वल्लभभाई पटेल | Vallabhbhai Patel


भारत की आजादी की लड़ाई का स्मरण करते ही तीन नाम हमारे सामने आ जाते हैं - गांधी, नेहरू और पटेल। गांधीजी यदि भारत की स्वतंत्रता के निर्माता थे, तो सरदार पटेल भारत की एकता के निर्माता थे। उन्होंने ऐसे समय में भारत को एकता के सूत्र में बांधा, जब अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए थे और जाते-जाते भारत की ५६२ देसी रियासतों को भी आजाद रहने की छूट दे गए थे। कैसे-यह आप आगे की पंक्तियों में पढ़ेंगे।


वल्लभभाई पटेल का जन्म


वल्लभभाई का जन्म ३१ अक्तूबर १८७५ को गुजरात के पेटलाद तालुके के करमसद गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम था झवेरभाई पटेल और मां का लाड़बाई।

झवेरभाई के पास लगभग दस बीघा जमीन थी। वह खेती करते थे। मामूली गुजर-बसर हो जाती थी। कहते हैं कि अपनी युवावस्था में सन् १८५७ में झांसी की रानी की सेना में भरती होकर वह अंग्रेजों से लड़े थे। इस तरह यदि पिता आजादी की पहली लड़ाई में लड़ा, तो पुत्र आजादी की अंतिम लड़ाई में।

उनके बड़े भाई विट्ठलभाई पटेल भी देश के बहुत बड़े नेता थे। तत्कालीन केंद्रीय विधान सभा के स्पीकर के रूप में वह बहुत प्रसिद्ध हुए।

विद्यार्थी अवस्था से ही वल्लभभाई बड़े स्वाभिमानी थे। किसी गलत बात को मानने के लिए तैयार नहीं होते थे | उनके एक अध्यापक कक्षा के विद्यार्थियों को कापियां, किताबें, पेंसिलें आदि अपने पास से ही खरीदने के लिए मजबूर करते थे। वल्लभभाई ने उनका पूर्ण बहिष्कार करा दिया। अंततः अध्यापक को अपना व्यापार बंद करना पड़ा।

इसी तरह जब वह बडौदा में पढ़ते थे, तो उन्होंने संस्कृत विषय छोड़कर गुजराती भाषा ले ली। पर गुजराती शिक्षक संस्कृत के प्रेमी थे, इसलिए जब वल्लभ भाई उनकी कक्षा में गए तो उन्होंने ताना देते हुए कहा, “आइए महापुरुष! क्या आपको पता है कि संस्कृत के बिना गुजराती आती ही नहीं।“ वल्लभभाई ने तुरंत जवाब दिया, “यदि हम सब संस्कृत में रहते तो आप पढ़ाते किसे ?” पर गुजराती शिक्षक का ताना सच निकला और वल्लभभाई महापुरुष बन गए।


वल्लभभाई पटेल की शिक्षा


बाईस वर्ष की उम्र में उन्होंने नाडियाद स्कूल से मैट्रिक परीक्षा पास की, फिर मुख्तारी की परीक्षा पास करके गोधरा में मुख्तारी की प्रैक्टिस शुरू की। वहां से वह बोरसद चले गए जहां उनकी प्रैक्टिस खूब चलने लगी।

एक बार वह एक मुकदमें में बहस कर रहे थे कि उन्हें तार मिला कि आपरेशन के बाद उनकी पत्नी का देहांत हो गया है। पर यह खबर मिलने पर भी उनके चेहरे पर कोई शिकन तक न आई और बहस पूरी करके ही उन्होंने लोगों को बताया, परंतु पत्नी की मृत्यु के बाद उन्होंने दोबारा शादी नहीं की। इससे एक तो उनकी कर्तव्य-परायणता और दूसरे हृदय की कोमलता के गुणों पर प्रकाश पड़ता है।

अब वल्लभभाई बैरिस्टरी पड़ने के लिए विलायत जाने की तैयारी करने लगे । उनका पासपोर्ट भी बन गया, जिस पर उनका नाम वी. जे. पटेल लिखा था इसी समय उनके बड़े भाई विट्ठलभाई ने स्वयं पहले जाने की इच्छा प्रकट की उनका नाम भी वी. जे. पटेल बनता था ।

इसलिए वह अपने छोटे भाई के पासपोर्ट पर विलायत चले गए। जब वह लौटे, तब वल्लभभाई विलायत गए। वहां उन्होंने बहुत ही सादा जीवन व्यतीत किया। सैर-सपाटे की जगह वह अपना सारा समय अध्ययन में ही लगाते थे। जहां वह रहते थे, वहां से मिडल टेम्पल का पुस्तकालय कोई ग्यारह मील दूर था। पर वह नित्य प्रति सवेरे उठकर उस पुस्तकालय में जाते थे और दिन-भर अध्ययन करते रहते थे। शाम के समय जब चपरासी उन्हें बतलाता कि अब पुस्तकालय के बंद होने का समय हो गया हैं, तभी वह उठते। इसी के फलस्वरूप वह उस साल की बैरिस्टरी की परीक्षा में सर्वप्रथम रहे।


वल्लभभाई पटेल की देश सेवा


इस पर इन्हें ५० पौंड का पुरस्कार भी मिला। विलायत से लौटने के बाद वह अहमदाबाद में बैरिस्टरी करने लगे और थोड़े ही दिनों में प्रसिद्ध हो गए। वह बड़ी अमीरी का जीवन बिताने लगे | यूरोपीय रहन-सहन के तरीकों को उन्होंने अपना लिया। इसी समय उन्होंने महात्मा गांधी की नाम सुना। शुरू में वह उनके विचारों से प्रभावित नहीं हुए। परंत कुछ ही समय बाद वह पूरी तरह गांधीजी के रंग में रंग गए। उन्होंने अपनी चलती हुई वकालत को लात मार दी और पूरी तरह, तन-मन-धन से देश-सेवा में लग गए।

उनके बड़े भाई ने तो पहले ही अपने को देश-सेवा में लगा दिया था, सर्वप्रथम वल्लभभाई ने गोधरा में हुए प्रांतीय राजनीतिक सम्मेलन में गुजरात की बेगार-प्रथा को समाप्त करने के लिए एक प्रस्ताव पास कराया। इस सम्मेलन के सभापति गांधीजी थे। इसी सम्मेलन में पहले पहल भारतीय भाषाओं का प्रयोग किया गया, इस काम के लिए वहाँ एक समिति भी बनाई गई, जिसके महामंत्री वल्लभभाई चुने गए | उनके प्रयत्नों के फलस्वरूप गैरकानूनी बेगार-प्रथा बंद हो गई|


खेड़ा सत्याग्रह


खेड़ा सत्याग्रह के समय उन्होंने कोट, पैंट, टाई त्याग करके किसानों की पोशाक धोती- कुर्ता अपना ली और किसानों में काम करना शुरू कर दिया।


जलियांवाला बाग हत्याकांड


अप्रैल १९१९ में जलियांवाला बाग का हत्याकांड हुआ। सारे देश में इसके विरोध में आंदोलन छेड़ दिया गया। वल्लभभाई ने इसमें बड़ी लगन से काम किया। गांव-गांव में दौरा करके उन्होंने इसे सफल बनाया| अहमदाबाद की प्रसिद्ध कपड़ा मिल मजदूर हड़ताल में भी उन्होंने गांधीजी के साथ काम किया । गुजरात विद्यापीठ के लिए दस लाख रुपये जमा किए।


झंडा सत्याग्रह


नागपुर के झंडा सत्याग्रह का नेतृत्व भी सरदार ने किया। अंत में सरकार को समझौते के लिए झुकना पड़ा। इस सत्याग्रह के बाद उनका नाम सारे भारत में फैल गया।

कुछ समय बाद अंग्रेज सरकार को एक बार फिर वल्लभभाई का लोहा मानना पड़ा। गुजरात के बोरसद नामक तालुके पर यह कहकर दो लाख चालीस हजार रुपये से भी अधिक का कर लगा दिया गया कि डाकुओं से निपटने के लिए विशेष पुलिस रखी गई है । इस ज्यादती को वल्लभभाई कैसे चुपचाप सह लेते? उन्होंने लोगों से कहा कि आप कर देना बंद कर दें। मजबूरन सरकार को कर संबंधी आदेश वापस लेना पड़ा, इसी तरह आणंद तालुके में भी सरकार को वल्लभभाई के सामने मुंह की खानी पड़ी।

उन्हीं दिनों वह अहमदाबाद म्युनिसिपैलिटि के चेयरमैन बने और बड़े अच्छे ढंग से लोगों की सेवा की। १९२७ की गुजरात की भीषण बाढ़ के समय भी उन्होंने कड़ी मुस्तैदी से जनता की सेवा की।


बारदोली सत्याग्रह


सन् १९२७ में ही बारदोली का प्रसिद्ध सत्याग्रह शुरू हुआ। किसानों पर सरकार ने लगान की दर बढ़ा दी। किसान वल्लभभाई के पास गए। वल्लभभाई ने कहा कि - यदि जोखिम उठाना हो तो मैं आपके लिए लड़ सकता हूं। किसान मान गए और उनके नेतृत्व में आंदोलन शुरू कर दिया। उन्होंने गांव वालों को इस तरह संगठित किया कि लगान मिलना तो दूर, गांवों में सरकारी अफसरों को भोजन, रिहाइश और सवारी तक मिलना दुश्वार हो गया।


वल्लभभाई पटेल को सरदार की उपाधि


सरकार की ओर से भी बड़े-बड़े अत्याचार हुए। गरीब किसानों के घरों के ताले फौज के जरिए तुड़वाकर, सामान जब्त करके मालगुजारी वसूल करने की कोशिश की गई और भी तरह-तरह के जुल्म किए गए, पर सरकारी खजाने में एक कौड़ी भी जमा न हुई। हजारों लोग जेल गए। उनकी गाय-भैंस तक जब्त कर ली गई। फिर भी उन्होंने सिर न झुकाया । यहां तक कि जब्त किए हुए सामान को उठाने के लिए कोई मजदूर नहीं मिलता था | जब्त की गई जायदाद को बोली देने वाला कोई आदमी नहीं मिलता था, महीनों तक यही हाल रहा अंत में सरकार को झुकना पड़ा और उसने लगान वृद्धि के बारे में फिर से जांच- पड़ताल करना स्वीकार कर लिया। इसी सफलता के कारण गांधीजी ने वल्लभभाई पटेल को “सरदार” की उपाधि दी।

तब से ही वह सरदार पटेल के नाम से प्रसिद्ध हुए।


दांडी यात्रा


सन १९२९ में लाहौर कांग्रेस में पूर्ण स्वराज्य की मांग की गई सरकार ने इसे नहीं माना। अतः गांधीजी ने फिर से सत्याग्रह का नारा दिया और १२ मार्च को अपनी प्रसिद्ध दांडी- यात्रा शुरू कर दी।


नमक सत्याग्रह


६ अप्रैल को नमक-कानून तोड़कर उन्होंने नमक-सत्याग्रह आरंभ किया। सरदार ने भी इस सत्याग्रह में भाग लिया और वह गिरफ्तार कर लिए गए। उनको तीन मास की कैद और ५०० रुपये जुर्माने की सजा दी गई, पर उन्होंने जुर्माना न देकर तीन सप्ताह और जेल में ही काटे।

जेल से छूटने के कुछ ही समय बाद तिलक-दिवस मनाने के लिए बंबई में एक बड़ा जबरदस्त जुलूस निकला। पुलिस ने इस जुलूस को रोका। सरदार पटेल जुलूस के अग्रभाग में थे, अतः पुलिस ने उन्हें फिर पकड़कर तीन महीने के लिए जेल भेज दिया।

सन १९३१ में कांग्रेस का अधिवेशन कराची में हुआ | वल्लभभाई इसके अध्यक्ष चुने गए। इसके कुछ समय बाद गांधीजी दूसरी गोलमेज कांफ्रेंस में शामिल होने के लिए विलायत गए। परंतु कोई समझौता न हो सका और गांधीजी वापस लौट आए, अब सरकार गांधी-इरविन समझौते को खुलकर तोड़ने लगी। अत्याचार भी जोरों से होने लगे। फलतः देश में फिर से असंतोष फैल गया और आंदोलन की तैयारी होने लगी। इस आंदोलन में गांधीजी के साथ सरदार पटेल भी यरवदा जेल में नज़रबंद कर दिए गए जहां उन्होंने गांधीजी की खुब देखभाल की। गांधीजी ने बाद में कहा कि जेल में मैंने सरदार पटेल में तो मां के गुणों के दर्शन किए।

सन् १९३७ में कांग्रेस ने कौसिलों के चुनाव में भाग लिया और ग्यारह में से सात प्रांतों में अपने मंत्रिमंडल बनाए। सरदार पटेल ही कांग्रेस की चुनाव मशीनरी के कर्ता-धर्ता थे |

१९३९ में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो गया। अंग्रेज सरकार ने अपनी ओर से भारत के इस युद्ध में शामिल होने की घोषणा कर दी। इसके विरोध में कांग्रेसी मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा दे दिया । १७ नवंबर १९४० को व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान वह फिर गिरफ्तार हुए। पर स्वास्थ्य खराब होने के कारण नौ महीने बाद रिहा कर दिए गए। “भारत छोड़ो” आंदोलन के सिलसिले में अगस्त १९४२ में वह फिर गिरफ्तार किए गए। अन्य सभी नेताओं के साथ १५ जून १९४५ को वह भी छोड़े गए। स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अंग्रेज सरकार से वार्ताएं शुरू हुई। सरदार पटेल ने इनमें कांग्रेस की ओर से भाग लिया।


आजाद भारत मे वल्लभभाई पटेल की भूमिका


१५ अगस्त १९४७ को देश आजाद हुआ। इससे कुछ महीने पहले जवाहरलाल नेहरू अंतरिम सरकार के अध्यक्ष बने और सरदार पटेल गृह और सूचना तथा प्रसारण विभागों के सदस्य बने। बाद में भारतीय रियासतों का विभाग भी उन्होंने संभाल लिया। फिर वह भारत के उप प्रधानमंत्री बने |

सरदार पटेल स्वतंत्रता के महान सेनानी थे, परंतु अब उन्होंने अपने को एक अत्यंत कुशल प्रशासक भी सिद्ध किया, हालांकि इससे पहले उन्हें प्रशासन का कोई अनुभव नहीं था।

आजादी के बाद देश के सामने कई बड़ी समस्याएं आई थीं। विभाजन के फलस्वरूप देश के कई भागों में हिंदू-मुस्लिम दंगे होने लगे । लाखों विस्थापित इधर से उधर आने-जाने लगे। इससे भी बढ़कर हजारों अंग्रेज और मुसलमान सरकारी कर्मचारी भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गए। इससे देश के शासन का ढांचा पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया, पर सरदार पटेल ने अपनी कुशल सूझबूझ से इन सभी समस्याओं पर बड़ी तेजी से काबू पा लिया। दंगों को उन्होंने बड़ी कठोरता से दबाया। इंडियन सिविल सर्विस की जगह उन्होंने भारतीय प्रशासन सेवा बनाई।

सरकारी खर्च में ७८ करोड़ रुपये की कमी की। परंतु जिस काम के लिए उन्हें सदैव याद किया जाएगा, यह था देशी रियासतों का एकीकरण। जब अंग्रेज भारत छोड़कर जाने लगे तो देश की देसी रियासतों को यह आजादी दे गए कि वह चाहें तो आजाद रह सकते हैं, या चाहें तो वह भारत या पाकिस्तान में मिल जाएं।

अंग्रेजों का विचार था कि ये रियासतें देश की स्वतंत्रता के लिए नासूर का काम करेंगी और भारत मजबूत नहीं हो सकेगा। पर सरदार ने अपनी विलक्षण बुद्धि से इस विकट समस्या को आनन-फानन में हल कर दिखाया । भारत में शामिल होने वाली ५६२ रियासतें थी, जिनकी आबादी ८ करोड़ ६५ लाख और क्षेत्रफल पांच लाख वर्गमील था। कई राजा और नवाब स्वतंत्र होने के स्वप्न देखने लगे थे। पर सरदार पटेल ने अधिकांश राजाओं और नवाबों को समझा-बुझाकर भारत में शामिल होने के लिए राजी कर लिया।

पहली जनवरी १९४८ को २३ रियासतें उड़ीसा में शामिल हुई। केवल कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़ की रियासतों के मामलों में अड़चन पैदा हुई। कश्मीर भी जल्दी ही भारत में शामिल हो गया। जूनागढ़ की प्रजा ने विद्रोह कर दिया और नवाब पाकिस्तान भाग गया । जनमत संग्रह के बाद यह रियासत भारत में शामिल हो गई। हैदराबाद भारत की बहुत बड़ी रियासत थी। इसका क्षेत्रफल लगभग ८३००० वर्ग मील और आबादी १,६३,००,००० थी । उसकी अपनी सेना भी थी। बार-बार समझाने पर भी निजाम ने भारत में शामिल होना स्वीकार नहीं किया। वहां के रजाकार लोगों पर अत्याचार करने लगे । जब सरदार के धैर्य का प्याला भर गया तो उन्होंने पुलिस कार्रवाई करने का निर्णय किया। यह ऐसा साहस बड़ा कदम था जिसकी निजाम ने कल्पना तक न की थी।

१३ सितंबर १९४८ को भारतीय फौजें हैदराबाद में शांति स्थापना के लिए घुस गईं। पांच दिन में ही निजाम ने घुटने टेक दिए। इस तरह सभी रियासतें भारतीय संघ का एक अटूट अंग बन गई। संपूर्ण भारत में एकता स्थापित हो गई। इस दृष्टि से सरदार पटेल की तुलना जर्मनी के प्रिंस बिस्मार्क से की जा सकती है।


वल्लभभाई पटेल की मृत्यु


सरदार पटेल का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता था। नाक की बीमारी उन्हें जेल यात्रा में लग चुकी थी। बाद में दिल का दौरा भी पड़ा था। ३० जनवरी १९४८ की गांधीजी की हत्या के बाद उनका दिल टूट गया था। पर इसके बावजूद वह कसकर काम करते रहे। १५ दिसंबर १९५० को दिल के दौरे से बंबई में उनका निधन हो गया।

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