कार्तिक मास की कहानी | कार्तिक पूर्णिमा की कहानी | Kartik Purnima Ki Katha


एक सांसू बवां ही । सगलो गांव काती न्हावण गंगाजी जावण लाग्यो । जणा बहु बोली सासूजी म्हे भी चालू । सासू बोली थारी अबार उमर कोनी थ्हे घर रेवो म्हे ही जावू |सासू तो चली गयी । बा कुम्हार सू ३० मांटी का कुण्डा ल्याई रोज रात का भर कर रख देती और दिनुगा न्हावती जणा केवती सासू न्हाव उन्ड बहु न्हाव कुण्ड गंगाजी की धार बहु का कुण्डा म ही आ जाती

एक दिन सासू बठ न्हावण लागी जणा सासूजी की नथ गंगाजी म पड़गी बहु जणा न्हावण लागी तो बोली हे गंगा मैय्या थारी धार कुण्डा म आ जाइज्यो । बी दिन सासूजी की नथ कुण्डा म मिलगी । सासूजी गंगाजी सू पाछी आई जणा सामा लेवण लाग्या बहु सासूजी की नथ पेरी ही सासू नथ न देखर पूछी कि आ नथ थारे कन कठसूं आई । बहु बोली सासूजी थ्हे न्हाया उन्ड म्हे न्हायी कुण्ड । रोज गंगा मैय्या की धारा म्हारा कुण्डा म आ जाती या नथ भी म्हने धार के साथ कुण्डा म ही मिली। सासू बोली वे कूण्डा स्नान क्यान का है म्हने बता ? आगे देखतो कुण्डा सोना का होयग्या । सासू बोली बहु तू तन मन से न्हावती ही म्हे तो ऊपर का मनसू गई ही। खूब ब्राम्हण जीमाया होम करयो ब्राम्हणां न दक्षिणा दिवी। लुगायां न साडयां दिवी। हे गंगा मैय्या बहु क धार घाली ज्यान म्हारे भी घालीजे ।

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