सी वी रमन पिल्लै | C. V. Raman Pillai


श्री सी वी रमन पिल्लै मलयालम के सबसे बड़े ऐतिहासिक उपन्यासकार तो थे ही, १९वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और २०वीं शताब्दी के शुरू में उन्होंने केरल के सामाजिक और राजनीतिक जीवन को भी नया मोड़ दिया था।

उन दिनों केरल में जात-पात का बहुत जोर था। मलाबार क्षेत्र में नंपूतिरि ब्राह्मणों और तिरुवांकुर-कोच्चिन में नायरों का बोलबाला था। बाकी जातियों के लोगों को नीची निगाह से देखा जाता था और उन्हें कोई अधिकार भी नहीं थे।


अनुक्रम (Index)[छुपाएँ]

सी वी रमन पिल्लै की जीवनी

सी वी रमन पिल्लै का जन्म

सी वी रमन पिल्लै की शिक्षा

सी वी रमन पिल्लै के कार्य

पेट्रयाट का सम्पादन

सी वी रमन पिल्लै का विवाह

सी वी रमन पिल्लै के उपन्यास

मलयाली सभा की स्थापना

सी वी रमन पिल्लै की साहित्य मे रुचि

मार्तंड वर्मा उपन्यास

सी वी रमन पिल्लै का राजनीतिक जीवन

धर्मराज उपन्यास की रचना

सी वी रमन पिल्लै की मृत्यु

साहित्य और कला कुछ आरामतलब लोगों के शौक थे। साहित्य का अर्थ मुख्यतः कविता से लिया जाता था, जो श्रृंगार रस और अश्लीलता प्रधान होती थी। गद्य को बड़ी उपेक्षा से देखा जाता था। यहां तक कि विद्वान लोग तो अपनी चिट्ठियां भी पद्य में ही लिखते थे। मलयालम नाटक संस्कृत के प्रसिद्ध नाटकों की भोंडी नकल होते थे, कुल मिलाकर साहित्य यथार्थ से इतना दूर था कि जन-साधारण को उसमें कोई रुचि न थी।


सी वी रमन पिल्लै का जन्म


ऐसे समय में १९ मई १८५८ में सी वी रमन पिल्लै का तिरुअनंतपुरम में जन्म हुआ। वह अपने माता-पिता की आठवी संतान और तीसरे पुत्र थे। उनके पिता नीलकंठ पिल्लै संस्कृत के विद्वान थे। अपनी जीविका के लिए वह ताड़-पत्र या भोज-पत्रो पर रामायण, महाभारत और भागवत आदि लिखा करते थे। पर इस काम में इतनी आमदनी नहीं होती थी, कि वह अपने लंबे-चौड़े परिवार का पेट पाल सकें। इसलिए बाद में वह तिरुवांकुर के महाराज के यहां बल्लमदार बन गए | सौभाग्यवश इस परिवार पर केशवन तंपी नामक एक उच्च सरकारी पदाधिकारी दयालु हो गए और उन्होंने अपने पूर्वजों के विशालकाय घर का एक भाग उन्हें रहने के लिए दे दिया। इसी घर में सी वी (इस नाम से वह अधिक प्रसिद्ध थे) का जन्म हुआ।


सी वी रमन पिल्लै की शिक्षा


बचपन में उन्हें प्राचीन ढंग की संस्कृत, वेदांत, व्यवसाय, ज्योतिष, आयुर्वेद और यहां तक कि मंत्रवेद की भी शिक्षा दी जाने लगी। पर अभी वह नौ ही वर्ष के थे, कि उनके पिता का देहांत हो गया। पिता के बाद तंपी ही उनकी देखभाल करने लगे। उन्हें तिरुअनंतपुरम के अंग्रेज अध्यापकों वाले एकमात्र अंग्रेजी स्कूल और फिर एकमात्र कालिज में भेजा गया। वहां पढ़ते हुए सी वी ने अंग्रेजी साहित्य और विशेषकर उपन्यास तथा नाटकों का गहरा अध्ययन किया। वह न केवल पढ़ाई में अच्छे थे, बल्कि बड़े हाजिरजवाब, मजाकिया और बुद्धिमान भी थे और अभिनय व गाने में भी उनकी रूचि थी। अच्छे खिलाड़ियों में उनकी गिनती होती थी। इसलिए वह बड़े लोकप्रिय थे|


सी वी रमन पिल्लै के कार्य


कालिज के कार्यक्रमों के अतिरिक्त, केरल की प्राचीन कलाओं में, जैसे-कथकली, में भी उनकी रुचि थी। जब उनके पास-पड़ोस के बड़े-बूढ़े केरल के प्राचीन इतिहास की वीर गाथाएं सुनाते, तो वह उन्हें बड़े दत्तचित्त होकर सुनते और अपनी शंकाएं भी प्रकट करते। उन्हीं दिनों उन्होंने तिरुवांकुर और कोच्चिन के अंग्रेजी और मलयालम दैनिकों में तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं पर कई आलोचनात्मक और निर्भीक लेख लिखे, जिनसे अच्छा खासा विवाद उठ खड़ा हुआ।

कालिज की शिक्षा समाप्त होने से पहले ही एक दुर्घटना हो गई। उनके संरक्षक तंपी की नौकरी छूट गई और उन्हें पढ़ाई के लिए पर्याप्त सहायता मिलनी बंद हो गई। ऐसे समय कुछ मित्रों ने उनकी सहायता की और उन्होंने बी.ए. की परीक्षा सम्मान सहित पास की।


पेट्रयाट का सम्पादन


बी.ए. पास करने के बाद वह कानून पढ़ना चाहते थे, ताकि स्वतंत्र रूप से जीविका चला सकें पर उसके लिए साधन कहां थे? सरकारी नौकरी भी वह नहीं करना चाहते थे इसलिए १८८२ में २४ वर्ष की छोटी उम्र में ही उन्होंने केरल पेट्रयाट नामक एक पाक्षिक पत्र निकाला। उसमें भी वह सरकार की गरमागरम आलोचना करते थे। इससे उनके संरक्षक और बड़े भाई नाराज हो गए, क्योंकि वे लो सरकारी नौकरी में थे। कुछ दिन बाद उनका पत्र बंद हो गया |


सी वी रमन पिल्लै का विवाह


इसी बीच उनके बड़े भाइयों ने उनकी इच्छा के विरुद्ध उनका विवाह कर दिया। जहां वह विवाह करना चाहते थे, वहां विवाह नहीं हो सका, पत्नी से उनकी पटी नहीं। तंग आकर वह घर छोड़कर चले गए। यहापि तीन महीने बाद ही वह वापस लौट आए, परंतु बाहर भटकने का एक बड़ा लाभ हुआ|


सी वी रमन पिल्लै के उपन्यास


इस अवधि में उन्होंने हैदरअली और टीपू सुलतान से संबद्ध ऐतिहासिक स्थलों की यात्रो की। आगे चलकर उन्होंने जो उपन्यास लिखे, उनका सूत्र मैसूर के शासक का तिरुवांकुर पर आक्रमण ही था।

हैदराबाद में उन्हें मुसलमानों के साथ रहने का मौका मिला, जिससे उन्हें मुसलमानों के रीति-रिवाजों और तरीकों की अच्छी जानकारी हो गई। अपने उपन्यासों के मुसलमान पात्रों का चित्रण करते समय उन्होंने अपनी इस जानकारी का खूब उपयोग किया। घर वापस लौटने पर उन्होंने स्वतंत्र रूप से जीविका कमाने की खातिर कानून पढ़ना शुरू कर दिया। फीस आदि की व्यवस्था के लिए वह सरकारी दफतर में क्लर्क बन गए।


मलयाली सभा की स्थापना


सी.वी. को समाज-सेवा की बड़ी उत्कंठा थी। इसलिए अपने मित्रों के साथ मिलकर उन्होंने “मलयाली सभा” नामक एक समाज-सेवा संगठन की स्थापना की। सभा की ओर से मलयाली नामक एक पत्र भी निकलता था। सी.वी. ही इसके संपादक थे। अपने पत्र में वह “विवाह विधेयक” “जमींदार-किसान संबंध” आदि विषयों पर बराबर लिखते थे।


सी वी रमन पिल्लै की साहित्य मे रुचि


उन दिनों तक सी वी रमन पिल्लै ने लेखक बनने की नहीं सोची थी। परंतु उनका पहला साहित्यिक प्रयास ही एक महत्वपूर्ण घटना बन गया। वह सामाजिक रीति-रिवाजों की आलोचना किया करते थे और इसके सबसे प्रभावकारी साधन के रूप में उन्होंने एक प्रहसन लिख डाला – “चंद्रमुखी विलासम” | यह मलयालम का पहला प्रहसन था, उसके पहले समस्त नाटक प्राचीन ढंग से ही लिखे जाते थे। इस प्रहसन में उन्होंने पतनोन्मुख उच्चवर्गीय समाज पर करारी चोट की थी। इस प्रहसन का अभिनय भी किया गया, जिसमें सी. वी. ने भी भाग लिया। इससे एक ओर तो मलयाली सभा की गतिविधियों को बहुत बढ़ावा मिला और दूसरी ओर उच्चवर्गीय लोग उनसे बेहद नाराज हो गए।


मार्तंड वर्मा उपन्यास


यह प्रहसन लिखने से भी पहले वह “मार्तंड वर्मा” नामक एक उपन्यास लिख चुके थे। पर इसका प्रकाशन नहीं हो सका था। इसका प्रकाशन १८९१ में हुआ, जब मलयालम में दो उपन्यास “कुंडलता” और “इंदुलेखा” प्रकाशित हो चुके थे | परंतु मार्तड वर्मा पहला ऐतिहासिक उपन्यास था, जिसमें केरल के पूर्वजों की वीरता का शानदार उल्लेख किया गया था | अंग्रेजी न जानने वाले मलयाली पाठकों के लिए यह एक नई और अनूठी चीज थी और उन्होंने इसका खूब स्वागत किया। घर-घर में इसका प्रचार हो गया।

मार्तंड वर्मा तिरुवांकुर राज्य के संस्थापक महाराजा मार्तंड वर्मा और वरी कबीले के लोगों से उनके संघर्ष की गाथा है। इसमें लेखक ने देशभक्ति, कर्तव्य, साहस और जागरूकता का संदेश दिया है।


सी वी रमन पिल्लै का राजनीतिक जीवन


इसके बाद सी.वी. राजनीति में डटकर भाग लेने लगे। उन दिनों अन्य छोटी जातियों की तो बात ही क्या, नायर जाति के लोगों को भी सरकार में बड़ी सरकारी नौकरियां नहीं दी जाती थी, क्योंकि १९वीं शताब्दी के प्रारंभ में उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह में भाग लिया था | इसलिए नायर लोगों ने महाराजा को एक ऐतिहासिक आवेदन किया, यह आवेदन भी सी.वी. ने ही लिखा था | इसमें अन्य बातों के साथ-साथ यह मांग भी की गई थी, कि इजवा नामक पिछड़ी जाति के लोगों को भी सरकारी नौकरियां दी जाएं। इस तरह तिरुवांकुर राज्य में शासन में जनता को भाग दिलाने में यह आंदोलन पहला बड़ा कदम था। जब पैसे की तंगी के कारण आंदोलन कठिनाई में पड़ा, तब सी. वी. ने अपनी पत्नी के जेवर बेचकर ७०० रुपये दिए।

अपने पत्र में भी सी.वी. बराबर जन-आंदोलन के समर्थन में लिखते रहे। अधिकारी उनसे भयभीत हो गए और अंततः सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया कि सरकारी कर्मचारी अखबार या पत्रिकाएं न चलाएं।

इसलिए मलयाली का प्रकाशन बंद करना पड़ा। फिर भी सी. वी. छह नामों से अन्य अखबारों में लिखते रहे और सामाजिक व राजनीतिक सुधारों का समर्थन करते रहे।

यद्यपि सी.वी. को पाश्चात्य शिक्षा मिली थी, परंतु उनका सामाजिक व राजनीतिक दृष्टिकोण पाश्चात्य न होकर भारतीय था। अपने पौराणिक वीर और वीरांगनाएं ही उनके आदर्श थे। वह हिंदू समाज के आधुनिकीकरण के लिए बराबर कोशिश करते रहे। हिंदू धर्म के पुनर्त्थान के लिए बनी, एक संस्था में इसीलिए शामिल नहीं हुए कि वह अंतर्जातीय विवाहों और विभिन्न जातियों में सहभोज का समर्थन नहीं करती थी। इस उदार दृष्टिकोण के कारण ही कई मित्र उनके विरोधी हो गए।


धर्मराज उपन्यास की रचना


मार्तंड वर्मा के २० वर्ष बाद उन्होंने अपना दूसरा उपन्यास धर्मराज लिखा। उस समय तक वह सामाजिक और राजनीतिक नेता के रूप में काफी प्रसिद्ध हो चुके थे, उनका तीसरा उपन्यास “प्रेमामृतम्” और चौथा उपन्यास “रामराजा बहादुर” (दो खंड) काफी जल्दी-जल्दी निकले।


सी वी रमन पिल्लै की मृत्यु


वह अपना पांचवां और छठा उपन्यास साथ-साथ लिख ही रहे थे कि २१ मार्च १९२२ में ६४ वर्ष की उम्र में उनका स्वर्गवास हो गया।

इन उपन्यासों के अतिरिक्त, उन्होंने कई प्रहसन भी लिखे, जिनमें तात्कालिक सामाजिक कुरीतियों पर व्यंग्य किया गया है।

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में सी.वी. जनता में, और विशेषकर युवकों में बहुत लोकप्रिय हो गए थे, क्योंकि वह उनके आदर्शों के प्रतीक थे। उनके भव्य मुख-मंडल को देखकर लोगों में आदर और श्रद्धा उत्पन्न होती थी। उनका षष्ठी पूर्ति समारोह सारे केरल में धूमधाम से मनाया गया।

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