भैरवी चक्र साधना | Bhairavi Chakra Sadhna

भैरवी साधना | भैरवी चक्र साधना विधि | भैरवी साधना मंत्र | भैरवी मंत्र | भैरवी विद्या



भैरवी चक्र साधना में जाति धर्म पर विचार नहीं होता। यह साधना सभी साधकों को समानता देती है। इसमें छुआ-छूत का विचार नहीं है। इसमें भोजन के शाकाहार या मांसाहार का विचार नहीं है। समाज की निम्न जातियां जो खाती-पीती हैं, उन्हीं से चक्र साधना की जाती है।



भैरवी चक्र साधना का इतिहास


यह साधना पद्धति हजारों बरस पुरानी है । वाममार्गी की साधना करने वाले सिद्ध अवधूत और तांत्रिक इस उपासना के जरिए ऐसी सिद्धियां प्राप्त करते हैं, जिनकी हम आसानी से कल्पना भी नहीं कर सकते ।

इस उपासना पर तांत्रिक बौद्ध संप्रदाय का प्रभाव माना जाता है। इस मामले में विद्वानों ने अनेक बातें कही हैं | चक्रानुष्ठान पर बौद्ध साधना का कितना प्रभाव है इस बारे में भरोसे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता। तंत्र शास्त्र की पुस्तकों में जो वर्णन मिलता है। उसमें कहीं-कहीं बौद्ध साधना का उल्लेख नहीं किया गया है।

नवरात्र में आदिशक्ति को प्रसन्न करने के लिए करोड़ों भक्त सात्विक द्रव्यों द्वारा पूजन करते हैं। इसी पर्व पर वाममार्गी तांत्रिक भैरवी चक्र साधना के जरिए जगदंबा को प्रसन्न करते हैं।


भैरवी चक्र साधना के नियम


भैरवी चक्र का आयोजन करने के बारे में कोई खास नियम तय नहीं किया गया है। साधक जिस समय, जिस घड़ी यह साधना करना चाहे, वह कर सकता है। इस साधना के लिए कोई शुभ मुहूर्त नहीं होता। सभी मुहूर्त इसके लिए शुभ होते हैं |

भैरवी चक्र साधना से साधकों का कल्याण होता है। इस साधना से प्रसन्न होकर भगवती अपने साधक को उसका मनचाहा वरदान देती हैं। साधना के आचार्य को “कुलाचार्य” कहा जाता है। साधना का स्थान सुंदर शांत और एकांत होना चाहिए। इस स्थान पर कुलाचार्य “क्लीं फट्” मंत्र से आसन को शुद्धकर उस पर बैठता है।

आसन पर बैठने के बाद सिंदूर, लाल चंदन या सिर्फ जल से त्रिकोण और चौकोण मंडल बनाना चाहिए। फिर रंगे हुए घड़े को स्थापित करके उसमें दही और अक्षत डालना चाहिए। घड़े पर सिंदूर का तिलक लगाना चाहिए। उस पर फल और पल्लव चढ़ाना चाहिए।


इस घड़े को सुगंधित जल से भर देना चाहिए। फिर प्रणव का पाठ करके मंडल पर इसे स्थापित कर देना चाहिए। धूप-दीप, गंध और पुष्प से इसकी पूजा करनी चाहिए। फिर इष्ट देवता का ध्यान कर उनकी संक्षिप्त पूजा करनी चाहिए।

इस चक्र पूजा में घट की स्थापना नही की जाती। पूजा का बहुत-सा विधान भी नहीं करना पड़ता । ब्रह्मज्ञान से संपन्न साधक को ही इसकी साधना करनी चाहिए। इस चक्र साधना का अधिपति केवल ब्रह्मनिष्ठ साधक ही हो सकता है। इसमें शामिल होने वाले सभी साधकों में ब्रह्मज्ञान होना चाहिए।

चक्र पूजा में जाति का विचार नहीं है, जूठन आदि का विचार भी नहीं किया जाता । चक्र पूजा में शामिल होने वाला हर साधक शिवा का रूप माना जाता है। इस साधना में देश काल का नियम नहीं है। पात्र अपात्र का विचार भी नहीं किया जाता। जो पुरुष चक्र साधना में उपयोग की जाने वाली कोई भी वस्तु लाता है, उसका इस्तेमाल करना उचित माना जाता है। अगर कोई वस्तु दूर देश से लाई गयी है, वह पकी हुई है या कच्ची है। उसे लाने वाला कुलाचारी वीर है या दीक्षा रहित पशु, वह वस्तु चक्र पूजा में आते ही पवित्र हो जाती है।

म्लेच्छ स्वपच, किरात या हूण जाति के लोग चक्र पूजा में कच्चा या पका द्रव ले आते हैं तो वह साधक के हाथ का स्पर्श पाकर स्वयं पवित्र हो जाता है। पाप से ग्रस्त लोग अगर चक्र पूजा का दर्शन कर लें तो उनके पाप नष्ट हो जाते है और वे पशुभाव से मुक्त हो जाते हैं | चक्र के अनुष्ठान को छिपाने की जरूरत नही है, जो साधक सचमुच ब्रह्म के रहस्य को जानते हैं, जो पशुभाव से मुक्त हैं, जो इंद्रियजित हैं, अवधूत हैं, वे भैरवी चक्र साधना को छिपाने की भावना मन में नहीं लाते | चक्र साधना में सम्मिलित होने वाले साधक को व्यर्थ बकवास नहीं करनी चाहिए। उसे किसी प्रकार की वाचालता नहीं दिखानी चाहिए। उसे पूजा के स्थान पर थूकना नहीं चाहिए, वायु भी नहीं छोड़नी चाहिए और वर्ण का विचार कभी नहीं करना चाहिए।

जो लोग क्रूर और दुष्ट है, कुल दूषक हैं, कौलाचार की निंदा करते हैं, वे अगर चक्र पूजा मं आ भी जायें, तो उन्हें बाहर निकाल देना चाहिए।


दिव्य चक्र


भैरवी चक्र से भी उत्तम, तत्व चक्र है। इसे दिव्य चक्र कहा जाता है। इस अनुष्ठान के अधिकारी ब्रह्मज्ञ साधक ही हो सकते हैं। जो साधक परबह्म के उपासक हैं, जो ब्रह्मज्ञान में तत्पर हैं, जिनका अंतःकरण शुद्ध है, जो सभी प्राणियों का हित करने में लगे रहते हैं, जो विवाद रहित शांत, दयाशील, दृढ़ व्रत सत्य संकल्प और ब्रह्म हैं, वही इस तत्व चक्र के अधिकारी हैं।


आनंद भैरवी श्लोक


इस पूजा में गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करनी चाहिए। साधक को सभी तत्व-द्रव्य सामने रखकर “फट्” मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। इससे पहले नौ पात्र की स्थापना करने की जरूरत नहीं है, साधक जितने पात्र स्थापित करना चाहें कर सकता है । लेकिन उसे पात्र में सुगंधित द्रव्य और फूल डालकर उसमें आनंद भैरव और आनंद भैरवी का ध्यान करना चाहिए। इस ध्यान के निम्न श्लोक पढ़ने चाहिए -

नवयौवन संपन्नां तरुणारुण विग्रहाम ।
चारुहासामृताभासोल्लसबद्वद्दनपंकजाम् ।।
नृत्यगीतकृतामोदां नानाभरणभूषिताम् ।
विचित्रवसनाध्यायेद्धराभय करांबुजाम् ।।

अर्थ - आनंद भैरवी नौ यौवना हैं। उनका शरीर तरूण अरुण के समान है। उनकी अति मनोहर हंसी से उनके वदन कमल की शोभा बढ़ रही है। वे नृत्य गीत में सदा आनंद बिखेरती रहती है। उन्होंने अनेक प्रकार के आभूषण धारण किये हैं। उन्होंने विचित्र वस्त्र पहन रखा है। वे एक हाथ से अपने भक्तो को वर और दूसरे हाथ से अभय दे रही हैं।


आनंद भैरव श्लोक


आनन्द भैरवी का ध्यान करने के बाद आनन्द भैरव का ध्यान इस प्रकार करना चाहिए -

कर्पूरूपूरधवलं कमलायताक्षं,
दिव्याम्बराभरणभूषितदेहकान्तिम् ।
वामेन पाणिकमलेन क्षुधाक्षपात्रं,
दक्षेण शुद्धिगुटिकान्दधतं स्मरामि ।।

अर्थ - आनन्द भैरव का शरीर कपूर के समान श्वेत वर्ण है। उनके नेत्र कमल के समान बड़े हैं। उनके शरीर पर दिव्य वस्त्र और दिव्य आभूषणों की शोभा दर्शनीय है। उनके बायें कर कमल में मद्य पात्र है और दाहिने कर कमल में मांस, मत्स्य और मुद्रा है। ऐसे आनन्द भैरव का ध्यान करने से भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

आनन्द भैरव और आनन्द भैरवी का ध्यान करने के बाद सुरा पात्र में दोनों की समरसता का विचार करना चाहिए। पहले प्रणव (ओंकार) फिर नाम और उसके बाद नमः का उच्चारण करके सुगन्धित द्रव्य और फूलों से सुरा का शोधन करना चाहिए।

सुरा शोधन का मंत्र “आं ही क्री स्वाहा” कहा गया है, इसका १०८ बार जप करना चाहिए। इस सम्बन्ध में शिव का आदेश है कि “कलिकाल में पंचमकार के द्वारा शक्ति आराधना सरल नहीं होगी, कुलाचार को ठीक से समझे बिना, उसके रहस्य को हृदयंगम किये बिना लोग अपनी वासनापूर्ति के लिए साधना का दिखावा करेंगे। इससे उनका अभीष्ट सिद्ध नहीं होगा।

कलियुग में मनुष्यों के अंदर संयम और सद्बुद्धि का अभाव होगा, उनका मन सहज ही काम के वशीभूत होगा, उनकी सामान्य छुद्र बुद्धि के कारण वे स्त्रियों को शक्ति के रूप में नहीं देख पायेंगे । इसलिए उनका पंचमकार के द्वारा पूजा करना उचित नहीं है। पंचमकार के तत्वों को जुटाने के बजाय देवी के चरणों का ध्यान कर मंत्र जपते हुए भैरवी चक्र साधना करना चाहिए।“


मधुत्रय क्या है ?


शिव ने आदितत्व-सुरा की जगह तीन मधुर द्रव्यों का विधान किया है। ये द्रव्य हैं- दूध, चीनी और शहद। इसे शास्त्र में मधुत्रय कहा गया है। चक्र पूजा में सुरा के स्थान पर मधुत्रय का भोग लगाया जा सकता है। इस निवेदन से भी देवता प्रसन्न होते हैं।

यदि साधक सचमुच कुलाचारी है, वीर है और वह ब्रह्म के तत्व को समझता है तो वह सुरा और मांस आदि से भैरवी चक्र आराधना कर सकता है। यह जरूरी नहीं है कि पूजा के समय पांचों तत्व जुटायें जायें, जितने तत्व आसानी से मिल सकें, उन्हीं के जरिये पूजा की जा सकती है। मांस आदि जो तत्व हैं उनमें से हर एक को “आं ही क्रीं स्वाहा” मंत्र से अभिमंत्रित करना चाहिए। फिर सभी तत्वों और सारी सृष्टि को ब्रह्ममय देखने की भावना करनी चाहिए। आंख मूंदकर सभी तत्व जगदंबा महाकाली को निवेदन कर, उसका सेवन करना चाहिए।

चक्र पूजा आरंभ होती है तो उसमें बैठे हुए वीरों के ब्रह्म तेज से सारे विघ्न डरकर भाग जाते हैं। भूत-पिशाच, गुह्यक, यक्ष,बैताल और क्रूर जातियां भैरवी चक्र का नाम सुनते ही भाग खड़ी होती हैं। जिस स्थान पर भैरवी चक्र साधना होती है, वह महातीर्थ बन जाता है, वहां देवराज इंद्र सहित सभी देवता आदर पूर्वक आते हैं। चक्र का स्थान श्रेष्ठ तीर्थ बन जाता है और इसका नैवेद्य पाने के लिए देवता भी आशा रखते हैं।


भैरवी चक्र साधना विधि


साधना करने के लिए साफ-सुथरा निर्मल रमणीय और एकांत स्थान होना चाहिए। इस स्थान पर आसन बिछाकर चक्रेश्वर को बैठना चाहिए। सभी तंत्र में प्रयोग होने वाले तत्वों से यह पूजा की जाती है। इन सभी तत्वों का शोधन “ॐ हंस” मंत्र के जप से करना चाहिए। सौ बार यह मंत्र पढ़कर इस श्लोक का उच्चारण करना चाहिए -

ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रहाग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मणैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना।।

अर्थ - जिसके द्वारा अर्पण करता हूं वह ब्रह्म है, जिसमें अर्पण करता हूं वह भी ब्रह्म है, जो अर्पण है वह ब्रह्म है। इस प्रकार ब्रह्ममय कर्म की समाधि से साधक में ब्रह्म ही लीन हो जाता है।

इस मंत्र को सात बार या तीन बार जपकर सब तत्वों को शुद्ध कर लेना चाहिए। फिर “ॐ सच्चिदेकं ब्रह्म” इस मंत्र से सब तत्वों को ब्रह्म को अर्पण कर देना चाहिए, इसके बाद चक्रेश्वरी को सभी साधकों के साथ पान और भोजन करना चाहिए |


तत्व चक्र साधना


भैरवी चक्र और तत्व चक्र साधना की पहली सीढ़ी चक्रानुष्ठान हैं। चक्रानुष्ठान में शामिल होने के अधिकारी सिर्फ वे साधक हैं, जिन्होंने दीक्षा ली है और जो कुलाचार, कौलिक मत में विश्वास करते हैं। शाकूत संप्रदाय में उन ५ तत्वों को विस्तार से बताया गया है, जिनका उपयोग पूजा के लिए किया जाता है। सुरा, मांस और बलिदान की विधि समझाई गयी है। इस बात पर बहुत जोर दिया गया है कि साधना के लिए पहले इन्हें शुद्ध किया जाना चाहिए।


भैरवी चक्र साधना में स्त्रियों का महत्व


जो सुरा शोधन किये बिना पूजा में प्रयोग की जाती है। वह सांधना को निष्फल बना देती है। उससे देवी-देवता प्रसन्न नहीं होते। साधना में स्त्रियों को शक्ति के रूप में स्थान दिया गया है। इस बात पर जोर दिया गया है कि चक्रानुष्ठान में साधक को अपनी पत्नी के साथ बैठना चाहिए। पत्नी को भी दीक्षा लेनी चाहिए और उसके साथ साधना करनी चाहिए। देवी को जो फल, मूल या पत्र चढ़ाए जाते हैं, उनका भी शोधन किया जाना चाहिए। बिना शोधन किये इन्हें चढ़ाने से साधक नरकगामी होता है।

अपनी गुणशीला पत्नी से श्रीपात्र की स्थापना करवानी चाहिए। पत्नी का शुभ की हुई सुरा और जल से अभिषेक करना चाहिए। अभिषेक के समय “ऐं क्लीं सौ:” मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। इसके बाद “त्रिपुरायै नमः” का उच्चारण करके “ईमां शक्तिं पवित्री कुरु” कहनी चाहिए। इसके बाद “मम शक्तिं कुरु स्वाहा” कहना चाहिए।

इस प्रकार पूरा मंत्र यह हुआ, “ऐं क्लीं सौः त्रिपुरायै नमः इमां शक्तिं पवित्री कुरु मम शक्ति कुरु स्वाहा” | अगर स्त्री दीक्षित नहीं है तो उसके कान में मायाबीज का उच्चारण करना चाहिए।

चक्रानुष्ठान के त्रिकोण मंडल के बाहर एक षटकोण खींचकर उसके बाहर चतुष्कोण मंडल बनाया जाता है। चतुष्कोण मंडल के चारों कोणों में चार मंत्रों का पाठ किया जाता है। ये मंत्र हैं -

“पूं पूर्णशैलाय पीठाय नमः, ॐ उड्डीयानाय पीठाय नम:, जां जालंधराय पीठाय नमः, कां कामरूपाय पीठाय नमः।“


चारों पीठों की पूजा


ये चार पीठ हैं –

पूर्णशैल, उड्डीयान, जालंधर और कामरूप ।

साधक मंत्र उच्चारण के बाद इन चारों पीठों की पूजा करता है। इसके बाद घटकोण मंडल के ६ कोणों की पूजा के लिए मंत्र का पाठ किया जाता है।

ये मंत्र हैं –

हां नमः, हीं नमः, हूं नमः हैं नमः, हौ नमः, हः नमः ।

मंत्र पढ़ने के बाद इन कोणों के देवताओं की पूजा करनी चाहिए। त्रिकोण मंडल में “हीं आधार शक्तये नमः” मंत्र पढ़कर आधार देवता की पूजा की जाती है। इसके बाद अग्नि की दस कलाओं की पूजा की जाती है। अग्नि की दस कलाओं का नाम है -

धूम्रा, अर्चि, शूक्ष्मा, ज्वालिनी, विस्फुलिंगिनी, सुश्री, सुरूपा और हव्य कव्य वहा।

इनकी पूजा के मंत्र इस प्रकार है -

धू धूम्रायै नमः, अं अर्च्चिये नमः, ज्वं ज्वालिन्यै नमः, सूं सूक्ष्मायै नमः, विं विस्फुलिग्यै नमः, सुं सुश्रियै नमः, सुं सुरुपायै नमः, कं कपितायै नमः और हं हव्य कव्य वहायै नमः ।

इसके बाद यह मंत्र पढ़ना चाहिए -

मम् वहिन मंडलाय दश कलात्मने नमः ।

यह मंत्र पढ़कर आधार में अग्नि मंडल की पूजा करनी चाहिए।


बारह कलाओं की पूजा


साधक को अग्नि मंडल की पूजा के बाद बारह कलाओं की पूजा करनी चाहिए। ये कलायें हैं –

तपिनी, तापिनी, धूम्रा, मरीचि, ज्यालिनी, रूचि, सुधूम्रा, भोगप्रदा, विश्वा, बोधिनी, धारिणी और क्षमा।

अघ्र्य पात्र में “अं सूर्य मंडलाय द्वादश कलात्मने नमः” मंत्र पढ़कर सूर्य मंडल की पूजा करनी चाहिए।


चंद्रमा की सोलह कलाओं का पूजन


इस अनुष्ठान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा चंद्रमा की सोलह कलाओं का पूजन है। ये कलाएं है -

अमृता, मानदा, पूजा, तुष्टि, पुष्टि, रति, धृति, शशिनी, चंद्रिका, कांति, ज्योत्सना, श्री, प्रीति, अंगदा, पूर्णा और पूर्णामृता।

ये कलाएं कामदायिनी हैं। ये मनोकामना पूरी करती हैं इनकी पूजा के लिए इन मंत्रों का प्रयोग किया जाता है

अं अमृतायै नमः, आं मानदायै नमः, इं पूजायै नमः, ई तुष्टये नमः, ॐ पुष्टये नमः, ऊं रतये नमः, ऋं धृतये नमः, ऋं शशिन्यै नमः, लृं चंद्रिकायै नम:, लृं कांतये नमः, एं ज्योत्सनायै नमः, ऐं श्रीयै नमः ओं प्रीतये नमः, औ अंगदायै नमः, अं पूर्णायै नमः, अ: पूर्णामृतायै नमः ।

इसके बाद अघ्र्य पात्र के जल से सोम मंडल की पूजा करनी चाहिए। पूजा करते समय “ॐ सोम मंडलाय पोडश कलात्मने नमः” मंत्र का पाठ करना चाहिए।

अनुष्ठान का अगला चरण दूब, अक्षत, लाल फूल, श्यामा घास और अपराजिता के फूल को पात्र में डालना है। पात्र में डालकर तीर्थ का आव्हान करना चाहिए। अनुष्ठान में सुरा को अभिमंत्रित किया जाता है। इसके शोधन इन श्लोकों का पाठ किया जाता है -

अखंडकरसानंदाकरे परसुधात्मनि ।
स्वच्छंदस्फुरणामत्र निधेहि कुलरूपिणी।।
अनड्गस्थामृताकारे शुद्धज्ञानकलेवरे ।
अमृतत्वं निषेहास्मिन्वस्तुनि किन्नरूपिणी।
तद्रुपेणैकरस्यं व कृत्वाध्र्य तत्वरूपपिर्णा ।
भूत्वा कलामृताकारमपि विस्फुरणॅ करू।।
ब्रह्माण्डरसरसम्भूतमशेषरसम्भवम |
आपूरितं महापात्रं पीयूषरसमावह ||

इन श्लोकों का पाठ करने के बाद मन में यह भावना लानी चाहिए – “में आत्मभाव रूपी पात्र में भरे हुए इस भाव रूप परम अमृत का परमात्मरूप अग्नि में होम करूंगा।“

सुरा में सदाशिव और भगवती की समरसता का ध्यान कर उसकी पूजा धूप दीप से करनी चाहिए। सुरा के मुख्य घट और श्रीपात्र के बीच में गुरुपात्र, भोगपात्र और शक्तिपात्र रखना चाहिए। इसके अलावा योगिनी पात्र, वीर पात्र, बलि पात्र, आचमन पात्र, पादय पात्र और श्रीपात्र सहित कुल नौ पात्र की स्थापना करनी चाहिए। इन पात्रों में तर्पण किया जाता है।

सबसे पहले आनंद भैरव और आनंद मैरवी का तर्पण किया जाता है फिर गुरू पात्र में रखे हुए अमृत से गुरू परंपरा का तर्पण करना चाहिए। सर्वप्रथम ब्रह्म रंध्र में स्थित सहस कमल दल में गुरू पत्नी के साथ गुरू का तर्पण करना चाहिए। फिर परमगुरू, परात्पर गुरू और परमेष्ठि गुरू का तर्पण किया जाता है ।

उदाहरण के लिए मंत्र सहित तर्पण का विधान यह है -

“ऐ सपत्नीकं अमुकानंद नाथम श्री गुरूं तर्पयामि नमः, ऐं सपतल्नीकं अमुकानंद नापम् परम् गुरूं तर्पयामि नमः, ऐं सपल्नीकं अमुकानंद नाथम् परात्पर गुरूं तर्पयामि नमः, ऐ सपत्नीकं अमुकानंद नाथम् परमेष्ठि गुरुं तर्पयामि नमः ।।“

अमुक के स्थान पर गुरू का नाम लेना चाहिए।

इसके बाद हृदय कमल में भोग पात्र के अमृत से उस बीज का उच्चारण करना चाहिए, जिसका गुरू ने उपदेश किया है। इस बीच के पाठ से आधयाशक्ति काली का तर्पण किया जाता है। उदाहरण के लिए तर्पण इस प्रकार होगा –

“हीं बीं क्रीं परमेश्वरि स्वाहा । आध्या कालीं तर्पयामि स्वाहा ।“

इसी प्रकार अङ्ग देवता का तर्पण करने के लिए – “अड्ग देवता तर्पयामि स्वाहा” मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। आवरण देवता के लिए तर्पण का मंत्र यह है – “आवरण देवतास्तपर्यामि स्वाहा ।“


शिवा बलि


इसके बाद बटुक बलि और पूजा का विधान किया जाता है। फिर क्षेत्रपाल और गणपति का आह्वान करके शिवा बलि दी जाती है। शिवा बलि देते समय यह भावना करनी चाहिए – “है देवि! हे महाभागे! हे शिवे!। हे कालाग्नि रुपिणी यह बलि ग्रहण करो।“ इस भावना के साथ यह श्लोक पढ़ना चाहिए -

शुभाशुभं फलं व्यक्तं ब्रूहि गृहण बलिं तव ।
मूलमेष बलिः पश्वाच्छिवायै नम इत्यपि ।
चक्रानुष्ठानमेतत्तु तवाग्रे कथितं शिवे ।।

इस विधान से साधक को शुभाशुभ फल का ज्ञान होता है। शिवा बलि देते समय यह मंत्र पढ़ना चाहिए -

“एष बलिः शिवायै नमः ।“

इसके बाद चंदन, अगर, कस्तूरी और सुंदर फूलों से आदि शक्ति की आराधना करनी चाहिए। इस पूजा का विस्तृत विधान किसी गुरू से जानना आवश्यक है। इस पूजा की विधि में तंत्र और योग का तालमेल है ।

आदिशक्ति की प्राण प्रतिष्ठा के लिए इन मंत्रों का उपयोग किया जाता है –

“श्री हीं क्रीं श्री स्वाहा आध्या: काली देवतायाः प्राणा इह प्राणाः,
आध्याकाली देवतायाः जीव इह स्थितः ।
क्रीं आद्ये कालिके देवि परिवार दिभिः
सह इहा गच्छ तिष्ठ इह सन्निधेहि इह सन्निरुध्यस्व मम पूजां गृहाण ।

भगवती कालिका की विधि पूर्वक प्राण प्रतिष्ठा के बाद उन्हे रवाना कराना चाहिए। देवता के अङ्ग में षडन्यास करना चाहिए। फिर पाध्य, अध्र्य, आचमनीय, स्नान, बसन, भूषण, गंध, पुष्प, धूप, दीप,नैवेध्य और पुनआचमनीय देना चाहिए।

चक्रानुष्ठान में जप ध्वनि पढ़ना चाहिए और घंटे की विधियत पूजा करनी पाहिए। विधि पूर्वक पूजन के बाद यह मंत्र पढ़ना चाहिए।

“परमं वारुणी कल्पं कोटि कल्पान्तकारिणी,
गृहाण शुद्धि सहितं देहि में मोक्ष मव्ययं ||

हे माता तुम कोटि-कोटि कल्पों का अंत करती हो, तुमको यह परम वारुणी रूप कल्प-मध्य शुद्धि के साथ अर्पण करता हूँ। इसे ग्रहण करके मुझे अक्षय मोक दो।

चक्रानुष्ठान में आदिशक्ति कालिका और गुरुओं की पूजा के बाद आठ नायिकाओ का पूजन किया जाता है। इन नायिकों का वर्णन इस प्रकार किया गया है -

“मंगला विजया भद्रा जयंती चापराजिता।
नंदिनी नारसिंही च कौमारीत्यष्टमातरः ।।

चक्र पूजा में केवल दिकपाल, इंद्र, वागीश्वरी, सरस्वती, ब्रह्मा, लक्ष्मी, नारायण और उमा महेश्वर की आराधना का विस्तार से विधान किया जाता है | आधार शक्तियों के साथ ही धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य की पूजा करनी चाहिए। तामसी भावनाएं - अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्य की पूजा भी करनी चाहिए। यंत्र के मध्य भाग में अनंत और पद्म की पूजा का विधान है।

तामसी भावनाओं का पूजन इसलिए किया जाता है कि आदिशक्ति का रूप तम भाव में भी व्याप्त है। यह भाव साधक के मार्ग में विघ्न न बन जाये, इसलिए इसकी आराधना करनी चाहिए।

चक्र पूजा में हबन और प्राणायाम का विधान किया जाता है। इसमें जप करने से सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। जगदंबा के विधिवत पूजन के बाद उन्हें आदरपूर्वक विदा किया जाता है। इस भावना के साथ कि वे साधक की प्रार्थना पर बार-बार चक्र पूजा में पधारती रहें । इस अनुष्ठान में पान पात्र कैसा हो –

इसका विस्तार से विवेचन किया गया है पान पात्र सोने, चांदी, कांच या नारियल का होना चाहिए।

पूजा में सुरा का प्रयोग अमृत के रूप में किया जाता हैं। ऋषियों ने साफ तौर पर कहा है कि – “अमृत रूप यह प्रसाद सिर्फ साधना में सहायता देने के लिए हैं। इसका उपयोग नशे के लिए नहीं करना चाहिए। चक्रानुष्ठान में इस अमृत का सेवन सिर्फ पांच पात्र तक सीमित रखना चाहिए। अगर यह प्रसाद ग्रहण करने से मन चंचल हो जाये और आंखें चलाएमान होने लगे तो यह साधना में छिन्न करने वाली अवस्था है। ऐसे पीने को पशु पान कहा गया है और इसकी निंदा की गयी है।“

चक्रानुष्ठान वामनार्गी तंत्र साधना का महत्वपूर्ण अंग है, लेकिन वह सामान्य साधकों का मार्ग नहीं है। इस मार्ग पर चलने वाला साधक एक प्रकार से तलवार की धार पर चलता है। यह उपासना आम तौर पर अवधूत और विदेह प्रवृत्ति के साधक ही कर पाते हैं इन साधकों की कृपा से भक्तों की सारी मनोकामनाएं आसानी से पूरी हो जाती हैं । अपुत्र को पुत्र प्राप्त होता है, निर्धन को धन मिलता है। रोगी को आरोग्य और शत्रु से घिरे दुखी व्यक्ति को विजय मिलती है। जरूरी है कि सिर्फ संयमी साधक ही पूजा के विधान में शामिल हों। बाकी भक्तों के लिए शक्ति की सात्विक आराधना ही उचित मार्ग है।

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