आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी | Acharya Mahavir Prasad Dwivedi


आज राष्ट्रभाषा हिंदी को हम जिस रूप में देखते हैं, वह रूप देने का बहुत कुछ श्रेय है, महावीर प्रसाद द्विवेदी को। भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके सहयोगियों ने आधुनिक हिंदी की नींव डाली थी और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनके साथियों ने उस पर हिंदी साहित्य की विशाल इमारत खड़ी की।


आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म | Birth of Acharya Mahavir Prasad Dwivedi


आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म १५ मई १८६४ को उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के दौलतपुर ग्राम में एक गरीब परिवार में हुआ था | आपके पिता श्री रामसहाय रोजी कमाने मुंबई चले गए थे। अपने एकमात्र पुत्र का नाम उन्होंने महावीर सहाय रखा।


आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की शिक्षा | Education of Acharya Mahavir Prasad Dwivedi


जब महावीर प्रसाद सहाय कुछ बड़े हुए तो अपने गाँव की पाठशाला में दाखिल हुए और वहीं उन्होंने उर्दू-फारसी की शिक्षा प्राप्त की। संस्कृत भी घर में पढ़ी। पाठशाला के प्रमाणपत्र में इनका नाम महावीर प्रसाद लिखा हुआ था। आगे चलकर उनका यही नाम स्थाई बन गया।

बाद में अंग्रेजी पढ़ने के लिए वह रायबरेली के जिला स्कूल में दाखिल हुए। पर गरीबी इतनी थी कि सप्ताह के शुरू में पैदल चलकर ३० मील दूर गांव को जाते और सप्ताह-भर का आटा-दाल-चावल लेकर वापस रायबरेली आते। स्कूल की थोड़ी-सी फीस भी मुश्किल से जुट पाती। इस बीच उनका विवाह भी हो गया। पढ़ाई समाप्त करके वह अपने पिता के पास मुंबई चले गए और वहां रहकर उन्होंने संस्कृत, गुजराती, अंग्रेजी, मराठी का भी थोड़ा-सा अभ्यास कर लिया।


महावीर प्रसाद द्विवेदी के कार्य | Works of Mahavir Prasad Dwivedi


मुंबई में जहां वह रहते थे, वहीं पड़ोस में कुछ रेलवे के बाबू भी रहते थे। उन्हें देखकर महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भी रेलवे में नौकरी कर ली। अजमेर में रहते हुए उन्हें १४ रुपये मासिक वेतन मिलता था। इन १५ रुपयों में से वह पांच रुपये घर भेजते थे, पांच रुपये से अपना खर्चा चलाते थे और बाकी बचे पांच रुपयों से एक गृह-शिक्षक रखकर विद्याध्ययन करते थे। इससे पता चलता है कि उन्हें विद्याध्ययन में प्रारंभ से ही कितनी रुचि थी।

अजमेर से महावीर प्रसाद द्विवेदी जी पुनः मुंबई आ गए और तार का कार्य सीखा। यहीं से उन्नति करते-करते वह टेलीग्राफ इंस्पेक्टर नियुक्त हुए और झांसी चले गए। १५ रुपये मासिक से बढ़कर उनकी मासिक आय २०० रुपये तक जा पहुंची थी। उनकी कार्यकुशलता से उनके अधिकारीगण बड़े प्रसन्न थे। परंतु वह बड़े स्वाभिमानी थे।

एक बार जब सुपरिटेंडेंट से झगड़ा हो गया तो उन्होंने नौकरी से तत्काल त्यागपत्र दे दिया। लोगों एवं अधिकारियों के बहुत समझाने पर भी वह न माने और जो त्यागपत्र एक बार दे दिया, सो दे दिया।


महावीर प्रसाद द्विवेदी का साहित्य | Literature of Mahavir Prasad Dwivedi


साहित्य की ओर उनका झुकाव बचपन से ही था। मुंबई पहुंचकर वह रुचि और भी बढ़ गई। वह कविताएं लिखने लगे। प्रारंभ में समय की परिपाटी के अनुसार वह भी ब्रजभाषा में लिखते थे, परंतु जल्दी ही वह समझ गए कि ब्रजभाषा की जगह बोलचाल की भाषा को ही अपनाना होगा। इसलिए उन्होंने खड़ी बोली में लिखना शुरू कर दिया। रेलवे में नौकरी करते समय भी लिखने में उनकी रुचि बनी रही। वह उस समय की सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली मासिक पत्रिका सरस्वती में लेख आदि भेजा करते थे। एक बार उन्होंने इंडियन प्रेस से प्रकाशित होने वाली हिंदी शिक्षावली तृतीय रीडर की कटु आलोचना की, जिस कारण इस प्रेस वालों को बहुत अधिक आर्थिक हानि हुई। किंतु यह आलोचना इतनी अच्छी थी कि इससे प्रभावित होकर श्री चिंतामणि घोष ने इन्हें सरस्वती का संपादक बना दिया।

यहां इन्हें २३ रुपये मासिक वेतन मिलता था। कहां उन्होंने २०० रुपये की नौकरी को लात मार दी और कहां 23 रुपये मासिक की नौकरी स्वीकार कर ली। पर उनका सरस्वती पत्रिका का संपादक बनना ही वह घटना है, जिसने हिंदी साहित्य को एक नया रूप एवं नया मोड़ दिया।

सरस्वती के संपादक के रूप मे उन्होंने दो-तीन ऐसे महत्वपूर्ण कार्य किए कि हिंदी-जगत सदा उनका ऋणी रहेगा। हिंदी के संबंध में उनके कुछ निश्चित विचार थे। वह चाहते थे कि भाषा व्याकरण-सम्मत होनी चाहिए, क्योंकि वही भाषा बनी रह सकती है, जिसका व्याकरण निर्दोष हो। पाली और प्राकृत आदि भाषाएं इसी कारण लुप्त हो गई कि उनका व्याकरण निर्दोष नहीं था। वह यह भी चाहते थे कि वाक्य छोटे हों और भाषा में मुहावरों का यदासंभव प्रयोग किया जाए। उन दिनों की हिंदी में इन बातों पर बहुत ध्यान नहीं दिया जाता था। हर लेखक अपने ही ढंग से लिखना पसंद करता था इसलिए द्विवेदीजी ने पहले स्वयं अपनी भाषा सुधारी। सरस्वती में वह जो अमलेख, संपादकीय टिप्पणियां निबंध, कविताएं आदि लिखते थे, उनमें वह इन बातों का पूरा ध्यान रखते थे। इसके साथ ही सरस्वती में प्रकाशन के लिए जो रचनाएं आती थी, उनमें भी वह इन्ही बातों का ध्यान रखते थे। प्राप्त सामग्री का संशोधन और संपादन वह पूरी ईमानदारी के साथ खरेपन की कसौटी पर ही करते थे। किसी प्रकार की रूरियात करना उन्होंने सीखा ही न था। वह किसी का भी लिहाज न करते थे। इसलिए कई लोग उनसे रुष्ट भी रहते। इस काम में उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, किंतु उन्होंने इसकी कभी परवाह नहीं की। इसी कारण अपने क्षेत्र में उन्होंने एक नया मानदंड स्थापित करने में सफलता पाई।

लेखकों की भाषा सुधारने के साथ-साथ उन्होंने बहुत से नए लेखकों को भी तैयार किया। जब वह देखते थे कि किसी नए लेखक में प्रतिभा है, तो वह उसे तुरंत प्रोत्साहन देते थे, उसका मार्गदर्शन करते थे।

पं. देवीद्त शुक्ल को एक पत्र में उन्होंने लिखा था – “पोस्ट कार्ड मिला, दोनों लेख भी मिले। आपने बड़ी कृपा की। मैं बहुत कृतज्ञ हुआ। इन लेखों को सरस्वती में निकालने की अवश्य चेष्टा करूगा। अवकाश मिलने पर कुछ-न-कुछ अवश्य लिख भेजा कीजिए। जहां तक हो सके, भाषा सरल बोलचाल की हो। कि्लिष्ट संस्कृत शब्द न आने पाएं। मुहावरों का ख्याल रहे। वाक्य छोटे-छोटे हो।“

जिन नए लेखकों को वह प्रकाश में लाए, उनमें से कई आगे चलकर प्रसिद्ध कवि, लेखक और पत्रकार बने। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, पं. गिरधरशर्मा नवरत्न, गयाप्रसाद शुक्ल स्नेही, रूपनारायणजी पांडेय, पं. रामनरेश त्रिपाठी, ठाकुर गोपाल शरण सिंह आदि इनमें प्रमुख हैं अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी और श्री हरिभाऊ उपाध्याय ने तो उनके साथ सहायक के रूप में काम किया।

गद्य को सुधारने के साथ महावीर प्रसाद द्विवेदी ने पद्य को सुधारने पर भी उतना ही ध्यान दिया, उन दिनों आमतौर पर ब्रजभाषा में ही कविता की जाती थी | उन्होंने इन कवियों को बोलचाल की भाषा में कविता लिखने को प्रेरित किया। जब श्री मैथिलीशरण गुप्त ने उन्हें एक कविता ब्रजभाषा में भेजी, तो उसे लौटाते हुए उन्होंने कहा – “आपकी कविता पुरानी भाषा (ब्रजभाषा) में लिखी गई है हम बोलचाल की भाषा (खड़ी-दोली) में कविता छापना पसंद करते हैं। इसके बाद जब सरस्वती में गुप्तजी की हैमंत कवित छापी तो गुप्तजी यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि कविता में इतना अधिक संशोधन और परिवर्तन हुआ था कि वह उनकी रचना ही नही लगती थीं। बोलचाल की भाषा में कविता लिखने का गुर उन्होंने द्विवेदीजी से सीखा था।“

कविता को सुधारना कहीं अधिक कठिन होता है परंतु महावीर प्रसाद द्विवेदी को इसमें कमाल हासिल थी। दूसरों के लिखे पद्यो में से अनावश्यक पदों को वह अलग कर देते थे और स्वयं उसी छंट में दो-एक पद बनाकर वह कविता का तारतम्य नहीं बिगड़ने देते थे। गद्य लेखकों की ही तरह वह पद्य लेखकों को भी सुझाव दिया करते थे।

समालोचना के क्षेत्र में भी उनका योगदान कम नहीं। उन दिनों आलोचना के गंभीर और व्यापक रूप को ग्रहण करने वाला कोई नहीं था। उन्होंने सीधे-सादे ढंग से पुस्तकों की समालोचना प्रकाशित करके एक नई शैली को जन्म दिया। इस शैली के कारण पाठकों की रुची भी परिष्कृत हुई और वे गंभीर आलोचनाएं समझने योग्य भी बने।

महावीर प्रसाद द्विवेदी एक महान पत्रकार भी थे, सरस्वती को उन्होंने कोरी साहित्यिक पत्रिका नहीं बनाया, वह उसमें दुनिया-भर के विषयों पर लेख छापते थे, जो उन दिनों एक अनूठी बात थी। इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र आदि विभिन्न विषयों पर लेख लिखने के लिए उन्होंने भिन्न लेखकों को भी ढूंढ निकाला। सरस्वती के लिए अमरीका से सत्यदेव, भोलादत्त पांडे और रामकुमार खेमका, और अन्य देशों से संत निहालसिंह, सुंदरलाल, कृष्ण कुमार माथुर आदि विद्वान अपनी रचनाएं भेजा करते थे। कविवर नाथूराम शंकर शर्मा, पं. पद्मसिंह शर्मा, श्री बदरीनाथ भट्ट आदि तत्कालीन साहित्यकारों का सहयोग भी सरस्वती को मिला।

सरस्वती को रोचक बनाने के लिए भी उन्होंने बहुत चेष्टा की। रंगीन चित्र और व्यंग्य चित्र प्रकाशित किए। बालिकाओं तथा स्त्रियों के लिए विशेष रचनाएं छापी। कुल मिलाकर उन्होंने सरस्वती को इतने ऊंचे स्तर की पत्रिका बना दिया कि सरस्वती में रचना छपना बड़े गर्व की बात मानी जाने लगी।

महावीर प्रसाद द्विवेदी ने १७ वर्ष तक सरस्वती के माध्यम से हिंदी साहित्य की सेवा की। अपने इस संपादन काल में उन्होंने अपनी शक्ति से अधिक कार्य किया। इस कारण उनका स्वास्थ्य काफी गिर गया। १९२० में उन्होंने संपादन-कार्य से अवकाश ग्रहण कर लिया।

द्विवेदीजी ने इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र, पुरातत्व, समाजशास्त्र, विज्ञान, साहित्य, काव्य आदि सभी विषयों पर लिखा। उनके छोटे-बड़े ग्रंथों की संख्या कुल मिलाकर ८१ है। उन्होंने बालकों के लिए, तरुणों के लिए, महिलाओं के लिए, साधारण जनों के लिए, सभी के लिए लिखा।

लार्ड बैंकन के निबंधों का महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने हिंदी में अनुवाद भी किया। उनकी पुस्तकों में रसज्ञ रंजन, नैषध-चरित-वर्चा, कालिदास की निरंकुशता, नाट्यशास्त्र आदि प्रमुख है। द्विवेदीजी की संपूर्ण कविताओं का संग्रह द्विवेदी काव्यमाला नाम से प्रकाशित हुआ है।

सरस्वती पत्रिका से अवकाश ग्रहण करने के बाद वह अपने गांव में चले गए। वहां से भी वह प्रायः सरस्वती और अन्य पत्रिकाओं के लिए लिखा करते थे। परंतु अपने लेखों के साथ वह संपादक को लिख देते थे कि “लेख काम का हो तो छापिएगा, अन्यथा नहीं।“

द्विवेदीजी को गांव और ग्रामीण जीवन बहुत प्रिय था। भाषा के सुधार के साथ ग्राम-सुधार मे भी उनकी रुचि कम नही थी | गांव में जाकर उन्होंने ग्राम पंचायत संबंधी कानून पास करवाया, अपने गांव दौलतपुर के वह सरपंच भी रहे। इस नाते वह गांव वालों के झगड़े सुलझाने में बहुत मदद किया करते | गांव में रहते हुए ही उन्होंने होमियोपैथी की प्रैक्टिस शुरू की और गांव वालों का मुफ्त इलाज करने लगे।


महावीर प्रसाद द्विवेदी को प्राप्त सम्मान | Mahavir Prasad Dwivedi received the honor


सन् १९३१ में काशी नगरी प्रचारिणी सभा ने हिंदी का प्रथम आचार्य मानकर उन्हें सम्मान प्रदान किया। दो वर्ष बाद उन्हें अभिनंदन ग्रंथ भेंट किया गया। इसी वर्ष डा. गंगानाथ झा के सभापतित्व में द्वेदी मेले का आयोजन किया गया।


महावीर प्रसाद द्विवेदी की मृत्यु | Death of Mahavir Prasad Dwivedi


जीवन के अंतिम दिनों में वह रोगग्रस्त हो गए। रोग निवारण के लिए बहुत प्रयत्न किए गए, पर सब विफल रहे। २१ दिसंबर १९३८ को हिंदी साहित्य का यह महारथी स्वर्ग सिधार गया।

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