रमण महर्षि की जीवनी | Ramana Maharshi


महर्षि रमण का जन्म


दक्षिण के शैव लोग “अरुदर्शन” (अर्थात् जब शिव ने अपने भक्तों को नटराज के रूप में दर्शन दिए) का त्यौहार बड़े जोर-शोर और श्रद्धा-भक्ति से मनाते हैं। ३० दिसंबर १८७९ को इसी पवित्र त्यौहार के दिन तमिलनाडु के तिरुचुली नामक छोटे से कस्बे में श्री सुंदरम् अय्यर के घर एक बालक का जन्म हुआ, जो आगे चलकर महर्षि रमण के रूप में विख्यात हुआ।

कुछ लोग महर्षि रमण को भगवान शिव का अवतार मानते हैं। इसका कारण शायद यह है कि बचपन से ही वह संन्यासियों जैसा आचरण करते थे। समाधिस्थ होना तो जैसे उनके स्वभाव में ही सम्मिलित था।

इस प्रसंग में एक घटना बड़ी मनोरंजक है जो उनकी बहुत छोटी उम्र में घटी थी। उन दिनों वह अपने चाचा के घर किण्डीगुल में थे। घर में कोई समारोह था, सो सब लोग पहले तो उसी में मशगूल रहे और फिर मंदिर चले गए। रमण उनके साथ नहीं गये। वह चुपचाप बैठे पढ़ते रहे। फिर जब नींद आने लगी तो कुंडे-दरवाजे बंद करके सो गए।

घर के लोग जब वापस लोटे, तो उन्होंने बहुतेरा खटखटाया और शोर मचाया, पर रमण की नींद न टुटी| आखिर वे लोग किसी दूसरे के घर से होकर अपने घर में आए और रमण को जगाने के लिए पीटने लगे| घर के सब बच्चों ने उन्हें पीटा, चा ने भी पीटा, पर उनकी आंखे न खुली|वह पूर्ववत सोए रहे। रमण को उस मार-पीट का कुछ भी पता नहीं लगा। वह तो सुबह घर के लोगो ने उन्हे बतलाया, तो उन्हें पता चला कि रात को उनकी पिटाई भी हुई था।

मुदुरै में भी ऐसी घटनाएं अक्सर ही घटती थी, वहां रमण स्कूल में पढ़ते थे जब किसी लड़के से उनकी खटपट हो जाती, तब दिन में जागते हुए तो वह उनसे कुछ कह न पाता, क्योंकि रमण का स्वास्थ्य अच्छा था, पर उनके सो जाने पर वह अपने मन की मुराद पूरी कर लेता। वह अपने साथियों की मदद से सोए हुए रमण को उठाकर कहीं ले जाता और मन भर पीटने के बाद फिर वहीं सुला जाता।

बालक रमण में इस तरह की गहरी नींद के साथ-साथ अर्द्ध निद्रा में रहने की भी आदत थी। ये दोनों ही बातें उनकी धार्मिक वृत्तियों की परिचायक है। गहरी नींद एक ओर तो अच्छे स्वास्थ्य की निशानी है और दूसरी ओर इस बात का संदेश देती है कि यदि कोई व्यक्ति ध्यान में लीन हो जाए, तो पूरी तरह निमग्न रह सकता है - अर्द्धनिद्रावस्था यह दर्शाती है कि व्यक्ति आंखें खुली रहने पर भी, संसार के काम करते हुए भी, आत्मा अथवा परमात्मा में लीन हो सकता है।

महर्षि रमण का बचपन का नाम वेंकटरमण था, पर साधारणतः लोग उन्हें रमण के नाम से ही पुकारते थे | अपने नाम के अनुरूप ही वह अध्यात्म की दुनिया में रमण भी करते थे | उस समय उनकी उम्र १७ वर्ष की रही होगी। वह अपने चाचा के घर आए हुए थे। वहां एक विचित्र घटना घटी। वह घटना स्वयं उन्हीं के शब्दों में इस प्रकार है :

“मैं कभी बीमार नहीं हुआ था। स्वास्थ्य ठीक था। पर एक दिन एकाएक मैंने महसूस किया कि मैं मर रहा हूं। मौत के भय ने मुझे बुरी तरह जकड़ लिया। पर उस समय यह नहीं सूझा कि किसी डाक्टर के पास जाऊं, अथवा किसी मित्र को बुलाऊं। मैं अपने आप में ही उलझ गया, मौत के भय ने एकाएक मुझे सोचने पर मजबूर किया कि मैं मर रहा हूँ। पर तभी दिमाग में एक बिजली कौंधी - मैं कहां मर रहा हूं, मर तो शरीर रहा है। और मैं मौत का नाटक करने लगा। मैं लेट गया - सांस रोक ली और सब हरकतें भी बंद कर दी। तब मैंने अपने से कहा - यह शरीर तो मर गया। इसके मरने में और कसर ही क्या है? इसे जला दिया जाएगा, पर इस शरीर के मरने से मैं मर गया क्या? यदि मैं मर गया, तो शक्ति कैसे अनुभव करता हूं? मेरा व्यक्तित्व तो इससे अलग है। मैं इस शरीर की आत्मा हूं। शरीर मर जाएगा - पर मेरी आत्मा नहीं मरेगी। मैं तो कभी मरूंगा ही नहीं। और, इसके साथ ही, मौत का भय एकदम चला गया | मैं पुनःसशक्त हो गया। तब से मैंने शरीर में विशेष दिलचस्पी लेनी छोड़ दी।“


महर्षि रमण की ध्यान विधि


उसके बाद यदि कोई उनसे कुछ कहता-झगड़ता, तो वह जवाब नहीं देते। जो कुछ भी खाने को मिलता, खा लेते। धीरे-धीरे स्कूल में भी उनकी दिलचस्पी समाप्त हो गई। खेल-कुद से तो मन हट ही गया। एक संन्यासी सा जीवन बन गया | फिर एक दिन चरम स्थिति भी आ पहुंची। स्कूल में काम नहीं किया था - इसलिए अंग्रेजी व्याकरण के एक अभ्यास को तीन बार नकल करने की सजा मिली। दो बार तो उन्होंने नकल कर ली, पर उसके बाद न जाने मन में क्या उमंग उठी कि सभी किताबें एक ओर फेंक दीं और समाधि लगाकर ध्यान करने बैठ गए। फिर, कुछ देर बाद, उन्होंने स्कूल जाने का बहाना किया, कहा कि वहां स्पेशल क्लास लगेगी। चलने लगे, तो बड़े भाई ने पांच रुपये दिए, कालेज में अपनी फीस जमा करवाने को।

रमण ने सोचा कि अरुणाचलम् पहुंचने में तीन रुपये लगेंगे। सो, उन्होंने तीन रुपये तो अपने पास रखे और एक चिट लिख दी – “मैं अपने परम पिता की तलाश में, उसी की आज्ञा से, जा रहा हूँ। यह एक महान कार्य है - इसके लिए दुख करने और खोज में रुपया खर्च करने की आवश्यकता नहीं। तुम्हारी कालेज की फीस जमा नहीं करवा रहा। दो रुपये इसके साथ नत्थी हैं।“

इसके बाद वह घर से निकले, स्टेशन पर आए, टिकट लिया और गाड़ी में बैठ गए। राह में दो दिन भटके भी, परंतु आखिर में अपने आराध्य भगवान शिव के स्थान अरुणाचलम् पहुंच ही गए।

जब वह अपने घर से चले थे, तो कानों में सोने की बालियां थी। राह में भटक जाने पर उन्होंने वे बालियां एक गृहस्थ को चार रुपये में दे दी। अरुणाचलम् पहुंचने पर एक आदमी ने उनसे पूछा - "चुटिया मुंड़वाओगे?"

उन्होंने कहा-"हां।"

फलतः वह उन्हें एक जगह ले गया, जहां अनेक नाई बैठे यही काम कर रहे थे। चोटी मुड़वाकर उन्होंने अपनी जनेऊ भी अपने आप उतार दी। धोती फाड़कर फेंक दी और उसमें से कोपीन या लंगोटी के लायक कपड़ा रख लिया। बाल कटवाने के बाद हिंदू रीति के अनुसार स्नान करना चाहिए, पर रमण तो शरीर की सेवा के पक्ष में थे ही नहीं, सो मंदिर की ओर चल पड़े। परंतु मंदिर के द्वार में घुसने से पहले ही जोरों की बूंदें पड़ी और उनका स्नान हो गया।

इस प्रकार, दुनिया से मुंह मोड़कर, और सारी इच्छाओं को त्यागकर, महर्षि रमण भगवान शिव के चरणों में साधनालीन हो गए। मंदिर के बड़े दालान में एक ओर उन्होंने आसन जमा दिया। कई सप्ताह तक वह बिना हिले-डुले, बोले-चाले, वहीं बैठे रहे। संसार से उनका नाता टूट चुका था। वह आत्मा की खोज में लीन थे।

शीघ्र ही, लोग उन्हें “ब्राह्मणस्वामी” कहने लगे और शेषाद्रिस्वामी नाम के एक सज्जन ने, जो कुछ साल से वहां आए हुए थे, उनकी देखभाल का काम अपने जिम्मे ले लिया। लोग रमण महर्षि को “छोटा शेषाद्वि” भी कहने लगे।

उनके घर से गायब होने के बाद स्वभावतः ही लोग उनकी खोज में लग गए और एक दिन उनकी माता उनके पास आ पहुंची। पर वह चुप रहे, कुछ नहीं बोले। अंततः एक व्यक्ति के कहने पर उन्होंने लिखा – “नियंता की आज्ञा और प्रारब्ध कर्मों के अनुसार जो कुछ नहीं होगा वह कभी नहीं होगा इसलिए अच्छा है कि जो होता है, उसे होने दो।“

लगभग तीन वर्ष तक रमण ने कठोर तपस्या की। इन दिनों कोई व्यक्ति जो कुछ मुंह में डाल देता, वही खा लेते, पर दिन में केवल एक बार, और वह भी उतना ही, जिससे शरीर का आधार बना रहे। कुछ दिनों तक तो जिस पानी मिले दूध से मंदिर का फर्श धुलता था, यहा उन्हें पिलाया गया।

अरुणाचलम् की पहाड़ी के चारों ओर बहुत रूखा-सा वातावरण है। इस चोटी के दक्षिण में, नीचे की ओर, महर्षि रमण का आश्रम है। इस आश्रम की भी एक कथा है| महर्षि रमण की माता ने जब और कोई चारा न देखा, तो वह उन्हीं के पास रहने लगी और उनके भक्तों-शिष्यों की सेवा करने लगी। धीरे-धीरे उन्हें भान होता गया कि रमण अद्भुत शक्ति संपन्न दैवी पुरुष हैं। एक बार तो रमण के रूप में साक्षात भगवान ने उन्हें दर्शन दिए और वह चिल्ला पड़ी -"बेटा, इन सांपों को दूर करो। ये तुम्हें काट खाएंगे।"

अंत में, जब माता की मृत्यु हुई, तो उनकी समाधि आज के आश्रम के स्थान पर बना दी गई। उन दिनों महर्षि रमण अरुणाचलम् की एक गुफा में रहते थे और माता की समाधि पर प्रतिदिन घूमने जाते थे। एक दिन वहां गए, तो वहीं ठहर गए। उनके शिष्यों को चिंता हुई कि वह कही चले गए। सो, वे उन्हें खोजने लगे। अंत में, उन्होंने उन्हें अपनी माता की समाधि पर बैठे पाया। पूछने पर वह बोले, "भगवान् का यही आदेश है।" फलतः वहां आश्रम बना दिया गया। अब तो आश्रम एक पूरी बस्ती ही बन गया है, पर पहले-पहल महर्षि के रहने के लिए वहां केवल घांस-फूंस की एक झोपड़ी डाली गई थी।

महर्षि रमण की आध्यात्मिक उन्नति की बात शीघ्र ही सारे संसार में फेल गई । विभिन्न देशों के लोग उनके दर्शन के लिए आने लगे | अच्छे प्रतिष्ठित और विचारवान व्यक्ति उनके पास आते और उनके सत्संग का लाभ उठाकर अपना जीवन सफल मानते। उनका कहना था कि सारे प्राणी, सारी आत्माएं, एक हैं। सभी आत्माओं को सुखी बनाने के लिए प्रयत्नशील होना ही ईश-भक्ति है। इसीलिए वह दुखियों, रोगियों, आदि की भरपूर सेवा करते थे कहते हैं कि कुछ ईसाई पादरी एक बार उनकी परीक्षा के लिए आए। वे महर्षि को पाखंडी मानते थे। पर जब उन्होंने उन्हें एक कोढ़ी दंपति की सेवा में लीन देखा, तो उनकी आंखें खुल गई और उन्होंने कहा, "आज हमने साक्षात् यीशू मसीह के दर्शन किए हैं।"


रमण महर्षि के विचार


आज हमारे बीच महर्षि रमण तो नहीं हैं, पर उनकी शिक्षाएं उनके उपदेश और उनके सिद्धांत आज भी हमें प्रेरणा दे रहे हैं। वह कहते थे – “भगवान, गुरु और आत्मा एक समान हैं।“

गुरु की परिभाषा वह इस तरह करते थे – “गुरु वह है जो हर समय आत्मा की गहराई में निवास करता है। उसे गलतफहमियों और भेद-भावों से दूर रहना चाहिए। वह स्वतंत्र और बंधनमुक्त होना चाहिए। उसे कभी चिंतित नहीं होना चाहिए।“

वह यह भी कहते थे कि – “जो व्यक्ति अपने को नहीं जानता, वह दूसरे को क्या ज्ञान दे सकता है? वह अद्वैत सिद्धांत को मानने वाले थे। वह अधिक बोलते नहीं थे, परंतु लोगों को उनके दर्शन मात्र से शांति प्राप्त होती थी | बात यह थी कि वह स्वयं ज्ञानपूर्ण थे और सदा दूसरों के कष्ट दूर करने अथवा अपने ऊपर रखने की भावना रखते थे।


रमण महर्षि की समाधि


महर्षि रमण अपने शरीर की बिल्कुल परवाह नहीं करते थे। इसी वजह से वह असमय में ही बुढ़े हो गए |१९४७ के बाद तो वह बहुत ही कमजोर हो थे। फिर,१९५० में उनकी आंख में एक भयंकर फोड़ा निकला। इस फोड़े का कई बार आपरेशन हुआ, परंतु वह ठीक न हुआ और अंत में उसी की वजह से वह महासमाधि में लीन हो गए।

इस तरह, यद्यपि महर्षि रमण हमारे बीच से चले गए हैं, पर उनका यह संदेश आज भी हमें बार-बार सावधान करता है – “सभी प्राणी एक हैं। सबके कल्याण में ही तुम्हारा कल्याण है ।“

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