिंजड़े में बंद किए हुए पक्षी-इन दोनों में कितना अंतर है |” राष्ट्र के बारे में भी यही बात सत्य है। इन ओजपूर्ण शब्दों में स्वाधीनता की महत्ता का वर्णन करने वाले विष्णुशास्त्री चिपलूणकर एक महान देशभक्त और मराठी भाषा के युगपुरुष थे।

आज हम स्वाधीन भारत में सांस लेते हुए चिपलूणकर जी के इन शब्दों का महत्व शायद उतना न समझ पाएं, किंतु यदि हम पराधीन भारत के दमनपूर्ण वातावरण की कल्पना कर सकें तो हमें ज्ञात होगा कि चिपलूणकर का स्वदेशाभिमान कितना उग्र और स्फूर्तिदायी था।



अनुक्रम (Index)[छुपाएँ]

विष्णु शास्त्री चिपलूणकर का जीवन परिचय

विष्णु शास्त्री चिपलूणकर का जन्म

विष्णु शास्त्री चिपलूणकर का परिवार

विष्णु शास्त्री चिपलूणकर की शिक्षा

विष्णु शास्त्री चिपलूणकर का विवाह व कार्य

शालापत्रक पत्रिका का सम्पादन

निबंधमाला का सम्पादन

न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना

किरण व आर्यभूषण मुद्रणालय की स्थापना

विष्णु शास्त्री चिपलूणकर की मृत्यु


चिपलूणकर ने यह सिंहनाद ९० वर्ष पहले किया था, जब अंग्रेजों ने हमारे यहां अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। लोग अंग्रेज़ी राज्य को ईश्वरीय देन समझने लगे थे, अंग्रेजों की दासता में संतोष पाकर आग्ल सभ्यता को अपनाने लगे थे और अपनी परंपरा तथा धर्म को निकृष्ट एवं त्याज्य समझने लगे थे।


विष्णु शास्त्री चिपलूणकर का जन्म


विष्णुशास्त्री का जन्म २० मई १८५० को पुना में हुआ। उनके पिता कृष्णशास्त्री संस्कृत और अंग्रेज़ी के बड़े विद्वान थे और सरकारी-शिक्षा विभाग में ऊंचे पद पर थे। समाज में उनकी बड़ी प्रतिष्ठा था। वह एक प्रभावशाली वक्ता थे। उन्होंने सकरात की जीवनी, संस्कृत भाषा का व्याकरण, “अरेबियन नाइट्स” का मराठी अनुवाद आदि पुस्तकें लिखी थी। उन्होंने कालिदास के मेघदूत का जो मराठी अनुवाद किया था, वह अनूठा था। अंग्रेज़ लेखक जानसन के एक दार्शनिक उपन्यास का भी उन्होंने रूपांतर किया था। ऐसे साहित्य-रसिक, प्रतिभासंपन्न और उद्भट विद्वान के पुत्र होने का सौभाग्य विष्णुशास्त्री को मिला।


विष्णु शास्त्री चिपलूणकर का परिवार


विष्णुशास्त्री के बाबा हरिपंत और उनकी पत्नी भागीरथी बहुत ही धार्मिक, संयमी और सदाचारी थे। उनके विपरीत कृष्णशास्त्री का जीवन भोगप्रधान तथा स्वच्छंद था। इन दोनों के जीवन का विरोध विष्णुशास्त्री बचपन से ही देखते रहे थे | जिसका उनके मन पर बहुत असर पड़ा।


विष्णु शास्त्री चिपलूणकर की शिक्षा


विष्णुशास्त्री के चरित्रगठन में उनके बाबा हरिपंत का ही प्रमुख हाथ था। उन्होंने विष्णुशास्त्री को ब्रह्मकर्म की शिक्षा दी और वेदों का अध्ययन भी करवाया। बचपन में जो संस्कार होते हैं और जैसी शिक्षा मिलती है, उसी से व्यक्ति का चरित्रगठन होता है। विष्णुशास्त्री ने अपने बाबा से धर्मपरायणता और सदाचार लिया और पिता से साहित्य-सेवा की रुचि तथा विद्याप्रेम लिया। उनकी स्मरणशक्ति असामान्य थी। वह लंबी-लंबी संस्कृत, अंग्रेजी और मराठी कविताएं जबानी याद कर लेते थे। उनके बचपन में ही, जब वह सात साल के थे, १८५७ का स्वाधीनता-संग्राम हुआ। इस संग्राम से प्रभावित होकर उनके मन में स्वाधीनता की लालसा जागी। उनके मन में विदेशी राज के प्रति घृणा उत्पन्न हुई और वह देश तथा समाज की उन्नति की कामना करने लगे।

ग्यारह वर्ष की आयु मे वह पुना हाई स्कूल मे दाखिल हुए। वहां पर कृष्णशास्त्री बैजापुर नाम के एक शिक्षक संस्कृत के बड़े विद्वान थे। उन्हीं के कारण विष्णुशास्त्री संस्कृत काव्य में रुचि लेने लगे। वैसे तो विष्णुशास्त्री को शिक्षा मिलती ही थी, घर में भी उनकी शिक्षा कम नहीं होती थी, किंतु इस शिक्षा का स्वरूप कुछ भिन्न था। उनके पिता के पास समालोचना के लिए संस्कृत ग्रंथ काफी संख्या में आते थे तथा बहुत से लेखक तथा विद्वान साहित्य-चर्चा के लिए उनके घर आते थे। सन् १८६५ से “शालापत्रक” नाम की शिक्षा-पत्रिका के वह संपादक थे। इस प्रकार पत्रिका का संपादन करने की शिक्षा विष्णुशास्त्री को बचपन में ही प्राप्त हो गई थी और घर में साहित्यकारों का वातावरण रहने के कारण उनमें साहित्य-प्रेम भी बचपन में ही जाग चुका था।


विष्णु शास्त्री चिपलूणकर का विवाह व कार्य


विष्णुशास्त्री का विवाह १८६५ में हुआ। अगले वर्ष वह पूना कॉलेज में दाखिल हुए। विष्णुशास्त्री को साहित्य से अत्यधिक रुचि थी और न्यायशास्त्र (लॉजिक) और गणित जैसे रूखे विषयों से उन्हें घृणा थी। इन विषयों में वह अधिक नहीं पढ़ पाए। विष्णुशास्त्री ने अनेक अँग्रेजी, मराठी और संस्कृत ग्रंथ पढ़े | जिनमें उपन्यास, नाटक, इतिहास, काव्य, निबंध आदि साहित्य के सभी अंग थे। मेकाले, मिल, जॉन्सन की शैली का उन पर प्रभाव पड़ा। गणित और न्यायशास्त्र में अपनी कमजोरी के कारण वह बी.ए. में एक बार फेल हो गए। आखिर दूसरे विषय लेकर वह बी.ए. में पास हुए। छात्र अवस्था में ही अंग्रेज़ी भाषा और साहित्य से उन्हें इतना प्रेम था, कि वह अंग्रेज़ी भाषा को “शेरनी का दूध” कहते थे, किंतु अंग्रेज़ी राज उन्हें उतना ही नापसंद था। वह स्वाधीनता के उपासक थे। हिंदू धर्म, भारतीय सभ्यता और परंपरा का उन्हें बहुत अभिमान था। उनका अंपग्रेजी भाषा का प्रेम दास-मनोवृत्ति का परिचायक नहीं था। वह अंग्रेज़ी को स्वदेशाभिमान जागृत करने वाले साहित्य से संपन्न भाषा मानते थे | उस भाषा के साहित्य का अध्ययन कर वह अपनी मातृभाषा मराठी को इन्हीं गुणों से संपन्न करना चाहते थे। उच्च अध्ययन के समय में विष्णुशास्त्री ने पाठ्य पुस्तकों के अलावा अनेक संस्कृत, मराठी और अंग्रेज़ी ग्रंथों का अध्ययन किया।


शालापत्रक पत्रिका का सम्पादन


१८७२ के बाद से “शालापत्रक” पत्रिका का काम विष्णुशास्त्री ही देखने लगे। इस पत्रिका द्वारा वह अपनी लेखन-कला का परिचय लोगों को देने लगे। वह भाषण नहीं कर सकते थे, किंतु उनकी कलम बहुत तेज थी। अंग्रेज़ी और मराठी इन दोनों भाषाओं के वह बड़े प्रभावकारी लेखक थे। शालापत्रक में उन्होंने जो लेख लिखे, उनमें से काव्य पर लिखे हुए निबंध बहुत अच्छे है। कालिदास, भवभूति, बाण, सुबंधु और दंडी इन पांच संस्कृत कवियों पर लिखे हुए, उनके निबंधों को मराठी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। बाद में कुछ मित्रों के सुझाव पर उन्होंने अपनी अलग पत्रिका निकाली, जिसका नाम था “निबंधमाला”।


निबंधमाला का सम्पादन


विष्णुशास्त्री का कौटुंबिक जीवन सुखी नहीं था। उनके दो बच्चे हुए लेकिन वे बचपन में ही गुजर गए। पत्नी हमेशा बीमार रहा करती थी। लेकिन विष्णुशास्त्री ने इस व्यक्तिगत दुःख को अपने जीवनकार्य में बाधा नहीं डालने दी। उनके जीवनकार्य का एक शब्द में वर्णन करना हो तो वह है उनकी अपनी पत्रिका “निबंधमाला” | यह पत्रिका उन्होंने अकेले ही सात साल तक चलाई। उनकी मृत्यु के साथ ही यह पत्रिका समाप्त हो गई। इस पत्रिका के कारण ही विष्णुशास्त्री चिपलूणकर “मालाकार” के नाम से प्रसिद्ध है।

“निबंधमाला” पत्रिका से मराठी-साहित्य में नया युग प्रारंभ हुआ। यद्यपि यह पत्रिका साहित्य सेवा के प्रमुख उद्द्देश्य से शुरू की गई थी, पर आगे चलकर इसने लोगों में जागृति और राष्ट्रीय अभिमान की नींव डाली तथा अंग्रेजी राज और आंग्ल संस्कृति से प्रभावित लोगों को गहरी नींद से जगाया। पत्रिका ने पुरातन भारतीय सभ्यता की याद दिलाकर लोगों में आत्मविश्वास उत्पन्न किया और बौद्धिक गुलामी की जंजीरे तोड़ दीं। यह सब कार्य उन्होंने केवल ३२ वर्ष की छोटी सी आयु में पूरा किया। जब हम इस बात को ध्यान में लाते हैं तो मन आश्चर्य से भर उठता है

उनकी निबंधमाला को वास्तव में ज्ञानकोश कहना उचित होगा। वह अपने हरेक लेख के शुरू में सुभाषित प्रायः संस्कृत से देते थे। विष्णुशास्त्री ने जो कार्य किया, उसके दो अंग हैं। एक तो उन्होंने मराठी भाषा को प्रभावशाली और संपन्न बनाया। मराठी भाषा भी समर्थ भाषा है, यह उन्होंने अपने लेखो से सिद्ध कर दिया। साथ ही उन्होंने लोगों में पराधीनता के प्रति घृणा और स्वाधीनता के लिए उत्कृट प्रेम उत्पन्न किया। सरकारी स्कूल में नौकरी करते हुए भी उन्होंने “निबंधमाला” में अंग्रेज़ इतिहासकारों की और अंग्रेज़ी राज की कड़ी आलोचना की। इस कारण उनकी बदली रत्नगिरि कर दी गई। यह बदली एक मामूली सजा के रूप में थी, किंतु इससे विष्णुशास्त्री का दिल दबा नहीं। वह सरकारी नौकरी से इस्तीफा देकर कुछ स्वतंत्र काम करने की सोचने लगे। उन्होंने छह मास की छुट्टी ली, पुस्तकों की दुकान खोली और “चित्रशाला” प्रेस का पुनर्गठन किया।


न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना


सरकारी नौकरी से इस्तीफा देकर उन्होंने पुना में एक स्कूल खोलने का निश्चय किया और “न्यू इंग्लिश स्कूल” नाम से एक स्कूल खोला। लगभग इसी समय दो युवक आकर उनसे मिले, जिनके नाम थे, गोपाल गणेश आगरकर और बाल गंगाधर तिलक | ये दो युवक चिपलूणकर जी की “निबंधमाला” से अत्यंत प्रभावित हुए थे। इन दो निःस्वार्थी, तेजस्वी और ध्येयवादी युवकों के आ जाने से विष्णुशास्त्री चिपलूणकर का वह स्कूल अधिकाधिक लोकप्रिय होने लगा।


किरण व आर्यभूषण मुद्रणालय की स्थापना


यद्यपि अध्ययन-कार्य में चिपलूणकर की रुचि थी, तथापि वह लोगों में जागृति उत्पन्न करने को और अधिक महत्व देते थे, इसलिए उन्होंने अक्तूबर १८७९ में “किरण” मुद्रणालय खोला। बाद में पुनर्गठन करके उसका नाम “आर्यभूषण” रखा गया। अंग्रेज़ी पत्र “मराठा” और मराठी पत्र “केसरी” यहीं से प्रकाशित हुए थे। इन दिनों उन्होंने निबंधमाला में “आपच्या देशाची स्थिति” शीर्षक से एक अत्यंत महत्वपूर्ण लेख लिखा। यह उनका आखिरी लेख था। इस लेख में उन्होंने भारतीय परंपरा, धर्म और सभ्यता का गुणगान कर लोगों का स्वाभिमान जगाया | अंग्रेजों में जो अच्छी बातें उन्होंने पाईं, उनका भी वर्णन उन्होंने इस निबंध में किया। इस निबंध में उन्होंने इतने विचार प्रकट किए थे कि १९१० के अप्रैल महीने में अंग्रेज़ी शासन ने उसे जब्त कर लिया। यह उनका आखिरी निबंध था।


विष्णु शास्त्री चिपलूणकर की मृत्यु


अठारह साल की उम्र से वह लगातार लिख रहे थे, सात साल तक उन्होंने अकेले ही निबंधमाला चलाई थी और स्कूल, मुद्रणालय और पत्र आदि का कार्य संभाला था। इसका उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा और १७ मार्च १८८२ को पुना मे उनकी मृत्यु हो गई। उस समय उनकी आयु बहुत ही कम, केवल ३२ साल की थी |

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