नानालाल | नानालाल दलपतराम कवि | Nanalal Dalpatram Kavi


गुजरात के रास और गरबा नृत्य देश भर में प्रसिद्ध हैं । इन्हें लोकप्रिय बनाने में गुजरात के सबसे बड़े कवि नानालाल का बहुत बड़ा हाथ है। नानालाल केवल कवि ही नहीं थे, नाटककार और निबंध-लेखक के रूप में भी वह बहुत प्रसिद्ध हुए। वास्तव में तो वह पचास वर्ष तक गुजराती साहित्य पर छाए रहे।




नानालाल का जन्म


नानालाल का जन्म १६ मार्च १८७७ में अहमदाबाद में हुआ था। उनके पिता का नाम दलपतराम था। दलपतराम भी गुजरात के बहुत बड़े कवि थे, वह बड़े नीतिवान, सदाचारी तथा धर्मपरायण व्यक्ति थे। दलपतराम के चार पुत्र थे। नानालाल सबसे छोटे थे। अपने पिता के गुण नानालाल को भी विरासत में मिले।

दलपतराम जी का मकान एक मंदिर के पास था। यह मंदिर “श्री स्वामीनारायण मंदिर” के नाम से सारे गुजरात में सुप्रसिद्ध है। सारे गुजरात में स्वामीनारायण का मत काफी फैला हुआ है। इस मत में सदाचार और मानव-प्रेम के साथ ईश्वर भक्ति पर जोर दिया गया है। इस मंदिर में आकर बड़े-बड़े कवि अपने पद गाते, कीर्तन करते और रास खेलते। दलपतराम और नानालाल पर उनका गहरा प्रभाव पड़ा।


नानालाल की शिक्षा


बचपन में नानालाल बहुत चंचल थे। यह चंचलता कभी-कभी उनके माता-पिता को भी व्यग्र कर देती थी। इसी कारण पिता दलपतराम ने उनको एक गृहस्थ के यहां रहने भेज दिया, जो बच्चों की शिक्षा में बहुत रुचि लेते थे। उनका नाम था प्रो.काशीराम दवे। श्री दवे ने नानालाल की पढ़ाई पर बहुत ध्यान दिया जिससे नानालाल एक लायक विद्यार्थी बन गए। सोलह वर्ष की उम्र में मैट्रिक की परीक्षा पास करके नानालाल बंबई के एलफिंस्टन कालेज में दाखिल हुए। फिर वह अहमदाबाद के गुजरात कालेज में पढ़े।


नानालाल के कार्य


१९०१ में एम.ए. परीक्षा पास करने के बाद वह सादरा नामक शहर में राजकुमारों के स्कूल के हेडमास्टर बन गए। फिर वह काठियावाड़ में राजकोट शहर में राजकुमार कालेज में चले गए। कुछ समय बाद कालेज छोड़कर उन्होंने काठियावाड़ में सरकारी नौकरी कर ली और शिक्षा विभाग के बड़े अधिकारी बने।

इस पद पर आकर नानालाल को काठियावाड़ के गांव-गांव और जिले-जिले में घूमने का मौका मिला। उन्होंने शिक्षा-पद्धति में कई सुधार किए। उन दिनों शिक्षकों का वेतन बहुत थोड़ा होता था, नानालाल ने उनका वेतन बढ़वाया और बुढ़ापे में पेंशन दिलाने का भी प्रबंध किया। गांव-गांव घूमने से उनकी कल्पना-शक्ति बहुत बढ़ी। लोकजीवन, नृत्य, गीत तथा प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद उन्हें मिला। इस आनंद-उल्लास को नानालाल ने अपनी कविता में, नाटकों और निबंधों में बहुत सुंदर ढंग से उतारा ।

जब वह शिक्षा अधिकारी थे, तब हमारे देश में अंग्रेजों का राज्य था। गांधीजी ने अंग्रेजी राज के विरोध में सत्याग्रह आंदोलन शुरू कर दिया था। गांधीजी ने कहा कि प्रत्येक सरकारी नौकर को सरकारी नौकरी छोड़ देनी चाहिए। नानालाल में देशप्रेम बहुत था। उन्होंने भी गांधीजी का आदेश मानकर १९२१ में सरकारी नौकरी छोड़ दी और अहमदाबाद जाकर रहने लगे। उसके बाद उन्होंने अपना सारा जीवन गुजराती भाषा की सेवा में लगा दिया। कहते हैं कि अपने देहांत के केवल ८ दिन पहले ही उन्होंने लिखना छोड़ा था । यह था कवि का देश-प्रेम और भाषा-प्रेम।


नानालाल के काव्य


विद्यार्थी अवस्था में ही नानालाल ने कविता लिखनी शुरू कर दी थी। १८९७ में “प्रेम भक्ति” उपनाम से उनकी लिखी एक कविता प्रकाशित हुई। अगले वर्ष “बसंतोत्सव” नामक काव्य लिखा। नई शैली के कारण इसने पाठकों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। कवि ने अपनी कविता में पलनी को “कुलयोगिनी” कहा है।

नानालाल के काव्यों में ऊर्मिकाव्य, खंडकाव्य, महाकाव्य, रास, भजन, पद, तथा छंदोबद्ध रचनाएं हैं। प्रेम, प्रकृति, राष्ट्रभक्ति, प्रभुभक्ति, पितृभक्ति, गुरुभक्ति, वीरपूजा आदि विविध विषय हैं। ऊर्मिकाव्य गुजराती में बेजोड़ है। इनमें से कुछ काव्यों ने तो विश्व साहित्य में स्थान प्राप्त कर लिया है। उन्होंने करीब २०० रास लिखे हैं। इन रचनाओं से गुजरात के लोक जीवन में उल्लास, ताजगी तथा नए बसंत का प्रारंभ होना माना जाता है।

कवि के मन में भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता के प्रति बड़ा आदर और भक्तिभाव था। साथ ही उन्हें मानव मात्र के कल्याण में गहरी आस्था थी। इसलिए उनकी रचनाओं में हमें प्रेम, सेवाव्रत, आत्मीयता, सर्वधर्म-समन्वय और जनकल्याण के दर्शन होते हैं।

नानालाल की कविताएं मधुर हैं, सुंदर हैं। साथ ही उनमें उत्तम कोटि की कल्पना पाई जाती है | जिसका उनसे पहले के अन्य गुजराती कवियों में अभाव था। गुजराती महिला को आज डोलना आता है, गूंजना आता है, रवभरी चाल चलना आता है। इस सब में नानालाल के रास तथा गीतों का काफी योगदान है। उनके रास तो गुजराती महिलाओं के कंठ पर हमेशा के लिए बैठ गए हैं। इनमें नानालाल ने गोपी, कृष्ण, बांसुरी, गोरस, नैसर्गिक सौंदर्य आदि माध्यमों से अपने विचार प्रकट किए हैं।


नानालाल के नाटक


नानालाल ने अनेक नाटक भी लिखे हैं, जिसमें कुछ ऐतिहासिक नाटक भी हैं। “संघमित्रा” , “शहंशाह अकबर शाह” जैसे ऐतिहासिक नाटक हैं। “राजर्षि भरत” पौराणिक नाटक है। उनकी सब रचनाओं में हमें एक कवि के दर्शन होते हैं।


नानालाल के निबंध


उन्होंने निबंध भी लिखे। गीता, मेघदूत, शाकुंतलम् तथा पांच उपनिषदों का भाषांतर भी किया। कवि को केवल गुजराती से ही नहीं, हरेक भाषा से प्रेम था। वह समझते थे कि जितनी हो सके, उतनी भाषाएं हमें जाननी चाहिए। इससे हमें अपनी भाषा का विकास करने में मदद मिलेगी। कवि ने गुजराती भाषा को कई नए तेजोमय शब्द दिए हैं और भाषा को समृद्ध बनाया है।

जब नानालाल पचास वर्ष के हुए तब सारे गुजरात में उनकी स्वर्ण जयंती मनाई गई। जब वह साठ साल के हुए तब भी बड़ी धूम-धाम से “हीरक जयंती” मनाई गई | इस अवसर पर कवि ने गुजरात में जगह-जगह जाकर भाषण दिए।


नानालाल की मृत्यु


९ जनवरी १९४६ को ६९ साल की उम्र में उनका देहांत हुआ | १८९९ में उनका पहला काव्य “बसंतोत्सव” प्रकाशित हुआ था। तब से ४६ साल तक बराबर उन्होंने गुजराती भाषा की सेवा की।

नानालाल ने कविता, नाटक, निबंध आदि लिखकर गुजराती भाषा को विविध क्षेत्रों में समृद्ध बनाया। जब वह २१ साल के थे, तब उनके पिता का देहांत हो गया था। पिता को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपनी कविता में कवि ने इस बात की चर्चा की कि उन्होंने नासमझी की अवस्था में किस तरह माता-पिता को परेशान किया था और फिर उसके लिए माफी चाही।

कवि के देहांत के बाद राजकोट के राजकुमार कालेज में उनकी याद में एक स्मारक बनाया गया है। यह स्मारक नानालाल जी की भावनाओं का प्रतीक है। उनकी भावना के चार तत्व थे : सौंदर्य, प्रेम, भक्ति और शील। सौंदर्य के प्रतीक के लिए कमल का फूल है। उसके एक तरफ “सौंदर्य” लिखा है और दूसरी तरफ से आमने-सामने हंस हैं। प्रेम भावना के लिए जल सींचती तापस कन्या और हिरण हैं, भक्ति भाव का आलेखन दीपक को नमन करती हुई सुंदरी द्वारा कराया गया है शील का प्रतीक वृक्ष की डाल पर बैठे हुए दो पक्षी हैं। एक पक्षी हरी डाल पर तथा दूसरा सूखी डाल पर बैठा है।

पिता और पत्र दोनों के कवि होने का सुयोग एक विरल घटना है। पिता दलपतराम तथा पुत्र नानालाल दोनों ने मिलकर ११४ वर्ष तक अखंड काव्योपासना की। ऐसा उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है।

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