महाकवि मुद्दण | Mahakavi Muddana


लक्ष्मी नारणप्पा ही बाद में महाकवि मुद्दण के नाम से प्रसिद्ध हुए। उनका जन्म २४ जनवरी १८७० में मैसर राज्य के दक्षिण कन्नड जिले में नंद लाइक नामक स्थान पर एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम पाठालि तिम्मप्पय्या और माता का महालक्ष्मप्पा था । उनके माता-पिता नारणप्पा को प्यार से मुद्दण (प्यारा बेटा) कहकर पुकारते थे। इसी घरेलू नाम को बाद में कवि ने अपने उपनाम के रूप में अपना लिया।


महाकवि मुद्दण की शिक्षा


बालक नारणप्पा ने स्कूली शिक्षा अपने गांव में और पास के कस्बे उडिपि में पाई। मुद्दण बड़ा पढ़ाकू लड़का था। स्कूल के पुस्तकालय में जितनी भी कन्नड़ की पुस्तकें थीं, सब उसने पढ़ डालीं।

वह अंग्रेजी भी पढ़ना चाहता था, परंतु गरीबी के कारण माता-पिता उसे और आगे नहीं पढ़ा सके। इसलिए अपने स्कूल के अध्यापकों से वह प्राइवेट तौर पर अंग्रेजी भी पढ़ता रहा । फिर वह उडिपि के कन्नड़ ट्रेनिंग स्कूल में भरती हो गया।

विद्यार्थी-अवस्था में ही वह मंगलौर के यक्षगान कलाकारों के संपर्क में आए (यक्षगान उस क्षेत्र की लोकप्रिय नाट्य रचना है)। उन्होंने यक्षगान के ढंग पर कुछ कविताएं लिखीं और उन्हें यक्षगान देखने वाली जनता के सामने सुनाया। १८ वर्ष की अवस्था में उन्होंने अपनी ट्रेनिंग समाप्त कर ली। ट्रेनिंग समाप्त करने के बाद नारणप्पा अपने स्कूल में ड्रिल मास्टर बन गए। उनका वेतन था, १० रुपये महीना।

उडिपि में उसी स्कूल में वह मलाली सुब्बाराव नामक एक अध्यापक के संपर्क में आए। सुब्बाराव ने कुछ मराठी नाटकों और यक्षगानों की रचना की थी । नारणप्पा ने अपनी कुछ रचनाएं मलाली सुब्बाराव को सुनाई और उनसे प्रार्थना की कि “मुझे अपने शिष्य के रूप में ग्रहण कर लीजिए।“ अपने गुरु की सहायता से उन्होंने संस्कृत के नाटक रतलनावलि के आधार पर रत्नावलि कल्याण नाम से एक यक्षगान नाटिका लिखनी शुरू की। अपनी इस रचना में उन्होंने यक्षगान गीतों की धुनों का काफी उपयोग किया। जनता ने इसका अच्छा स्वागत किया और जनता की मांग पर कई जगह इसके आधार पर नाटक खेले गए।


महाकवि मुद्दण का कविता प्रेम


इस तरह ड्रिल मास्टर धीमे-धीमे कवि बनने लगे। इसे पूरी करने के बाद उन्होंने एक और रचना हाथ में ली, जो स्कंद पुराण के षणमुख चरित प्रसंग पर आधारित थी। यह रचना थी – कुमार विजय। अब तक नारणप्पा कन्नड़ भाषा पर अधिकार प्राप्त कर चुके थे और उन्हें संगीत का भी कुछ ज्ञान हो चला था। उन्होंने वायलिन बजाना भी सीखा। अपनी नई रचना में उन्होंने कई गाए जा सकने वाले गीत भी लिखे। यह रचना उन्होंने अपने गुरु मलाली सुब्बाराव को समर्पित की। साहित्यिक दृष्टि से यह रचना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इसी बीच सुब्वाराव का तबादला कुंडापुर में हो गया। अपनी ज्ञान-पिपासा के कारण नारणप्पा वहां पहुंच गए। धीमे-धीमे यक्षगान नाटकों की रचना में उनकी रुचि कम होती गई और गौरव ग्रंथ लिखने की आकांक्षा बलवती होती गई। इसके लिए उन्होंने कन्नड की प्राचीन रचनाओं का अध्ययन शुरू किया।


महाकवि मुद्दण का अज्ञात नाम से प्रकाशित करना


कवि ने कन्नड़ की अदभुत रामायण का रूपांतर शुरू किया। प्रतिदिन वह अपने गुरुजी से मूल संस्कृत पाठ के दो या तीन अध्याय पढ़ते। अगले दिन वह उन्हीं का रूपांतर प्राचीन कन्नड़ में करते और उसे अपने गुरुजी को पढ़कर सुनाते। यह रचना उन्होंने १८९४ में पूरी की | उन्हें डर लगा कि यदि इस रचना पर उन्होंने अपना नाम दे दिया, तो जनता इसका मजाक उड़ाएगी इसलिए उन्होंने इस रचना के प्रकाशक (काव्य मंजरी पब्लिकेशन्स) को यह लिखकर भेज दिया, कि उन्होंने एक अज्ञात कवि की महान कृति ढूंढ निकाली है। इसमें कथा के नैतिक पक्ष पर जोर दिया गया है, सब अनावश्यक घटनाएं रहने दी गई है और वही घटनाएं रहने दी है, जिनसे सौंदर्य और रोचकता में वृद्धि होती है।

इसका प्रकाशन होते ही उन्होंने एक और रचना रामपटटाभिषेक लिखनी शुरू की। इसकी मूल कथा में बताया गया है कि किस तरह रावण को पराजित करने के बाद विजयी राम सीता सहित अयोध्या वापस लौटते है। रामपट्टाभिषेक में कवि की कल्पना अपने सर्वोत्तम रूप में प्रकट होती है। कवि ने इस रचना को भी अपने पुराने प्रकाशक के पास लक्ष्मी के उपनाम से भेजा और कहा कि लक्ष्मी प्राचीन-काल का एक कवि था।

उन दिनों बी. वेंक्टाचार्य कन्नड़ में बंकिम बाबू की बांग्ला की अमर रचनाओं का अनुवाद कर रहे थे और वे जनता में बहुत लोकप्रिय हो रही थीं। कन्नड़ पाठकों में उनके प्रति नशा-सा छा गया था। इन उपन्यासों की कथावस्तु, शैली और लिखने के ढंग ने पाठकों का मन मोह लिया था |


महाकवि मुद्दण के नाम से प्रथम रचना


कवि नारणप्पा भी इसके अपवाद नहीं थे और इन उपन्यासों का उन पर बहुत प्रभाव पड़ा था | उन्होंने भी पद्य की जगह गद्य लिखने का फैसला किया। उन्हें लगा कि केवल कुछ ही लोग प्रौढ़ काव्य को समझ सकते है, जब कि गद्य को समझने वालों की संख्या बहुत अधिक होती है। उन्होंने अपने अगले पध्य रामेश्वमेघम् को गद्य-शैली में लिखा। इस बार उन्होंने अपना उपनाम रखा मुद्दण, जिस नाम से बचपन में इनकी मां उन्हें बुलाया करती थी।

रामेश्वमेघम उनकी सर्वोत्कृष्ट रचना है। यह पद्य पुराण की शेष रामायण के रामेश्वमेघम्प्रसंग पर आधारित है। इसमें काव्य-कौशल अपने निखार पर है। इस रचना का सबसे रोचक और अनूठा प्रसंग है, मुद्दण और मनोरमा का वार्तालाप जो इस महाकाव्य का अभिन्न अंग है। यह महाकाव्य इन दोनों के सुंदर वार्तालाप से प्रारंभ होता है और इसका अंत भी उसी से होता है। इस वार्तालाप में हास्य का काफी पुट है। यह हास्य कन्नड़ कविता के लिए नई चीज थी। यह मुद्दण की महत्वपूर्ण देन थी।

इसमें मुद्दण ने प्राकृतिक सौंदर्य के चित्रण में कमाल किया है। वैसी ही सरलता से मनुष्य-स्वभाव के निरूपण में भी अपना कौशल दिखलाया है।

रामेश्वमेघम् से कन्नड़ में एक नए अध्याय का सूत्रपात हुआ। जनता ने उसका हार्दिक स्वागत किया। जनता ने उस अज्ञात कवि की तारीफ के बांधने शुरू कर दिए। मुद्दण और मनोरमा का वार्तालाप सभी पाठकों के मुंह पर चढ़ गया। अंग्रेजी और कन्नड़ समाचारपत्रों ने इस नई रचना की भूरि-भूरि प्रशंसा की। यह सौभाग्य की बात थी कि कवि ने स्वयं अपनी आंखों अपनी रचनाओं का स्वागत होते देखा था। परंतु लोगों को यह पता नहीं था कि वह कवि कौन है, क्योंकि उन्होंने ये रचनाएं मुद्दण नाम से लिखी थीं।


महाकवि मुद्दण की मृत्यु


मुद्दण इसी बीच तपेदिक के शिकार हो गए थे और उसी के कारण ३१ वर्ष की अल्पायु मंं १५ फरवरी १९०१ को वह स्वर्ग सिधार गए। मृत्यु के समय उनका एक उपन्यास पुल अधूरा पड़ा था।

आधुनिक कन्नड़ साहित्य का श्रीगणेश मुद्दण से होता है। उन दिनों कन्नड़ साहित्य की पूरी तरह उपेक्षा की जाती थी। मुद्दण ने ही उसे अपने परिश्रम से सींचा, उसे पल्लवित तथा विकसित किया |

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