बिधान चंद्र राय | Bidhan Chandra Roy



बिधान चंद्र राय का जन्म


बिधान चंद्र राय (Bidhan Chandra Roy) का जन्म पटना में १ जुलाई १८८२ हुआ था। उस समय उनके पिता प्रकाशचंद्र राय वहां आबकरी इंस्पेक्टर थे। विधानचंद्र राय बंगाल के महाराजा प्रतापादित्य के वंशज थे, जो १५८२ में दक्षिण बंगाल की गद्दी पर बैठे थे। बंगाल की स्वतंत्रता के लिए प्रतापादित्य को कई वर्ष तक मुगलों से लड़ना पड़ा था। विधानचंद्र राय को स्वातंत्रता-प्रेम और निर्भीकता के गुण विरासत में मिले थे।

बिधान चंद्र राय के माता-पिता त्याग, तपस्या, संयम, अनुशासन, समाज सेवा और परोपकार के जीते-जागते उदाहरण थे। वे नित्य सोकर उठते ही ईश्वर की प्रार्थना करते थे। वेतन का रुपया जब तक ईश्वर को अर्पण नहीं कर दिया जाता था, तब तक उनमें से कभी भी खर्च नहीं करते थे। सबसे छोटा होने के कारण माता-पिता विधान को सबसे ज्यादा प्यार करते थे। जिस वातावरण में बालक विधान पला, उसका उस पर बहुत प्रभाव पड़ा। पिता अपने बच्चों को उपदेश दिया करते थे कि न तो मांगो, न उधार दो, न मना करो। उन्होंने अपने बच्चों को स्वावलंबी, परिश्रमी और नम्र बनना सिखाया। माता-पिता दोनों अपने दैनिक जीवन में इन सद्गुणों को चरितार्थ करते थे।


बिधान चंद्र राय की शिक्षा


बिधान चंद्र राय ने बिहार में एक ग्रामीण पाठशाला में बंगाली पढ़ना आरंभ किया। बाद में अंग्रेजी स्कूल में भर्ती हो गए। बचपन में उनमें कोई असाधारण प्रतिभा न थी। छुट्टियों में विधान और उनके भाइयों को घरेलू काम भी करना पड़ता था। इनमें झाडू लगाना, मेज कुर्सी साफ करना, बर्तन मांजना, कुएं से पानी खींचना और रोटी पकाने के अलावा घर का शौचालय साफ करना भी शामिल था। पटना से उन्होंने बी.ए. पास किया। पिता की भांति उन्हें वकालत के पेशे से घृणा थी। सरकारी नौकरी भी पसंद न थी। अतः जून १९०१ में वह कलकत्ता मेडिकल कालेज में भर्ती हो गए। उस समय उनके पिता रिटायर हो चुके थे, इसलिए खर्च नहीं भेज सकते थे। विधान को छात्रवृत्ति मिलती थी, उससे भी पूरा नहीं पड़ता था। वह औजार और पुस्तकें भी नहीं खरीद सके। मेडिकल कालेज में अपने ५ वर्ष के अध्ययनकाल में उन्होंने केवल पांच रुपये की एक पुस्तक खरीदी थी। वह पुस्तकालय से या अपने मित्रों से पुस्तकें मांग कर काम चलाते थे।


बिधान चंद्र राय के कार्य


सन् १९०६ में कालेज से पास करने के तुरंत बाद, डा. राय प्रांतीय चिकित्सा सेवा में ले लिए गए और फरवरी १९०९ में उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए। वहां कालेज में भर्ती होने में बड़ी बाधाएं आई। डेढ़ महीने में वह करीब ३० बार डीन से मिले थे। कभी उनसे कहा गया कि कालेज खर्चीला है, कभी यह कि उनके पास समय कम है, कभी यह कि विदेशियों की भर्ती का कोटा भर चुका है। डीन मना करते-करते तंग आ गया था। एक दिन उसने क्रुद्ध होकर कहा - अच्छा फीस ले आओ।

विधान ने इतने परिश्रम से पढ़ाई की कि एम. आर.सी.पी. (मेम्बर रायल आफ फिजीसियंस) की परीक्षा में प्रथम पास हुए। मई १९११ तक उन्होंने शल्य विज्ञान की सबसे ऊंची परीक्षा एफ. आर. सी. एस. (फैलो आफरायल कालेज आफ सर्जन्स) भी पास कर ली। भारत आकर उन्होंने प्राइवेट प्रैक्टिस शुरू कर दी। कुछ ही वर्षों में उनकी ख्याति सर्वत्र फैल गई। वह चिकित्सा में निपुण तो थे ही, रोगियो के साथ सहानुभूति भी रखते थे, आवश्यकता पड़ने पर वह रोगियों को परिचर्या भी करते थे। गरीब रोगियों को तो पथ्य बनाकर भी देते थे | उनसे कभी फीस नहीं लेते थे और कभी-कभी तो दवाई भी मुफ्त देते थे। अपनी ५० वर्ष की प्रैक्टिस में उन्होंने कभी किसी के पास बिल नहीं भेजा। उनके संपर्क में आकर रोगी का चेहरा खिल उठता था और उसका आधा रोग दूर हो जाता था।

इंग्लैंड से उच्च डिग्रियां प्राप्त करने पर भी उन्हें बड़ा पद न मिला। वह केम्पबैल मेडिकल कालेज में पढ़ाने लगे। डा. राय १९१९ तक इस स्कूल में रहे। फिर त्यागपत्र देकर कारमाइकेल मेडिकल कालेज में चिकित्सा शास्त्र के प्राध्यापक नियुक्त हुए। १९१६ में कलकत्ता विश्वविद्यालय सीनेट के मेम्बर चुने गए।


बिधान चंद्र राय का राजनीतिक जीवन


विश्वविद्यालय के अधिकारों की रक्षा के लिए डा. राय को राजनीति में प्रवेश करना पड़ा। १९२३ में बंगाल विधान परिषद के होने वाले चुनावों में वह स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुने गए। उन्हे राजनीतिक दलों से चिढ़ थी। फिर भी वह देशबंधु चित्तरंजन दास की स्वराज्य पार्टी का साथ देते थे | उनकी मृत्यु के बाद बिधान चंद्र राय परिषद में स्वराज्य पार्टी के उपनेता बने। डा. राय भाषण देने में बहुत झिझकते थे। परंतु धीरे-धीरे उनकी झिझक कम हो गई और वह बंगाल विधान परिषद में विनोद, व्यंग्य और आलोचना भरे भाषण देने लगे। उनके भाषण तथ्यपूर्ण और सारगर्भित होते थे। वह बड़े हाजिर-जवाब थे। उनकी स्मरण शक्ति बहुत तेज थी।

सन् १९३० के बाद बिधान चंद्र राय दो बार कारपोरेशन के एल्डरमैन और दो बार मेयर बुने गए। देश में अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह की आग धधक रही थी। गांधीजी के आदर्शों से प्रभावित होकर वह उनके अनुयायी बन गए। दिसंबर १९२८ में वह कलकत्ता कांग्रेस की स्वागत समिति के मंत्री चुने गए। उन्होंने बड़ी कुशलता से सारा प्रबंध किया और वह अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य चुने गए। अप्रैल १९३० में मोतीलाल नेहरू ने उन्हें कांग्रेस कार्यकारिणी समिति का सदस्य नामजद किया।


बिधान चंद्र राय की गिरफ्तारी


छः महीने तक उन्होंने बंगाल में सविनय अवज्ञा आंदोलन का नेतृत्व किया। २६ अगस्त १९३० को वह गिरफ्तार कर लिए गए और अलीपुर सेंट्रल जेल में रखे गए। वहां पहुंचते ही जेल-सुपरिटेंडेंट ने उन्हें जेल के अस्पताल का चार्ज सौंप दिया।


बिधान चंद्र राय और महात्मा गांधी


डा. राय की गांधीजी से पहली मुलाकात १९१४-१५ में कासिम बाजार के महाराजा के मकान पर हुई थी। उस समय डा. राय को राजनीति का कोई ज्ञान न था। पर सन् १९३१ के बाद गांधीजी में और उनमें घनिष्टता बढ़ती ही गई। १९३३ में पूना में और १९४३ में आगाखां महल में गांधीजी ने जो लंबे उपवास किए, उनमें गांधीजी के स्वास्थ्य की देखभाल डा. राय ही किया करते थे। राय गांधीवादी जरूर थे, पर वह गांधीजी के अंधभक्त नहीं थे। कई बातों में दोनों में मतभेद हो जाता था।

सन् १९३४ में बिधान चंद्र राय बंगाल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष चुने गए, पर गुटबंदी के कारण चार महीने बाद ही त्यागपत्र दे दिया।

डा. राय की राजनीति की कल्पना दूसरों से भिन्न थी। वह राजनीति का अर्थ लोक सेवा समझते थे। इसीलिए वह कभी किसी गुट में शामिल नहीं हुए। उनका कहना था कि कोई चिकित्सक पार्टीबंदी में शामिल नहीं हो सकता, क्योंकि उनके लिए शत्रु मित्र, गरीब-अमीर सभी समान होने चाहिए और उसे सब की सेवा करनी चाहिए। १९३९ में अखिल भारतीय मेडिकल कौसिल ने उन्हें अपना पहला अध्यक्ष चुना। इस पद पर वह कई वर्षों तक रहे।


बिधान चंद्र राय को प्राप्त उपाधि


बिधान चंद्र राय की अधिकतम रुचि चिकित्सा और शिक्षा में थी । १९४१ में वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति चुने गए। उनकी सेवाओं के उपलक्ष्य में कलकत्ता विश्वविद्यालय ने १९४४ में उन्हें डाक्टर आफ साइंस की सम्मानित उपाधि से विभूषित किया।


बिधान चंद्र राय का मुख्यमंत्री बनाना


२ जून १९४७ को वह मोतियाबिंद की चिकित्सा के लिए यूरोप और अमेरिका के लिए रवाना हो गए। इसी बीच भारत-विभाजन की घोषणा की गई। बंगाल के मुख्यमंत्री अथवा संयुक्त प्रांत के गवर्नर का पद स्वीकार करने के लिए तार और टेलीफोन द्वारा उनसे आग्रह किया गया। परंतु उन्होंने स्वीकार नहीं किया। भारत लौटने पर, उन्हें बिना बताए ही बंगाल का मुख्यमंत्री चुन लिया गया । १२ जनवरी १९४८ को उन्हें इसकी सूचना दी गई। परंतु उसी दिन गांधीजी ने अपना उपवास शुरू किया था। इसीलिए डा. राय गांधीजी के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए दिल्ली चले गए। दिल्ली में भी उसके पास कई-तार और टेलीफोन पहुंचे। परंतु वह गांधीजी को छोड़कर नहीं आए। अंत में 18 जनवरी को, जब गांधीजी ने व्रत तोड़ा, तो बिधान चंद्र राय ने उनसे सब बाते बताई और यह भी कहा कि मै मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहता। गांधीजी ने उन्हें सलाह दी कि यदि लोगों को आपकी सेवाओं को आवश्यकता है तो आपको उसकी प्रार्थना स्वीकार कर लेनी चाहिए। गांधीजी की सलाह पर विचार करने के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद स्वीकार करने का निश्चय किया| २३ जनवरी १९४८ को उन्होंने अपना मंत्रिमंडल बनाया।

मुख्यमंत्री बनते ही, वह बंगाल की उन जटिल समस्याओं को सुलझाने में लग गए, जिनसे अराजकता की स्थिति पैदा हो गई थी। सबसे पहले उन्होंने कांग्रेस से गुटबंदी दूर कर अनुशासन स्थापित किया। फिर राज्य की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए अनेक योजनाएं आरंभ की। उन्होंने शरणार्थियों की समस्या हल करने और मजदूरों की दशा सुधारने का भी प्रयत्न किया। उनकी दुढता और तत्परता के कारण, कुछ ही दिनों में अराजकता की स्थिति दूर हो गई।


बिधान चंद्र राय की मृत्यु


१ जुलाई 1962 मे बिधान चंद्र राय का देहांत हुआ, वह मुख्यमंत्री बने रहे। उनकी मृत्यु पर सारे देश में शोक मनाया गया, क्योंकि सभी उनको प्यार करते थे।


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