राधानाथ राय | Radhanath Ray


उनीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में उत्कल के जिन तीन साहित्यिकों ने उड़िया साहित्य को समृद्ध करने में हाथ बंटाया था, उनके नाम हैं फकीर मोहन सेनापति, राधानाथ राय और राव। इन तीनों में से फकीर मोहन उम्र में सबसे बड़े थे, उन्होंने अन्य दो साहित्यिकों के लिए साधना का मार्ग प्रशस्त किया था। फकीर मोहन उड़िया गद्य साहित्य के जन्मदाता थे । लेकिन राधानाथ राय मुख्यतः एक कवि थे। उनका काव्य अपनी रोचकता के कारण ५० वर्षों तक उड़िया साहित्य पर छाया रहा। उत्कलवासी उन्हें बड़े प्रेम से कविवर कहकर पुकारते हैं।



राधानाथ राय का जन्म | राधानाथ राय की शिक्षा


उन्हें स्कूली शिक्षा बहुत नहीं मिली, परंतु सरस्वती की उन पर बहुत कृपा थी। राधानाथ राय २७ सितंबर १८४८ में उड़ीसा के बालेश्वर जिले के केदारपुर ग्राम के एक सुसंस्कृत परिवार में पैदा हुए थे। बचपन से ही राधानाथ बड़े कमजोर शरीर के थे, इसलिए वह अपने माता-पिता से अलग होकर बहुत दिन बाहर नहीं रह सके। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए उस समय कलकत्ता जाना पड़ता था। राधानाथ कलकत्ते में रहकर अध्ययन करते थे, लेकिन हर समय अस्वस्थ रहने के कारण मैट्रिक परीक्षा देने के बाद वह बालेश्वर वापस लौट आए |

उन दिनों अंग्रेजों का राज था और देश में शिक्षित युवकों की संख्या बहुत कम थी। राधानाथ भी बालेश्वर जिले में पहले युवक थे जिन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। फकीर मोहन सेनापति ने अपने आत्म-चरित्र में लिखा है कि जिस दिन राधानाथ की मैट्रिक परीक्षा पास करने की खबर बालेश्वर के कलेक्टर के दफ्तर में उनके पिता सुंदर राय के पास पहुंची, उस दिन सुंदर राय के साथी विस्मित होकर आपस में बात करने लगे, “देखो सुंदर बाबू के लड़के राधानाथ ने हमेशा अस्वस्थ रहने के बावजूद परीक्षा में कैसा चमत्कार दिलाया है।“


राधानाथ राय के कार्य


राधानाथ को शिक्षा केवल मैट्रिक तक हो हुई थी क्योंकि अस्वस्थ रहने के कारण वह कल्कत्ते वापस न जा सकें। उड़ीसा में पढ़ाई का इंतजाम था ही नहीं। उन दिनों भारतीयों को किसी भी दप्तर में नौकरी आसानी से नहीं मिलती थी, लेकिन राधानाथ राव ही जिले के सबसे अधिक शिक्षित व्यक्ति थे। इसलिए उन्हें एक सरकारी स्कूल मे अध्यापक की नौकरी मिल गई । आगे चलकर राधानाथ बाबू अपनी कार्य कुशलता और प्रातिभा के बल पर स्कूलों के डिबीजनल इंस्पेक्टर के पद पर पहुंच गए और अंत में इसी पद से सेवानिर्वित्त हुए।


राधानाथ राय का साहित्य मे योगदान


राधानाथ राय एक अत्यंत नम्र व्यक्ति थे। वह बड़े विद्वान थे और कई भाषाओं के पंडित थे। परंतु अपनी साहित्यिक प्रतिभा तथा पांडित्य के लिए वह कभी भी अभिमान नहीं करते थे बल्कि उन्होंने आम जनता के एक दीन सेवक के रूप में मातृभूमि की सेवा की थी। उनकी साहित्यिक रचनाओं के कारण ही उड़िया साहित्य को एक नया रूप मिला। प्रकृति-वर्णन में तो उन्हें कमाल हासिल था। उन दिनों उड़िया भाषा में स्कूलों के बच्चों के लिए भी किताबें न थीं। इस अभाव की पूर्ति भी उन्होने शिष्य मधुसूदन राय के साथ मिलकर की |


राधानाथ राय का विलिका काव्य


वास्तव में कवि राधानाथ प्रकृति के पुजारी थे। वह प्रकृति की प्रत्येक वस्तु में परमात्मा की सत्ता का दर्शन करते थे। उनका एक मनोरम काव्य “विलिका” प्रकृति के वर्णन के कारण ही प्रसिद्ध हो गया है।

उड़ीसा यद्यपि प्राकृतिक सौंदर्य का भंडार है तथापि प्राचीन तथा मध्ययुगीन किसी भी कवि ने प्रकृति की तरफ इतना ध्यान नहीं दिया जितना कविवर राधानाथ ने अपनी कविताओं में दिया है। राधानाथ राय जब स्कूलों के इंस्पेक्टर के रूप में काम कर रहे थे उस समय उन्होंने लंबी छुट्टी लेकर भारत के विभिन्न स्थानों का भ्रमण किया था, फिर उड़ीसा लौटकर वहां के अनेक दर्शनीय स्थानों की सैर की। इस यात्रा के बाद कवि ने चिलिका काव्य की रचना की थी।


राधानाथ राय के पौराणिक, ऐतिहासिक और काल्पनिक कथाओं की रचना


पौराणिक, ऐतिहासिक और काल्पनिक कथाओं को लेकर राधानाथ राय ने केदारगौरी, चंद्रभागा महायात्रा और ऊषा आदि अनेक काव्य लिखे हैं। साधारण पाठक को यह काव्य अत्यंत रोचक लगते हैं।

कवि के चंद्रभागा काव्य में कोणार्क स्थित सूर्य मंदिर की स्थापना की कहानी वर्णित है। ऊषा काव्य में एक राजकुमार और राजकन्या के विवाह का वर्णन है ।


राधानाथ राय की ग्रंथावली


कविवर राधानाथ के समस्त काव्य एक ग्रंथावली के रूप में प्रकाशित हो चुके हैं। उड़िया साहित्य में यह ग्रंथावली एक अमूल्य रत्न समझा जाता है। कवि के लिए हुए दरबार काव्य से उनके देशप्रेम और गरीबों के प्रति उनकी सहानुभूति का परिचय मिलता है। संस्कृत भाषा के प्रकांड विद्वान होने के कारण राधानाथ ने कवि कालिदास की संस्कृत रचना “मेघदूत” का उड़िया भाषा में सफल अनुवाद किया था। कविता के अतिरिक्त कवि ने गद्य रचना भी की थी।


राधानाथ राय की मृत्यु


आजीवन अस्वस्थ रहने के कारण वह अधिक दिन जीवित न रह सके। लगभग ५० वर्ष की आयु में १७ अप्रैल १९०८ को उनका स्वर्गवास हुआ। राधानाथ राय आज जीवित नहीं हैं लेकिन घर-घर में उनकी रचनाएं पढ़ी जाती हैं।

उनकी समाधि कटक स्थित सतीचौरा में है जहां प्रतिवर्ष एक स्मृति सभा होती है जिसमें उड़ीसा के लेखक और कलाकार भाग लेते हैं।

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