टी एल वासवानी | साधु वासवानी | Sadhu Vaswani


सिंध की माटी ने अनेक साधु-संतों और महापुरुषों को जन्म दिया है। इनमें से एक थे दादा वासवानी, जो बड़े होकर भारतीय संस्कृति के अग्रदूत बने।


साधु वासवानी का जन्म


साधु वासवानी का जन्म २५ नवंबर १८७९ को हैदराबाद (सिंध) में हुआ था । उनका पूरा नाम था थावरदास लीलाराम वासवानी।


साधु वासवानी की शिक्षा


पहली बार जब बालक वासवानी स्कूल जाने लगे, तो उनकी माता ने कहा, "बेटे एक बात याद रखना। रोज स्कूल जाने से पहले जपुजी साहब और सुखमनी साहब का पाठ करके जाना।" माता की यह सीख उन्होंने कभी नहीं भूली। पाठ करना उनके जीवन का अटूट नियम बन गया। कभी-कभी स्कूल को देर हो जाती, तो वह नाश्ता न करते, पर जपुजी साहब का पाठ अवश्य करते। खेलने में उनका मन नहीं लगता था । स्कूल से आने के बाद सबसे पहले स्कूल का काम करते, बाद में कुछ घर का काम करके, ऊपर छत पर चले जाते। वहां बैठकर वह ऋषि मुनियों के जीवन-चरित्र पढ़ते थे।

कहते हैं कि साधु वासवानी अभी आठ वर्ष के ही थे, तो एक रात उन्हें एक प्रकाश नजर आया । उस प्रकाश से आवाज आई, "बालक तुम्हें बहुत बड़ा काम करना है।" साधु वासवानी जी ने स्वयं इस दर्शन के विषय में कहा था, "एक रात, मैं घर के आंगन में घूम रहा था। चांद और तारे चमक रहे थे। उस रात मेरे दिल में आवाज आई, पूरी कर तू अपने दिल की प्यास जाकर हो संतों के दर का दास।“

उस रात मुझे ऐसा लगा कि आसपास के सब पदार्थ, सारा जग, सब गायब हो गए हैं, केवल एक रिक्त स्थान है, वहां न दीवारें हैं, न महल, न बंगले, न पशु, न पक्षी, न नदियां, न पहाड़। उस रिक्त स्थान में मैंने देखा एक अजीब ज्योति जल रही है। वही ज्योति मैंने अपने अंतरमन में भी देखी।"

इस दर्शन के बाद साधु वासवानी जी का मन भगवान की ओर अधिक झुकता गया, विशेषकर पिता की मृत्यु के बाद। अभी वह चौथी कक्षा में ही थे, कि उनके पिता का देहांत हो गया। सब रोने लगे परंतु उनकी आंखों में आंसू तक न थे, वह जपुजी साहब का पाठ करते रहे । अतिम संस्कार के बाद दादा सोचने लगे, “पिताजी कहां गए? ऐसी कौन सी वस्तु थी, जो उनको शरीर से निकल गई कि वह निष्चेष्ट हो गए और अग्नि में जलने पर भी चूं तक न की? क्या हर एक इंसान का अंत ऐसे ही होगा? तो, यह संसार क्या है? इस तरह वह घंटों सोचते रहते।

इन सब बातों के होते हुए भी वह मन लगाकर पढ़ते रहे। वह बहुत ही होशियार विद्यार्थी थे। उनका मकान कच्ची मिट्टी का, तंग गली में था। उसमें बत्ती तक न थी, फिर भी वह सड़क की बत्ती की रोशनी में जाकर पढ़ते। मैट्रिक की परीक्षा में वह पूरे सिंध में प्रथम आए। उन्हें मैक्लीन छात्रवृत्ति मिली। इसके पश्चात वह कराची के कालेज में दाखिल हुए । कालेज के प्रिंसिपल हैजकेथ ने एक बार उन्हें निबंध लिखने के लिए दिया और फिर निबंध पढ़कर कहा, "तुमने नकल मारी है, यह बातं अच्छी नहीं । तुम्हारी अंग्रेजी ऐनी बेसेंट जैसी लग रही है।"

यह सुनकर दादा को बहुत दुख हुआ। उन्होंने कहा, "यह निबंध मैंने ही लिखा है । आप इसी समय मेरी परीक्षा ले सकते हैं।"

प्रिंसिपल ने एक और निबंध लिखने को दिया। दादा ने उसी समय लिख दिया। प्रिंसिपल साहब निबंध पढ़कर हैरान हो गए और कहा, "तुम बहुत होशियार लड़के हो । एक दिन तुम्हारा नाम डा. ऐनी बेसेंट से भी ऊंचा होगा।"

मैट्रिक के बाद बी.ए. में भी वह अंग्रेजी में पहले नंबर पर आए। यूनिवर्सिटी ने उन्हें "एलिस छात्रवृत्ति” दी। १९०२ में उन्होंने एम.ए. पास किया।


साधु वासवानी के कार्य


सन् १९०८ में टी.जी. कालेज में प्रोफेसर नियुक्त किए गए । उसके बाद वह १९१२ में लाहौर के दयालसिंह कालेज, १९१५ में कूच विहार के विक्टोरिया कालेज तथा १९१६ में पटियाला के महेंद्र कालेज के प्रिंसिपल बने ।

छोटी उम्र में ही उन्होंने गीता तथा अन्य शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था। कालेज में उन्होंने एक युवक मंडल बनाया और युवकों को धार्मिक विचारों से अवगत कराया। स्थान-स्थान पर उन्होंने ईश्वर और धर्म पर भाषण दिए। उनके धार्मिक विचार हर जगह प्रसिद्ध हो गए। अभी उनकी उम्र ३० वर्ष की ही थी कि बर्लिन से उन्हें एक निमंत्रण मिला। वहां विश्व धर्म सम्मेलन होना था। वह भारत के प्रतिनिधि बनकर गए। उन्होंने केवल आधा घंटा भाषण दिया पर उनके भाषण का जादू जैसा प्रभाव पड़ा । कई अखबारों में उनका भाषण छपा । फिर उन्होंने यूरोप के विभिन्न नगरों की यात्रा की। वहां उन्होंने स्वामी विवेकानंद की तरह पूर्व और पश्चिम में एक सेतु-निर्माण का कार्य किया। उनके भाषणों ने वहां भारतीय धर्म के लिए गहरी रुचि पैदा की।


साधु वासवानी का सन्यासी जीवन


मां के मरने के बाद वह सांसारिक बंधनों से मुक्त हो गए, इसलिए उन्होंने प्रिंसिपल के पद से इस्तीफा दे दिया। उनके मार्ग में कोई रुकावट बाकी नहीं बची थी। अब उनके जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ। १९१८ में उन्होंने अमीरी त्यागकर गरीबी को अपना साथी बनाया।


साधु वासवानी का राजनीतिक जीवन


अब दादा का ध्यान भारत की पराधीनता की ओर गया। उस समय गांधीजी ने सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया था। वासवानी इस आंदोलन के स्तंभ बन गए। १९२० में कराची में महात्मा गांधी द्वारा बुलाई गई बैठक की अध्यक्षता की। १९२१ में गांधीजी की “यंग इंडिया” पत्रिका के पहले पृष्ठ पर ही असहयोग आंदोलन के समर्थन में उनके लेख को स्थान दिया गया था। इनके लेखों को पढ़कर लोग रोमांचित हो उठते थे और मर-मिटने के लिए तैयार हो जाते थे।


साधु वासवानी की पुस्तके


भारतवासियों में जागृति लाने के लिए उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं – “अवेक यंग इंडिया”, “इंडियाज एडवेंचर”, “इंडिया इन चेन्स”, “दी सीक्रेट आफ एशिया”, “माई मदरलेंड”, “'बिल्डर्स आफ टुमारो”, “एपासल्स आफ फ्रीडम” आदि |

उन्होंने शिक्षा तथा दूसरे क्षेत्रों की ओर भी ध्यान दिया, उनका विचार था कि सही शिक्षा का अर्थ चरित्र-निर्माण है। इसलिए उन्होंने सोचा कि शिक्षा को नया रूप दिया जाए। उन्होंने कहा – “नई शिक्षा आवश्यक है। आजकल हमारे स्कूल और कालेज जेल की कोठरिया हैं, जहां भारतीय आदर्श और भारतीय संस्कृति-रूपी सूर्य का प्रकाश नहीं पड़ सकता।“

इस बात को दृष्टि में रखते हुए उन्होंने भिन्न-भिन्न स्थानों में यूथ सेंटर या युवक केंद्र खोले और भिन्न-भिन्न स्थानों पर “मिशन आफ इंडियन यूथ” विषय पर भाषण दिए। राजपुर में शक्ति आश्रम खोला जहां गीता, प्रार्थना, भारतीय संस्कृति आदि विषयों पर कक्षाएं लगती थीं ।


मीरा मूवमेंट की स्थापना


सन् १९३३ में उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में “मीरा मूवमेंट” की नींव डाली। इसका उद्देश्य था विद्यार्थियों को वर्तमान जीवन के महत्वपूर्ण सत्यों, भारतीय संस्कृति और भारतीय आदर्श से अवगत कराना। उनके इस कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा हुई।


सेंट मीरा कालेज की स्थापना


सन् १९६२ में वासवानी ने पूना में लड़कियों के लिए सेंट मीरा कालेज खोला, क्योंकि वह यह समझते थे कि भारत के भविष्य निर्माण में स्त्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

बचपन से ही उनका मन भगवान की ओर झुका हुआ था। पर उनका धर्म किसी विशेष धर्म संप्रदाय या सिद्धांत से संबंधित नहीं था, उनका धर्म था भगवान का स्मरण और गरीबों की सेवा वह भारत के सभी शहरों, गांवों में घूमे। सभी प्रकार के संप्रदायों के पुरुषों और महिलाओं से मिले। वह दया की जीती-जागती तस्वीर थे। एक जगह उन्होंने कहा - “सादा बनो, मान-गुण संपन्न बनो, मजबूत बनो और अपनी ताकत गरीबों की सेवा में लगा दो”|

प्रत्येक गरीब के लिए उनका दरवाजा खुला हुआ था । दुर्बल, आपत्तिग्रस्त, दीन-दुखियों, भूखे-प्यासों की सेवा करना, उनके चेहरों पर मुस्कान लाना, उनके जीवन की उत्कट आकांक्षा थी।

एक दिन एक साहूकार आदमी उनके पास एक मंदिर के लिए धन की थैली लाया । दादा ने थैली ले ली, परंतु एक मंदिर की अपेक्षा उनके सामने दीन- दुखियों की तस्वीर उभर आई । उन्होंने कहा, "सबसे अच्छा मंदिर गरीब की आत्मा है जो अपना खाना-कपड़ा पाती है और भगवान को दुआएं देती है।" और उन्होंने वह सारा धन गरीबों पर खर्च कर दिया।

जब इंग्लैंड और जर्मनी में युद्ध चल रहा था उस समय साधु वासवानी हैदराबाद में थे। सभी चीजों के भाव बढ़ गए थे। अन्न और चीनी नहीं मिल रही थी । दादा कलेक्टर से मिले और गेहूं, चावल और चीनी की गाड़ियां भरवाकर घर-घर पहुंचवाने लगे।

उनका कहना था – “आदमी का उद्देश्य संसार से भागकर जंगल, पर्वत या गुफा में तपस्या करना नहीं है। उसे इसी संसार में रहकर कर्तव्य पूरा करना चाहिए। दुनिया में रहो न कि दुनिया के हो जाओ|”

उनकी दया मनुष्यों तक ही सीमित नहीं थी | पशु-पक्षी भी उनके संगी-साथी थे, उनका विचार था कि यह सृष्टि एक परिवार है और यह पशु-पक्षी मनुष्यों के भाई-बहन हैं। १९३४ में उन्होंने बंबई में आल इंडिया ह्यूमैनिटेरियन कांफ्रेंस की अध्यक्षता की। उन्होंने कहा – “मेरे लिए किसी पशु-पक्षी को प्यार न करना भगवान को प्यार न करना है। यह तो एक जबान है, पर मेरी लाखों जबानें होती तो एक-एक जबान से कहता-हिंसा न करो, दया करो।“

पशु-पक्षी तो क्या उन्हें फूलों से, पेड़-पौधों से भी प्यार था । वह फूल को तोड़ने नहीं देते थे। कहते थे, “फूलों का भी अपना परिवार होता है इसलिए उन्हें एक दूसरे से अलग नहीं करना चाहिए।“

वह एक महान लेखक भी थे। एक सौ से ज्यादा पुस्तकें अंग्रेजी में और तीन सौ के करीब अपनी मातृभाषा सिंधी में लिखी थी। अंग्रेजी की कुछ पुस्तकों का जर्मन और अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।

उनकी सिंधी कविताओं में बुलबुल के गीत की तरह मिठास है। लेखक के साथ-साथ वह एक अच्छे वक्ता भी थे। उनकी वाणी में मुरली की धुन जैसी मिठास थी। उनके एक-एक शब्द में शक्ति और जादू था। सच तो यह है कि उनका जीवन एक अनंत गीत था।


साधु वासवानी की मृत्यु


१६ जनवरी १९६६ को पूना में वह इस संसार को छोड़कर चले गए, परंतु उनके कार्यों की ज्योति अब भी जल रही है।

पूना में दो दवाखाने हैं जहां सैकड़ों गरीब मरीज लोग इलाज कराते हैं। सेंट मीरा कालेज और सेंट मीरा स्कूल, दोनों में गरीब विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा दी जाती है। एक “कल्याण कोश” है। जिसमें से भारत के विभिन्न भागों के गरीबों और जरूरतमंदों को सहायता मिलती है। एक प्रकाशन विभाग है जहां ऐसी पुस्तकें और पत्रिकाएं छपती हैं जिनमें दादा वासवानी का संदेश होता है | इनके अतिरिक्त एक सेवा घर है जहां स्त्रियों को स्वयं जीविकोपार्जन का अवसर दिया जाता है। एक जीव दया विभाग है जहां पशु-पक्षियों के कल्याण के लिए कार्य होता है।

भारत सरकार ने भी साधु वासवानी की ९०वीं जन्म शताब्दी पर एक डाक टिकट निकाला था।

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