श्रीपाद दामोदर सातवलेकर | Shripad Damodar Satwalekar


हमारे देश की सांस्कृतिक परंपरा सदैव बड़ी गौरवशाली रही है । अत्यंत प्राचीन काल से लेकर समय-समय पर अनेक ऋषि-मुनियों, संत-महात्माओं तथा विद्वान विचारकों ने यहां जन्म लिया और न केवल इसकी सांस्कृतिक परंपरा को बनाए रखा, बल्कि इसके गौरव को भी बढ़ाया। प्राचीनकाल में वाल्मीकि, वेद व्यास, आदि महान ऋषियों ने वेदों तथा उपनिषदों आदि की व्याख्या की, स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद आदि महापुरुषों ने मानवता को शांति सद्भावना और सच्चे ज्ञान का संदेश देकर हमारी प्राचीन संस्कृति को बनाए रखा।

वेदमूर्ति पंडित श्रीपाद दामोदर सातवलेकर इसी लड़ी के एक मूल्यवान मोती थे।


अनुक्रम (Index)[छुपाएँ]

श्रीपाद दामोदर सातवलेकर की जीवनी

श्रीपाद दामोदर सातवलेकर का जन्म

श्रीपाद दामोदर सातवलेकर की शिक्षा

श्रीपाद दामोदर सातवलेकर की चित्रकला

श्रीपाद दामोदर सातवलेकर पर लोकमान्य तिलक के प्रभाव

श्रीपाद दामोदर सातवलेकर के लेख

वैदिक राष्ट्रीय गीत की प्रकाशन

श्रीपाद दामोदर सातवलेकर की गिरफ्तारी

स्वाध्याय मंडली की स्थापना

संस्कृत स्वयं शिक्षक ग्रंथ की रचना

श्रीपाद दामोदर सातवलेकर का सम्मान

श्रीपाद दामोदर सातवलेकर को पदम विभूषण की उपाधि

श्रीपाद दामोदर सातवलेकर का निधन


श्रीपाद दामोदर सातवलेकर का जन्म


सातवलेकर जी का जन्म १९ सितंबर १८६७ को महाराष्ट्र में बंबई के निकट सावंतवाड़ी के कोलरगांव नामक ग्राम मे एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में हुआ था।


श्रीपाद दामोदर सातवलेकर की शिक्षा


उन्होंने बड़ी कठिन परिस्थितियों में शिक्षा पाई। सौभाग्यवश बचपन में ही उन्हें कुलगुरु श्री केलकर शास्त्री से पढ़ने का मौका मिला। शास्त्री जी बड़े मनोयोग से पढ़ाते थे। वह बच्चों में स्वयं पढ़ने की इच्छा पैदा कर देते थे। सातवलेकरजी को भी आठ-दस वर्ष की उम्र में संस्कृत और वेद पढ़ने में आनंद आने लगा। बाद में अपने साथियों के साथ मिलकर उन्होंने संस्कृत वाग्वर्धिनी सभा की स्थापना की, जिसकी बैठक में सब सदस्य संस्कृत में ही बोलते और भाषण करते थे।


श्रीपाद दामोदर सातवलेकर की चित्रकला


बचपन से ही उनकी रुचि चित्रकला में भी थी। आकृतियां बनाना और उनमें रंग भरने के नए-नए प्रयोग करने में उन्हें बड़ा आनंद आता था । अतः सावंतवाड़ी के टेक्नीकल स्कूल में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने बंबई के जे.जे.स्कूल आफ आर्टस् में दाखिला लिया और चित्रकला में डिप्लोमा प्राप्त किया। कुछ समय तक वहीं अध्यापक रहे। फिर चित्रकला और फोटोग्राफी का निजी व्यवसाय शुरू किया। यद्यपि यही व्यवसाय उनकी आजीविका का साधन था, फिर भी शुरू से ही संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन में उनकी विशेष रूचि थी। अपना बाकी समय वह वैदिक साहित्य के अध्ययन में लगाते थे। इसमें उन्हें बहुत रस मिलता था ।


श्रीपाद दामोदर सातवलेकर पर लोकमान्य तिलक के प्रभाव


इन्हीं दिनों सातवलेकर जी लोकमान्य तिलक के विचारों से बहुत प्रभावित हुए। देश में विदेशी शासन के विरोध में आंदोलन जोर पकड़ रहा था । फिर भला राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत सातवलेकर इससे अलग कैसे रहते | “केसरी” में प्रकाशित अपने लेखों में सातवलेकरजी ने अंग्रेजी सरकार की कड़ी आलोचना की और युवकों से पराधीनता के जुए को उतार फेंक देने के लिए संगठित प्रयास करने की अपील की।


श्रीपाद दामोदर सातवलेकर के लेख


आपका व्यक्तित्व दोहरा था, एक ओर तो वह राष्ट्रीय भावनाओं से प्रभावित होकर क्रांतिकारी कार्यों में सहयोग देते थे, दूसरी ओर वेदों का गहरा अध्ययन कर तथा उन्हें शुद्ध स्वरूप में पेंश कर राष्ट्रीय भावना जाग्रत करते थे। चाणक्य के सूत्र “आर्य कभी पराधींन नहीं हो सकता” में उनका दृढ़ विश्वास था । अतः भारत के स्वाधीन होने तक वह जन-जन में राष्ट्रीय भावना के बीज बोते रहे।

अपने व्यवसाय के सिलसिले में वह हैदराबाद गए और वहां एक स्टूडियो भी खोला। वहां वह निजाम हैदराबाद और उनके हाकिमों के चित्र बनाते थे। उनके बनाए हुए चित्र बहुत बढ़िया होते थे और चित्रों से उन्हें बहुत अच्छी आमदनी होती थी। परंतु खाली समय में वह वेदों का प्रचार करते और लोकमान्य तिलक का संदेश जनता को देते। प्रतिदिन सायंकाल राष्ट्रीय विचारों के देशभक्त युवक उनके यहां एकत्र होते और राजनीतिक प्रश्नों पर विचार-विमर्श होता।

सातवलेकरजी वहां भाषण देते। “राष्ट्रीय शिक्षा” और “स्वराज्य” उनके भाषणों के मुख्य विषय होते थे। हैदराबाद में उनके भाषणों की धूम मच गई। उनकी राजनीतिक सक्रियता बढ़ती देखकर अंग्रेजों को बड़ी घबराहट हुई और अंग्रेज रेजिडेंट ने निजाम पर दबाव डाला कि सातवलेकर जी को हैदराबाद से निकाल दिया जाए। निजाम नहीं चाहता था कि सातवलेकरजी हैदराबाद छोड़कर जाएं। उसने सातवलेकरजी से कहा कि आप वेदों का प्रचार छोड़कर केवल चित्रकारी करें, पर सातवलेकरजी न माने।


वैदिक राष्ट्रीय गीत की प्रकाशन


इन्हीं दिनों उनकी पहली पुस्तक “वैदिक राष्ट्रीय गीत” प्रकाशित हुई। इसमें राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत वेद मंत्रों की व्याख्या थी और राष्ट्र को स्वतंत्र और समुन्नत रखने के लिए साधनों का भी वर्णन था। इससे अंग्रेज रेजिडेंट और भी चिढ़ गया। ब्रिटिश सरकार ने इस पुस्तक को भड़काने वाला साहित्य घोषित कर जब्त कर लिया अंत में सातवलेकरजी ने वेद प्रचार त्यागने की जगह हैदराबाद त्यागना ही उचित समझा ।

हैदराबाद में आवास के दौरान ही सातवलेकरजी ने स्वामी दयानंदजी का “सत्यार्थ प्रकाश” पढ़ी। उसे पढ़कर वह आर्य समाज के संपर्क में आए और स्वामी श्रद्धांनंद की प्रेरणा से गुरुकूल कांगड़ी आ गए। वहां पर वह छात्रों को फोटोग्राफी, चित्रकला तथा वेदों की शिक्षा देते रहे। परंतु वहां भी देशभक्तों से उनका संपर्क बराबर बना रहा। मद्रास और लाहौर में भी वह कुछ समय रहे। लाहौर से भी अंग्रेज सरकार ने उन्हें निर्वासित कर दिया।


श्रीपाद दामोदर सातवलेकर की गिरफ्तारी


गुरुकुल कांगड़ी में अपने निवास के दौरान उन्होंने “वैदिक प्रार्थना की तेजस्विता” नाम से एक लेख लिखा । यह लेख कोल्हापुर से प्रकाशित मराठी मासिक पत्र “विश्व वृत्त” में छपा । बाद में उसी लेख को इलाहाबाद की एक हिंदी पत्रिका ने छाप दिया। ब्रिटिश सरकार इस लेख से कांप उठी और पत्र के संपादक व मुद्रक को तीन वर्ष की सजा दी। लेख के लेखक को तो इतना भयंकर समझा गया कि उन्हें पकड़ने के लिए ३०० सिपाही गुरुकुल कांगड़ी भेजे गए। लेख को राजद्रोह फैलाने वाला माना गया। एक वर्ष तक कैद काटने के बाद निरपराध सिद्ध होने पर सातवलेकरजी को छोड़ दिया गया, पर इस घटना का बहुत प्रभाव पड़ा। वह सोचने लगे कि यदि वेद की एक प्रार्थना से अंग्रेज सरकार इतना घबरा गई है तब तो निश्चय ही वेदों का ज्ञान और प्रसार देश के लिए परम उपयोगी होगा उन्होंने फैसला कर लिया कि में अपना शेष जीवन वेदों के प्रचार में ही लगाऊंगा।

कारावास में अपने अनेक ग्रंथों का अध्ययन किया और जेल से रिहा होते ही संस्कृत विद्या और वेदप्रचार में लग गए। चित्रकार ने तूलिका त्याग लेखनी को अपनी संगिनी बना लिया। वैदिक सिद्धांतों का जनता में प्रचार करना उनका मुख्य उद्देश्य बन गया ।


स्वाध्याय मंडली की स्थापना


अपने इस उददेश्य की प्राप्ति में उन्होंने सक्रिय राजनीति से विश्राम लेकर एक जगह जमकर वेद और वैदिक साहित्य के अनुशीलन तथा ग्रंथ प्रकाशन का निश्चय किया। इसलिए १९१८ में उन्होंने महाराष्ट्र के आँध (जिला सतारा) स्थान पर “स्वाध्याय मंडली” की स्थापना की।

यहां से नियमित रूप से उत्तम व्याख्या सहित वैदिक साहित्य का प्रकाशन आरंभ हुआ। पहले, उपनिषदों के हिंदी भाष्य नई व्याख्याओं सहित निकाले। इसके बाद उन्होंने चारों वेदों के शुद्ध संस्करण छापे। इसके अलावा उन्होंने संस्कृत में “अमृतलता”, हिंदी में “वैदिक धर्म” और मराठी में “पुरुषार्थ” नामक मासिक पत्रिकाओं का प्रकाशन भी शुरू किया। गुजराती में भी इसी उद्देश्य से वह एक मासिक पत्रिका निकालते थे, कुल मिलाकर उन्होंने लगभग ४०० पुस्तकें तथा ग्रंथ लिखे, जिनमें महाभारत और रामायण की टीका अत्यंत महत्वपूर्ण और उच्च कोटि की रचनाएं मानी जाती हैं। श्रीमद्भागवत का अनुवाद “पुरुषार्थ बोधिनी" तो उनका उल्लेखनीय ग्रंथ है। कई भारतीय भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है।


संस्कृत स्वयं शिक्षक ग्रंथ की रचना


जनसाधारण में संस्कृत का प्रचार हो, यह उनका प्रिय कार्य था। उन्हें यह देखकर बहुत दुख होता था कि हमारे यहां संस्कृत की भारी उपेक्षा की जाती है जबकि विदेशों में संस्कृत का अध्ययन अधिकाधिक लोकप्रिय हो रहा है। इसके अलावा वह लोगों के इस वहम को भी दूर करना चाहते थे कि संस्कृत बड़ी कठिन भाषा है। इसलिए वह संस्कृत भाषा को आसान और लोकप्रिय बनाना चाहते थे। उन्होंने २४ खंडों में “संस्कृत स्वयं शिक्षक” नामक एक ग्रंथ की रचना की, जिसका उद्देश्य आसान तरीके से पाठकों को संस्कृत भाषा सिखाना था। सरदार पटेल, महात्मा गांधी, महादेव देसाई आदि ने इसी पुस्तकमाला द्वारा संस्कृत का ज्ञान प्राप्त किया था । देश में हजारों और लोगों ने भी उनकी इस पुस्तकमाला से व्यवहार योग्य संस्कृत का ज्ञान प्राप्त किया।


श्रीपाद दामोदर सातवलेकर का सम्मान


सातवलेकरजी के वेदविषयक महान कार्य को देखते हुए उन्हें अनेक संस्थाओं ने सम्मानित किया। इसमें संदेह नहीं कि उन्हें विभिन्न क्षेत्रों में जितना सम्मान मिला, उतना अन्य किसी संस्कृत विद्वान को कभी नहीं मिला। 'महामहोपाध्याय', 'साहित्य वाचस्पति', 'ब्रह्मर्षि', "गीतालंकार', 'वेद वाचस्पति' आदि उपाधियां उन्हें प्रदान की गई। कई विश्वविद्यालयों ने उन्हें डाक्टर आफ लिट्रेचर की उपाधि दी।


श्रीपाद दामोदर सातवलेकर को पदम विभूषण की उपाधि


२६ जनवरी १९६८ को राष्ट्रपति की ओर से 'पदम विभूषण' की उपाधि से विभूषित किया गया। उनका सौवां जन्मदिन भी बड़ी धूम-धाम से मनाया गया।

भारत के स्वतंत्र होने तक सातवलेकरजी औंध में ही रहे। 1948 में आपने औंध छोड़ा और गुजरात में बलसाड़ के निकट पारडी में १८ एकड़ क्षेत्र में आश्रम बनाया । स्वाध्याय मंडल का काम वहां भी पूरे उत्साह तथा जोर-शोर से जारी रहा। १०० वर्ष से अधिक उम्र के होने के बावजूद वह अंत तक पूरी तरह स्वस्थ रहे। वह बिना सहारे के बैठते थे। सुनने और लिखने-पढ़ने में भी उन्हें कोई कठिनाई नहीं होती थी। प्रतिदिन आठ घंटे स्वाध्याय भी करते थे। अपनी दीर्घायु का रहस्य वह बताते थे संयम, प्राणायाम तथा नियमित दिनचर्या को। उन्होंने कभी भी नशा नहीं किया। यहां तक कि अपने जीवन के १०१ वर्षों में उन्होंने चाय भी केवल एक ही बार पी थीं, वह भी तब जब कोल्हापुर के महाराजा ने उन्हें बुलाकर स्वयं चाय पिलाई । उस समय वह “ना” न कर सके। काफी, कोको आदि भी उन्होंने कभी नहीं पी। भैंस का दूध भी वह कभी नहीं पीते थे सुबह शाम केवल गाय का दूध पीते थे। भोजन में रोटी, दाल तथा सब्जियां लेते थे । इसके अतिरिक्त सुबह-शाम नियम से प्राणायाम करते थे। वह अंत समय तक बराबर संस्कृत तथा भारतीय संस्कृति की सेवा में लगे रहे।


श्रीपाद दामोदर सातवलेकर का निधन


आधुनिक भारत के इस महान व्यक्ति का निधन ३१ जुलाई १९६८ को हुआ।

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