यतींद्र नाथ मुखर्जी | बाघा यतीन | Bagha Jatin


आजादी की लड़ाई में सर पर कफन बांधे जो क्रांतिकारी हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए थे और जिनकी पिस्तौलों से सात समुद्र पार विलायत से आए गोरे शासक दहल गए थे, उनमें यतींद्रनाथ मुखर्जी का नाम सदा आदर से लिया जाएगा। अंग्रेज सरकार उन्हें सबसे खतरनाक अराजकतावादी मानती थी।


यतींद्र नाथ मुखर्जी का जन्म


यतींद्र नाथ मुखर्जी जन्म ७ दिसंबर, १८७९ को नदिया जिले में काया नामक स्थान पर मामा के घर हुआ था । उनका बचपन भी वहीं बीता, क्योंकि बचपन में ही उनके पिता का देहांत हो गया था और उनकी मां अपने भाई के घर रहने लगी थी।


बाघा यतीन | बाघा जतीन


बचपन से ही उन्हें खेल-कूद और व्यायाम में काफी दिलचस्पी थी। वह एक अच्छे खिलाड़ी, बढ़िया तैराक, दक्ष घुड़सवार और पहलवान थे। वह निडर इतने थे, कि एक बार एक खूंखार चीते को उन्होंने छुरे से ही यमलोक पहुंचा दिया। इसी कारण वह “बाघा यतीन (बाघा जातीन)” के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

उनके मामा सामाजिक कार्यों में बड़ी रुचि लेते थे। इसलिए उनके यहां तरह-तरह के लोग आया करते थे। बालक यतींद्र पर भी इसका प्रभाव पड़ा। वह भी दीन-दुखियों की सेवा करने लगे। देशप्रेम की भावना भी तभी उनके मन में जागृत हुई। फलतः एक ओर जहां उनका चरित्र इस्पात सा कठोर था वहां दूसरी ओर बहुत कोमल भी था ।


यतींद्र नाथ मुखर्जी की शिक्षा


सन् १८९८ में कृष्ण नगर ए.वी. स्कूल से एंट्रेंस परीक्षा पास करने के बाद वह सेंट्रल कालेज, कलकत्ता में दाखिल हुए। किंतु देश के लिए कुछ करने या मरने की भावना उनके दिलो-दिमाग में घर किए हुए थी। इसलिए उन्होंने पढ़ाई-लिखाई की ओर विशेष ध्यान दिया ही नहीं।

१९०० में उन्होंने कालेज की पढ़ाई छोड़ दी और स्वतंत्र जीवन निर्वाह के लिए नौकरी कर ली। कुछ समय तक कलकत्ते के एक व्यापारी के दफ्तर में स्टेनोग्राफर रहे। फिर मुजफ्फरपुर जाकर बैरिस्टर कैनेडी के यहां स्टेनोग्राफर बने। उसके बाद १९०३ में बंगाल सचिवालय में टाइपिस्ट बन गए।


यतींद्र नाथ मुखर्जी का क्रांतिकारियों के संपर्क में आना


कलकत्ता में ही वह अरविंद घोष और यतींद्रनाथ बनर्जी जैसे प्रसिद्ध क्रांतिकारियों के संपर्क में आए, जिससे उनके जीवन में एक नया मोड़ आया । इन दोनों क्रांतिकारियों ने उन्हें आजादी की लड़ाई में अपना सब कुछ न्यौछावर करने के लिए प्रेरित और कटिबद्ध किया। सन् १९०४ में वह बंगाल सरकार के वित्त सचिव के स्टेनोग्राफर नियुक्त हुए। इसी पद पर रहते हुए उन्हें १९०७ में दार्जिलिंग भेजा गया। जहां वह काफी लोकप्रिय हो गए। देशभक्ति का जोश तो था ही, १९०८ में उन्होंने दो गोरे अफसरों को पीट दिया। इस कारण कुछ दिन तक उन पर मुकदमा चला, जो बाद में वापस ले लिया गया | इस मुकदमें में मजिस्ट्रेट ने भी उन्हें भविष्य में अच्छा व्यवहार करने की चेतावनी दी। इस पर यतींद्रनाथ ने जवाब दिया था कि – “मैं यह विश्वास नहीं दे सकता कि अपने अथवा अपने देशवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए भविष्य में हाथ नहीं उठाऊंगा।“

फलतः जून १९०८ में उनका तबादला कलकत्ता कर दिया गया। २७ जनवरी, १९१० अर्थात् अपनी गिरफ्तारी तक वह कलकत्ता में ही रहे।


यतींद्र नाथ मुखर्जी के कार्य


यतींद्रनाथ उन दिनों कलकत्ता में मानिकतला के पास ही रहते थे। पहले मानिकतला क्रांतिकारियों का गढ़ था । परंतु क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी और कलकत्ता की अनुशीलन समिति के गैर-कानूनी करार दिए जाने के बाद, बंगाल का राजनीतिक जीवन सूना-सूना हो गया था । नेताओं को या तो जेल में बंद कर दिया गया था, या देश निकाले की सजा दे दी गई थी। सरकार तेजी से दमनचक्र चला रही थी । ऐसे कठिन समय में क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं को यतींद्रनाथ मुखर्जी का सहयोग मिला। उन्होंने अपने को राजनीतिक तूफान में झोंक दिया और हावड़ा, नदिया, खुलना, जैसोर, राजशाही और चौबीस परगना आदि में घूम-घूमकर गुप्त समितियों का संगठन किया और बहुत से युवकों को क्रांति का मंत्र सिखाया।

उन्हें विश्वास था कि केवल सशस्त्र क्रांति से ही अंग्रेज शासक घुटने टेक सकते हैं। लेकिन साथ ही वह यह भी महसूस करते थे, कि इस लड़ाई में आम जनता का सहयोग भी परमावश्यक है। इसलिए उन्होंने कलकत्ता मैडीकल कालेज अस्पताल के पीछे आत्मोन्नति समिति कायम की, ताकी वह क्रांतिकारी कार्यों का केंद्र बन सके। इसमें काफी पढ़े-लिखे लोग शामिल हुए।

यद्यपि यतींद्रनाथ मुखर्जी का विचार छोटी-मोटी राजनीतिक डकैती या सरकारी अफसरों की हत्याओं का कतई न था, फिर भी उन्हें यह सब बाध्य होकर करना पड़ा क्योंकि पैसे के बिना काम चलाना संभव नहीं था।

उनके नेतृत्व में एक डकैती नदिया में १९०८ में डाली गई।

फिर १९१० में डिप्टी पुलिस सुपरिटेडेट आलम की हत्या हुई। उसमें भी उनका प्रमुख हाथ था। इसी हत्या के संदेह में जनवरी १९१० में वह गिरपतार कर लिए गए, किंतु छूट गए । फिर दोबारा भी वह गिरफ्तार किए गए और उन पर डकैतो के गिरोह का सदस्य होने का अभियोग लगाकर मुकदमा चलाया गया, लेकिन यह मुकदमा भी उनके खिलाफ टिक न सका लेकिन वह अभी जेल में ही थे कि तीसरा मुकदमा भी चलाया गया। हाई कोर्ट के विशेष ट्रि्यूनल के सामने उन्हें पेश किया गया लेकिन इस बार भी वह छूट गए।

सन् १९११ में उन्हें सरकारी नौकरी से बरखास्त कर दिया गया और आजीविका के लिए वह ठेकेदारी करने लगे। साथ ही बंगाल के क्रांतिकारियों से उनका संपर्क बढ़ने लगा । 1913 में बमान और विरदापुर में भयंकर बाढ़ आई, जिससे लोग तबाह हो गए। यह बाढ क्रांतिकारियों के लिए वरदान साबित हुई, क्योंकि उन्हें सहायता कार्य के बहाने लोगों से निकट संपर्क स्थापित करने का मौका मिला। इसके बाद १९१३ में क्रांतिकारी नेताओं के मन में विभिन्न क्रांतिकारी दलों को एक-जुट होकर काम करने का विचार पनपने लगा ।

१९१४-१५ तक यह दल एक-जुट होकर काम भी करने लगे। फिर १९१४ के अगस्त महीने में जो प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ा, उससे क्रांतिकारियों को नया बल मिला और उनके सोचने की दिशा बदल गई। वे लोग दूसरी सशस्त्र क्रांति की बात सोचने लगे। बंगाल के क्रांतिकारियों को बर्लिन से आए, जितेंद्रनाथ लाहड़ी ने बताया कि वे बटाविया स्थिति जर्मन दूतावास में अपना कोई आदमी भेजें क्रांति के लिए आवश्यक धन और हथियार उन्हें हासिल होंगे। फिर क्या था, क्रांतिकारियों की बांछें खिल गई।

दूसरी ओर क्रांतिकारियों ने श्याम और जावा में पहले से ही अपने अड्डे खोल रखे थे। क्रांतिकारियों ने तय किया कि सशस्त्र क्रांति की जाए। इसके लिए धन जुटाने के उद्देश्य से कई डकैतियां डाली गई और हजारों रुपये इकट्ठे किए गए, जर्मनी से भी काफी धन मिला । शंघाई और बैंकाक से भी रुपये मिलने लगे । वटाविया से खबर मिली कि शस्त्रों को लेकर एक जहाज भारत पहुंचेगा। तय हुआ कि रायमंगल में इस जहाज से हथियार उतारे जाएं। लेकिन यह देश का दुर्भाग्य था कि बीच में ही इस जहाज का रहस्य खुल गया और हथियार क्रांतिकारियों के हाथ नहीं लग सके। दूसरी ओर पुलिस की सी. आई.डी. ने १९१५ में कलकत्ता की हैरी एंड संस नामक दुकान पर छापा मारा, जहां क्रांतिकारियों का एक अड्डा था। पुलिस को यह भी पता चल गया कि यतींद्रनाथ मुखर्जी उड़ीसा में मयूरगंज राज्य की पहाड़ियों के बीच काप्तीपद नामक स्थान पर छिपे हुए हैं। फलतः ५ सितंबर, १९१५ को एक पुलिस दस्ता बालेश्वर (उड़ीसा) जा पहुंचा और क्रांतिकारियों के एक और अड्डे, यूनिवर्सल एम्पोरियम की तलाशी ली। वहां भी जो कागजात बरामद हुए उनसे भी यह बात जाहिर हो गई कि पिछले कई महीनों से काप्तीपद, यतींद्रनाथ मुखर्जी का गढ़ बना हुआ है


यतींद्र नाथ मुखर्जी की मृत्यु


यतींद्रनाथ मुखर्जी को भी ६ सितंबर १९१५ की रात को एक आदमी के जरिये यह खबर मिल गई, कि पुलिस का दस्ता काप्तीपद डाक बंगले में पहुंच चुका है। फलतः सुबह से पहले पुलिस की पकड़ से बाहर होने के लिए यतींद्रनाथ मुखर्जी अपने साथी चित्तप्रिय और मनोरंजन के साथ रातों-रात तालडीहा की ओर चल पड़े। वह बालेश्वर स्टेशन भी पहुंच गए, लेकिन गाड़ी से रवाना होने की योजना बदल दी और पास के एक गांव में जा पहुंचे।

नदी को पार कर जब वे लोग ९ सितंबर १९१५ की सुबह में गांव में पहुंचे, तो गांव वालों ने उन्हें डकैत समझा और उनका पीछा किया। ये लोग काफी थके-मांदे, भूखे प्यासे थे। फिर भी ये लोग गांव वालों की पकड़ से बाहर होने की कोशिश में आगे ही बढ़ते जा रहे थे। उधर पुलिस को भी खबर मिल गई और वे लोग आ पहुंचे। फिर जमकर दोनों ओर से गोलियां चली।

लेकिन कहां पुलिस वालों का भारी जत्था और कहां केवल ५ क्रांतिकारी शूरवीर अपनी छोटी-छोटी पिस्तौलों और थोड़ी सी कारतूसों के साथ | नतीजा वही हुआ जो होना चाहिए था।

एक क्रांतिकारी तो वहीं खेत रहा और दो बुरी तरह घायल हुए। तभी पुलिस उन्हें पकड़ सकी। पुलिस से लड़ते-लड़ते जिस क्रांतिकारी ने घटनास्थल पर ही वीरगति पाई थी, वह थे चित्तप्रिय ।

घायल होकर अस्पताल में भर्ती होने वाले थे - यतींद्रनाथ मुखर्जी और ज्योतिष पाल, पुलिस ने जिन्हें हिरासत में ले लिया था वे थे मनोरंजन और नीरेंद्र।

१० सितंबर, १९१५ को अस्पताल में यतींद्रनाथ मुखर्जी का देहावसान हो गया। मनोरंजन और नीरेंद्र को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। ज्योतिष पाल को आजीवन कारावास की सजा मिली। वह बाद में पागल होकर बरहामपुर जेल में मर गए। इस प्रकार अपने गर्म-गर्म खून से आजादी के इन दीवानों ने भारतीय राष्ट्रवाद के पौधे को सींच-सींचकर इतना बढ़ाया कि आज हम आजाद हैं।

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