भगवानलाल इंद्रजी | Bhagwan Lal Indraji


जिस रूप में भारत का इतिहास हम आजकल पढ़ते हैं, वह १९वीं शताब्दी में इतना स्पष्ट नहीं था। प्राचीन-काल में हमारे देश में इतिहास लिखने की कला नहीं थी। १८वीं व १९वीं शताब्दी में विद्वानों के अथक प्रयास से हमारे इतिहास को श्रृंखलाबद्ध किया गया । यह कार्य प्राचीन ग्रंथों, अभिलेखों, सिक्कों, मुहरों तथा इस प्रकार की अन्य सामग्री के अध्ययन से ही संभव हो सका।

इस दिशा में कार्य करने वाले विद्वानों में एक थे - पंडित भगवानलाल इंद्रजी । हमारे देश के इतिहास की रचना में उन्होंने बहुत बड़ा काम किया है।


भगवानलाल इंद्रजी का जन्म


भगवानलाल इंद्रजी का जन्म ७ नवंबर १९३९ को जूनागढ़ (काठियावाड़) के प्रस्तोरा नागर ब्राह्मण कुल में हुआ था। उनके पिता तत्कालीन ब्राह्मणों की तरह वेद, पुराण व शास्त्रों के ज्ञाता थे | वह एक माने वैद्य भी थे। भगवानलाल इंद्रजी अपने परिवार में सबसे छोटे थे और उनसे बड़े दो भाई थे।


भगवानलाल इंद्रजी की शिक्षा


भगवानलाल इंद्रजी को अपने पूर्वजों से विरासत के रूप में वेद, पुराण तथा धर्मशास्त्रों का ज्ञान और प्राचीन साहित्य का प्रेम मिला था। उन दिनों जूनागढ़ में अंग्रेजी शिक्षा का प्रबंध न होने के कारण भगवानलाल इंद्रजी को अंग्रेजी सीखने का अवसर न मिला। अंग्रेजी का ज्ञान न होने से उनको इतिहास शोध के कार्य में कठिनाई तो अवश्य हुई, पर उनकी साधना में कोई अंतर न पड़ा। इसी कारण अंग्रेजी न जानते हुए भी उनको देश-विदेश में ख्याति मिली। वैसे काम-चलाऊ अंग्रेजी उन्होंने धीरे-धीरे सीख ली थी।

बाल्य-काल में ही उनकी रुचि भारत के गौरवपूर्ण इतिहास के अवशेषों में थी। उनके जन्म-स्थान जूनागढ़ के निकट ही गिरनार पर्वत की शिला पर मौर्य सम्राट अशोक, महाक्षत्रप रुद्र दामन और गुप्त सम्राट स्कंदगुप्त के लेख अंकित है। प्राचीन ब्राह्मी लिपि के ये शिलालेख भगवानलाल इंद्रजी के मन में बैचेनी पैदा करते थे, पर प्राचीन लिपियों का ज्ञान न होने के कारण भगवानलाल इंद्रजी इनको पढ़ने में असमर्थ थे।


भगवानलाल इंद्रजी के कार्य


संयोगवश उनको प्रसिद्ध पाश्चात्य विद्वान जेम्स प्रिन्सेप का प्राचीन भारतीय लिपियों पर एक लेख पढ़ने के लिए मिला। भगवानलाल ने उस लेख में दी हुई प्राचीन भारतीय वर्णमाला की नकल उतारकर अपने पास रख ली। उन दिनों भारतीय व विदेशी विद्वान भारतीय इतिहास की खोज में लगे थे। पर कई गुत्थियों नहीं सुलझ पा रही थीं। इन गुत्थियों में सबसे कठिन थी, भारत की प्राचीन लिपियों को पढ़ने की। इस दिशा में शोध कार्य आरंभ तो हो चुका था, पर कोई कड़ी हाथ न लगने के कारण लेखों व सिक्कों का अध्ययन भली प्रकार न हो पाता था। इस विषय के शोधकर्ताओं में जेम्स प्रिन्सेप भी थे, जिनके लेख की मदद से भगवानलाल इंद्रजी ने गिरनार के लेखों को एक नए ढंग से पढ़ा। यह कार्य आसान नहीं था। फिर भी वह अपने प्रयास में जुटे रहे। उन्होंने मुंबई के अपने मित्रों से प्राचीन लिपियों के बारे में लेख व पुस्तकें मंगवाई| महाक्षत्रप रुद्र दामन के शिलालेख को पढ़ने का निरंतर प्रयत्न किया।

शक क्षत्रपों के सिक्कों पर भी भगवानलालजी का कार्य अत्यंत महत्व का है।

पंडित भगवानलाल इंद्रजी के इन प्रयासों की ख्याति काठियावाड़ के तत्कालीन अंग्रेज पोलिटिकल एजेंट ए.के.फोर्ब्स तक पहुंची। उसने उनके कार्य की सराहना करते हुए मुंबई के सुप्रसिद्ध विद्वान, समाज-सुधारक व लेखक-चिकित्सक डा. भाऊ दाजी को पत्र लिखा कि वह उन्हें अपने पास बुला लें।

डा. भाऊ दाजी अपने समय के प्रसिद्ध चिकित्सक थे और मुंबई के मेडिकल कालेज के पहले स्नातकों में से एक थे, पर उनकी रुचि डाक्टरी तक ही सीमित न थी। प्राचीन भारतीय संस्कृति व इतिहास के अध्ययन के अतिरिक्त, उन्होंने अपने देशवासियों के राजनैतिक व सामाजिक कल्याण में भी हाथ बंटाया। उन्होंने न केवल भगवानलाल इंद्रजी को, वरन अन्य कई विद्वानों को भी सहायता दी।

इसी के फलस्वरूप भगवानलाल इंद्रजी आर्थिक कठिनाइयों में नहीं पड़े और अपनी प्रतिभा का सदुपयोग कर पाए। भगवानलाल इंद्रजी उन्हें अपना गुरु मानते थे।

अक्तूबर १८६१ में डा. भाऊ दाजी ने इन्हें मुंबई आने का निमंत्रण दिया। डा. भाऊ दाजी से यह संबंध भगवानलाल इंद्रजी के जीवन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है। भगवानलाल इंद्रजी ने डा. भाऊ दाजी का निमंत्रण स्वीकार किया और अपने साथ वह ६० प्राचीन क्षत्रप सिक्के भी लेते गए। वहीं उनका अन्य विद्वानों से भी परिचय हुआ, जिनको इन्होंने अपने कार्य के बारे में बताया। डा. भाऊ दाजी के संपर्क से पंडितजी नए सिरे से भारतीय इतिहास के अध्ययन में जुट गए।

पंडितजी इसके बाद २४ अक्तूबर १८६२ को मुंबई गए और डा. भाऊ दाजी के बंगले की चहारदीवारी में ही उन्होने रहना शुरू कर दिया । डा. भाऊ दाजी के साथ रहते हुए पंडितजी ने भारत के प्रसिद्ध अवशेषों की खोज के सिलसिले में भारत के ऐतिहासिक स्थलों की कई बार यात्रा की। १८६२-६३ में भाऊ दाजी ने उन्हें पश्चिमी भारत की गुफाओं के लेखों का अध्ययन करने के लिए भेजा। इस काल में उन्होंने अजंता, कार्ला, भाजा, नासिक, पांडुलेण, जुन्नार इत्यादि गुफाओं में लेखों का अध्ययन व संपादन किया। इसका विवरण मुंबई की रायल एशियाटिक सोसायटी के समक्ष १० जुलाई १८६३ को डा. भाऊ दाजी ने पढ़कर सुनाया।

यह विवरण सोसायटी की शोध-पत्रिका के सातवें खंड में छपा है।

सन् १८६४ की सर्दियों में वह जैसलमेर के जैन भंडारों की बहुमूल्य ऐतिहासिक सामग्री का अध्ययन करने गए। उनके साथ एक अन्य विद्वान पंडित पांडुरंग गोपाल पाध्ये भी थे | मार्ग की मुसीबतें, रेगिस्तान की ठंड और जैन भंडारों की सीलन के कारण दोनों विद्वान बीमार पड़ गए। जैसलमेर में गुजारे तीन महीनों में से २२ दिन तो बीमारी की हालत में ही बीते। इस दशा में भी इन पंडितों ने प्राचीन हस्तलिपियों की प्रतिलिपियां बनाई व उनका अध्ययन किया पर इन परिस्थितियों में काम करने का फल यह हुआ कि इस बार भगवानलाल इंद्रजी का स्वास्थ्य खराब हुआ तो फिर ठीक न हो सका।

सन् १८६८ में वह फिर अपनी यात्रा पर निकल पड़े। इस दौरे में उन्होंने उत्तर भारत के प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थलों की यात्रा की और इलाहाबाद, वाराणसी, मथुरा व दिल्ली गए। इलाहाबाद के किले के अशोक स्तंभ में उत्कीर्ण गुप्त सम्राट समद्रगुप्त के लेख का उन्होंने अध्ययन किया। मथुरा के बाजारों से उन्होंने बैक्ट्रियन और शक राजाओं के सिक्के खरीदे। अपनी यात्रा पूरी होने पर यह बहुमूल्य सामग्री अपने साथ मुंबई लेते गए। उन्हीं की वसीयत के अनुसार, उनकी मृत्यु के बाद यह सामग्री लंदन के संग्रहालय को दान दे दी गई और आज भी वहां सुरक्षित है।

भगवानलाल इंद्रजी की जिज्ञासा उन्हें फिर एक बार भ्रमण की ओर खींच ले गई। उनको इस यात्रा के लिए जूनागढ़ दरबार ने आर्थिक सहायता दी। दिसंबर १८७३ में वह फिर एक बार मुंबई से बाहर निकले। अपने इस दौरे में वह नेपाल, भारत-तिब्बत की सीमा, बिलोचिस्तान और यूसुफजई इलाके में गए। नेपाल की बौद्ध गुफाओं का इस प्रकार पहली बार उन्होंने ही अध्ययन किया। नेपाल के लेखों पर उनकी पुस्तक आज भी संदर्भ-ग्रंथ है। अपने इस भ्रमण का ब्यौरा उन्होने अपनी डायरी में लिखा है। गुजराती में लिखी उनकी दिनचर्या साहित्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। अपने इस दौरे के बाद भगवानलाल इंद्रजी जब मुंबई वापस लौटे तो इनके प्रश्रयदाता व गुरु डा. भाऊ दाजी पक्षाघात के कारण मृत्यु-शय्या पर मिले। २१ मई १८७४ को उनका देहांत हो गया।

भगवानलाल इंद्रजी के ऊपर से उनका साया उठ गया। पर दोनों के अपार स्नेह की थाती के रूप में आज भी मुंबई की रायल एशियाटिक सोसायटी में रखी उन दोनों की पुस्तकें व पांडुलिपियां उनके चिरस्थाई नाम का स्मरण कराती है।

भगवानलाल इंद्रजी के कार्य की सराहना करते हुए १८८३ में हालैंड के लीडन विश्वविद्यालय ने उन्हें पी.एच.डी. की उपाधि प्रदान की। भारत से संबंधित अन्वेषण करने वाली हालैंड तथा ब्रिटेन की राजकीय संस्थाओं का भी उनको सम्मानित सदस्य चुना गया। मुंबई की रायल एशियाटिक सोसायटी का भी उन्हें सदस्य बनाया गया। जनवरी १८८२ में तत्कालीन मुंबई सरकार ने उन्हें मुंबई विश्वविद्यालय का सभासद (फेलो) नियुक्त किया।


भगवानलाल इंद्रजी की मृत्यु


भारत के इस महान ज्ञान वीर की मृत्यु १६ मार्च १८८७ को ४९ वर्ष की अल्पायु में हुई। कोई संतान न होने के कारण उन्होंने अपनी बहुमूल्य एकत्रित सामग्री शिक्षण-संस्थाओं तथा संग्रहालयों को दान में दे दी।

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