मौलाना मजहरुल हक | Maulana Mazharul Haque


मौलाना मजहरुल हक भारत के चोटी के नेताओं में थे। उन्होंने उस समय अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध आजादी की लड़ाई शुरू की, जब कि बहुत कम लोग इस मैदान में आए थे। गांधीजी ने उनके बारे में ठीक ही कहा है – “यों तो ऐसे लोग हर जमाने में बहुत कम हुए हैं, लेकिन मुल्क के इतिहास के इस दौर में तो ऐसी हस्ती ढूंढने से भी नहीं मिलेगी।“


मौलाना मजहरुल हक का जन्म


मौलाना मजहरुल हक २२ दिसंबर १८६६ को पटना जिले के बहपुरा गांव में पैदा हुए। उनके पिता शेख अहमदुल्ली साहब थे, जो एक छोटे-से जमींदार और बहुत भले आदमी थे। वह अपने पिता के इकलौते बेटे थे |


मौलाना मजहरुल हक की शिक्षा


उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर में हुई। वह १८७६ में पटना कालिजिएट में दाखिल हुए और १८८६ में मैट्रिक पास करके पटना कालिज में नाम लिखाया। मगर १८८७ में केनिंग कालिज में दाखिला लेने के लिए लखनऊ चले गए। वहीं उनके दिल में इंग्लैंड जाने का शौक पैदा हुआ। उस जमाने में बहुत से नवयुवक यूरोप जा रहे थे। मगर घर वालों से आज्ञा मिलने की आशा नहीं थी, इसलिए वह चुपचाप ही बिना किसी को बताए हुए मुंबई पहुंच गए और हाजियों के जहाज में बैठकर अदन पहुंच गए। यहां उनके सारे पैसे खत्म हो गए। मजबूरन उन्होंने अपने पिता को सूचना दी और उनसे मदद मांगी।


मौलाना मजहरुल हक और महात्मा गांधी की मित्रता


उनके पिता ने उनको रुपये भेज दिए और वह लंदन पहुंच गए। यह एक संयोग की ही बात है कि इस जहाज में महात्मा गांधी भी यात्रा कर रहे थे। जहाज में दोनों में अच्छी मित्रता हो गई, जो हमेशा कायम रही।

वह ५ दिसंबर १८८८ को लंदन पहुचे थे और तीन साल इंग्लैंड में रहे व बैरिस्टरी की डिग्री लेकर भारत वापस आए और पटना में प्रैक्टिस करने लगे। एक साल बाद वह यू.पी. जूडिशियल सर्विस में शामिल हो गए। मगर जब उन्होंने देखा कि अंग्रेज अफसर अपने अधीनस्थ भारतीय कर्मचारियों के साथ अच्छा बरताव नहीं करते और उन्हें नीची निगाह से देखते हैं, तो उन्होंने १८९६ में त्यागपत्र दे दिया और छपरा चले आए व वहीं प्रैक्टिस करनी शुरू कर दी।


मौलाना मजहरुल हक का सामाजिक जीवन


उसके बाद से उन्होंने देश की आजादी और समाज की भलाई के कामों में हिस्सा लेना शुरू किया। १९०६ में वह पटना चले आए और वहीं प्रैक्टिस करने लगे। थोड़े समय में ही उनकी गणना चोटी के वकीलों में होने लगी और उन्होने बहुत बड़े-बड़े मुकदमों की पैरवी की। १९१३ में कानपुर में एक सड़क चौड़ी करने के लिए अंग्रेज अधिकारियों ने एक मस्जिद का कुछ हिस्सा तोड़ दिया, जिस पर मुसलमानों ने अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया । इस पर अंग्रेज अफसरों ने बहुत सख्तियां की और गोली चलाई, जिसमें कई आदमी मारे गए। अंग्रेज अफसरों के डर से कोई स्थानीय वकील या बैरिंस्टर इस मुकदमे की पैरवी करने के लिए तैयार नहीं था। तब मौलाना मजहरुल हक कानपुर पहुंचे और बिना किसी फीस के यह मुकदमा अपने हाथों में ले लिया। अंत में वायसराय के बीच-बचाव से फैसला हो गया।


मौलाना मजहरुल हक का राजनीतिक जीवन


इस जमाने में वह कांग्रेस के अधिवेशनों में हिस्सा लेने लगे थे और १९१२ में पटना में कांग्रेस का जो अधिवेशन हुआ था, उसकी स्वागत समिति के अध्यक्ष चुने गए। इस अवसर पर उन्होंने जो भाषण दिया था, वह देशप्रेम और आजादी की लगन की वजह से आज तक याद किया जाता है।

१९१६ के कांग्रेस-अधिवेशन में भाषण देते हुए उन्होंने कहा था – “समय गुजर गया। अब काम का समय है। आप भारत के लिए होमरूल या स्वशासन मांग रहे है। क्या आप समझते हैं कि यह चीज केवल मांगने से मिल जाएगी? हमें अपने शासकों को यह दिखाना होगा कि भारत का हर आदमी, हर स्त्री और हर बच्चा सेल्फ गवर्नमेंट हासिल करने के लिए किस तरह अटल है।“

सन् १९१७ में जब गांधीजी चंपारन गए तो मौलाना मजहरुल हक ने उन्हें अपने घर पर ठहराया। जब गांधीजी पर मोतीहारी में धारा १४४ का उल्लंघन करने के लिए मुकदमा चलाया गया, तो वह फौरन मोतीहारी पहुंचे। बाद में महात्मा गांधी पर से मुकदमा उठा लिया गया और गांधीजी मजहरुल हक के साथ छपरा चले आए।

गांधीजी के साथ उनके मेल-जोल की वजह से मौलाना साहब की जिंदगी में बड़ा परिवर्तन हुआ। उन्होंने रईसाना ठाठ-बाट की जिंदगी छोड़कर सादगी को अपना लिया और अपना सब कुछ देश-सेवा के लिए अर्पित कर दिया। १९१७ में मांटेग्यू मिशन भारत आया था और उसने प्रशासनिक सुधार के जो सुझाव दिए थे, उसे १९१९ के गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट में सम्मिलित कर लिया गया।

लेकिन इन तथाकथित सुधारों से सारे देश में बड़ी निराशा हुई। पहले महायुद्ध की वजह से देश की राजनीतिक स्थिति पर बहुत असर पड़ा था। फिर भारत सरकार ने रौलेट एक्ट पास करके लोगों को दबाना चाहा। इन सब बातों से सारे देश में हलचल मच गई और महात्मा गांधी ने घोषणा की कि अगर यह कानून उठा नहीं लिया गया तो इसके विरुद्ध आंदोलन किया जाएगा, इस घोषणा के बाद ही सारे देश में सत्याग्रह तथा हड़ताल, जलसे-जुलूस का सिलसिला शुरू हो गया।

महात्मा गांधी पंजाब में गिरफ्तार कर लिए गए और मुंबई भेज दिए गए। मौलाना मजहरुल हक ने भी बड़े जोश-खरोश के साथ ऐसे जलसों-जुलूसों में हिस्सा लिया और असहयोग आंदोलन का तूफानी दौर शुरू हो गया। असहयोग आंदोलन का एक बुनियादी कार्यक्रम यह था, कि ऐसे स्कूलों और कालिजों से विद्यार्थियों को हटा लिया जाए जो सरकार से सहायता पाते हैं।


बिहार नेशनल कालिज की स्थापना


महात्मा गांधी का विचार था कि बिहार में राष्ट्रीय विश्वविद्यालय स्थापित किया जाए। इसलिए जो सात-आठ हजार रुपये उन्होंने बिहार में जमा किए थे, वे स्थानीय नेताओं को दे दिए। इस तरह ५ जनवरी १९२१ में बिहार नेशनल कालिज की स्थापना हुई। उस समय एक महाविद्यापीठ भी स्थापित किया गया इस विद्यापीठ के कुलपति मौलाना मजहरुल हक बनाए गए। उस जमाने की एक नाटकीय घटना का विवरण डा. राजेंद्र प्रसाद ने अपनी आत्मकथा में दिया है।


सदाकत आश्रम की स्थापना


बिहार स्कूल आफ इंजीनियरिंग के विद्यार्थी, जिन्होंने असहयोग आंदोलन के जमाने में कालिज छोड़ दिया था, मौलाना साहब के पास पहुंचे और उनसे कहा कि उनके लिए कोई समुचित व्यवस्था की जाए। हक साहब ऐसे नेताओं में नहीं थे, जो सिर्फ जबानी भाषण देते हैं और कागजी सुझाव देते हैं। वह सच्चे अर्थों में एक सिपाही थे। वह केवल कार्य करने पर विश्वास करते थे। उन्होंने फौरन अपनी सजी-सजाई कोठी सिकंदर मंजिल छोड़ दी और उन विद्यार्थियों के साथ पटना-दानापुर रोड पर दिगाह की एक बाड़ में शरण ली। उन्होंने कुछ झोंपड़ियां खडी की और देखते-ही-देखते एक आश्रम बन गया। इस तरह सिकंदर मंजिल की ठाठ-बाट का जीवन गुजारने वाला व्यक्ति बाग में बनी हुई झोंपड़ी का वासी बन गया। यह मौलाना मजहरुल हक ने इस स्थान का नाम “सदाकत आश्रम” रखा। आजकल बिहार कांग्रेस कमेटी का मुख्यालय इसी में है।

सितंबर १९२१ में उन्होंने पटना से एक अंग्रेजी साप्ताहिक मदरलैड जारी किया, जो सारे देश में बहुत प्रसिद्ध हो गया। उन्होंने इस अखबार द्वारा यह प्रचार किया कि सही प्रजातंत्र वही है, जिसमें सबकी भावनाओं पर ध्यान दिया जाए, किसी को छोटा या बड़ा न समझा जाए। वह हिंदू-मुस्लिम एकता और भाईचारे के भी बहुत बड़े प्रचारक थे। उन्होंने अपने भाषणों और लेखों में बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया है कि भारत की भलाई इसी में है कि दोनों धर्मों के लोग मिल-जुलकर रहें। अपने अखबार में उन्होंने ब्रिटिश सरकार के अत्याचारों और आजादी के आंदोलनों के लिए भी बहुत कुछ लिखा।

सरकार के खिलाफ लिखने के लिए उन पर मुकदमा भी चलाया गया और १००० रुपये जुर्माना किया गया। मगर उन्होंने जुर्माना देने से इंकार कर दिया और उसके बजाय तीन महीने के लिए जेल चले गए और उनका अखबार बंद हो गया। मौलाना मजहरुल हक उस समय देश के चोटी के नेता थे।

महात्मा गांधी, पंडित मोतीलाल नेहरू, हकीम अजमल खां, डा. अंसारी, मौलाना आजाद और दूसरे तमाम बड़े नेताओं से उनके गहरे संबंध थे।

इस तरह बिहार में राजनीतिक जागृति पैदा कराने में उनका बहुत बड़ा हाथ है। आजादी के बाद जो लोग मशहूर हुए और आगे आए, उनमें अधिकतर ऐसे लोग थे, जो मौलाना साहब के साथी थे।

सन् १९२६ में अखिल भारतीय कांग्रेस के गुवाहाटी-अधिवेशन की अध्यक्षता के लिए उनका नाम प्रस्तुत हुआ था, मगर उन्होंने इसे कबूल करने से इंकार कर दिया, क्योंकि उस वक्त वह राजनीतिक जीवन से संन्यास ले चुके थे और एक फकीर का जीवन बिता रहे थे। डा. पट्टाभि सीतारामय्या ने कांग्रेस के इतिहास में उनके बारे में लिखा है : “उन्होंने अपने जीवन का आखिरी हिस्सा न केवल एकात में गुजारा, बल्कि एक सच्चे साधु के रूप में बिताया।“

अपने जीवन के अंतिम दिनों में वह बिल्कुल साधु हो गए थे। उन्होंने लंबी दाढ़ी रख ली थी, बड़े मामूली कपड़े पहनते थे और सादे ढंग से रहते थे। वह सारन जिले के गांव फरीदपुर चले आए और वहीं अपने मकान में रहने लगे। इस मकान का नाम उन्होंने “आशियाना” रखा था, गांधीजी ने उनके जीवन के बारे में लिखा है कि – “वह हमारे मतभेदों से तंग आकर दुनिया से अलग-थलग हो गए थे। वह बहुत बड़े देशप्रेमी, सच्चे मुसलमान और एक बड़े दार्शनिक थे। पहले वह बड़े रईसाना ठाठ-बाट से रहते थे, लेकिन जब असहयोग आंदोलन चला तो उन्होंने सब कुछ छोड़-छाड़कर फकीरी का जीवन अपना लिया। उनकी कथनी और करनी में कोई फर्क नही था। उनका स्थापित किया हुआ सदाकत आश्रम भारत के दोनों धर्मों को मिलाने का काम कर सकता है।“


मौलाना मजहरुल हक की मृत्यु


२७ दिसंबर १९२९ को उन पर पक्षाघात का हमला हुआ और २ जनवरी १९३० को वह परलोक सिधार गए और अपने मकान के बगीचे के एक कोने में उन्हे दफन किया गया ।

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