बाबू रामानंद चटर्जी |रामानन्द चट्टोंपाध्याय | Ramananda Chatterjee


बाबू रामानंद चटर्जी एक बार काशी में गंगाजी में स्नान कर रहे थे, कि पैर फिसल जाने से गोता खाने लगे। एक बंगाली युवक ने उन्हें बचा लिया। बाबूजी ने कृतज्ञतापूर्वक उसे अपना नाम तथा पता दे दिया और कह दिया कि अगर कभी कलकत्ता आना हो तो मिलना और मेरे योग्य कोई सेवा हो तो बतलाना। वह बंगाली युवक कलकत्ता पहुंचा और तलाश करके उनसे मिला। तत्पश्चात उसने अपनी कविता उन्हें भेंट करते हुए कहा – “कृपा कर इसे प्रवासी में छाप दीजिए।“ बाबूजी ने कविता पढ़ी और फिर कहा – “भाई, इस कविता को तो मैं नहीं छाप सकता। अगर तुम चाहो तो मुझे चलकर हुगली नदी में डुबो सकते हो।“


बाबू रामानंद चटर्जी का जन्म


पत्रकारिता के इतने उच्च आदर्शों की स्थापना करने वाले बाबू रामानंद चटर्जी का जन्म २९ मई १८६५ को बांकुड़ा (बंगाल) के एक सामान्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था|


बाबू रामानंद चटर्जी की शिक्षा


प्राथमिक शिक्षा उन्होंने वहीं के एक स्कूल में पाई थी। उच्च शिक्षा के लिए कलकत्ता चले आए। वहां बड़ी आर्थिक कठिनाइयों के बीच उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। कभी-कभी तो उन्हें चाय के साथ मूड़ी (भुने हुए चावल) खाकर ही गुजर करनी पड़ती थी। परंतु बड़े परिश्रमी और होशियार विद्यार्थी थे। मैट्रिक की परीक्षा में उन्हें चौथा स्थान प्राप्त हुआ और उन्हें २० रुपये मासिक छात्रवृत्ति मिला। एफ.ए. की परीक्षा में भी उन्होंने बहुत ऊंचा स्थान पाया और उन्हें २५ रुपये महीने का छात्रवृत्ति मिला।

१९८८ में उन्होंने बी.ए. की परीक्षा अंग्रेजी विषय लेकर पास की और प्रथम श्रेणी व प्रथम स्थान प्राप्त किया। तब उन्हें ४० रुपये महीने की छात्रवृत्ति मिली। अभी वह एम.ए. में पढ़ ही रहे थे, कि कालिज के अधिकारियों के अनुरोध पर उन्होंने सिटी कालिज में पढ़ाना भी शुरू कर दिया था।

मेधावी विद्यार्थी होने के कारण उन्हें विदेश में जाकर पढ़ने के लिए छात्रवृत्ति भी मिलने लगी थी। परंतु उन्होंने उसे लेने से इंकार कर दिया, क्योंकि वह सरकारी नौकरी किसी भी हालत में नहीं करना चाहते थे।


बाबू रामानंद चटर्जी की पहला पत्र


विद्यार्थी-अवस्था से ही बाबू रामानंद चटर्जी बड़े निर्भीक थे। अपने पहले लेख के बारे में एक बार उन्होंने बताया था - एक गोरे मजिस्ट्रेट ने यह हुक्म निकाल दिया था कि अमुक सड़क पर कोई बैलगाड़ी दोपहर को न निकला करे, क्योंकि तब साहब विश्राम करते है। मैंने उसके इस अनाचार के विरुद्ध अपना प्रथम पत्र लिखा था।“


धर्मबंधु का सम्पादन | दासी का सम्पादन


तभी से उन्हें पत्रकारिता का शौक लग गया था। उन दिनों उन्होंने अपने एक मित्र को धर्मबंधु नामक पत्र निकालने में सहायता की। आगे चलकर वह स्वयं इस पत्र के संपादक बन गए। तब से लेकर आगामी ५० वर्षों तक पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने जो शानदार काम किया, उसके कारण उनका नाम स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य हो गया है। फिर वह दासी नामक पत्रिका के संपादक बने।


मुकुल नामक बच्चों का पत्र निकालना


आचार्य जगदीशचंद्र बसु के सहयोग से मुकुल नामक बच्चों का पत्र भी निकाला। एम.ए. करने के बाद भी वह सिटी कालिज में पढ़ाते रहे। इसके बाद १८९५ में वह कायस्थ पाठशाला के प्रिंसिपल बनकर इलाहाबाद चले गए। वहां रहते हुए भी उन्होंने एक वर्ष तक दासी पत्रिका का संपादन किया। इलाहाबाद में रहते हुए उन्होंने राष्ट्रवादी गतिविधियों में भाग लेना शुरू किया।


बाबू रामानंद चटर्जी का राजनीतिक जीवन


इलाहाबाद से वह अक्सर कांग्रेस के लिए प्रतिनिधि चुने जाते रहे और उसके अधिवेशनों में भाग लेते रहे। श्री गोपालकृष्ण गोखले के सभापतित्व में होने वाले कांग्रेस के अधिवेशन में उन्होंने प्राथमिक शिक्षा के बारे में जो भाषण दिया, उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा हुई। यहीं रहते हुए वह गोपालकृष्ण गोखले, मदनमोहन मालवीय, सच्चिदानंद सिंहा, सी.वाई. चिंतामणि सरीखे प्रसिद्ध नेताओं के संपर्क में आए।

उन दिनों राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन को उनके अंग्रेज प्रिसिपल ने राष्ट्रवादी गतिविधियों में भाग लेने के लिए निकाल दिया था। बाबूजी ने उन्हें कायस्थ पाठशाला में दाखिल कर लिया। अंग्रेजों के रोबदाब के उन दिनों में यह बहुत हिम्मत का काम था।

विद्यार्थियों के साथ-साथ रामानंद बाबू अपने अध्यापक सहयोगियों का भी बहुत ध्यान रखते थे। कायस्थ पाठशाला में श्री रामदास गौड़ कैमिस्ट्री के प्रोफेसर थे। प्रयोग करते समय गौड़जी से कांच को कुछ चीजे टूट गई। कायस्थ पाठशाला के मैनेजर ने सीधे गौड़ साहब से जवाब-तलब कर लिया।

रामानंद बाबू ने इस बात का घोर विरोध किया। उन्होंने मैनेजर से कहा – “आप मुझ से जवाब-तलब कर सकते थे, मेरे अधीनस्थ साथी से नहीं।“ इसी बात पर उन्होंने त्यागपत्र ही दे दिया। इलाहाबाद जाते समय उन्होंने यह प्रतिज्ञा की कि वह ऐसी वस्तुओं का प्रयोग नहीं करेंगे जो भारत में न बनी हों। इसी तरह स्वदेशी का व्रत उन्होंने बंगाल में स्वदेशी आंदोलन प्रारंभ होने से १० वर्ष पहले और गांधीजी का असहयोग आंदोलन शुरू होने से २६ वर्ष पहले ही ले लिया था।


प्रदीप नामक पत्र का संपादन


यद्यपि वह पाठशाला के प्रिंसिपल थे, पर पत्रकारिता तो उनके खून में थी। इलाहाबाद में रहते हुए भी वह विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख आदि भेजते रहते थे। वहां रहते हुए भी उन्होंने प्रदीप नामक पत्र का संपादन करना भी स्वीकार किया। यह पत्र गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर का समर्थन करता था। तभी से गुरुदेव और बाबूजी की मैत्री हो गई, जो अंत तक कायम रही। कायस्थ समाचार के प्रकाशन में भी उन्होंने योगदान किया।


प्रवासी नामक बांग्ला मासिक की स्थापना


नौकरी करते समय ही उन्होंने १९०१ में प्रवासी नामक बांग्ला मासिक की स्थापना की। उस समय इसकी व्यवस्था का भार उन पर, उनकी पत्नी श्रीमती मनोरमा देवी पर और एक क्लर्क के ऊपर ही था। परंतु अपने गंभीर अध्ययन और परिश्रम के बल पर उन्होंने “प्रवासी” को बांग्ला का सर्वश्रेष्ठ मासिक पत्र बना दिया।

प्रवासी की स्थापना के चार वर्ष बाद उन्होंने कायस्थ पाठशाला के प्रिसिपल-पद से त्यागपत्र दे दिया, क्योंकि उनके जैसा स्वतंत्र विचारों वाला व्यक्ति पुराने विचारों वाले प्रबंधकों के साथ चल नहीं सकता था।


माडर्न रिव्यू नामक अंग्रेजी मासिक पत्र निकालना


इलाहाबाद से ही उन्होंने जनवरी १९०७ में माडर्न रिव्यू नामक अंग्रेजी मासिक पत्र निकालना शुरू किया और इसी के साथ भारत में पत्रकारिता के एक नए युग का सूत्रपात हुआ। माडर्न रिव्यू की सबसे बड़ी विशेषता थी, उसकी संपादकीय टिप्पणियां थी | यह टिप्पणियां दुनिया के हर विषय पर होती थीं और इनसे पता चलता था कि बाबू रामानंद चटर्जी का अध्ययन कितना गहन और कितना व्यापक था। उनकी राजनीतिक टिप्पणियां तो विशेष रूप से पसंद की जाती थी इसलिए वह लंबे-लंबे लेखो से कहीं अधिक प्रभावकारी सिद्ध होती थी, अपने निर्भीक और राष्ट्रवादी विचारों के लिए तो रामानंद बाबू प्रसिद्ध थे ही। सरकार की कड़ी-से-कड़ी आलोचना करने में भी वह हिचकिचाते नहीं थे इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि अधिकारी वर्ग उनसे रुष्ट हो जाते थे ।

उन्हें आदेश दिया गया कि “या तो अपने दोनों पत्र बंद करो या उत्तरप्रदेश छोड़ दो।“ पत्र बंद करने की जगह वह उ.प्र. छोड़कर कलकत्ता आ गए। अब वह बड़े बाबू के नाम से प्रसिद्ध हो गए थे।

“माडर्न रिव्यू” और “प्रवासी” निकालने में बड़े बाबू ने अपना सारा जीवन खपा दिया। ६२ वर्ष की उम्र में भी वह सुबह पांच घंटे, दोपहर को चार घंटे और कभी-कभी रात्रि को भी दो घंटे अपने पत्रों का कामकाज देखा करते थे। इसी कारण अन्य कार्मों के लिए उनके पास समय ही नहीं बच रहता था। इसलिए न तो वह लोगों से मिलना-जुलना पसंद करते थे और न ही लंबी-चौड़ी बातचीत करना।

सभा-सोसायटियों में जाने से भी वह यथासंभव बचा करते थे। सप्ताह में केवल एक दिन वह पत्र-व्यवहार करते थे, और उनके पत्र भी स्पष्ट अक्षरों में छोटे-छोटे ही होते थे, परंतु प्रचार से कोसों दूर रहने पर भी अपने मासिक पत्रों के बल पर उन्होंने जो ख्याति अर्जित की, उसकी तुलना नहीं हो सकती।

अपने संपादन-काल में उन्होंने नए लेखकों, कवियों और चित्रकारों को भी भरपूर प्रोत्साहन दिया था। अपने असाधारण परिश्रम तथा तीक्ष्ण बुद्धि के कारण ही रामानंद बाबू ने विश्व के सर्वश्रेष्ठ पत्रकारों में एक उच्च स्थान प्राप्त कर लिया। उनके द्वारा संपादित माडर्न रिव्यू की पुरानी फाइलों में भारतीय राजनीति, शिक्षा, इतिहास, पुरातत्व इत्यादि के लिए जितनी महत्वपूर्ण सामग्री एकत्रित है, उतनी भारत के अन्य किसी पत्र में न होगी। माडर्न रिव्यू की पुरानी फाइलों से इसके सैंकड़ों प्रमाण विद्यमान हैं। कि अन्याय का विरोध करने का कोई भी मौका रामानंद बाबू ने अपने हाथ से नहीं जाने दिया।

बड़े बाबू के संपादकीय नोट इतने उच्च कोटि के होते थे, कि बड़े-बड़े नेता भी यह जानने के लिए इच्छुक रहते थे कि माडर्न रिव्यू ने क्या सम्मति प्रकट की है। गांधीजी ने यरवदा जेल से १८ अक्तूबर १९३० को रामानंद बाबू को एक पत्र लिखा था, जिसमें मई से लेकर अक्तूबर तक के अंक मंगाए थे।

बड़े-से-बड़े नेता भी उन दिनों माडर्न रिव्यू में अपना लेख भेजा करते थे। कांग्रेस-अध्यक्ष बनने पर नेहरूजी ने १९३७ में चाणक्य के छद्म नाम से स्वयं अपने ऊपर एक लेख लिखा था। भारत के ही नहीं, विदेशों के भी श्रेष्ठ लेखक उनके पत्र माडर्न रिव्यू में लेख लिखने में गौरव का अनुभव करते थे। सुप्रसिद्ध अमरीकी लेखक डा. संडर लैंड ने तो यहां तक लिख दिया था – “अमरीका में माडर्न रिव्यू की कोटि का कोई मासिक पत्र नहीं, और मेरा तो ख्याल है कि यूरोप में भी शायद ही कोई हो।“

हिंदी-भाषी होते हुए भी उन्होंने आज से ४० वर्ष पहले ही यह समझ लिया था, कि अंत में हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा बनेगी। इसलिए उन्होंने हिंदी में “विशाल भारत” निकालना शुरू किया। उन्होंने विशाल भारत के प्रथम अंक के लिए संपादक के पास कुछ नोटों का मसाला भेजा था और एक नोट में उन्होंने बतलाया था कि देश के सभी नगरों में सबसे अधिक हिंदी बोलने वाले कलकत्ता में ही रहते हैं। यह सिद्ध करने के लिए उन्होंने भिन्न-भिन्न नगरों की जनसंख्या भी लिख दी थी। अंकों तथा तथ्यों को इकट्ठा करने में और उनका उचित उपयोग करने में उन्हें कमाल हासिल था।

यद्यपि विशाल भारत में उन्हें हमेशा हजारों रुपयों का घाटा हुआ, पर वह उसे बराबर चलाते गए। शायद यह बहुत कम लोगों को मालूम हो कि महाकवि रवींद्रनाथ ठाकुर को उन्होंने भी प्रेरित किया था कि अपनी रचनाओं का हिंदी में अनुवाद कराएं। उन्होंने स्वयं हिंदी अनुवादों के प्रकाशन की भी व्यवस्था कर ली, परंतु बाद में महाकवि के अनुरोध पर यह काम उनकी संस्था को ही सौंप दिया।

जिस तरह वह स्वयं स्वतंत्र रहकर लिखना चाहते थे, उसी तरह अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को भी लिखने की पूरी छूट देते थे। वह हिंदू महासभा के सूरत-अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गए थे, परंतु विशाल भारत में न तो उनका चित्र ही छपा और न ही भाषण, बल्कि उनके सभापतित्व के विरोध में एक नोट छप गया।

जब विशाल भारत में अराजकतावाद पर लेख छपने शुरू हुए तो बड़े बाबू ने संपादक को मना करने के बजाय स्वयं अपना नाम विशाल भारत के संचालक-पद से हटवा लिया।

सन् १९२६ में लीग आफ नेशन्स ने उन्हें जेनेवा आने का निमंत्रण दिया था और वह वहां पधारे भी थे। जेनेवा से स्वदेश लौटते समय जब राष्ट्रसंघ ने बड़े बाबू को नियमानुसार आठ-दस हजार रुपये का चैक देना चाहा, तो उन्होंने यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि इस रकम के स्वीकार कर लेने पर मेरी मानसिक स्वाधीनता में बाधा पड़ेगा। भारत वापस आने पर जब बड़े बाबू ने राष्ट्रसंघ की कठोर आलोचना की तो लाहौर के सिविल एंड मिलिटरी गजट ने व्यंग्य करते हुए लिखा था – “संघ के आतिध्य का यह दुरुपयोग है।“ इसका मुंहतोड़ उत्तर देते हुए बड़े बाबू ने लिखा था – “सुनते हैं कि जान बुल (अंग्रेजी सांड़) की खुशामद करने के लिए उसकी पेट-पूजा करनी पड़ती है, पर गजट के एडीटर साहब को मै बतला देना चाहता हूं कि मैं एक प्याला चाय के लिए भी राष्ट्रसंघ का ऋणी नहीं हूं।“

बड़े बाबू आधुनिक चित्रकला के भी बड़े समर्थक थे। उन दिनों जब आधुनिक कलाकारों को कोई पूछता भी नहीं था, तब उन्होंने चटर्जी पिक्चर एल्बम के नाम से एक एल्बम-माला प्रकाशित की थी, जिसमें इन कलाकारों के चित्र छपते थे। बाद में उन्होंने प्रवासी, माडर्न रिव्यू और विशाल भारत द्वारा भी इन कलाकारों को प्रोत्साहन दिया। अवनींद्रनाथ ठाकुर, नंदलाल बोस, ओ.सी. गांगुली जैसे प्रतिष्ठित चित्रकारों को शुरू में बड़े बाबू ने ही प्रोत्साहन दिया था।

बाबू रामानंद चटर्जी के लिए पत्रकारिता एक मिशन था और वह स्वयं भी पत्रकार होने में गर्व अनुभव करते थे। एक बार किसी कांग्रेस के जलसे में रामानंद बाबू पत्रकारों के कक्ष में बैठे दूर से महात्माजी ने उन्हें देख लिया और किसी व्यक्ति को उनके पास भेजा कि उन्हें मंच पर ले आए। बड़े बाबू ने उत्तर दिया – “मैं अपने साथियों के साथ पत्रकारों की गैलरी में बैठने में ही अपना गौरव मानता हूँ।“ दरअसल, उन्होंने पत्रकारिता को ही गौरवान्वित किया था।


बाबू रामानंद चटर्जी की मृत्यु


उनका स्वर्गवास ३० सितंबर १९४३ को हुआ।


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