यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त | Jatindra Mohan Sengupta

भारत के स्वाधीनता संग्राम में तिलक, गांधी, नेहरू आदि सर्वोच्च जन-नेताओं की तुलना में अन्य नेताओं के बारे में लोग कम ही जानते हैं। यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त (Jatindra Mohan Sengupta) एक ऐसे ही नेता थे, जिनका स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान था | लेकिन जन-सामान्य को उनके बारे में अपेक्षाकृत कम जानकारी है।


यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त का जन्म


यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त का जन्म २२ फरवरी १८८५ को चटगांव में हुआ था। उनके पिता जात्रमोहन सेनगुप्त जमींदार और लोकप्रिय व्यक्ति थे। वह यतींद्र को सफल बैरिस्टर बनाना चाहते थे, लेकिन यतींद्र अपनी मां विनोदिनी के इतने दुलारे थे कि वह स्कूल भेजने को भी तैयार नहीं थीं। अतः यतींद्र मोहन की पढ़ाई घर पर ही एक शिक्षक रखकर शुरू हुई और सात वर्ष का होने के बाद ही वह गांव की पाठशाला में भेजे गए।


यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त की शिक्षा


जब यतींद्र १३ वर्ष के हुए तो जात्रमोहन ने, जो अब तक बंगाल विधान परिषद के सदस्य बन चुके थे, यतींद्र मोहन का नाम कलकत्ता में भवानीपुर के साउथ सबर्बन स्कूल में लिखा दिया। बाद में यतींद्र ने हायर स्कूल में पढ़ाई की और वहां से एंट्रैस परीक्षा पास करके प्रेसीडेंसी कालेज में पढ़ने लगे। उस समय जात्रमोहन के मित्रों ने यतींद्र को इंग्लैंड भेजने की राय दी। लेकिन यह मुनकर विनोदिनी देवी दुखी हो गई। इससे यतींद्र का इंग्लैंड जाना टल तो गया, लेकिन कुछ समय बाद यतींद्र को बैरिस्टर बनने के लिए इंग्लैंड जाना ही पड़ा। वह ४ अगस्त १९०४ को इंग्लैंड के लिए रवाना हुए।

यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त कैम्ब्रिज के डाउनिंग कालेज में पढ़ने लगे। जात्रमोहन के एक अंग्रेज मित्र ने राय दी कि यतींद्र मोहन आई.सी.एस. परीक्षा की तैयारी करें, परंतु जात्रमोहन सहमत नहीं हुए। वह चाहते थे कि यतींद्र वकालत का स्वतंत्र पेशा अपनाएं, न कि अंग्रेजी सरकार के नौकर बनें। यतींद्र को इंग्लैंड में अध्ययन के साथ-साथ खेलने का खूब अवसर मिला, क्रिकेट, टेनिस और नाव खेने में वह अग्रणी रहे। इसके अतिरिक्त यतींद्र हिंदुस्तानी मरजलिस के प्रमुख हो गए और बाद में इसके और “पूर्व-पश्चिम सभा” के अध्यक्ष रहे । १९०९ में एल.एल. बी. की डिग्री लेकर तथा बैरिस्टर बनकर यतींद्र मोहन हिंदुस्तान वापस आए।


यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त का विवाह


इंग्लैंड में ही यतींद्र मोहन की भेट नैली ग्रे नामक अंग्रेज लड़की से हुई। दोनों में स्नेह हो गया। उन्होंने शादी कर ली और श्रीमती नैली सेनगुप्त भी यतींद्र के साथ ही हिंदुस्तान आई। जात्रमोहन और परिवार के अन्य लोग नैली से संतुष्ट और प्रसन्न रहे ।


यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त के कार्य


हिंदुस्तान लौटकर यतींद्र मोहन एक साल तक चटगांव में वकालत करने के बाद कलकत्ता उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे। उन्होंने धीरे-धीरे अपनी वकालत जमा ली, लेकिन उन्हें आमदनी ज्यादा नहीं होती थी। अतः वकालत करने के साथ-साथ वह रिपन ला कालेज में प्राध्यापक भी हो गए। इस समय तक वह सक्रिय राजनीति में नहीं आए थे और उनका पारिवारिक जीवन बहुत सुखी था। अपने बच्चों और छोटे भाई तथा पत्नी के साथ बड़ी प्रसन्नता से उनका जीवन गुजर रहा था।


यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त का राजनीतिक जीवन


सन् १९११ में यतींद्र मोहन ने कांग्रेस के फरीदपुर अधिवेशन में चटगांव के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया और इस तरह उनके सक्रिय राजनीतिक जीवन की शुरूआत हुई। इस अधिवेशन में यतींद्र मोहन ने सुझाव दिया कि अगला अधिवेशन चटगांव में हो। यह सुझाव स्वीकृत हो गया और अगला अधिवेशन चटगांव में हुआ। श्री ए. रसूल अध्यक्ष चुने गए और जात्रमोहन स्वागत समिति के अध्यक्ष बने। चटगांव अधिवेशन में सुरेंद्र नाथ बनर्जी भी आए और उनका भव्य स्वागत हुआ।

सन् १९१९ में बंगाल प्रांतीय कांग्रेस का अधिवेशन मैमनसिंह में हुआ। जात्रमोहन इसके अध्यक्ष चुने गए। वह बहुत वृद्ध हो गए थे और अपना पूरा भाषण नहीं पढ़ सके। यतींद्र मोहन ने उनका शेष भाषण पढ़ा था। इसके कुछ महीने बाद २ नवंबर १९१९ को जात्रमोहन का देहांत हो गया।

सितंबर १९२० में नीति निर्धारण के लिए कांग्रेस का विशेष अधिवेशन कलकत्ता में हुआ जिसकी अध्यक्षता शेरे पंजाब लाला लाजपतराय ने की। यतींद्र मोहन ने अधिवेशन के अतिरिक्त सचिव के रूप में काम किया। इस अधिवेशन में असहयोग की नीति का शुभारंभ किया गया। देशबंधु चित्तरंजनदास ने असहयोग के प्रस्ताव का विरोध किया। लेकिन विपिनचंद्र पाल तथा यतीद्र मोहन ने उनका समर्थन किया। प्रस्ताव स्वीकृत हो गया।

अब यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त ने चटगांव में स्वाधीनता संग्राम को संगठित करने के लिए तीन मास के लिए वकालत छोड़ने को निश्चय किया। कठिन परिश्रम से वह चोटी के वकील बने थे, लेकिन देशप्रेम के कारण उन्होंने सब कुछ त्याग दिया। उन्होंने सोचा था कि वह केवल तीन मास तक वकालत छोड़ेंगे लेकिन वास्तव में वह दो साल तक वकालत नहीं कर सके। उन्होंने अनुभव किया कि सफल आंदोलन के लिए समाज के सभी वर्गों को संगठित करना पड़ेगा। अतः वह किसानों और मजदूरों की सभाएं करने लगे। लोग हजारों की संख्या में उनका भाषण सुनने आने लगे। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में समितियां गठित की। लोग संगठन की शक्ति अनुभव करने लगे और धीरे-धीरे यतींद्र मोहन एक लोकप्रिय नेता बन गए। इसी समय उन्होंने बर्मा आयल कम्पनी के मजदूरों का एक संघ बनाया जिसका अध्यक्ष उन्हें ही चुना गया। इस संगठन की एक सभा में उपस्थित होने के कारण एक हेडक्लर्क को बर्खास्त कर दिया। इसके विरोध में यतींद्र मोहन ने एक सफल हड़ताल का संचालन किया और अंत में कम्पनी को झुकना पड़ा तथा यतींद्र मोहन की सभी शर्ते माननी पड़ी। इस संबंध में अखबारों ने यतींद्र मोहन की बहुत प्रशंसा की।

दूसरी महत्वपूर्ण घटना सिलहट के चाय-बागानों में काम करने वाले कुलियों के शोषण से संबंधित थी। चाय-बागानों में अच्छी तनख्वाह आदि मिलने का लालच देकर यूरोपीय मालिकों के एजेंट दूसरे प्रांतों से कुलियों को बहका कर ले आते थे, नौकरी शुरू करने पर उन्हें जो रुपया दिया जाता था उसे कर्ज के रूप में दर्ज किया जाता था और जब कभी वे घर जाने का नाम लेते तो उन्हें यह कर्ज वापस करने को कहा जाता था। कुलियों की विनती और प्रार्थना की ओर कोई ध्यान नहीं देता और वे चाय बागानों में गुलामों की तरह जीवन बिताने को मजबूर हो जाते थे। जब असहयोग आंदोलन सारे देश में चल रहा था, उसी समय कुछ कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को कुलियों की दयनीय अवस्था का पता चला और वे इस अंधकारमय क्षेत्र में स्वतंत्रता का बीज-मंत्र देने आ गए और मई १९२१ में चाय बागानों में जबर्दस्त हड़ताल हो गई। हजारों कुलियों को उन्हें पहले तो कानूनी कार्रवाई का डर दिखाया, और जब इस पर भी वे नहीं माने तो करीमगंज रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर से इन कुलियों को टिकट बेचने को मनाकर दिया। टिकट नहीं मिला, तो कुली चांदपुर घट की ओर पैदल ही चले। इसी समय करीमगंज कांग्रेस ने यतींद्र मोहन को तार भेजा और यतींद्र मोहन तुरंत ही करीमगंज गए। करीमरगंज में सारा किस्सा सुनकर उन्होंने तुरंत असम बंगाल रेलवे के एजेंट और ट्रैफिक मैनेजर को तार भेजा।

इससे बहुत से कुली रेलगाड़ी से चांदपुर चले गए जहां से कुछ ग्वालंदो गए। इधर सिलहट के जिलाधीश ने ७ मील के क्षेत्र में धारा १४४ लागू कर दी और हजारों कुलियों को जबर्दस्ती चांदपुर भेजा गया। इसी समय चाय बागानों का एक यूरोपीय प्रतिनिधि कुलियों को वापस काम पर लौटने के लिए कहने आया। परंतु कुली आतंकित थे और उन्होंने चांदपुर से ग्वालंदो जाने का निश्चय किया। तब उन्हें रेलवे स्टेशन के एक शेड में बंद कर दिया गया। २० मई १९२१ की रात में हजारों कुली जब खुले में सोए हुए थे, तभी गोरखा सैनिकों से आक्रमण करने को कहा गया। गोरखों ने बूटों और घुसों से खूब मारा जिससे लगभग १०० कुली घायल हुए। इस घटना से बंगाल का वातावरण कषुब्ध हो गया और यतींद्र मोहन तुरंत चांदपुर पहुंचे। इसी बीच २० मई की दुर्घटना से क्षुब्ध होकर चांदपुर और लक्सम रेलवे स्टेशनों के कर्मचारियों ने २४ मई को कुलियों की सहानुभूति में हड़ताल कर दी। हड़ताल फैलती गई और चांदपुर, नारायणगंज और ग्वालंदो के बीच चलने वाले जहाजों के कर्मचारियों ने भी काम करने से इनकार कर दिया, जिससे सभी जहाजों का चलना ठप्प हो गया। यतींद्र मोहन असम बंगाल रेलवे कर्मचारी संघ के अध्यक्ष थे। उन्होंने घोषणा की कि हड़ताल आधी रात में सोए हुए असहाय कुलियों पर आक्रमण किए जाने के फलस्वरूप हुई है। चटगांव नगर में भी हडताल हुई। यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त के प्रयत्नों से हड़ताले शांतिपूर्ण रही। हडतालियो को खिलाने पिलाने का जिम्मा भी यतीद्र मोहन ने अपने ऊपर ले लिया और इसी कारण उन पर ४०,००० रुपये का ऋण हो गया। अब तक कुल हड़तालियों की संख्या २५००० हो चुकी थी। एक हफ्ते में दमन और भयानक हो गया। कर्मचारियों को अपने मकान छोड़कर जाने के लिए कहा गया, परंतु उन्हें कोई सामान ले जाने की अनुमति नही दी गई। इसलिए यतींद्र मोहन ने हड़ताल के ४१वें दिन जुलस निकालने की घोषणा की।

२ जुलाई १९२१ को ६-७ हजार आदमी जुलूस के लिए एकत्र हो गए। जुलूस निकलने पर संख्या बढ़ती गई। जब जुलूस जामा मस्जिद के पास पहुचा तो जिलाधीश और पुलिस के प्रधान ने ५० गोरखा सैनिकों के साथ रास्ता रोक लिया। नेताओं को पकड़कर जेल ले जाया गया और गोरखों को जुलूस तोड़ देने का हुक्म दिया गया। यतीद्र मोहन ने छूटने के लिए किसी तरह की जमानत देने से इनकार कर दिया। लेकिन चित्तरंजन दास कलकत्ते में इन सारी घटनाओं की जानकारी प्राप्त करते रहते थे और उन्होंने यह अनुभव किया कि यदि यतीद्र मोहन ने जेल में रहेंगे ता उत्तेजित और क्षुब्ध जनता को हिंसा की ओर बढ़ने से कोई रोकने वाला नहीं रहेगा। इसलिए देशबंधु दास ने यतींद्र मोहन को इस आशय का तार भेजा और सुझाव दिया कि वह जमानत पर छूट जाएं। यतींद्र मोहन ने यह सुझाव अनिच्छापूर्वक स्वीकार कर लिया और ५ जुलाई को व्यक्तिगत जमानत पर छूट गए, छूटने के बाद एक आम सभा हुई जिसकी अध्यक्षता श्रीमती नैली सेनगुप्त ने की। इस सभा में यतीद्र ने लोगों से शांति और अहिंसक रहने के लिए कहा।

इसी समय महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की कार्यवाही देखने के लिए चटगांव का दौरा करने का निश्चय किया। यतींद्र मोहन ने उनके भव्य स्वागत का प्रबंध किया। स्टेशन से यतींद्र मोहन के घर तक दो मील के रास्ते पर दोनों तरफ हजारों स्वयंसेवक खड़े थे और दो लाख लोग श्वेत खादी पहन कर गांधीजी के स्वागत के लिए आए थे। जनता के अनुशासन से गांधीजी बहुत प्रभावित हुए। गांधी मैदान में एक सभा हुई। जिसमें गांधीजी ने भाषण दिया। उन्होंने कहा कि हड़ताली कर्मचारियों ने अपने समय का सदुपयोग नहीं किया और यह समझते रहे कि केवल हड़ताल करने से ही वे स्वाधीनता संग्राम में सहयोग दे रहे हैं। उन्होंने इस तरह की विचारधारा की निंदा की और कहा कि जो लोग कोई रचनात्मक कार्य न कर सकें वे अपने काम पर लौट जाएं। गांधीजी के प्रभाव से अधिकांश लोगों ने अपनी नौकरी हमेशा के लिए छोड़ दी और राष्ट्रीय आंदोलन में कूद पड़े। इसके बाद सूत कातने और खादी बुनने का काम चटगांव में जोरों से चल पड़ा।

२४ सितम्बर १९२१ को ३ माह की व्यक्तिगत जमानत समाप्त होने वाली थी। उसी दिन शाम को यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त को फिर गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन पुलिस आवश्यक सबूत न जुटा सकी, अतः वह छोड़ दिए गए। फिर भी लोगों में स्वभावतः काफी असंतोष फैला। रामानंद चट्टोपाध्याय ने “मार्डन रिव्यू” में लिखा कि – “यतींद्र मोहन जैसे प्रमुख नागरिक की बिना किसी आरोप के गिरफ्तारी ने यह सिद्ध कर दिया है कि सुधारों के बावजूद भारतीयों की स्थिति में कोई भी परिवर्तन नही हुआ है।“

यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त को २० अक्तूबर को फिर गिरफ्तार कर लिया गया और एक जुलूस का नेतृत्व करने के आरोप पर तीन माह के सश्रम कारावास का दंड दिया गया। जब वह जेल में थे तभी इंग्लैंड के युवराज १७ नवंबर को भारत आए। इस अवसर पर कलकत्ते में और देश के अन्य भागों में जबर्दस्त हड़ताले हुई। इसके दो माह बाद, फरवरी, १९२२ में यतींद्र मोहन जेल से छूटे। अब तक उन्हें “देशप्रिय” कहा जाने लगा था और चटगांव में होने वाले प्रंतीय कांग्रेस के अधिवेशन के लिए उन्हें ही स्वागत समिति का अध्यक्ष चुना गया। इस अवसर पर सदस्यों का स्वागत करते हुए उन्होंने जो भाषण दिया, वह बड़ा प्रभावशाली था |

इस अधिवेशन के तीन माह बाद “नेहरू रिपोर्ट” प्रकाशित हुई जिसमें यह सुझाव दिया गया था की देश अभी अहिंसात्मक असहयोग के लिए तैयार नहीं है और नया कार्यक्रम बनाना चाहिए। देशबंधु का विचार था कि विधान सभाओं और कौसिलों में प्रवेश करके संघर्ष जारी रखना नए कार्यक्रम का अंग होना चाहिए। उनके अनुसार असहयोग से अभी स्वाधीनता प्राप्त नहीं हो सकती थी। अतः यतींद्र मोहन ने फिर वकालत शुरू कर दी।

कौसिलों के लिए चुनाव लड़े जाएं या नहीं, इस बात पर कांग्रेस में दो पक्ष हो गए-एक तो वे जो कौसिलों का बहिष्कार करने के पक्ष में थे और दूसरे वे जो चुनाव लड़कर असहयोग की लड़ाई कौसिलों के अंदर भी फैलाना चाहते थे। यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त चुनाव लड़ने के पक्ष में थे उनका विचार था कि यदि असहयोगी उम्मीदवार मतदाताओं को यह बताकर वोट मांगे कि वे कांग्रेस के सिद्धांत मानते है तो चुनाव में भाग लेने में कोई हर्ज नहीं है। बाद में कांग्रेस ने चुनाव लड़ने के इच्छुक सदस्यों को चुनाव लड़ने के लिए अनुमति दे दी और ऐसे सदस्यों ने स्वराज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े।

नवंबर १९२३ के चुनावों में बंगाल कौसिल में स्वराज पार्टी के ४० उम्मीदवार चुने गए। यतींद्र मोहन चटगांव चुनाव क्षेत्र से आनंद चरण दत्त के विरुद्ध विजयी हुए। वह उस समय स्वराज पार्टी तथा बंगाल प्रांतीय कांग्रेस समिति दोनों के सचिव थे और देशबंधु के दाहिने हाथ बन गए थे। लार्ड लिटन ने देशबंधु को स्वराज पार्टी का मंत्रिमंडल बनाने के विषय में बातचीत करने के लिए आमंत्रित किया। विचार करने के बाद देशबंधु ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया। स्वराज पार्टी ने मंत्रिमंडल बनाने के सरकार के सभी प्रयत्नो को विफल कर दिया। अगस्त १९२४ में लार्ड लिटन ने यतींद्र मोहन को मंत्रिमंडल बनाने के संबंध में मंत्रणा करने के लिए बुलाया। यतींद्र मोहन ने उन्हें बताया कि स्वराज पार्टी मंत्रिमंडल बनाने के खिलाफ नहीं थी, बल्कि विरोध तो दोहरे शासन की व्यवस्था से था और जब तक जन आकांक्षाओं की पूर्ति कौसिल के माध्यम से नहीं हो सकती तब तक स्वराज पार्टी मंत्रिमंडल बनाने का प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर सकती।

स्वराज पार्टी ने कलकता नगर निगम बनने पर १९२४ में निगम का चुनाव भी लड़ा। देशबंधु चित्तरंजन दास इसके पहले मेयर बने। उनकी १६ जून १९२५ को मृत्यु होने के बाद यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त मेयर बने। देशबंधु के निधन पर यतींद्र मोहन बंगाल प्रांतीय कांग्रेस समिति तथा बंगाल स्वराज पार्टी के भी अध्यक्ष चुने गए।

यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त पांच बार कलकता के मेयर चुने गए और अपनी निष्पक्षता, उदारता आदि गुणों के कारण कलकत्ता की जनता में बहुत लोकप्रिय हो गए। जब वह दुसरी बार मेयर चुने गए थे तो विरोधी दलो के सदस्यों ने भी उनकी प्रशंसा की थी और यूरोपियन सदस्य भी उनके व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने कलकत्ता निगम की प्रतिष्ठा काफी बढ़ा दी थी। जब वह पहली बार मेयर बने तो लड़कियो के लिए बहुत कम प्रारंभिक विद्यालय थे। निगम ने ऐसे स्कूलों की संख्या दूगुनी कर दी।

उनके समय में चिकित्सा सुविधाओं का सुधार और विस्तार किया गया। शुद्ध दूध और पानी की सफाई की ओर विशेष ध्यान दिया गया। पांच बार मेयर चुना जाना उनके लोकप्रिय होने का प्रमाण है जनता अब उन्हें शेरे बंगाल कहा करती थी।

अंग्रेज़ सरकार ने यह अनुभव किया कि जब तक स्वराज पार्टी सशक्त है तब तक कोई मंत्रिमंडल टिक नहीं सकता। अतः सरकार ने दोहरा शासन कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया था | १९२४-२६ के दौरान सरकार हमेशा मुंह की खाती रही। लेकिन १९२६ में हिंदू मुस्लिम दंगे हुए जिससे पार्टी कमजोर हुई और १९२६ में हुए कौसिलों के चुनाव में हिंदुओं और मुस्लमानों के मतभेद और स्पष्ट हो गए। सरकार ने इस अवसर का लाभ उठाकर दोहरा शासन फिर लागू कर दिया और मंत्रिमंडल बना दिया। परंतु १९२७ में हिंदू-मुस्लिम मतभेद कम हो गए और कुछ मुसलमान स्वराज पार्टी के सदस्य बन गए। अत: अग्रेज़ी सरकार की मनोकामना पूरी न हो सकी और कई मंत्रिमंडल बनते-बिगड़ते रहे। इसी समय अग्रेज सरकार ने एक चाल चली-अब तक दो मंत्री हुआ करते थे जिनमें से एक हिंदु होता था और एक मुस्लिम लेकिन अब सरकार ने तीन मंत्रियों की नियुक्ति का फैसला किया जिनमें से दो मुस्लिम होते जिससे कि मुस्लिम बहुमत में होते और वे सरकार का साथ देते। परंतु कांग्रेस इस चालवाजी को समझ गई और यह निर्देश दिया कि स्वराज पार्टी के सभी सदस्य त्यागपत्र दे दे और जब तक दोहरा शासन लागू रहे तब तक कौसिलों के चुनाव न लड़े। यतीद्र मोहन सरकार की इस फूट डालने वाली नीति से जनता को परिचित कराना चाहते थे। साइमन कमीशन के बहिष्कार के संबंध में ७ अप्रैल १९२८ को बशीरहाट सभा में उन्होंने कहा कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हिंदु-मुस्लिम फूट के कारण ही अंग्रेज भारत सरकार पर अधिकार कर सके थे और इसी फूट के आधार पर वे अपना शिकंजा और कसना चाहते हैं।

सन् १९२८ में अखिल भारतीय कांग्रेस अधिवेशन कलकत्ता में हुआ। यतीद्र मोहन स्वागत समिति के अध्यक्ष थे। अपने भाषण में यतीद्र मोहन ने पूर्ण स्वतंत्रता के लिए एक होकर संघर्ष करने का आह्वान किया। उन्होंने नारी-स्वतंत्रता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि आधी जनसंख्या को पर्दे में रखने का मतलब है कि राष्ट्र की शक्ति को कुंठित करना उन्होंने बहु-पत्नी प्रथा की भी आलोचना की। अंत में उन्होंने कहा कि भारत मां के पुत्र और पुत्रिया, एक स्वतंत्र राष्ट्र के लिए, दमन और संकटों की परवाह किए बिना, एक साथ सतत संघर्ष करें। इस अधिवेशन के अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू थे। इस अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वतंत्रता की मांग नहीं की। अगले साल, १९२९ में लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में न केवल पुर्ण स्वतंत्रता की मांग की गई, बल्कि इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक कार्यक्रम भी तय किया गया जिसमें प्रतिवर्ष २६ जनवरी को स्वतंत्रता दिवस मनाना भी शामिल था।


यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त का बीमार होना


जनवरी १९३० में उच्च रक्तचाप के कारण डाक्टरों ने यतींद्र मोहन को पूर्ण विश्राम और समुद्र तट की सैर करने की सलाह दी। परंतु अस्वस्थ होने के बावजूद २६ जनवरी को वह एक सभा में गए जहां निगम के भवनों पर कांग्रेस का झंडा फहराने का प्रस्ताव पास हुआ और अगले दिन से निगम के सभी भवनों पर कांग्रेस का तिरंगा झंडा लहराने लगा। यही उस समय राष्ट्रीय ध्वज था।

१ फरवरी १९३० को यतींद्र मोहन अपनी पत्नी के साथ सिंगापुर रवाना हो गए। रास्तें में रंगून में उनसे लोगों ने भाषण देने का अनुरोध किया, पर स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण वह टाल गए। लेकिन उन्होंने वादा किया कि लौटते समय वह भाषण देंगे। वापसी यात्रा में वह १८ फरवरी को रंगून आए। उस समय बर्मा को भारत से अलग करने की बात चल रही थी। अपने भाषणों में यतींद्र मोहन ने कहा कि बर्मा को भारत से अलग कर दिए जाने पर बर्मियों का अहित होगा, और बर्मी लोग राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम की मुख्य धारा से कट जाएंगे, ताकि अंग्रेज शासक उनकी पूर्ण स्वतंत्रता की मांग को ठुकरा सकेंगे। उन्होंने बर्मियों को राय दी कि भारत से बर्मा को अलग किए जाने से सरकार के प्रयत्नों का विरोध करें। रंगून में उनका आखिरी भाषण २१ फरवरी को हुआ। इसके बाद वह कलकत्ता आ गए।

यतींद्र मोहन के रंगून में दिए गए भाषण अखबारों में प्रकाशित हुए थे। इनके आधार पर उन्हें १३ मार्च १९३० को राजद्रोह के आरोप में कलकत्ते में गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के वारंट के अनुसार उन्हें रंगून की अदालत में १८ मार्च को उपस्थित होना था। यह गिरफ्तारी बर्मा के गवर्नर सर चार्ल्स इन्स के इशारे पर हुई थी और उनकी इच्छा थी कि यतीद्र मोहन को लंबी सजा मिले।

परंतु सर चार्ल्स इन्स की यह इच्छा पूरी न हो सकी, क्योंकि मुकदमा एक ईमानदार और निष्पक्ष न्यायाधीश श्री मौरिस कालिस की अदालत में हुआ। जज ने यतींद्र मोहन को केवल १० दिन की साधारण कैद की सजा दी।

यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त रंगून जेल से ३० मार्च १९३० को मुक्त हुए और ३ अप्रैल को कलकत्ता पहुंचे। १२ अप्रैल को छात्रों की एक सभा में एक निषिद्ध पुस्तक “दी काल ऑफ दी कंट्री” पढ़ने के कारण फिर गिरफ्तार कर लिए गए। वह जेल में ही थे कि २९ अप्रैल को उन्हें पांचवीं बार कलकत्ता नगर निगम का मेयर चुना गया। वह मेयर पद के लिए शपथ ग्रहण करने की निश्चित अवधि तक जेल मुक्त न हो सके, अतः उन्होंने संदेश भेजा कि वह मेयर नहीं बनना चाहते। तब सुभाषचंद्र बोस मेयर चुन लिए गए।

यतींद्र मोहन २५ सितंबर १९३० को रिहा हुए। अब तक बहुत से कांग्रेसी नेता गिरफ्तार हो चुके थे। यतींद्र मोहन कांग्रेस के कार्यवाहक अध्यक्ष मनोनीत किए गए। २५ अक्तूबर को जलियांवाला बाग में भाषण देते समय उन्हें धारा १४४ का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। दिल्ली में पति-पत्नी को एक ही जेल में रखा गया। गांधी-इरविन समझौता होने पर सभी गिरफ्तार असहयोगी रिहा कर दिए गए। यतींद्र मोहन और नैली भी २७ जनवरी को रिहा कर दिए गए और वे मौलाना आज़ाद के साथ कलकत्ता आ गए।

सन् १९३१ के करांची कांग्रेस में बहुत से लोग यतींद्र मोहन को कांग्रेस अध्यक्ष चुनना चाहते थे, लेकिन उन्होंने सरदार पटेल के समर्थन में अपना नाम वापस ले लिया। इस अधिवेशन में कुछ लोग गांधी-इरविन समझौते का विरोध करना चाहते थे। विरोध करने वालों का विचार था कि इस समझौते से भारत की स्वतंत्रता का प्रश्न पूरी तरह से अंग्रेजों की इच्छा पर निर्भर हो जाएगा। समझौते को स्वीकार करने के लिए जवाहरलाल नेहरू ने एक प्रस्ताव पेश किया जिसका जमनादास मेहता ने विरोध किया। यतींद्र मोहन ने प्रस्ताव का समर्थन करते हुए एक प्रभावशाली भाषण दिया। उन्होंने कहा कि महात्माजी के नेतृत्व में देश काफी मजबूत है और अंग्रेजों का शासन उखाड़ फेंकने में सक्षम है। उनका कहना था कि महात्माजी ने समझौता इसीलिए किया था कि उन्हें विश्वास था कि सारे देश की शक्ति उनके साथ है। यतींद्र मोहन के भाषण के बाद जवाहरलाल नेहरू के प्रस्ताव का विरोध नहीं हुआ।

बहुत परिश्रम करने के कारण यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त का स्वास्थ्य बिगड़ गया। डाक्टरों की राय पर वह अपनी पत्नी नैली सेन गुप्त के साथ अक्तूबर १९३१ में इंग्लैंड गए इंग्लैंड में वह अपनी सुसराल गए। उनकी सास अपने दामाद और पुत्री को देखकर बहुत प्रसन्न हुई। उन्हें गर्व भी हुआ कि उनका दामाद भारत का एक राष्ट्रीय स्तर का नेता बन गया है और उनकी पुत्री ने भी राष्ट्रीय आंदोलन में डटकर हिस्सा लिया है।


यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त की मृत्यु


लेकिन यतींद्र ज्यादा दिन इंग्लैंड में रह नहीं पाए। अंग्रेज सरकार ने भारत के नेताओं को फिर जेल में बंद कर दिया था। गांधीजी ने वाइसराय विलिंगडन को मुलाकात के लिए दो बार तार दिया पर वाइसराय ने दोनों बार इनकार कर दिया। इस पर गांधीजी ने एक वक्तव्य दिया जिस पर उन्हें गिरफ्तार करके यरवदा जेल भेज दिया गया। इन सब घटनाओं के कारण यतींद्र मोहन इंग्लैंड से जल्दी ही लौट आए। २० जनवरी १९३२ को बंबई पहुंचते ही उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया और दार्जिलिंग जेल में भेज दिया | जहां ऊंचाई के कारण उनका रक्तचाप बढ़ गया। जब उनका स्वास्थ्य अधिक बिगड गया तब उन्हें जलपाईगुड़ी जेल में ले जाया गया, वह एक साल तक बिना कोई मुकदमा चलाए रखे गए। तबीयत ज्यादा बिगड़ने पर उन्हें फरवरी १९३३ में कलकत्ता मैडिकल अस्पताल में बंदी-मरीज के रूप में भर्ती किया गया।

अभी यतींद्र बंदी-मरीज के रूप में अस्पताल में ही थे, जब कांग्रेस का अधिवेशन कलकत्ता में करने का निश्चय हुआ। इस समय कांग्रेस पर रोक लगा दी गई थी और जो अध्यक्ष बनता उसे सरकार पकड़ लेती थी। यतींद्र की पत्नी नैली सेन गुप्त को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। इससे पहले यह सम्मान केवल दो और महिलाओं को मिला था - ऐनी बेसेंट(१९१७) और सरोजिनी नायडु (१९२५)। कांग्रेस अधिवेशन में नैली सेन गुप्त ने अध्यक्ष पद से अभी कुछ शब्द ही कहे थे कि पुलिस उन्हें भी पकड़कर ले गई। कुछ दिनों बाद जब मामला अदालत में पेश हुआ तो वह छूट गईं।

यतींद्र मोहन की तबीयत ठीक नहीं हुई तो उन्हें ५ जून १९३३ को रांची ले जाया गया जहां उनकी पत्नी को भी साथ रहने की अनुमति मिल गई। परंतु अन्य किसी से मिलना मना था। २२ जुलाई १९३३ की रात में उनकी तबीयत बहुत खराब हो गई तो उन्होंने अपनी पत्नी को आवाज दी। जब नैली उनके पास पहुंची तो वह बेहोश थे। सिविल सर्जन आया लेकिन चार घंटे तक प्रयत्न करने पर भी उनकी बेहोशी नहीं टूटी और करीब दो बजे रात को उनका देहांत हो गया। मृत्यु के बाद उनका शव कलकत्ता लाया गया।

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