बाबा खड़क सिंह | Baba Kharak Singh


बाबा खड़क सिंह हमारे स्वतंत्रता-संग्राम के एक बहुत बड़े सेनानी थे। वह पंजाब के प्रसिद्ध नेताओं में से थे। देश की आजादी के लिए वह १३ बार जेल गए थे और उन्होंने २० वर्ष का लंबा समय कारावास में काटा था।


बाबा खड़क सिंह का जन्म


उनका जन्म ६ जून १८६८ में पश्चिमी पाकिस्तान के प्रसिद्ध नगर सियालकोट में हुआ था। उनके पिता का नाम था, रायबहादुर सरदार हरी सिंह।


बाबा खड़क सिंह की शिक्षा


अपने नगर सियालकोट से इंटर की परीक्षा पास करने के पश्चात बाबाजी लाहौर चले आए, जहां से १८८९ में उन्होंने बी.ए. की डिग्री प्राप्त की। बी. ए. करने के पश्चात वह वकालत पढ़ने के लिए इलाहाबाद चले गए। किंतु अभी परीक्षा के दूसरे वर्ष में ही थे कि उनके पिता की मृत्यु हो गई।

इसके कुछ समय पश्चात उनके बड़े भाई का देहांत हो गया और घर का सारा बोझ उनके सिर पर आ पड़ा।

अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद बाबा खड़क सिंह कभी सरकारी नौकरी नहीं की थी। वह केवल थोड़े समय के लिए सियालकोट नगरपालिका के सचिव रहे, किंतु शीघ्र ही इस पद से त्यागपत्र दे दिया क्योंकि इस नगरपालिका के प्रधान अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर थे।


बाबा खड़क सिंह का राजनीतिक जीवन


बाबा खड़क सिंह का राजनीतिक जीवन १९१२ में शुरू हुआ, जब वह सियालकोट में हो रहे पांचवी अखिल भारतीय सिख कांफ्रेंस की स्वागत समिति के प्रधान चुने गए। १९१५ में वह तरन-तारन में होने वाली सातवीं सिख कांफ्रेंस के प्रधान चुने गए। उन दिनों सिख कांफ्रेस में अंग्रेजों के पिटठओं की संख्या अत्यधिक थी और उन्हें बाबा खड़क सिंह का प्रधान चुना जाना एक आख न भाया, बाबाजी अंग्रेजी राज के विरुद्ध थे। उन्होंने उन दिनों हो रहे पहले महायुद्ध में जर्मनों की हार तथा अंग्रजों की जीत का प्रस्ताव कांफ्रेंस में प्रस्तुत न होने दिया। उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया कि वह अंग्रेजों की विजय की शुभ कामना कदापि नहीं कर सकते और न ही अपने देश भारत को उनका गुलाम देख सकते हैं।

सन् १९१९ में अमृतसर के जलियांवाला बाग में हो रही एक सार्वजनिक सभा पर अंग्रेज जनरल डायर ने गोली चलाकर सैकड़ों निहत्थे हिंदुओं, सिखों तथा मुसलमानों को गोली का निशाना बनाया था और हजारों को जख्मी कर दिया था। इस घटना ने सारे देश में हलचल मचा दी थी और लोग इस बर्बरता का बदला लेने को उतावले हो उठे। पंजाब के कोने-कोने में अंग्रेजों के विरुद्ध घृणा की आग भड़क उठी। बाबा खड़क सिंहजी पर भी इस घटना का बहुत प्रभाव पड़ा और वह भारत को अंग्रेजों की दासता से छुड़ाने के लिए पूरी तरह राजनीति के मैदान में कूद पड़े। उनका नाम सारे देश में फैल गया।

१९१९ में होने वाले कांग्रेस-अधिवेशन के दिनों में महात्मा गांधी, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, मोतीलाल नेहरू, मदनमोहन मालवीय, डा. सत्यपाल, डा. किचलू, जिन्ना, मोहम्मद अली, शौकत अली - ऐसे प्रसिद्ध नेताओं के साथ बाबा खड़क सिंह का नाम भी बड़े गर्व से लिया जाता था।

क्योंकि मौलाना सन् १९२० में कलकत्ता में कांग्रेस का एक विशेष अधिवेशन हुआ, जिसके सभापति लाला लाजपतराय थे। इस सभा में महात्मा गांधी ने अंग्रेजों से असहयोग करने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। इस प्रस्ताव पर विचार करने के लिए २० अक्तूबर १९२० को लाहौर में बाबा खड़क सिंह के सभापतित्व में एक विशाल सम्मेलन हुआ, जिसमें महात्मा गांधी, डा. किचलू तथा अली बंधु जैसे चोटी के नेता सम्मिलित हुए। इस सम्मेलन में बाबा खड़क सिंह ने सिखों से गांधीजी के असहयोग आंदोलन में भाग लेने और कांग्रेस में सम्मिलित होने का अनुरोध किया।


बाबा खड़क सिंह का गुरुद्वारा मुक्त कराना


सिखों का कांग्रेस में शामिल होना, अंग्रेजों को एक आंख न भाया और वे सिखों में और बाबा खड़क सिंह के नेतृत्व को कमजोर करने के लिए तरह-तरह की चालें चलने लगे। उन दिनों सिखों के सारे गुरुद्वारे महंतों की संपत्ति थे। वे बहुत शक्तिशाली थे और मनमानी करते थे। इन महंतों की सहायता से अंग्रेजों ने बाबा खड़क सिंह के नेतृत्व में चलने वाले सिखों के स्वतंत्रता-संग्राम को कमजोर करने की चाल चली। बाबा खड़क सिंह के शहर सियालकोट में गुरु नानक देवजी की यादगार में एक ऐतिहासिक गुरुद्वारा बाबा दे बेर था, जिसका महंत गंडासिंह था। वह अपने धर्म और आचार-विचार फूट डालने से गिर चुका था | जनता इस गुरुद्वारे को महंत गंडासिंह से मुक्त कराना चाहती थी इसलिए इस गुरुद्वारे को मुक्त कराने के लिए मोर्चा आरंभ किया गया, जिसकी बागडोर बाबाजी को सौंप दी गई।

सियालकोट का डिप्टी कमिश्नर बाबाजी और उनके अनुयायियों की शक्ति से भयभीत था, इसलिए उसने गुरुद्वारे को ताला लगाकर उसके चारों ओर घेरा डाल दिया। बाबाजी कुछ सिखों का एक जत्था लेकर चल पड़े। डिप्टी कमिश्नर ने उन्हें रोकने का प्रयत्न किया और धमकाते हुए कहा आगे मत बढ़ो, जानते हो तुम कानून तोड़ रहे हो। किंतु वह तो गोली तक खाने को तैयार थे।

अपनी अचकन के बटन खोलकर वह मरने के लिए तैयार हो गए। उनकी निर्भयता देखकर डिप्टी कमिश्नर उनके रास्ते से हट गया और उन्होंने आगे बढ़कर गुरुद्वारे का ताला तोड़कर उस पर कब्जा जमा लिया। बाबा खड़क सिंह के नेतृत्व में सिखों की यह पहली जीत थी।


अंग्रेज़ो का कृपाण पर पांबदी लगाना


इसके कुछ समय पश्चात अंग्रेज सरकार ने सिखों की तीन फुट लंबी कृपाण पर पांबदी लगा दी। परंतु बाबाजी के आंदोलन के कारण अंत में सरकार ने घुटने टेक दिए और सिखों को कृपाण रखने की अनुमति मिल गई।


ननकाना साहब की घटना


फरवरी १९२१ में २५० सिखों का एक जत्था गुरु नानक देवजी के जन्म-स्थान ननकाना साहब के ऐतिहासिक गुरुद्वारे को वहां के महंत के कब्जे से मुक्त कराने के लिए गया। जत्थे पर महंत के किराए के आदमियों ने भयानक आक्रमण किया और लगभग २०० व्यक्तियों को बड़ी बेरहमी से कत्ल कर दिया, जिससे सिखों में हाहाकार मच गया। गुरुद्वारों में सुधार करने के विचार से सिख जनता ने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की स्थापना की। इसके प्रधान भी बाबा खड़क सिंह चुने गए । अंग्रेज सरकार को ननकाना साहब की दुर्घटना के पश्चात भी चैन न आया और नवंबर १९२१ में सिखों के दिलों को अधिक दुखाने के लिए पंजाब सरकार ने एक आज्ञा जारी करके अमृतसर के गुरुद्वारे हरि मंदिर के तोशाखाने की चाबियां वहां के डिप्टी कमिश्नर के हवाले कर दी और उसे तोशाखाने का संरक्षक बना दिया। सिख इस अपमानजनक निर्णय को न मान सके और बाबा खड़क सिंह के नेतृत्व में सारे पंजाब में अंग्रेज सरकार के विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया। हजारों सिख गिरफ्तार कर लिए गए।

बाबा खड़क सिंह और उनके साथियों को जेल में बंद कर दिया गया। किंतु अंत में सरकार ने तोशाखाने की चाबियां सिखों के हवाले कर दीं।

फरवरी १९२२ में जब लाला लाजपतराय गिरफ्तार कर लिए गए, तो बाबाजी को पंजाब कांग्रेस का प्रधान चुन लिया गया। प्रधान बनने के बाद उन्होंने सारे पंजाब में अंग्रेज सरकार के विरुद्ध धुआंधार भाषण दिए। मार्च १९२२ में उन्हें सरकार-विरोधी भाषण करने के अपराध में गिरफ्तार कर लिया गया और पांच साल के लिए डेरा गाजीखां की जेल में बंद कर दिया गया।


बाबा खड़क सिंह का अंग्रेज़ो द्वारा पगड़ी उतारना


जेल-अधिकारियों ने दिसंबर १९२२ में एक आदेश द्वारा राजनीतिक बंदियों पर पावंदी लगा दी कि सिख काली पगड़ी और हिंदू तथा मुसलमान गांधी टोपी नहीं पहन सकते। बाबा खड़क सिंह और दूसरे देशभक्त कैदियों ने इस आज्ञा को मानने से इंकार कर दिया। इस पर जेल-अधिकारियों ने जबरदस्ती बाबाजी के सिर से काली पगड़ी उतार दी। इस पर सभी ने निर्णय किया कि जब तक सरकार उन्हें पगड़ी और टोपी पहनने की अनुमति नहीं देती, तब तक वे कपड़े भी नहीं पहनेंगे और केवल मोडे या कच्छे में ही रहेंगे। अंत में सरकार ने सिखों को पगड़ी पहनने की आज्ञा दे दी, किंतु बाबाजी के उस समय तक पगडी पहनने से इंकार कर दिया जब तक कि सरकार हिंदुओं तथा मुसलमानों को गांधी टोपी पहनने की अनुमति नहीं देती। उनका कहना था कि केवल सिखों को पगड़ी पहनने की देकर सरकार “फूट डालो और राज करो” की चाल चल रही है। अंत में गांधी टोपी पहनने की अनुमति भी मिल गई।

सन् १९२८ में साइमन कमीशन भारत आया, जिसका देश के कोने-कोने में विरोध किया गया। पंजाब में कमीशन के विरुद्ध होने वाले प्रदर्शनों में बाबा खड़क सिंह ने बहुत जोर-शोर से काम किया।

सन् १९२९ में कांग्रेस ने देश के लिए औपनिवेशिक स्वराज का दर्जा प्राप्त करना स्वीकार कर लिया। किंतु बाबा खड़क सिंह ने इसका घोर विरोध किया, क्योंकि वह इसे भी अर्द्ध- दासता समझते थे | अंत में कांग्रेस ने भी जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में पूर्ण स्वराज्य को अपना लक्ष्य मान लिया।

सन् १९३२ में अंग्रेज प्रधानमंत्री रैम्जे मेकडोनल्ड ने भारत की विभिन्न जातियों में मतभेद उत्पन्न करने के लिए एक प्रदायिक पंचाट लागू किया। बाबा खड़क सिंह ने दूसरे राष्ट्रीय नेताओं की तरह इसका घोर विरोध किया और इसे ठुकरा दिया।


बाबा खड़क सिंह का राजनीति से अलग होना


दूसरे विश्वयुद्ध में बाबाजी ने नगर-नगर जाकर अंग्रेजों के विरुद्ध भाषण दिए, जिसका परिणाम यह हुआ कि १९४० में एक वर्ष के लिए आप कारागार में बंद कर दिए गए। बाबाजी देश की एकता के लिए जीवन-भर लड़ते रहे। वह देश के बंटवारे के भी विरोधी थे और अंखड भारत के स्वप्न देखते थे। इसलिए जब देश का बंटवारा हुआ, तो उन्हें अत्यधिक दुख हुआ। और फिर पाकिस्तान बनने के बाद जब वह भारत आ रहे थे, तो रास्ते में उनके इकलौते पुत्र पृथ्वीपाल सिंह की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई, जिससे उनका दिल टूट गया और वह दिल्ली आकर राजनीति से बिल्कुल अलग हो गए।

बाबा खड़क सिंह एक सच्चे देशभक्त, कर्मवीर और धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। वह जातिगत भेदभाव में विश्वास नहीं रखते थे। एक बार उनके पिता की बर्सी पर बहुत से सिख इसमें सम्मिलित हुए। ऊंची जात के कुछ सिखों ने नीची-जात के सिखों के साथ बैठकर प्रसाद खाने से इंकार कर दिया, किंतु बाबाजी ने कहा – “कुछ भी हो, नीची जात के सिखों को भी उनके साथ ही प्रसाद दिया जाएगा, क्योंकि सिख धर्म ऐसे भेदभाव का निषेध करता है।“

उन्होंने जीवन-भर जनता की सेवा निःस्वार्थ भाव से की। एक बार जब बर्मावासी भारतीयों के निमंत्रण पर वह बर्मा गए, तो वहां के भारतीयों ने उनको कई थैलियां भेंट कीं। परंतु उन्होने उन रुपयों को अपने निजी खर्च में लाने से इंकार कर दिया और कहा कि इस रुपये को जनता के हित में खर्च किया जाए।


बाबा खड़क सिंह की मृत्यु


६ अक्तूबर १९६३ को ९६ वर्ष की आयु में बाबा खड़क सिंह की मृत्यु हो गई और भारत का एक महान स्वतंत्रता सेनानी हमारे बीच से उठ गया।

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